अपनी बातः बच्चों की दुनिया में

एकबार फिर पहली मई आ गई है और ध्यान मजदूर आंदोलन और कम्यूनिज्म या लाल सलाम जैसे कई विभिन्न विषयों पर चला ही जाता है, जबकि अब तो बड़े-से बड़े कम्यूनिस्ट देश भी तेजी से पूंजिवाद की तरफ ही बढ़ रहे हैं और चारो तरफ ही आर्थिक व्यवस्था सुदृढ़ करने की ही होड़ लगी हुई है। हमारा भी २९ अप्रैल का दिन ब्रिटिश पार्लियामेंट में बीता तो ध्यान सामंत शाही पर जाना भी स्वाभाविक ही था। यह बात दूसरी है कि संदर्भ राजनीति का नहीं, अपनों और अपनों के उत्सव का था। भाषा और साहित्य के सम्मान का था ब्रिटेन की वातायन संस्था द्वारा समायोजित वर्ष २५-२६ के सम्मानों के उपलक्ष में।
अब जब लाल सलाम करने वाले सभी देश भी पूंजिवादी ही होते जा रहे हैं, तो हम भी इस दिन के पुराने सारे इतिहास को भूलकर , आगे से इसे श्रम-दिवस की तरह ही याद रखेंगे और श्रम की महत्ता का ही जश्न मनाएँगे और पूरे विश्व में चल रहे इन सारे लडाई-झगड़ों को भूलकर बच्चों के साथ मिलकर उनका ही उत्सव मनाएँगे इस अंक में।
उनकी बातों का, कहानियों का, बचपन के भोलेपन और मिठास का आनंद लेंगे इस अंक में।

याद आ रही है अपनी ही एक कविता,

फिर…

‘पहले मुर्गी आई या अंडा
सोच का बुरा है यह फंदा
छोड़ो सोचो मत ज्यादा
यह तो बात वही है होली
मुन्नी सयानी हंसकर बोली
बैठे-बैठे रह जाओगे सोचते
बीज गिरा था पेड़ से पहले
या पेड़ उगा बीज से पहले!’
शैल अग्रवाल

कौन किसका जनक है, सृष्टि रचयिता है-बच्चा या बड़ा?
एक तरफ सीखने की बढ़ने की चाह है , उत्साह और उम्मीद है तो दूसरी तरफ अनुभवों से अर्जित सोच व समझ है…दूरदर्शिता है। माना हर बच्चे में बड़ो की सभी संभावनाएँ रहती हैं और हर बड़ा अंत में मिटकर फिरसे बच्चा बनकर ही लौटता है, यह भी सच है। फिर भी बच्चे को बड़ा नहीं माना जा सकता, और अगर बड़ा बच्चे की तरह व्यवहार करने लग जाए, तो हास्यास्पद दिखने लगता है। इतने गंभीर न भी हों,तो भी यदि विकास रुका, चाहे वह शरीर का या बुद्धि का तो फिर तो आगे कुछ विशेष जानने और सीखने को , उत्साहित और ललायित होने को रहता ही नहीं।

जरूरी है कि अंदर के बच्चे को हर संभव अंत तक जिंदा रखा ही जाए, ताकि सहजता और मासूमियत बनी रहे। उत्साह और आनंद बना रहे।

बच्चों की दुनिया मोहक है , रंगीन है और हजार उलझनें और प्रश्न लिए हुए भी…कई बार तो बड़े भी हत्प्रभ रह जाएँ, ऐसे जटिल प्रश्न। क्योंकि हर बच्चे के अंदर एक वयस्क सदा रहता है और बच्चा या बालमन तो कभी बड़ों को छोड़ता ही नहीं। जी हाँ, वयस्क होकर भी नहीं। जरा मौका मिला नहीं, कि सारे सपनों की पिटारी लेकर आँखों में खेलने बैठ जाता है यह हमारे मन के अंदर छुपा बच्चा और हम वापस बचपन की उड़ान लेने लग जाते हैं…वही रूठना-मनाना और कट्टी-मिल्ली जीवन भर ही तो चलती हैं। आश्चर्य नहीं कि कई सवाल जैसे कि उपरोक्त मुर्गी और अंडे वाला भी ज्यों का त्यों ही हैं आज भी और सोच को निष्कर्ष पर न ले जाकर गोल-गोल घुमाता है।

सवाल चाहे कितना भी टेढ़ा हो, परन्तु एक बात तो निश्चित है कि न तो मुर्गी बिना अंडा ही संभव है और ना ही अंडे के बिना मुर्गी ही। दोनों ही एक दूसरे पर आश्रित हैं, एक दूसरे से और एक दूसरे में ही अस्तित्व है इनका , जैसे कि आदमी और उसके बच्चे का भी। आदमी नहीं तो बच्चा नहीं और बच्चा नहीं तो वयस्क भी नहीं। क्या फर्क पडता है पहले आदमी आया या फिर बच्चा, मुर्गी आई या फिर अंडा! हां, इतना अवश्वय कहा जाता है कि बृह्माजी ने सृष्टि रची थी। बाइबल में भी गौड क्रीएटेड अर्थ इन सेवेन डेज। और वर्ड्सवर्थ ने कहा कि चाइल्ड इज द फादर औफ द मैन ,यानी बच्च ही वयस्क का पिता है। बच्चा ही तो है जो बड़ा होता है, बड़े होने पर भी हमारे अंदर सदा रहता है। हमें आशावादी और जीवित रखता है। सोचने-समझने को प्रेरित करता है। फिर इस पहेली को कैसे सुलझाएँ कि कौन पहले आया अस्तितव में? शायद जरूरत ही नहीं है। हां, इस बच्चे को बचाए रखने में ही बड़ों की भी भलाई है, क्योंकि विकास की गुंजाइश रह जाती है, सहजता और सरलता बनी रहती है जीवन में। अँधेरी से अंधेरी रात में भी रौशनी में विश्वास बना रहता है।
बड़े छोटे सभी बच्चों के लिए हमने एक खूबसूरत बाल विशेषांक संजोया है इस अंक में-कई कई अच्छी और प्रेरक कविता कहानी और चित्रों के साथ। अपने खूबसूरत कार्टून और कहानी के साथ लेखनी में शामिल हैं नीलमणि। लेखनी परिवार में स्वागत है पहली बार रानी सुमिता जी का और गोलेन्द्र गोलू जी का व हमारी नन्ही लेखिका आद्रिका अग्रवाल का। रचनाएं कैसी लगीं? बताना मत भूलिएगा । आपकी राय ही हमारी दिशा निर्देशिका और प्रेरणा है।

लेखनी का अगला अंक युद्ध और इसकी अर्थ हीनता, व निभीषिकाओं पर है। कारण और प्रभाव आदि पर है। तबतक आपसे विदा लेती हूं। रचना भेजने की अंतिम तिथि २० जून है निम्मांकित ई. मेल पर- shailagrawal@hotmail.com, shailagrawala@gmail.com पर।

शुभेच्छु,
शैल अग्रवाल

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