
पाँच लघुकथा

मीरा जैन
516,साँईनाथ कालोनी . सेठी नगर
उज्जैन .9425918116
लघुकथा-१.
बचपन बचपन
दिव्यांम के जन्मदिन पर गिफ्ट में आए ढेर से नई तकनीक के इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों में कुछ को दिव्यम चला नहीं पा रहा था घर के अन्य सदस्यों ने भी हाथ आजमाइश की लेकिन किसी को भी सफलता नहीं मिली तभी कामवाली बाई सन्नो का 11 वर्षीय लड़का किसी काम से घर आया सभी को खिलौनों में बेवजह मेहनत करता देख वह बड़े ही धीमे में व संकोची लहजे में बोला –
‘आंटी जी ! आप कहें तो मैं इन खिलौनों को चला कर बता दूं’ पहले तो मालती उसका चेहरा देखती रही फिर मन ही मन सोच रही थी कि इसे दिया तो निश्चित ही तोड़ देगा फिर भी सन्नो का लिहाज कर बेमन से हां कर दी और देखते ही देखते मुश्किल खिलौनों को उसने एक बार में ही स्टार्ट कर दिया सभी आश्चर्यचकित थे , मालती ने सन्नो को हंसते हुए ताना मारा –
‘ वाह री सन्नो ! तू तो हमेशा कहती है पगार कम पड़ती है और इतने महंगे खिलौने छोरे को दिलाती है जो मैंने आज तक नहीं खरीदे ‘
इतना ही सुनते ही सन्नों की आंखें नम हो गई उसने भरे गले से कहा- ‘ मैडम जी ! यह खिलौनों से खेलता नहीं बल्कि खिलौनों की दुकान पर काम करता है।’
लघुकथा-२
जमीन आसमान
15 अगस्त के अवसर पर एक विदेशी सामाजिक संस्था के प्रमुख भारत के एक बाल आश्रम में झंडा वंदन के कार्यक्रम में सम्मिलित हुए कार्यक्रम समाप्ति के पश्चात उन्होंने उपस्थित बाल समुदाय से पूछा-
‘ प्यारे प्यारे बच्चों ! मैं आप सबके बीच आज इसलिए उपस्थित हुआ हूं ताकि आपकी जरूरतों को पूरी करने में आप सभी की कुछ मदद कर सकूं क्योंकि हमारी संस्था का मुख्य उद्देश्य आप जैसे अनाथ और बेसहारा बच्चों को सहारा देना है बताओ बच्चों आप लोगों को किन-किन चीजों की सबसे ज्यादा आवश्यकता महसूस होती है हम उसे पूरा करेंगे ?’
किंतु किसी भी बालक ने किसी भी प्रकार की मांग नहीं रखी ज्यादा जोर देने पर बच्चों के मॉनिटर ने अपनी मंशा कुछ यूं व्यक्त की-
‘ प्रणाम अंकल !आप हमारे शुभचिंतक हैं बहुत-बहुत धन्यवाद ,अंकल बस एक छोटी सी बात आपसे कहना चाहता हूं ‘
‘ हां हां बोलो बेटा ! क्या बात है?’
पूर्ण आत्मविश्वास के साथ उसने तिरंगे झंडे की ओर इशारा करते हुए कहा –
‘ अंकल ! जिसके सिर पर तिरंगा लहरा रहा हो वे भला अनाथ और बेसहारा कैसे हो सकते हैं ‘
एक बच्चे के मुख से देशभक्ति की इतनी सटीक परिभाषा सुन उनकी आंखों से श्रद्धा के आंसू टपक पड़े उन्होंने भारत के बारे में क्या सोचा था और क्या पाया उनके मुख से बरबस ही निकल पड़ा –
‘ वास्तव में भारत महान है ।’
लघुकथा-३
आज्ञा की अवहेलना
जैसे ही जलज ने घर मे कदम रखा बुजुर्ग पिता ने बिना किसी लाग लपेट केअपने मन की बात कही या यूँ कहे आदेश दिया –
‘ बेटा ! मोहल्ले के कम्युनिटी हाल मे वास्तु के सामानों की शानदार प्रदर्शनी लगी है घर मे सुख- शांति, समृद्धि व खुशहाली आदि के लिए ढेर सारी वस्तुएं हैं आस पास के सभी महिला-पुरुष आवश्यकतानुसार वस्तु ले लेकर आ रहे हैं बहू के साथ जाकर चार छ: वस्तुएं ले आ नहीं तो सारी अच्छी अच्छी वस्तुएं बिक जायेंगी ।’
जलज पिता की बातों से बेपरवाह सोफे पर पसर गया . अपने आदेश की अवहेलना से खफा मोहन जी भी नाराज से अपने कमरे मे चले गए।
कुछ देर पश्चात जलज कमरे मे पहुँच पिता से मनुहार के अंदाज मे बोला –
‘ चलो पापा ! चाय बन गई है ‘
नाराजगी भरे स्वर मे मोहन जी ने जवाब दिया-
‘ अभी नहीं पीनी है मुझे चाय ।’
जलज ने पिता का हाथ अपने दोनों हाथों मे लेकर चूमते हुए कहा-
‘ जिसके पास पिता हो उसे किसी भी वास्तु की आवश्यकता नहीं होती
है मेरे प्यारे पापा ‘
इतना सुन मोहन जी भी भाव विभोर अपने बेटे को अपलक निहारने लगे बेटे द्वारा की गई आज्ञा की अवहेलना से मोहन जी की आँखें खुशी से नम हो गई थी।
लघुकथा-४
” उपवास ”
समीर ने घर मे कदम रखते ही सामने अक्षय को देख प्रश्न किया-
‘ क्या बात है बेटा ! आज तुम खेलने नहीं गये तबियत तो ठीक है ?’
उत्साहित स्वर मे अक्षय ने जवाब दिया-
‘ पापा ! आज मम्मी के साथ मैने भी निराहार उपवास किया है अब
उनके साथ पूजा भी करूंगा ‘
‘ क्या— ‘ अवाक समीर का उत्तेजित स्वर उभरा-
‘ नीना ! ये क्या तमाशा है अक्षय से भी उपवास करवा लिया इस धर्म कर्म
को अपने तक ही सीमित रखो बच्चों के पीछे नहीं पड़ो समझी ‘
नीना ने सफाई पेश की-
‘ समीर ! अब अक्षय कोई छोटा बच्चा नहीं पूरे चौदह वर्ष का हो चुका
है और उसने स्वेच्छा से उपवास किया है और इसमे बुराई क्या है तन
और मन के साथ
श्रेष्ठ समाज का निर्माण भी समाहित है ‘
समीर ने खीझते हुए पूछा-
‘ अब तक मैने सुना था उपवास से तन स्वस्थ व आत्मा पवित्र होती है ये
समाज बीच कहाँ से आ गया ?’
नीना ने गंभीरता पूर्वक धीमे से कहा-
‘ समीर ! बात दरअसल ये है मै चाहती हूँ अक्षय को ये भी ज्ञात हो कि
भूख क्या होती है भूख का महत्व उसे मालूम होना ही चाहिये
ताकि बड़ा होकर दीन- हीन , निर्धन व्यक्तियों के प्रति
इसके मन मे सहिष्णुता एवं उदारता के भाव हो भूखों को भोजन कराने
की लालसा इसके मन मे जागृत रहे कुछ नहीं तो किसी जरूरतमंद को हेय दृष्टि से तो नहीं देखेगा ये भी संस्कारों की अनमोल कड़ी है जो स्वस्थ समाज के लिये अति आवश्यक है ‘
उपवास के इस नये रूप ने समाज सेवी समीर को भाव विभोर कर दिया।
लघुकथा-५
चाह
स्वाति को देखते ही गोमती का पारा सातवें आसमान में पहुंच गया
‘ देखो-देखो , इस महारानी को बड़ी शान से चली आ रही है आज साल भर का इतना बड़ा दिन है, लक्ष्मी पूजन का महत्त्व ही नहीं है इसके लिये, अरे ! रीति-रिवाज , धर्म-संस्कृति भी कोई चीज होती है केवल पैसे के पीछे भागने से कुछ नहीं होगा समझी, एक दिन नहीं जाती तो कौन सा तूफान आ जाता—-.’
मां का गुस्सा देख संदीप भी सहम गया स्वाति भी चुपचाप अपने कमरे में चली गई. मां के सामने संदीप की हिम्मत नहीं हो रही थी कि स्वाति को खाने की टेबल पर बुला ले, तभी दरवाजा खुला और स्वाति हाथ मुंह धो, कपड़े बदल कर खाने की टेबल पर आ खाना खाने लगी लेकिन उसकी आंखों में आंसू देख संदीप ने कहा-
‘ रो क्यों रही हो , मां का गुस्सा भी वाजिब है कम से कम आज के दिन तो तुम्हे घर पर ही रहना चाहिए था ‘
जवाब मे स्वाति बोली-
‘ संदीप ! ये खुशी के आंसू है , मां ने क्या-क्या कहा मुझे कुछ ध्यान नहीं है , मैं तो उस क्षण से अब तक अभिभूत हूं जब गायत्री के परिजनों ने मेरे पैर पकड़ कहा-
‘ आप साक्षात देवी की अवतार हैं आपने जच्चा और बच्चा दोनों को बचा लिया हम लोगों ने तो उम्मीद ही छोड़ दी थी दीपावली में हमारे घर भी लक्ष्मी आई है हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वह भी आपकी तरह नेक दिल और सेवाभावी बने ‘
और मालूम संदीप ! आज मैने उनसे ऑपरेशन की फीpस भी नहीं ली’
स्वाति की बात सुन रही सासु मां का दिल भर आया सोचने लगी-
‘ मैं अपनी बहू सी कब बनूंगी ‘

पाँच लघुकथा

संजय भारद्वाज
9890122603
sanjayuvach2018@gmail.com
फ्लैट-1, पाँचवीं मंज़िल, हिमगिरिनाथ सोसायटी, 486-ए, एलफिंस्टन रोड, खडकी, पुणे-411003 (महाराष्ट्र)
लघुकथा-1
धनतेरस
इस बार भी धनतेरस पर चाँदी का सिक्का खरीदने से अधिक का बजट नहीं बचा था उसके पास। ट्रैफिक के चलते सिटी बस ने उसके घर से बाजार की 20 मिनट की दूरी 45 मिनट में पूरी की। बाजार में भीड़ ऐसी कि पैर रखने को जगह नहीं। भारतीय समाज की विशेषता यही है कि पैर रखने की जगह न बची होने पर भी हरेक को पैर टिकाना मयस्सर हो ही जाता है।
भीड़ की रेलमपेल ऐसी कि दुकान, सड़क और फुटपाथ में कोई अंतर नहीं बचा था। चौपहिया, दुपहिया, दोपाये, चौपाये सभी भीड़ का हिस्सा। साधक, अध्यात्म में वर्णित आरंभ और अंत का प्रत्यक्ष सम्मिलन यहाँ देख सकते थे।
….उसके विचार और व्यवहार का सम्मिलन कब होगा? हर वर्ष सोचता कुछ और…और खरीदता वही चाँदी का सिक्का। कब बदलेगा समय? विचारों में मग्न चला जा रहा था कि सामने फुटपाथ की रेलिंग को सटकर बैठी भिखारिन और उसके दो बच्चों की कातर आँखों ने रोक लिया। …खाना खिलाय दो बाबूजी। बच्चन भूखे हैं।..गौर से देखा तो उसका पति भी पास ही हाथ से खींचे जानेवाली एक पटरे को साथ लिए पड़ा था। पैर नहीं थे उसके। माज़रा समझ में आ गया। भिखारिन अपने आदमी को पटरे पर बैठाकर उसे खींचते हुए दर-दर रोटी जुटाती होगी। आज भीड़ में फँसी पड़ी है। अपना चलना ही मुश्किल है तो पटरे के लिए कहाँ जगह बनेगी?
…खाना खिलाय दो बाबूजी। बच्चन भूखे हैं।…स्वर की कातरता बढ़ गई थी।..पर उसके पास तो केवल सिक्का खरीदने भर का पैसा है। धनतेरस जैसा त्योहार सूना थोड़े ही छोड़ा जा सकता है।…वह चल पड़ा। दो-चार कदम ही उठा पाया क्योंकि भिखारिन की दुर्दशा, बच्चों की टकटकी लगी उम्मीद और स्वर में समाई याचना ने उसके पैरों में लोहे की मोटी सांकल बाँध दी थी। आदमी दुनिया से लोहा ले लेता है पर खुदका प्रतिरोध नहीं कर पाता।
पास के होटल से उसने चार लोगों के लिए भोजन पैक कराया और ले जाकर पैकेट भिखारिन के आगे धर दिया।
अब जेब खाली था। चाँदी का सिक्का लिए बिना घर लौटा। अगली सुबह पत्नी ने बताया कि बीती रात सपने में उसे चाँदी की लक्ष्मी जी दिखीं।
लघुकथा-2
मृत्युपर्व
दो-तीन दिन से वे मृत्युशय्या पर हैं। बेटा ऑफिस से छुट्टी लेकर घर पर है। उसकी दोनों बहनें भी आ चुकी हैं। रिश्तेदार भी जुटने लगे हैं।
वे भरपूर जीवन जी चुके हैं। तीसरी पीढ़ी में भी कुछ की शादियाँ हो चुकी हैं। पकी आयु, चलने की बेला, फल के टपकने की प्रतीक्षा! दो बार तो लगा कि गए पर डॉक्टर ने जाँच कर बताया कि अभी हैं। शॉल ओढ़ाने को आतुर लड़के के ससुराल से छह-सात बार फोन आ चुके। आखिर बेटी के घर का मामला है। पहुँचने में भी बारह घंटे से अधिक का समय लगता है। बहू ने अपने घर में बताया कि अभी मरे नहीं हैं। फिर से जब लक्षण दिखेंगे, फौरन बताऊँगी।
तीसरे दिन की भोर चढ़ते-चढ़ते हर रिश्तेदार उद्विग्न हो चुका था। घर में इतने सारे रिश्तेदारों को पाकर बहू और पतोहू तो पहले ही आपा खोये बैठी थीं। हरेक शून्य में घूरता, एक-दूसरे को संभावना की दृष्टि से देखता। धीरे-धीरे बेचैैनी बढ़ती गई। जिस काम के लिए आये थे, उसके सम्पन्न न होने से हताशा झलकने लगी थी। एकाध रिश्तेदारों ने तो लौट जाने का मन बना लिया।
…‘न जाने किस में जान अटकाये पड़े हैं बुढ़ऊ?’
…‘बेटा-बेटी, नाती-पोता, सब तो आ लिये।’
…‘बुढ़िया को गये भी बरसों बीत गये।
…‘ कहीं कोई पुरानी कहानी तो नहीं जो अब याद आ रही हो!’
बातें भी समाप्त हो गईं। शून्य फिर जस की तस। पूरे वातावरण में अजीब-सी मुर्दनगी छाई थी। विकलता, नाराज़गी, बेचैनी, अनवरत प्रतीक्षा।
एकाएक लगा कि छाती साँस लेने-छोड़ने के लक्षण नहीं दिखा रही है। आनन-फानन में डॉक्टर को बुलाया गया। धड़कन जाँचकर, नब्ज़ हाथ में लेकर डॉक्टर ने जवाब दे दिया।
इस जवाब ने वातावरण में चैतन्य फूँक दिया। फोन खनखनाने लगे। अगली तैयारी शुरू हो चुकी थी। जीवन मानो लौट आया था।
लघुकथा-3
आग
दोनों कबीले के लोगों ने शिकार पर अधिकार को लेकर एक-दूसरे पर धुआँधार पत्थर बरसाए। बरसते पत्थरों में कुछ आपस में टकराए। चिंगारी चमकी। सारे लोग डरकर भागे।
बस एक आदमी खड़ा रहा। हिम्मत करके उसने फिर एक पत्थर दूसरे पर दे मारा। फिर चिंगारी चमकी। अब तो जुनून सवार हो गया उसपर। वह अलग-अलग पत्थरों से खेलने लगा।
वह पहला आदमी था जिसने आग बोई, आग की खेती की। आग को जलाया, आग पर पकाया। एक रोज आग में ही जल मरा।
लेकिन वही पहला आदमी था जिसने दुनिया को आग से मिलाया, आँच और आग का अंतर समझाया। आग पर और आग में सेंकने की संभावनाएँ दर्शाईं। उसने अपनी ज़िंदगी आग के हवाले कर दी ताकि आदमी जान सके कि लाशें फूँकी भी जा सकती हैं।
वह पहला आदमी था जिसने साबित किया कि भीतर आग हो तो बाहर रोशन किया जा सकता है।
लघुकथा-4
गोटेदार लहंगा
..सुनो।
…हूँ।
…एक गोटेदार लहँगा सिलवाना है.., कुछ झिझकते, कुछ सकुचाते हुए उसके बच्चों की माँ बोली।
….हूँ……हाँ…फिर सन्नाटा।
…अरे हम तो मजाक कर रहीं थीं। अब तो बच्चों के लिए करेंगे, जो करेंगे।…तुम तो यूँ ही मन छोटा करते हो…।
प्राइवेट फर्म में क्लर्की, बच्चों का जन्म, उनकी परवरिश, स्कूल-कॉलेज के खर्चे, बीमारियाँ, सब संभालते-संभालते उसका जीवन बीत गया। दोनों बेटियाँ अपने-अपने ससुराल की हो चलीं। बेटे ने अपनी शादी में ज़िद कर बहू के लिए जरीवाला लहंगा बनवा लिया था। फिर जैसा अमूमन होता है, बेटा, बहू का हो गया। आगे बेटा-बहू अपनी गृहस्थी की गाड़ी खींचने लगे।
बगैर पेंशन की ज़िंदगी कुछ ही सालों में उसे मौत के दरवाज़े ले आई। डॉक्टर भी घर पर ही सेवा करने की कहकर संकेत दे चुका था।
उस शाम पत्नी सूनी आँखों से छत तक रही थी।
….डागदर-वागदर छोड़ो। देवी मईया तुम्हें ठीक रखेंगी। तुम तो कोई जरूरी इच्छा हो तो बताओ.., सच को समझते हुए धीमे-से बोली।
अपने टूटे पलंग की एक फटी बल्ली में बरसों से वह कुछ नोट खोंसकर जमा करता था। इशारे से निकलवाए।
….बोलो क्या मंगवाएँ? पत्नी ने पूछा।
….तुम गोटेदार लहंगा सिलवा लो..! वह क्षीण आवाज़ में बोला।
लघुकथा-5
मोक्ष
उसका जन्म मानो मोक्ष पाने के संकल्प के साथ ही हुआ था। जगत की नश्वरता देख बचपन से ही इस संकल्प को बल मिला। कम आयु में धर्मग्रंथों का अक्षर-अक्षर रट चुका था। फिर धर्मगुरुओं की शरण में गया। मोक्ष के मार्ग को लेकर संभ्रम तब भी बना रहा। कभी मार्ग की अनुभूति होती भी तो बेहद धुँधली। हाँ, धर्म के अध्ययन ने सम्यकता को जन्म दिया। अपने धर्म के साथ-साथ दुनिया के अनेक मतों के ग्रंथ भी उसने खंगाल डाले पर ‘मर्ज़ बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की।’ … बचपन ने यौवन में कदम रखा, जिज्ञासु अब युवा संन्यासी हो चुका।
मोक्ष, मोक्ष, मोक्ष! दिन-रात मस्तिष्क में एक ही विचार लिए संन्यासी कभी इस द्वार कभी उस द्वार भटकता रहा।… उस दिन भी मोक्ष के राजमार्ग की खोज में वह शहर के कस्बे की टूटी-फूटी सड़क से गुज़र रहा था। मस्तिष्क में कोलाहल था। एकाएक इस कोलाहल पर वातावरण में गूँजता किसी कुत्ते के रोने का स्वर भारी पड़ने लगा। उसने दृष्टि दौड़ाई। रुदन तो सुन रहा था पर कुत्ता कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। कुत्ते के स्वर की पीड़ा संन्यासी के मन को व्यथित कर रही थी। तभी कोई कठोर वस्तु संन्यासी के पैरों से आकर टकराई। इस बार दैहिक पीड़ा से व्यथित हो उठा संन्यासी। यह एक गेंद थी। बच्चे सड़क के उस पार क्रिकेट खेल रहे थे। बल्ले से निकली गेंद संन्यासी के पैरों से टकराकर आगे खुले पड़े एक ड्रेनेज के पास जाकर ठहर गई थी।
देखता है कि आठ-दस साल का एक बच्चा दौड़ता हुआ आया। वह गेंद उठाता तभी कुत्ते का आर्तनाद फिर गूँजा। बच्चे ने झाँककर देखा। कुत्ते का एक पिल्ला ड्रेनेज में पड़ा था और मदद के लिए गुहार लगा रहा था। बच्चे ने गेंद निकर की जेब में ठूँसी। क्षण भर भी समय गँवाए बिना ड्रेनेज में लगभग आधा उतर गया। पिल्ले को बाहर निकाल कर ज़मीन पर रखा। भयाक्रांत पिल्ला मिट्टी छूते ही कृतज्ञता से पूँछ हिला-हिलाकर बच्चे के पैरों में लोटने लगा।
अवाक संन्यासी बच्चे से कुछ पूछता कि बच्चों की टोली में से किसीने आवाज़ लगाई, ‘ए मोक्ष, कहाँ रुक गया? जल्दी गेंद ला।’ बच्चा दौड़ता हुआ अपनी राह चला गया।
संभ्रम छँट चुका था। संन्यासी को मोक्ष की राह मिल चुकी थी।

पाँच लघुकथा. 
वर्षा गर्ग
(मुंबई)
लघुकथा-१
हौसला
“अरे-अरे ये क्या है?”
गृहस्वामिनी आभा ने जैसे ही माटी का दीया जलाकर एक कोने में रखा,रंगबिरंगी लटकन ,झालर और कंदील में मानो बैचेनी सी मच गई।
आभा को आभास हुआ जैसे वे सभी आपस में उस इकलौते दीये की बुराई कर रहे हों।
“कहाँ हमारी जगमग रोशनी और कहाँ इसकी कंपकंपाती लौ।”
“अरे ये तो हवा का एक झोंका तक बर्दाश्त नहीं कर पाएगा।”
अब आभा और भी मजे से उनकी बातों की कल्पना कर रही है।
“देखो ना!ऐसा मालूम देता है जैसे बड़े लोगों की पार्टी में कोई राह चलता घुस आया हो।”
“इसे तो ये भी नहीं पता ,जबरन किसी के बीच नहीं जाते।”
अपनी चमकीली रोशनी बिखेरता कंदील भी पीछे रहना नहीं चाहता।
और वह नन्हा दीपक अपनी छोटी सी लौ को कभी दाएं, कभी बाएं लहराता हुआ सभी के साथ मिलने जुलने की कोशिश कर रहा है।
जैसे किसी मेले में गुम हुआ कोई छोटा बच्चा अपने आसपास जमा अजनबियों की भीड़ को आँखें फाड़ कर देखने में लगा हो।
“क्या ये नहीं जानता,अब इसका समय नहीं है। बार-बार तेल बाती का प्रबंध, हवा से बचाव और जरा सी असावधानी से आग लगने का खतरा भी। इन्हीं सब बातों से बचने को तो सब हमें चुनते हैं।”
आभा बताना चाह रही है,सजावट चाहे जितनी भी कर लें,पूजा की आरती आज भी दीपक से ही की जाती है।
“ये चाहकर भी हमारे जैसी रोशनी नहीं कर पाएगा।”
एक बटन से पल-पल अपने रूप बदलने में सक्षम झालर की बात पूरी होते ही एक नन्हा बल्ब फटाक की आवाज़ से फूटा,और देखते ही देखते शॉर्ट सर्किट से सारी रोशनी अंधकार में बदल गई।
आभा देख रही है गहन तमस को चीरती दीये की लौ अब निष्कम्प है।
नन्हा दीया सीना ताने अपने हिस्से की रोशनी बिखेरे हुए सार्थक कर रहा है दीपावली को।
लघुकथा-२
शरशैया
“देवी माँ ! कभी तो हमारी भी सुनी होती।
बेटा नहीं तो एक बेटी ही दे देतीं। कम से कम घर में रौनक तो बनी रहती।”
घर के सामने से निकलती देवी माँ की भव्य शोभायात्रा की आवाज़ सुन रुक्मिणी जी अपने बिस्तर पर बैठी हुई, प्रार्थना कर रही हैं।
“माँजी ! ये आप कह रही हैं ? आपके अनुसार बेटी तो शाप होती है ,पिछले जन्म का पाप होती है ?”
“मुझे माफ़ कर दो बहू। एक माँ होकर भी मैं स्त्री का दर्द नहीं समझ पाई।”
बहू आराधना के मुँह से अपने ही शब्द सुनकर रुक्मिणी जी शर्म से गड़ी जा रही हैं।
आराधना को याद आ रहा है किस प्रकार गर्भ में बेटी की जानकारी मिलते ही पोते की जिद में माँजी ने धोखे से दवा खिलाकर उसका गर्भपात करवाया था।
सालों बीत चुके हैं इस बात को,दोबारा कभी गर्भ ठहरा ही नहीं।
“कोई तो प्रायश्चित होगा बेटी,मेरी ज़िद से तुम भी मातृत्व सुख से वंचित रहीं।”
“है ना माँ ! किसी अनाथ बच्ची को गोद लेकर हम अपनी खुशियां लौटा सकते हैं।”
कोने में बैठे बेटे ने मौका देखते ही अपनी बात रखी।
“नहीं…बेटी कोई मन बहलाने की चीज़ नहीं,जो बेटा नहीं होने पर कहीं से ले आई जाए।
प्रायश्चित करना है तो आपको भी घर का सूनापन सहन करना होगा,जैसे मैं पिछले सत्रह सालों से कीमत चुका रही हूँ,समय पर उचित विरोध नहीं कर पाने की।”
अनुराधा की बात सुनते हुए बिस्तर पर बैठी रुक्मणि जी शर शैय्या सी चुभन महसूस कर रही हैं।
***
लघुकथा-३
काला चश्मा
लयात्मक गति से लोकल ट्रेन अपने गंतव्य की ओर दौड़ रही है । पीछे छूटते दृश्यों के साथ मेरा मन भयभीत होता जा रहा है। लास्ट स्टॉप आने से पहले ट्रेन लगभग खाली हो जाती है।
रात दस बजे के बाद लेडीज़ कोच में पुरुषों को भी चढ़ने की अनुमति मिल जाती है। इक्का-दुक्का लोगों के बीच अकेली लड़की का आख़िरी लोकल का सफ़र आसान नहीं होता।
इस लोकल से लौटना मेरी मज़बूरी है, शिफ्ट ड्यूटी के बाद मेरे लिए सबसे उपयुक्त और किफायती साधन यही है। किंतु तीन-चार दिनों से रोज ही इस शख़्स की उपस्थिति और उसके हावभाव भयभीत करते हैं ।
आज भी वही चेहरा बेशर्मी से घूरता हुआ दिखाई दे रहा है। अपनी हड़बड़ाहट छुपाने के लिए मैंने बैग से निकाल कर काला चश्मा अपनी आँखों पर चढ़ा लिया।
अब वह अधेड़ और भी भद्दे तरीक़े से घूरने लगा है।
स्टॉप आने में कुछ ही क्षण बाकी हैं। अचानक सीट से उठते हुए मैंने अपना काला चश्मा उसे पकड़ा दिया।
“ये क्या है?”
“अंकल आपको इसकी ज्यादा ज़रूरत है। घूरते हुए इसे लगा लेंगे,तो आपकी उम्र का लिहाज़ बचा रहेगा।”
“कक कैसी बातें रही हो बेटी..” चोरी पकड़े जाने पर घबराहट में हकलाने लगा है।
मंथर होती ट्रेन रुक गई है।
“बेटी शब्द आपके मुँह से अच्छा नहीं लगता..” कहते हुए मैंने नीचे उतरकर तेजी से चलना शुरू कर दिया ।
एक उम्मीद मन में है, इन घूरती निगाहों का सामना शायद अब कभी नहीं होगा।
***
लघुकथा-४
लक्ष्मी,दुर्गा,सरस्वती
उनके कदमों की आहट सुनते ही मेरे भीतर भी तरंगें उठने लगती हैं।उनके किस्से ,हँसी-ठिठोली का इंतज़ार रहता है मुझे।
झुण्ड बनाकर पानी भरने आईं ये सभी गाँव की बहुएं हैं। अब इनके कण्ठ से फूटते सुर और भी सुरीले लगते हैं,कल कोई कह रही थी,”सासूजी मेरे हाथ से बनी तरकारी की तारीफ़ कर रही थीं। घर के बाकी लोगों ने भी कहा अब तो फूली-फूली गोल रोटियां बनाना भी सीख गई।
मन रम गया इसका अपनी गृहस्थी में।”
उनके चेहरे पर स्थाई रूप से बसी रूक्षता की जगह अब स्निग्धता दिखाई देती है। घरवालों की बुराई,लगाई-बुझाई अब नहीं होती।
अब तो सब नई-नई बातें सीख कर एक दूसरे को बताया करती हैं।
शायद इनके घरवाले भी इस परिवर्तन से अचरज में होंगे।
मुझे क्या,मुझसे कोई पूछने थोड़ी आयेगा,और न ही मैं किसी को कुछ बताने जाऊंगा।
कभी-कभी तो पानी की मटकियां एक ओर रख सब थोड़ा थिरकती भी हैं, हर एक पैर की थिरकन धरती में हिलोरें भरती है।
इनके चेहरे का तेज अब इन्हें औरतों से अधिक लक्ष्मी,दुर्गा,सरस्वती में बदल रहा है।
आप लोग विश्वास नहीं करेंगे,इनके अंदर बढ़ते आत्मविश्वास ने बंजर धरती पर खड़े मुझ जैसे ठूंठ में भी नवजीवन भर दिया।
हाँ! बिल्कुल सही समझे आप,इन्हें ख़ुश देखकर मेरे अन्दर की ख़ुशी पहली बार कोंपले बनकर खिल रही है।
और ये चमत्कार हुआ है एक मोबाइल से,जिसे गाँव में नई आई बहू जो पढ़ी-लिखी है,अपने साथ ले आई है।
***
लघुकथा-५
घूमर
मेला अपने शबाब पर है।
पूरे गाँव में छबीली के नृत्य की चर्चा हो रही है।
जिसे देखो वही पँडाल में घुसकर अपनी जगह बनाने में लगा है।
दिनभर गाँव की औरतों की चर्चा भी छबीली के इर्द गिर्द ही घूमा करती है।
“क्या घूमर करती है,बिना रुके तीस बत्तीस चक्कर लगा लेती है, पैरों में जैसे फिरकी लगी हो।”
“कपड़े देखे उसके,और जेवर भी असली हैं।सुना है खास जयपुर से लहँगा मँगवाती है।”
एक अनजाना भय, अनजानी ईर्ष्या सबके मन में समाती जा रही है।
पुरुष वर्ग नृत्य का दीवाना हुआ रोज ही मेले जाने की जुगत में रहता।
आखिर आज महिलाएं भी समूह में मेला घूमने के बाद पँडाल में घुस गईं,अब तो छबीली को देखना ही है चाहे जो हो जाए।
आरँभिक शोर गुल के बाद जैसे ही नृत्य करने घुसी, महिलाओं का हुजूम देख पलट गई छबीली,पूरे नृत्य के दौरान घूँघट लिए रही,जमुना काकी कुछ बैचेनी से ,गौर से उसी की ओर देख रही हैं।
छबीली ने घूमर शुरू किया,और एक के बाद एक घूमती ही गई,लगा होश खो बैठी है,चक्कर खाकर गिरने के पहले ही किसी ने सहारा दिया,चेहरा उघड़ गया,जिसने भी देखा,होश खो बैठा।
वहाँ छबीली के भेष में जमुना काकी की मुनिया थी, जिसके बरसों पहले मामा के गाँव जाते हुए किसी बाघ का शिकार होने की खबर पूरे गाँव में आज तक सुनाई जाती है।
***