बचपन से ही एक जिज्ञासा थी-कैसा है वह पड़ोसी देश जिसके सैनिक आए दिन ही हिमालय के उस पार से झांकने चले आते हैं और जिनकी विस्तारवादी नीति पड़ोसियों के पूरे-पूरे देश और टापू निगल लेती है, परन्तु कोई कुछ नहीं कर पाता ?
उस नौ दस साल की उम्र में ही पिताजी ने अखबार पढ़ने की आदत लगा दी थी और अखबार मुख्यतः पड़ोसी देशों की ऐसी ही खबरों से ही तब पटा रहता था। जबकि १९५५ के आसपास ही हिन्दी-चीनी भाई-भाई के नारे भी खूब ही सुने ते। यह तो बड़े होकर ही समझ में आया कि भाई-भाई का अर्थ यहाँ वह विश्वास भरा रिश्ता नहीं, जो प्रायः घर के बुजुर्ग परिवारों में रखना चाहते हैं। कई सवाल मन में उठते और इन पड़ोसी देशों के बारे में बहुत कुछ जानने की जिज्ञासा भी। उन्हें देखना और जानना चाहती, परन्तु मुँह खोलने से पहले ही कन्फ्यूशश का लिखा याद आ जाता कि कईबार चुप रहना ही बेहतर है, बजाय इसके कि मुँह खोलकर सारे संदेह ही मिटा दो! सही-गलत जानने और निर्णय लेने की उम्र नहीं थी वह। फिर अखबार भी तो मिर्च-मसाले लगाकर ही खबरें छापते हैं और अक्सर अतिरिक्त जिज्ञासा में बिल्ली को जान से हाथ धोना पड़ जाता है- अंग्रेजों में भी तो कुछ ऐसी ही एक प्रचलित कहावत है। फिर तुरंत ही यह भी सोचने लग जाती कि अगर हिमालय पर मेरा घर होता, तो क्या मैं यूँ चुप बैठ पाती? सवाल निश्चय ही परेशान करने वाले थे और जबाव और भी बेचैन करने वाले ।
चार दशक बाद यूरोप में रहते हुए जब एक लम्बा अरसा गुजर गया था और अतीत अतीत में था, अतिक्रमण और अनाधिकारिक अपहरण की ख़बरें विचलित तो करती थीं परन्तु उस तरह से लगातार परेशान नहीं, अनायास ही एक दिन अन्य देशों की भाँति चीन घूमने जाने का कार्यक्रम बन गया। और 10 अक्तूबर 2010 को हम एक अन्य मित्र दम्पति के साथ चीन पहुँच भी गए, पड़ोसी नहीं, एक पर्यटक की तरह ही।
अगर हमारे पास ताजमहल है तो उनके पास अद्रभुत दुनिया की सबसे लम्बी दीवार है। पूरे चार हफ्ते थे हमारे पास, चीन में जो कुछ घूमने लायक़ था, देख पाना संभव था, देखने और जानने को। इसी निश्चित और निर्धारित समय में पूरा महसूस कर लेना था हमें चीन के सारे स्वाद और जगहों को। पर सब कुछ पूर्व निर्धारित य़ात्रा संयोजक द्वारा, हर दिन और हर जगह का कार्यक्रम बना हुआ। फिर भी मन में एक अन्वेषक सैलानी-सी तितलियाँ फड़फड़ाने लगी थीं। पूर्णतः अनजान, अपरिचित और रहस्यमय देश था चीन मेरे लिए, बचपन से ही अद्भुत जानने की जिज्ञासा और कौतुहल से भरा हुआ। हमारे भारत की तरह ही एक बेहद गौरवमय ज्ञान और संस्कृति का भंडार …विशेषतः खगोल शास्त्र, ज्योतिष और गणना आदि के विषयों में।
पर जाने से पहले ही किसी मित्र ने तो यहाँ तक कह दिया- ज्यादा अंदरूनी भागों में घूमना है तो अकेले नहीं जाना चाहिए चीन जैसे देशों में। पर हम अकेले कहाँ थे, एक और मित्र दम्पति थे हमारे साथ इस पूरी यात्रा में और आज जब याद करने बैठी हूँ, तो वाक़ई में अविस्मरणीय यात्रा थी वह चीन की।
सबकी सलाह सुनते-समझते हमने लंदन से उड़ान ली थी। जहाज लंदन से उड़ा तो १२ घंटे बाद सीधा शंघाई में जाकर ही रुका था।
रात के नौ से सुबह के आठ बजे तक का समय उड़ान में मुख्यतः सोते ही बीता था। फिर चीन का समय में आगे होना भी बहुत अच्छा लगा। हमारे पहुँचते-पहुँचते ही वहाँ की सुबह सोई-सोई नहीं, कामकाजी और चहल-पहल भरी हो चुकी थी। होटल पंहुचते ही हम भी फ्रेश होकर तुरंत ही निकल लिए। मन और पैर दोनों ही उमंग से भरपूर थे घूमने के लिए। वैसे भी दो ही दिन तो थे हमारे पास शंघाई में और देखने को बहुत कुछ था।
चीन का संभवतः सबसे आधुनिक शहर शंघाई अमेरिका और यूरोप के शहरों से टक्कर लेता दिखा। ऊँची-ऊँची इमारतें और सभी में धूप पड़ते ही चमचम करती वैसी ही अनगिनत कांच की खिड़कियाँ। तीन-चार लेन की सड़कें और उन पर सरपट दौड़ती-भागती लैम्बगीनी और मर्सडीज जैसी मंहगी-मंहगी कारें। वही यूरोप की व्यस्तता …पैदल चलते लोगों के हाथों में भी वही बैग और लैपटौप और कानों पर वैसे ही मोबाइल फोन चिपके हुए , फिर भी सभी भागते-से , मानो किसी के पास थमने-रुकने का वक़्त ही नहीं।
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प्रसिद्ध विश्व-व्यापार मेला चल रहा था शंघाई में, तो साथ आए मित्र-दंपत्ति की इच्छानुसार होटल से सीधे हम वहीं पहुंच गए और पहला आधा दिन प्रदर्शनी गांव में ही बीता। हाँ गांव ही सही शब्द था उस बृहद क्षेत्र के लिए। जिसे पूरा देखना एक दिन तो क्या एक हफ्ते में भी संभव नहीं था। खास करके मेरे जैसे व्यक्ति के लिए-जबतक हर चीज को आराम से देखूँ समझूँ नहीं, आनंद ही नहीं आता, पर वक़्त ही तो नहीं था हमारे पास। और मेरी आँख में यह भी एक विरोधाभास ही है कि घूमने जाओ कहीं और वक़्त न हो आपके पास। खैर… यूरोप कक्ष सामने था, शुरुवात वहीं से की गई। बहुत कुछ देखा समझाा, पर नया-सा या विशिष्ट कुछ नहीं। ऐसे मेले इंगलैंड और बरमिंघम की नेशनल प्रदर्शनी सेंटर में पहले भी देखे थे। वही फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन आदि के ही स्टाल। इतना विस्तृत था वह परिसर कि एशियन सेक्सन की तरफ तो जाना ही नहीं हो पाया। चीन तक को नहीं देखा। इच्छा उसे ही देखने की थी। यूरोप में तो रहते ही थे। पर बहुमत नहीं मिला-चीन का क्या देखना, चारों तरफ़ उनका ही तो सामान है-कहकर सब मुड़ लिए।
रात भर की उड़ान की थकान और कुछ बोरियत, बस पैर यूँ ही घिसटते ही रहे ताल पर ताल मिलाते दो तीन घंटे कहीं भी और किसी भी स्टाल पर। जानने और समझने की जिज्ञासा ही नहीं हुई, जो कभी पिताजी के साथ प्रगति मैदान में घूमते हुए हुआ करती थी और खिलौने और मन की चीजों से कई-कई थैले भर लिया करते थे। या फिर बरमिंघम में कुछ और नहीं तो चौके के लिए कुछ छोटे-मोटे गैजेट तो ले ही लेते थे। स्वभाव के विपरीत खाली हाथ ही लौटते देख पति को भी आश्चर्य हुआ और पूछ बैठे‘ ठीक तो हो ना? ‘
और तब कान तक खिंच आई मुस्कान के साथ बिना जवाब दिए सब ठीक भी हो गया। हमारा मूड भी।
सब अपनी-अपनी मन की चीजें देख और समझ रहे थे। अंतरिक्ष रिसर्च कक्ष ने मुझे भी बांधा। विशेषतः सड़क पर रौशनी के खंबों की जगह अंतरीक्ष से कृतिम चांद से रात में अंधेरा हटाने वाली योजना ने। और भी कई ऐसी अचंभित करती योजनाएँ थीं वहाँ पर, जिनसे पृथ्वीवासियों का अन्तरिक्ष में भी ट्रैफ़िक जाम करने का पक्का इरादा समझ में आ रहा था। पर घूमते-घूमते अब तक सूरज सिर पर चढ़ आया था। पास ही फूड कोर्ट जैसी एक जगह पर शंघाई शाकाहारी चो मीन और सिंगापुरी नूडल्स खाकर हम वापस होटल लौट आए । पसंदीदा और स्वादिष्ट क्लीयर सूप ने वाकई में पुनः उर्जा दे दी थी। शाम को शंघाई के नदी किनारे बसे खूबसूरत बुंद घूमने जाना था, सभी थोड़ा आराम चाहते थे जाने से पहले।
सुबह की उस फीकी शुरुवात के बाद, नदी पर क्रूज और जगमग शंघाई की सैर करते हुए रात के भोज का आनंद बेहद सुखद था। नए देश का नया उत्साह वापस लौट आया। पर्यटकों की चहल पहल थी चारो तरफ और शाम की जगमग सजावट भी। सजे-धजे, लोग और नियौन लाइट से झिलमिल नदी का रंगीन किनारा… फटाफट कुछ यादें भी समेट लीं कैमरे में।
गाइड ने नाव के साथ-साथ गुजरती शंघाई की ऊँची-ऊँची भव्य इमारतों के बारे में विशेष जानकारी देता जा रहा था, जिसके सहारे हमारे अगले दिन की घुमाई थोड़ी और रोचक हो गई। घूमते हुए जगहें परिचित और जानी-पहचानी-सी भी लगीं ।
अगले दिन पहला मुकाम मशहूर शंघाई टावर था। अभिभूत करने वाला भव्य और विशाल । गर्दन उठाकर ऊपर देखा तो आँखों पर छा गया। अंदर गए तो दुकानें, रेस्टोरैंट व संग्रहालय सभी उसी … पूरी तरह से आधुनिक चीन की आर्थिक प्रगति को दर्शाता था टावर। पर्यटकों की भीड़ चारों तरफ़। शीशे का कौरीडोर वैसा ही लम्बा और डरावना, जैसा कि टोरैंटो में देखा था और एक छोटा रूप दुबई में भी। फिर भी देखते ही डर लगा कि कहीं चलते-चलते शीशा न टूट जाए और नीचे न गिर पड़ें? हालांकि जानते थे कि शीशा बेहद मजबूत है। कोई गिरता नहीं। फिर भी डरते रहे – हादसे कहकर तो नहीं आते ! बुद्धि चेताती रही । पर हमें तो भयभीत होना ही था। इसीलिए तो आए थे वहाँ। डरते-डरते गए और पूरा पार करके हँसते-ङँसते लौट भी आए । फिर तो कोई आधे रास्ते तक कोई पूरा पार करता पर सभी गए। एकाध को तो घुटनों के बल भी चलते देखा।
फिर हम शंघाई के मुख्य संग्रहालय में खड़े थे जिसने हमें चित्रों द्वारा शहर के इतिहास से परिचित कराया। कुछ अन्य एतिहासिक बर्तन व गहने और कपड़े आदि भी थे वहाँ प्राचीन ग्रामीण चीन को दर्शाते हुए।
हमारा अगला पड़ाव शुजौ चीन का लिटल वैनिस था। किसी जमाने में 6000 लकड़ी के पुल थे यहाँ पर , जिनके नीचे नदी बहती थी किनारे-किनारे लकड़ी के मकान, जो आज भी हैं । हाँ पुलों की गिनती अब हजारों से घटकर सैकड़ों में रह गई है। कहते हैं तेरहवीं शताब्दी में इटैलियन मार्को पोलो जब यहाँ आया था, तो शुजौ की सुंदरता पर मुग्ध हो गया था और उसने तुरंत ही इसकी तुलना अपने शहर वैनिस से कर डाली थी। कई देशों में अपना एक लिटल वैनिस है, लंदन में भी है। कुछ ऐसा आकर्षण है इटली के खूबसूरत शहर वैनिस के प्रति सभी का। पर हर देश की अपनी एक विशेष छवि है, पेड़-पौधे और ख़ुशबू है। चीन का शुजो भी सुंदर था अपनी तरह के अलग ही रंग,सम्मोहन और पेड़-पत्तियाँ, स्वाद और महक के साथ।
प्रसिद्ध है यह सिल्क की खेती और उत्पादन के लिए भी। जब आए ही थे तो उसकी भी टूर ले ली। बहुत कुछ नया जाना व सीखा रेशम और रेशम के कीड़ों के बारे में उनके उत्पादन और क्रय-विक्रय के बारे में बनारस की इस बेटी ने। हाँ, बनारस भी याद आया था मुझे शुजौ में।
गार्डेन औफ जौय भी शंघाई के पास ही था। गाइड वहाँ भी ले गया। एक बेहद खूबसूरत झील और पगोडा से भरा बगीचा, जहाँ बुद्ध की शांत प्रतिमा मन को आनंद और थिरता से भर रही थी। शाम को गार्डेन औफ पीस या गुई गार्डेन के साथ दिन शान्त और सुखद रूप से समाप्त हुआ।
अब अगली सुबह से अठ्ठाइस बेहद व्यस्त और यादों के एलबम में सजे-से दिन इन्तजार कर रहे थे हमारा ।
नए नए शहर , रोमांचक और यादगार जल यात्रा और चीन की अनुपम प्रकृति और दर्शनीय ऐतिहासिक व सांस्कृतिक जगहें, वह भी हर जगह एक नए और उत्साही स्थानीय गाइड व ड्राइवर के हंसमुख और विनम्र जोड़े के साथ। प्रायः युवा ही थे। कई विद्यार्थी भी । स्त्री, पुरुष दोनों। अतिरिक्त आमदनी की वजह से पर्यटन से जुड़े हुए थे ये। बातचीत के शौकीन व अपने विषय के अच्छे और भरपूर जानकार थे ये। जगहें, जहाँ घूमना चाहिए और शहर का सबसे अच्छा खाना कहाँ मिलता है, किस मेले या बाजार में जाना चाहिए तोहफे खरीदने, सब पता रहता ।
बड़ा बोनस था यह भी हमारे लिए। ऐतिहासिक और मशहूर दर्शनीय स्थलों के साथ-साथ इन युवा गाइड की सहायता से स्थानीय फल-सब्जियाँ और पेस्ट्रीज के साथ-साथ, चीनी स्थानीय बाजारों का भी भरपूर आनंद लिया हमने। हमारे लिए मोल-तोल भी कर लेते थे ये जरूरत समझने पर । वजह चाहे आपसी जरूरत ही रही हो, पर अपनत्व और परवाह थी इनके व्यवहार में।
लम्बी-लम्बी यात्राओं में कार के अंदर दौड़ते भागते बहुत कुछ ऐसा जानने को मिला, जिसने चीनी लोगों के मन और ज़िन्दगी में झांकने का मौका दिया। युवाओं की समस्या और दुःख दर्द से परिचित कराया। सबसे बड़ी शिकायत एक ही बच्चे की तत्कालीन कड़ी योजना से थी । क्रूरता जो अपनाई जाती थी इसके निर्वहन में, उससे थी। वह ऐसा वक्त था जब यदि संभव हो तो अधिकांश युवा चीन से बाहर निकलना चाहते थे। सैनिक आते थे बन्दूक के कुंदे से मार-मारकर दूसरे बच्चे को माँ के गर्भ से गिरा देते थे। फिर भी यदि किसी को दूसरा बच्चा छुप-छुपाकर हो ही जाए तो मां-बाप को अपनी पूरी पांच साल की कमाई देनी पड़ती थी सरकार को। न दे पाएँ तो ज़िन्दा कब्र थीं, जहाँ ऐसे बच्चों को भूखा प्यासा मरने के लिए छोड़ दिया जाता था। निर्मम और विचलित करने वाले थे पता नहीं, सच्चे या झूठे वे वर्णन!
आश्चर्य नहीं कि बेबी सूप सबसे बड़ी डेलिकेसी थी उस समय रेस्टोरेंट्स में। बार बार भूलना भी चाहो, तो भी मुश्किल ही तो है उन बातों को भूल पाना। कहीं पढ़ा था कि अब चीन की घटती आबादी और घटती युवा संख्या के रहते , यह एक बच्चे वाला नियंत्रण हटा दिया गया है।
हिन्दी चीनी भाई-भाई- बचपन में नारा सुना था। फिर भारत और चीन के बीच युद्ध भी हुए और छुटपुट आक्रमण और अतिक्रमण तो आए दिन ही। पर ये युवा राजनीति से दूर, अपने जैसे साधारण और संवेदन शील इनसान लगे, विनम्र और बड़ों की इज्जत करने वाले।
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हमारा अगली फ्लाइट चीन की राजधानी बीजिंग की थी।
शंघाई से फरक थी बीजिंग। भव्य और विशाल टैनिमन स्क्वायर में चारो तरफ लाल इमारतों का बाहुल्य । फौरबिडेन सिटी बृहद। लाल दीवाल से घिरा विशाल आहता और मुख्य द्वार पर दो विशाल शेर, साथ ही बड़ी सी माओ की तस्बीर। भीड़ इतनी कि चींटी की तरह चलते-चलते पूरे चार घंटे लगे और कक्ष आदि में भारत के मंदिरों की तरह ज्यादा रुक नहीं सकते थे कहीं। हाँ बीच के बड़े आहते में आपके पास वक्त ही वक्त था चारो तरफ देखने और तस्बीरें खींचने के लिए।
सारी विस्तार वादी नीतियों के बाद भी, कुशल व्यापारी है चीन। इनके सस्ते सामान से भारत ही नहीं, पूरे विश्व का बाज़ार भरा पड़ा है। जानते हैं क्या बेचना है और कितना बेचना है। मुनाफा ही असली पहचान है इनकी। पर चीन ही क्यों, यही तो है आज की पूरी व्यापारिक दुनिया। सही गलत कुछ नहीं। पैसे की चमक व खनक ही सर्वाधिक चटक। इस बात का अहसास हुआ तब जब सामने एक म्यूजियम में हम अभी घुसे ही थे कि एक औरत ने आकर हम सभी से अतिरिक्त दस-दस युआन रखवा लिए यह कहकर कि हमने वहाँ की तस्बीरें ली हैं। खैर…
पर यहाँ के संग्रहालयों को देखकर समझ में आया कि भारत की तरह ही ज्ञान और संस्कृति का देश था यह भी, माओ के बामपंथी विचारों की बाढ़ में बहने से पहले, आधुनिक भौतिकवाद के चंगुल में फंसने से पहले!…
लोककथाएँ अपनी जैसी । वही कई-कई हाथ और आँखों वाले देवी-देवता, जो सारा लेखा-जोखा रखते और स्वर्ग या नरक किए गए करमों के आधार पर भेज देते, कभी आदमी तो कभी जानवर बनाकर। और वही शेर बन्दर भालू पंचतंत्र की कहानियों की तरह ही जिन्दगी और जीने का मर्म समझाते । बीजिंग के पास और पुराने सियाम में बसा वह गार्डेन औफ गौड्स भी तो कुछ ऐसा ही था, जहाँ एक ढुलकते रैम्प से उतरना था दंपति को एक दूसरे का हाथ पकड़कर । स्थानीय मान्यता थी कि यदि कभी एक दूसरे को धोखा नहीं दिया है तो ही उतर पाते हो, वरना लड़खड़ा जाते हैं बीच में ही। और लड़खड़ाते ही बगल के रास्ते से नीचे उतरना पड़ता था खुले आम शर्मिंदा, या बकवास है सब कहकर। आश्चर्य हुआ जब कुछ सच में लड़खड़ाए। शायद उनका अपराधी अंतस ही था। विश्वास न करते हुए भी पति और मित्र दंपति के आग्रह पर खेल जैसे मुकाबले की तरह हम चारो भी उतरे और सफलता पूर्वक उतर आए। निश्चय ही अच्छा लगा था मन को।
प्रकृति प्रेमी लगे चीन के लोग और बौद्ध धर्म का प्रभाव भी स्पष्ट था चारो तरफ। मंगोलियन आक्रमक व हिंसक इतिहास के बारे में पता चलता है इनके संग्रहालयों को देखकर। वहाँ सजे हथियारों को देखकर। एक विकसित और सभ्य शहर प्रतीत हो रहा था आधुनिक चीन, रेशम और मसालों के लिए ही नहीं, खगोलशास्त्र और ज्योतिष के लिए भी। कैलिओग्राफी और खूबसूरत तस्बीरों के लिए भी। चीनी कालीनों के लिए भी। बामपंथी कड़े माओवाद के बावजूद भी, जहाँ एक लम्बे समय तक आम-आदमी से उसकी सारी स्वतंत्रता ही छीन ली गई थी। शक्ल सूरत और कद-काठी में भी ये हमारे पहाडी लोगों से मिलते-जुलते जैसे ही लगे । शाही और आम आदमी की जीवन शैली का अंतर भी बड़ा और वैसा ही दिखा जैसा कि भारत में है। और शायद विकसित पश्चिमी देश और विकसित हो रहे एशियन देशों का अंतर भी यही है। विकसित देशों में जीवन की बुनियादी जरूरत रोटी कपड़ा और मकान गरीब से गरीब को मुहैया कराई जाती है। एक स्तर से कोई गिरे नहीं, इसका दायित्व सरकार और समाज का रहता है। पर चीन में गरीबी भी भारत जैसी ही थी और समाज वैसे ही अमीर और गरीब दो हिस्सों में विभाजित। फलतः एक बेचैनी और बेइमानी भी दिखी ।
बीजिंग में शहर के बीच जगह-जगह पार्कों में सामूहिक सुबह की कसरत करते लोगों को देखकर बहुत अच्छा लगा। एक समय निर्धारित और जो जहाँ होता वहीं रुक जाता और कसरत करने लग जाता। काश् पूरा विश्व ही यह नीति अपना लेता तो आम आदमियों का स्वास्थ कुछ तो बेहतर होता ही! परन्तु सभी तो बंधे हुए हैं अपनी जरूरतों में , दिनचर्या में और पेट पालने की मजबूरियों में !
गार्डेन औफ हैवेन जिसे स्वर्ग और धरती को जोड़ने वाली जगह कहा जाता है, पहले आम आदमियों के लिए निषिद्ध था। वहाँ भी गए , जिसपर बौद्ध धर्म का प्रभाव स्पष्ट दिख रहा था। शांत और हरा-भरा बगीचा, जहाँ ताइची और अन्य सामूहिक क्रियाएँ हो रही थीं। ध्यान करते हुए भी लोग दिखे।
बीजिंग की समर पैलेस शायद वहाँ का सबसे खूबसूरत पर्यटक स्थल था। सुन्दर बाग बगीचे, पगोडा और नदी में तैरते हंस। हमने बोट राइड की पूरा विस्तृत बगीचा घूमने का आसान और उपयुक्त तरीका वही था उस वक्त। नाव में बैठी दो चीनी छोटी बच्चियाँ बड़े कौतुक से हमें देख रही थीं। हम अकेले भारतीय थे उस नाव में। अन्य कुछ जापानीज और कुछ यूरोपियन। मुस्कराहट की तो अदला-बदली हुई बच्चियों के साथ पर इससे ज्यादा कुछ नहीं। ठीक भी तो है अजनबियों से बात करना भी तो ठीक नहीं। बच्चियाँ प्यारी और समझदार लगीं। बिल्कुल चीनी गुड़िया जैसी।
अगले दिन हमें ग्रेट वॉल औफ चाइना देखने जाना था। दुनिया के सात मानव निर्मित आश्चर्यों में से एक। मन में आनंद और उत्सुकता की तितलियाँ फड़फड़ा रही थीं। दो-तीन घंटे की बस-यात्रा के बाद हम वहाँ पहुँचे । व्यस्त और चहल-पहल भरा पर्यटन स्थल था। नीचे दोनो तरफ छोटी-छोटी दुकानें। पर कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर आँखों को एक अनोखा विस्तार-सा देता खुलापन। नीले फैले आकाश के नीचे दोनों तरफ दीवाल से घिरी लम्बी और घुमावदार अन्तहीन सड़क, जिसके बारे में कहा जाता है दुनिया की सबसे लम्बी सड़कनुमा दीवार है । एक कौतुहल भरा अजूबा ही तो। आँखें जितनी दूर देख पा रही थीं, सड़क नुमा वह दीवार चली जा रही थी। बीच-बीच में बारादरी जैसे विश्राम स्थल या निरीक्षण कक्ष बने हुए थे। कई लोग काफी दूर तक गए। सुना है यहाँ भी लोग पर्वतों की तरह ही हाइकिंग के लिए आते हैं। पर हमने पैरों की जगह आँखों से ही अधिक काम लिया। मौसम खुला होता तो शायद बात दूसरी थी, फिर हमारी यात्रा का तो अभी पांचवाँ ही दिन था। किस्मत ऐसी कि पानी भी गिर रहा था लगातार। थोड़ी देर उस पानी में ही घूमते रहे। संजोने के लिए तस्बीरें खींचते रहे। अच्छा था कि हम ने छतरियाँ खरीद ली थीं वहीं से।
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टेराकोटा सेना चीन के शीआन शहर में स्थित है। जाने क्यों एक अभूतपूर्व उत्साह था इन्हें देखने का, ग्रेट वाल औफ चाइना की तरह ही। यह एक अद्वितीय सैन्य है जिसमें ८,००० सैनिक, घोड़े, रथ हैं और सम्राट के मक़बरे की मूर्तियाँ भी। ये सैनिक और घोड़े चीन के प्रथम सम्राट, चिन शी हुआंग की सेना को दर्शाते हैं। सम्राट की मौत पर इन्हें भी उनके साथ ही दफना दिया गया था । और इनकी खोज एक किसान ने की, अपने खेत में काम करते वक्त। आज यह एक बड़ा संग्रहालय और दुनिया की वर्ड हेरिटेज की तरह सुरक्षित है। जीवन्त रूप और आकार के उन सैनिकों को देखना एक असहज अनुभव है। वास्तविकता इतनी कि सभी के चेहरे अलग-अलग, जैसे कि इन्सानों के होते हैं। वहीं पर बगल में एक संग्रहालय भी है जिसमें एक बार फिर कुछ शस्त्र और बर्तन आदि अन्य चीजें रखी हैं जो उसी खुदाई में निकली थीं।
अगले पाँच दिन हमें यलो रिवर के क्रूज पर बिताने थे । उसी क्रूज़ के दौरान हम यात्सी नदी पर छोटी बोट से सैर करने गए । अग़ल बग़ल खड़े पहाड़ और बीच के संकरे रास्तों से अपनी राह बनाती नदी, इतना मोहक था सब मानो स्वप्न लोक में बिचर रहे थे। किनारे पर एक वृद्ध का बांसुरी बजाना। थोड़ी दूर पर एक युवा मैंडलिन बजाता हुआ। चीन की खूबसूरत और अविस्मरणीय यादें हैं ये।
जहाँ नदी की सैर करते हुए पहाडों पर ऊंचे लटके ताबूतों ने मन में सिहरन और आश्चर्य पैदा किया वहीं गुआलीन के नीले पहाड़ों ने मन मोह लिया। दृश्य और शहर इतना खूबसूरत कि शायद ही भूल पाऊँ। कहते हैं यह चीन का सबसे खूबसूरत एरिया है। स्फीत और चूने की गुफाएँ तो इतनी रंगबिरंगी कि अद्भुत जादुई अहसास हुआ। स्फीत और चूने से निर्मित वह गुफाएँ किसी आधुनिक थियेटर जैसी रंग-बिरंगी और मोहक थीं। बांस के बगीचे और पहाडों पर चावल की खेती एक अलग ही खूबसूरत रूप देती है गुएलिन को। तस्बीर-सा सुंदर था सब, इतना कि भुलाए ना भूले। कहते हैं यह चीन का सबसे खूबसूरत जादुई क्षेत्र है। कहावत है कि पहले यहाँ अक्सर यात्री गायब हो जाते थे और फिर उनका कोई पता नहीं लग पाता था।
टैरा कोटा सैनिक, फौर बिडेन सिटी, यलो रिवर क्रूज, गुएलिन का प्राकृतिक सोंदर्य और नीले पहाड़, जियांग का सांस्कृतिक शो, और वह उस मठ तक गहरी खाई पर बने दो पहाड़ियों को जोड़ते लकड़ी के ब्रिज के ऊपर से जाना फिर 200 सीढ़ियाँ चढ़कर उस मठ तक ऊपर पहुँच पाना, यांग्सी रिवर की रबर की डिंगी में सैर। तीन गौर्जेज के बीच बने डैम से हमारे शिप का निकलना, बहुत कुछ था चीन में जो याद रह गया। दूसरी तरफ बड़े-बड़े होटलों में सेना जैसे पंक्तिबद्धता के साथ बैरों द्वारा खाने की मेज पर खाना परोसना और हमारे होठों पर देखते ही मुस्कुराहट आ जाना, राजसी नहीं एक सैनिक शाषक-सा महसूस करना और खुद भी अकड़ कर बैठ जाना… वह प्रचलित रैस्टोरैंड के बाहर हर तरह के छोटे-बड़े , चमड़ी उतरे जानवर आँख बन्द करके उनके बगल से हमारा गुजर जाना, जाने कितनी रंग-बिरंगी यादें हैं इस यात्रा की। जो आज क़रीब-करीब १४ साल बाद खुध-ब-खुद बाहर आने को मचलीं। पर ऐसी ही तो होती हैं ये यादें…
खूबसूरत बाग बगीचे , नीले पहाड़ और नदी के किनारे बैठा बांसुरी बजाता बूढ़ा ग्रामीण बहुत कुछ देखा और महसूस किया हमने इस यात्रा में जो भुलाए नहीं भूलता। एक किसी पुराने शाही महल में बिना हमारे तस्बीर लिए ही उस चीनी औरत का हमसे झगड़ पड़ना कि हमें युआन देने ही होंगे और हमारा भी शांति के लिए चुपचाप दस-दस युवान देकर बाहर निकल आना। और वह यलो क्रूज पर तैरते जहाज का कप्तान जो बस तबतक इज्जत करता रहा, जबतक उसे पता था कि ब्रिटिश हैं हम। पर जैसे ही पूछा कि क्या यह क्रूज तिब्बत तक जाता है, और हम कैलाश पर्वत को भी देख पाएंगे और उसके बाद उसका यह पूछना कि क्या हम भारत से हैं? फिर उसके बाद सुबह शाम के अभिवादन में तक से पहले वाले आदर का गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो जाना, स्वार्थी मानव के स्वभाव का मजाक ही तो लगा था और आज भी होठों पर बरबस हंसी ले आता है। सच कहूँ, तो कइयों की बातों से लगा कि भारत की वह इज्जत नहीं चीन की आँखों में, जो पश्चिमी देशों की है। पिछड़ा और गरीब देश मानते हैं भारत को चीनी। खैर…सोच अपनी-अपनी और खयाल अपना-अपना। अच्छे-बुरे का मिला-जुला रूप ही तो है दुनिया। और हम घूमने जाते ही इसलिए हैं कि अच्छे का आनंद लें और बुरे को नकारना सीखें व पहचानें, वह भी बिना विचलित हुए।
कई ऐसी यादें भी हैं, जो चीन के प्राचीन चिकित्सा-ज्ञान के प्रति सिर श्रद्धा से झुका देती है। शरीर के नाड़ी बिन्दुओं को दबाती बहुत ज्यादा आराम देती वह शैन्जेन की मालिश आज भी भुलाए नहीं भूलती। लगा था पूरे बदन में बीस साल पहले की उर्जा और स्फूर्ति आ गई थी उस वक्त। शैंजेन चीन का हौंकगांग से सटा आखिरी शहर है और एक बड़ा व्यापार केन्द्र भी । सुनते हैं सिल्करूट यहीं से होकर आगे एशिया और यूरोप तक जाता था। शैंजेन में सारी आधुनिख सुविधाएँ भी हैं और सारी दुनिया का सामान असली और नकली दोनों ही रूपों में उपलब्ध है। यहाँ से पैदल ही सीमा पार करके हौंगकौंग आया जाया जा सकता है। हम भी आए और अंतिम दो दिन हौंगकौंग में रहे और घूमे। अति आधुनिक हौंगकौंग में जी भरकर खरीददारी की। चारों तरफ़ खूब भारतीय दिखे। और भारतीय खाना भी बिल्कुल अपने मन लायक़ और हर तरह का।
वापसी की उड़ान यहीं से थी। इसलिए अब आंतरिक उड़ानों में अतिरिक्त पैसे देने की जरूरत नहीं थी, इसलिए जी भरकर सभी के लिए तोङफे ख़रीदे। भव्य होटल, बड़े-बड़े बाज़ार और हार्बर, फिर वहाँ जहाज में सैर यादगार और खूबसूरत अनुभव थे हौंगकौंग के। पर एक चीज जो हमेशा याद रहगी वह था हौंगकौंग का एयरपोर्ट। सज्जा और बनाव में अति आधुनिक । जिससे निकलकर हम अपनी इंग्लैंड की फ़्लाइट में आ बैठे थे और वापस घर लौटने का उस रोमांचक यात्रा के बाद बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे।

शैल अग्रवाल
संपर्क सूत्रः shailagrawal@hotmail.com
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