सुमेर दसवीं कक्षा का छात्र है ।छुट्टी के समय घर जाते समय दोस्तों ने कहा–“सुमेर कल कालेज की छुट्टी है, हम लोग पिकनिक का प्रोग्राम बना रहे है तुम भी चलोगे?”
“कहाँ जा रहे हो ?”
“यह अभी तय नहीं किया है”
“तय कर के बताओ, मुझे तो पूरा प्रोग्राम बताने के बाद ही घर से छुट्टी मिलेगी।”
“घर पर कह देना कि गंडीपेठ जा रहे हैं ,रात तक लौट आएँगे।”
“तुम्हारी बातों से तो नहीं लग रहा कि तुम सच कह रहे हो और मैं घर से झूठ बोल कर कहीं नहीं जाता।”
“पर सही जगह का नाम बता दिया तो घर से छुट्टी नहीं मिलेगी।”
“क्या हम किसी गलत जगह जा रहे हैं ? ”
“नहीं ,हमारे लिए तो वह फन की जगह है पर माता पिता को बताया तो परमीशन नहीं मिलेगी।”
“ऐसी कौन सी जगह है ,मैं भी तो जानू ?”
“बता दूँ ?…पर किसी को बताना नहीं। ”
“ठीक है बताओ।”
“स्ट्राबरी, ब्लैकबेरी, बनाना फ्लेवर, मैंगो फ्लेवर आदि का मजा लेने चलना है तो चलो।”
“नहीं यार आज नहीं मेरा गला बहुत खराब चल रहा है ,आइसक्रीम तो बिलकुल मना है,केक-पेस्ट्री खा सकता हूँ।”
दोस्त हँसने लगे– “तुझे क्या लग रहा है हम आइसक्रीम या केक- पेस्ट्री खाने जा रहे है?”
“नाम तो तुमने उन्हीं के लिए हैं, फिर क्या खाने जा रहे हो?”
“अरे बुद्धू राम हम कुछ खाने नहीं, पीने जा रहे हैं।”
“क्या पीने जा रहे हो और कहाँ जा रहे हो ? ”
“हम लोग हुक्का सेंटर जा रहे हैं और ये नाम हुक्कों के विभिन्न फ्लेवरों के हैं,कुछ समझे?”
” हुक्का सेंन्टर ? …ये क्या होता है ?”
“अरे तू किस दुनिया में रहता है, तुझे यह भी नहीं पता कि हुक्का सेंटर क्या होते है? शहर में कम से कम डेढ़ सौ हुक्का सेंन्टर खुले हुए हैं।”
“मैंने तो नहीं सुना, क्या तुम लोग कभी वहाँ गए हो?”
“हाँ दो तीन बार… बहुत मजा आया था।”
“काहे में ?”
“अलग अलग टेस्ट का हुक्का पीने में पर लगता है तुमने कभी हुक्का देखा भी नहीं है।”
” फिल्मों में देखा है पर उसमें तो तंबाकू होता हैं। क्या तुम लोग वहाँ तंबाकू पीने जाते हो ? ”
“अब तू सवाल जवाब ही करता रहेगा या हमारे साथ चलने का प्लान भी बनाएगा ?”
“सॉरी यार मैं नहीं चल पाऊंगा। झूठ बोल कर मैं जाऊंगा नहीं और सच बोलने पर इस की इजाजत नहीं मिलेगी।”
“तू कब तक मम्मा पापा का छोटा सा बच्चा बना रहेगा ? ”
” बात माता पिता की इजाजत की नहीं है ,मेरा मन भी ऐसी जगहों पर जाने का नहीं करता। मैं तो तुम को भी ऐसी जगहों पर जाने से रोकना चाहता हूँ। इस उम्र में हमें अपना करियर बनाने पर ध्यान देना चाहिए।”
” अच्छा गुरु जी ठीक है आप मत चलिए पर हमारा यह प्लान किसी को बताना नहीं।”
“ठीक है” कह कर सुमेर अपने घर चला गया था।
सुबह अखवार में समाचार था कि हुक्का सेंटर पर छापा मार कर पुलिस ने साठ सत्तर बच्चों को पकड़ा है। उनमें बहुत से बच्चे पन्द्रह वर्ष से लेकर बीस – इक्कीस वर्ष के भी हैं । जब कि इक्कीस वर्ष से कम उम्र के बच्चों को वहाँ प्रवेश नहीं दिया जा सकता ” यह समाचार पापा ने पढ़ कर सब को सुनाया था।
मम्मी ने कहा “कुछ दिन पहले अपने शहर में भी छापे मार कर बच्चों को पकड़ा गया था पर मुझे तो एक बात आज तक समझ में नहीं आई कि इस तरह के सेंन्टर तो इस तरह खुल रहे हैं जैसे कोई हैल्थ सेंन्टर खोले जा रहे हों। इन को खोलने पर किस का भला होने वाला है?”
“ड्रग बेचने वालों और नेताओं का ही भला होता होगा या फिर इन सेंटरों का । असल में बहुत से सेंटर तो तरह तरह के फ्लेवरों की आड़ में बच्चों को नशे का आदी बना रहे हैं…तुमने वह समाचार सुमेर को बताया था?”
“नहीं मुझे लगा उसे बताऊंगी तो जिज्ञासा वश उसे भी जाने को मन करेगा … उस के मन में ऐसी जगहों के लिए जिज्ञासा क्यों पैदा की जाए…बस यही सोच कर नहीं बतायाथा।”
“हम नहीं बताएंगे तो भी बच्चे स्कूल -कालेज जाते हैं, उन्हें वहाँ से पता चलेगा पर वहाँ से आधी -अधूरी जानकारी मिलेगी पर हम जो बताएंगे उसके हर पहलू पर बताएँगे…बच्चों को ऐसे समाचार बताना बहुत जरूरी हैं। वरना बच्चे बिना यह जाने कि क्या है, क्या हो सकता, दोस्तो के कहने पर फन के लिए चले जाते हैं।”
“हाँ मम्मी, पापा बिलकुल ठीक कह रहे हैं। मेरे साथ के कुछ लड़के भी कल ऐसे ही किसी सेंटर में धुआं उड़ाने जाने वाले थे। मुझ से भी चलने को पीछे पड़े थे पर मैं ने मना कर दिया था, हो सकता है पकड़े गए बच्चों में वह भी हों।”
मम्मी सुन कर हिल गई –“ यह तू क्या कह रहा है ,तेरे स्कूल के बच्चे भी जाते हैं ? तू इन हुक्का सेन्टरों के बारे में पहले से जानता था ?”
“नहीं एक दो दिन पहले ही बस इतना पता चला था कि यह कोई फन की जगह है पर यह तो अब पता चल रहा है कि यह कोई गलत जगह है। हम बच्चों को इस तरह की सही जानकारी होनी चाहिए। साथ के लड़के तो बस फन या मजे की बात करते हैं बल्कि मैं समझता हूँ कि इस के दूसरे या बुरे पक्ष से ज्यादातर बच्चें अनजान हैं।”
“और बेटा जब तक इसका ज्ञान होता है तब तक देर हो चुकती है।”
“कैसी देर पापा ?”
“शुरू में तो बच्चे जिज्ञासा वश ग्रुप बना कर चले जाते हैं पर यह एक मकड़ जाल सिद्ध होता है। दस पन्द्रह मिनट हुक्का गुड़गुड़ाने के लिए वे लोग सौ -दो सौ,पाँच सौ रुपए वसूल करते हैं। कुछ बच्चों को चस्का लग जाता है तो वह चोरी आदि के चक्कर में फॅसते हैं। फिर कहीं कहीं तो तरह तरह के स्वादों की आड़ में कोकीन, ब्रााउन शुगर, हीरोइन जैसे
मादक पदार्थो को भी परोसा जा रहा है। एक बार इसकी लत लग गई तो फिर इस से बाहर निकलना बहुत मुश्किल होता है…छात्र मजा ले ले कर हुक्का गुड़गुड़ा रहे हैं और इसके धुंऐ के साथ शरीर में जहरीला रसायन निकोटीन भी जा रहा है। जिन से पेट, गले व फेफड़े की बीमारियाँ बचपन से घेरने लगती हैं। यह चस्का बच्चों को अपराध की तरफ भी धकेल रहा
है।”
“थैंक गॉड मैं उनकी बातों में नहीं आया। पापा अब इन लड़कों का क्या होगा?”
“पता नहीं बेटे उनका क्या होगा। हो सकता है कुछ बच्चों को जो कम उम्र के हैं और पहली बार पकड़े गए हैं उनके माता पिता को बुला कर वार्निग देते हुए छोड़ दिया जाए ताकि सुधरने व संभलने का उन्हें एक अवसर मिल सके जो कि अच्छा कदम होगा। इस से बच्चों व माता पिता दोनों को ही सबक लेने का अवसर मिल सकेगा। पर पुलिस सेंटर संचालकों पर जरूर कार्यवाही करेगी क्यों कि यह बचपन में जहर घोल रहे हैं।”

पवित्रा अग्रवाल
बेंगलौर (कर्नाटक )
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