धारावाहिकः काव्या-भाग 1-इन्दु झुनझुनवाला

2010 की वो खामोश, पर कितनी यादों को समेटती-बिखेरती रात।

मन बहुत भारी हो गया है, ना जानें क्यूँ । ऐसा कौन-सा रिश्ता था, जिसकी टीस अभी भी बाकी है, नहीं समझ पा रही हूँ मैं।
डिवोर्स फाइल किया था यानि सम्बन्ध -विच्छेद, उस रिश्ते के लिए जो कभी बँधा भी था दिल से?
सम्बन्ध तो कभी भी नही बना दिल से दिल का । बरसों हो गए उससे मिले, एक रिश्ता जो सामाजिक स्तर पर ही था बस। हाँ, पारिवारिक स्तर पर भी कहा जा सकता है।

उसके दो बच्चों की माँ भी तो बनी थी , इसलिए शारीरिक स्तर पर भी जुडना तो हुआ ही था , चाहे-अनचाहे।
आज तक दिल से इस रिश्ते को कोई नाम नहीं दे पाई थी। पर आज जब बात टूटने की है तो समझ में नहीं आ रहा, क्या टूट रहा है मेरे मन के भीतर भी । एक हूक-सी उठ रही है दिल में,,, आखिर क्या है जो पिघल रहा है मेरे भीतर, और बहने लगा है बाहर भी ,,
अब काले पन्नों पर भी बिखरने लगी है उसकी कुछ बूंदें !

सालो से यूँ ही तो भी बूंदें छलक रहीं थे, और स्याह होते रहे थे पन्ने कोरे कागज के मेरे जीवन की तरह ही ,,,,,,

जिंदगी के नाज़ुक से धागे में,
खूबसूरत मोतियों का पिरोना । हसरत के साए में था ,
एक भूल का पिरोना । सोचा न था ये धागे मजबूत कितने हैं। मोतियों के भार से टूट भी सकते हैं । लड़ियां पिरोने में ही
मशगूल रही इतनी । सुध रहा न हसीन घड़ियां बिता चुकी हूं कितनी । वो हसीन घड़ियां
जो लौट के नहीं आतीं । याद करने को रह जाती हैं बस एक दुख भरी कहानी।
(डॉ मंजरी की डायरी से 1987)

अजीब होता है ना स्त्री का मन ! मैंने तो कभी भी चाहा ही नहीं उसे,,,, और उसकी चाहत ?
क्या वो सचमुच का प्यार था? या बस एक जिद्द, मुझे पाने की । आज क्यूँ चलचित्र की भाँति सब घूमने लगा है बन्द आँखों के पर्दे पर,,,,।

कहीं दुबकी-सी, छुपी,
एक मासूम बच्ची
टुकुर-टुकुर देखती है
समय रूपी पंछी को,
जो अपने
नन्हें-नन्हें पंखों को फैलाए
पल से दिन,
दिन से महीनों
और सालों का सफर
तय करता रहा।

सोचती है वो,
मैं वहीं- की-वही खडी,
बदलते आकाश को
देखती रही।

बदला तो बहुत कुछ है,
बूढ़ी होती श्वासे ,
अनुभवों की झुर्रियाँ,
पके बालों की सिलवटें,
झुकी उम्मीदों की कमर ,
अनचाही चाहतों की डगर।
नन्हीं-नन्हीं कलियाँ
फूल बन गई।
जो कभी सिर-माथे थी ,
रास्ते की धूल बन गई।
पर एक चीज
जो नहीं बदली
आज भी,ज्योँ की त्यों,
वो मैं हूँ, हाँ मैं ही हूँ,
जस की तस ।
अपनी उम्र से परे ,
एक छोटी-सी बच्ची,
जिसके दूध के दाँत भी,
मानों टूटे नही है।
जिसकी प्यास
बुझी नही है।
जो आगे बढना चाहती है,
खिलखिलाती है ,
कभी गुनगुनाती है,
कोने में छुपकर,
कभी आँसू बहाती है।
माँ के आँचल से लिपटकर,
सोना चाहती है।
पिता की बाहों में अब भी,
झूला झुलना चाहती है।
बात-बात पर जिद्द करती है,
इतराती भी है,
कोई कुछ बोल दे,
तो शरमाती भी है।
अपनी उम्र से परे,
अपनी उम्र को,
नजरअंदाज कर,
अपनी ही उम्र से,
जूझना चाहती है।
जो है उसे मानती नही,
जो नही है उसे,
मनवाना चाहती है ।
बडों के इस बदलते शहर में,
एक नया सहर चाहती है।
बदलते आसमां के रंगों में,
इन्द्रधनुष तलाशती-सी,
समय रूपी पंक्षी के पंखों को थामकर,
चक्र को मानो
उल्टा घुमाना चाहती है।
सालों से महीनों
महीनों से दिन
और फिर दिन से
सिर्फ कुछ पलों की ख्वाहिश
बुनती-सी,
मरने के पहले
जीना चाहती है,
बस पल-दो-पल,
मस्ती भरे नगमें
बचपन के ,
अल्हड़पन के,
छेड़ना चाहती है,
मन में छुपी एक मासूम-सी बच्ची।
(डॉ इन्दु)

याद आने लगे वो खूबसूरत दिन ,,,,

सावन की पहली बारिश थी, मैं अपनी सहेली अंजु के साथ कालेज से घर के लिए निकली। हल्की-हल्की फुहार रिक्शे पर, हमारे कपड़ों पर, मानों छोटे-छोटे मोती चमकने लगे हों।
सोलह साल की कमसिन,अल्हड़ मैं और अंजु। थोडे सूखे, थोडे भीगे से कपडे, घर के गेट तक पँहुचे, माँ ऊपर खिडकी पर शायद मेरे ही इन्तजार में खडी थी , आते ही मीठी डाँट लगाई -‘भीग गई है,,,जा, जाकर पहले कपडे बदल ले , मैं तेरे लिए गरम चाय बनाती हूँ, तेरे पापा भी पोस्ट आफिस से आते होंगे ।’

चहकती-सी मैं अपने कमरे की ओर बढ गई ,जल्दी-जल्दी कपडे बदले ,पापा के साथ ढेर सारी बातें जो करनी थी । पाँच भाई-बहनों में पापा की लाडली थी ना मैं ।
वैसे तो पापा भैया से भी बहुत प्यार करते थे , पर मुझसे कुछ ज्यादा ही करते थे, क्यूँ, ये तो पता नहीं।
पर मेरे भैया कभी भी इस बात से चिढ़ते नही थे ,उनकी भी लाडली थी ना मैं ।
प्यार तो माँ भी बहुत करती थी, पर अब वो मेरे अल्हड़पन से थोडा डरने लगी थी ।
कालेज के लिए तैयार होकर जाती, तो थोडी हिदायतें देतीं, लड़कों से दूर रहने की सलाह देती , समय पर घर आने का आदेश देती और हर रोज खिडकी पर खडे होकर मेरा इन्तजार भी करती ।
बडा अटपटा लगता था मुझे तब ये सब।

जब मैं भी माँ बन गई एक बेटी की, तब समझ पाई हूँ उनका वो डर ,,,,

नहीं,,शायद और बहुत पहले, तीन साल बाद का जो हादसा मेरे साथ धटा, शायद तभी समझ गई थी मैं माँ के उस डर को ,उस चिन्ता को,,,,,
होनी को वही मंजूर था। मेरी सुन्दरता भी माँ के डर का बडा कारण थी शायद ।
——-
एक दिन कालेज से लौटी ,घर के दरवाजे तक पँहुचती, तभी एक आवाज ने रोका मुझे, मेरे घर से सडक के दूसरी ओर इशारा करते हुए कहा उसने,
‘ माफ करें, मैं पास के गाँव से आया हूँ, आपके घर के सामने रहता हूँ ,नया हूँ इस शहर में, क्या आप बता सकती हैं, यहाँ से पोस्ट आफिस कितनी दूर है ? ‘

मैंने मुडकर देखा, एक नौजवान था वो शायद मुझसे दो तीन साल बडा होगा , मै अल्हडपने में उसके प्रश्न पर चहक उठी और कहा,
‘ जरूर, मेरे पिताजी पोस्ट मास्टर है, गली के दूसरे छोर पर ही पोस्ट आफिस है, गली की ओर इशारा करते हुए मैंने कहा, वो कुछ और कहता , शायद धन्यवाद देता , पर उसके पहले ही इतना कहकर मैं अपने घर की ओर मुड गई ।

माँ रोज की तरह खिडकी से देख रही थी , आते ही ढेर सारे प्रश्न दाग दिए, कौन था , क्या बात की , क्यूँ बात की ?
मैने हँसते हुए कहा,” कोई था, रास्ता पूछ रहा था, शहर में नया है शायद, सामने वाले घर में रहने आया है ।”
“अब छोडो ना ,मुझे भूख लग रही है, जल्दी से कुछ खाने को दो ।”
माँ के चेहरे पर एक हल्की चिन्ता की रेखा देखकर मैंने कहा ।
माँ खाना लगाने लगी । कुछ सोच भी रही थी । मैंने ध्यान ही नही दिया ।
——
दो तीन दिनों बाद मेरी दोस्त अंजू मेरे घर आई , मैं उसके साथ बाजार जाने के लिए घर से निकली, सामने वही युवक टकराया, अंजू को देखकर पूछा ,’आप भी यही इसी घर में रहती हैं क्या ? ‘
अंजू थोडा सकपकाई , एक अजनबी के इस तरह सवाल पूछने पर ।
वो मेरी ओर प्रश्न भरी निगाह से देखने लगी । मैं हँसकर बोली , “नही ये मेरी दोस्त है। आपके मकान के बगल में ही रहती है ।”
इतना कहकर हम आगे बढ गए ।
इसी तरह कभी-कभार वो मिल जाता और हम एक आध बातें कर लेते, लेकिन हमने एक-दूसरे का नाम पूछने की जरूरत कभी नहीं समझी।
माँ की निगाहें अब ज्यादा खोजी हो गई थी। अब वो मेरे घर से निकलने पर भी खिडकी पर हर रोज खडी होती ।
मैंने इस बारे भी कभी सोचा भी नही ।
पर एक दिन जब माँ ने कहा , “वो तुम्हारे पीछे-पीछे घर से निकलता है, तो तुमलोग कहाँ मिलते हो?”
मुझे बडा आश्चर्य हुआ , मुझे तो वो कभी कभार ही मिलता है आते -जाते। हम क्यूँ मिलेंगे,भला ।
मैने समझाया माँ को , “आप क्यों इतना सोचते हो , मै तो ठीक से उसे जानती तक नहीं, ना ही कहीं मिलते हैं हम ।”

पर शायद माँ को विश्वास नहीं हो रहा था । ऐसा तो नहीं था कि उन्हें मुझ पर भरोसा नही था ,पर वो मेरे भोलेपन और सुन्दर चेहरे से डरने लगी थी। शायद माँ को शक की बीमारी है उस
समय मुझे यही लगा था । शक का इलाज तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं था ना, फिर मैं तो बच्ची थी ।
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भोली तो थी मैं , आज सोचती हूँ तो लगता है ,वो हादसा भी मेरे भोलेपन के कारण ही तो हुआ था ।
हँसी नहीं आती है सोचकर ,,,, गुस्सा अधिक आता है खुद पर ,,पर अब पछतावे होत क्या जब चिडिया चुग गई खेत।

सर्दी लग रही थी ,जाड़े के दिन थे और मुझे साइनेस की तकलीफ ।
डाक्टर ने तीन समय खाने के लिए दवाईयाँ दी और पापा सुबह आफिस जाते समय हिदायत देकर गए थे, दवाइयाँ समय से ले लेना ।
पर मैं लापरवाह ,, भूल गई दवाई लेना ।
शाम हो गई, अचानक याद आई दवाईयाँ ,,
पापा आकर डाँटेगे, बस जल्दी-जल्दी सारी दवाइयाँ बिना सोचे-समझे एक साथ ले ली ।
पता नहीं क्या और कितना लेना था और क्या ले लिया ।
पापा के इन्तजार में घर के दरवाजे पर जाकर बैठ गई, दवाइयों का नशा चढने लगा,
उलुल-जलूल जाने क्या बोले जा रही थी ?
थोडी देर में पापा आए, तब तक कुछ अनमनी-सी हो गई थी मैं ।
पापा ने देखा, फिर मुझे कुछ पता नही क्या हुआ ,
आँख खुली तो मैं हास्पिटल में थी, पापा सिरहाने खडे थे और माँ की आँखे रोते-रोते सूज गई थी। मैं कुछ पूछना चाहती थी पर मेरी आवाज जैसे अन्दर-ही-अन्दर धुट रही थी, ना जाने कितने दिनों तक हास्पिटल में रही मैं ।
सामने वाला वो लड़का भी कभी-कभार आता था मुझसे मिलने, मुझे आश्चर्य होता था,माँ को तो वो पसन्द नहीं था बिल्कुल भी, फिर कैसे आने देती हैं उसे ।
तब पापा ने बताया, मैं वहीं दरवाजे पर बेहोश हो गई थी, उन्होंने धबराकर माँ को पुकारा, तब तक सामने से वो लडका भी आ गया था उसने हास्पीटल लाने में उनकी मदद की और रोज कोई-न-कोई काम करने लगा माँ का। माँ को वो अच्छा लगने लगा है । वो ब्राह्मण भी है ये जानकर माँ उसे खाने पर भी कभी-कभार बुलाने लगी थी ।
तबतक मैं तो उसका नाम भी नही जानती थी। उस दिन पापा ने बताया कि उसका नाम नीरज है ।
मैंने पहले कभी उसका नाम पूछा ही नही । मेरा नाम वो जानता था या नहीं मुझे ये भी पता नहीं ।
मुझे हुआ क्या था माँ से बहुत बार पूछा ,पर किसी ने नहीं बताया ।

हाँ ये जरूर पता चला कि इस हादसे से ऐसा कुछ जरूर हुआ है कि उसके माँ के सामने मुझसे शादी का प्रस्ताव रखा था । तब माँ ने भी कहा था कि हमारी जाति अलग है अतः पहले अपने परिवार से पूछ लें।

तब समझ में नही आया कि आखिर माँ ने ऐसा कहा ही क्यूँ! अभी तो मैं बहुत छोटी थी। मुझे पढकर कुछ और ही बनने की ख्वाहिश थी। पापा भी चाहते थे कि मैं अच्छी तरह पढाई करूँ। मैं पढने में तेज थी, मेरा गला भी बहुत अच्छा था, गाना और बजाना भी सीख रही थी, कालेज के मंच पर अभिनय का मौका भी मिल जाता था। मेरे संगीत के गुरूजी, जो बचपन में भी मुझे संगीत सिखाते थे, कालेज में भी आते थे।
मुझे याद आता है, मैं छोटी थी तो तुतलाकर बोलती थी, पर गाने का शौक बहुत था। पता नहीं गुरूजी जी को क्या दिखता था मुझमें उसी समय से । वो मुझे तब भी गाना सिखाते थे। जब कालेज में पहले दिन मुझे देखा तो हँसते हुए पूछा था , अभी भी तोतली बोलती हो क्या ?

बचपना तो गया नहीं था मेरा , मैंने ठुनककर बोला-” गुरूजी अब मैं बडी हो गई हूँ ।”
वे हँसें और आशीर्वाद देकर आगे बढ गए।
अब रोज उनसे संगीत सीखने लगी थी फिर से ।
वे मुझे बहुत प्यार करते थे वे कहते थे मैं अपने पापा का नाम रोशन करूँगी ।
अभी तो मुझे बहुत कुछ करना था ।

फिर माँ ने शादी की बात क्यों की, आखिर इस बीच ऐसा क्या हुआ ?
पर आज कुछ-कुछ समझने लगी हूँ ,पता नही मेरा अन्दाज सही है या नही ।
पर मुझे लगता है कि उस दिन मेरे गलत दवाईयों के कारण होनेवाली बेहोशी के मायने माँ ने कुछ अलग ही लगा लिए थे ।
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माँ बहुत अच्छी थी। माँ तो अच्छी ही होती है ना । पर हाँ, मेरी माँ की ये शक करने की आदत मुझे बिल्कुल भी नही भातीं थी ।
मुझे याद आती है वो धटना जब मैंने दसवीं कक्षा की परीक्षा दी थी। गर्मी की छुट्टियों के दिन थे।
मेरी बुआ की बेटी की शादी थी, बुआ बहुत बडी थी और मेरे मम्मी-पापा उनका बहुत सम्मान भी करते थे, उनकी बात का पलटकर जबाब देने का साहस भी नही था उन्हें ।

यूँ तो मुझे भी बुआ से बहुत लगाव था,छुट्टियों में बुआ के घर जाकर रहना बडा भाता था।
फिर अभी तो शादी भी थी दीदी की । हम सभी गए बुआ के घर, खूब मौज-मस्ती की।
शादी में नाच-गाना और ढेर सारे स्वादिष्ट पकवान ।
विदाई हो गई दीदी की ।

रात हम सभी खाना खाने बैठे।
आम का मौसम और दाल में कच्ची कैरी का स्वाद । हम सभी चटखारे ले-लेकर खा रहे थे , बुआ का बेटा यानि भैया और उनके कुछ मित्र भी साथ थे। जिसकी दाल में कैरी का टुकडा मिलता, वो दूसरों को चिढाता था। अचानक मेरी दाल में आम का एक टुकडा मिला और मैं खुशी से चहक उठी, भैया और उसके दोस्तों को चिढ़ाया आम दिखाकर ।
भैया का एक दोस्त मुझे देखने लगा और उसने चुपके से मेरी थाली से वो टुकडा उठाकर खा लिया ।
मुझे गुस्सा भी आया, बाकी सभी हँसने लगे, तो मैं भी हँस पडी ।
पर मेरी माँ की शक्की निगाहों को ये बात बिल्कुल अच्छी नही लगी ।
वो उस समय तो कुछ नही बोली, पर दूसरे दिन सुबह उठते ही कहा ‘ गुडिया, अब अपना सामान बाँध लो हम घर लौट जाएंगे। मेरा नाम काव्या है, पर घर पर मुझे प्यार से सभी गुडिया ही बुलाते थे , सबकी लाडली जो थी मैं ।

मैंने कहा ,”अभी तो मेरी छुट्टियाँ हैं ना माँ! फिर इतनी जल्दी क्या है, दो-तीन दिन बाद आ जाऊँगी । आपलोग जाइऐ।

गाँव का प्यारा-सा माहौल ।
शहर का कृत्रिम जीवन,
साँसों में जहर अधिक,
पास-पास पर मन से दूर सभी ।
एक सपना फिर से जीने का ,
वो जीवन ,
छोटे से गाँव का।
आज पूरा हो चला ,
हर तरफ ठंडी, सुकून पहुँचाती ,
जीवन से भरपूर निर्मल हवाऐं।
खेतों में बहते जल की मधुर स्वर लहरी,,
उडते पक्षियों की कतारें,,
मीठे भोर के गीत गुनगुनाते ,चहचहाते।
झूमते वृक्ष,इठलाते पौधे,
हरी-भरी धरती।
खिलते फूल और गुफ्तगू पत्तों की।
दूर ताड -नारियल के ऊँचे -ऊँचे पेड़,
पहरेदारों से ।
खुले गगन की छाँव तले
सूर्य की नरम-गरम किरणों से
अठखेलियाँ करते
रूई से श्वेत बादलों की जमात,
स्वयं भी गुलाबी-सतरंगी हो जाते।
कहीं दूर मोर की पिहू-पिहू,
और कोयल की कुहू कुहू ।
इन सबके साथ बैठा मेरा मन ,
सोचता है स्वर्ग की बात ,,,
क्या इससे अधिक सौन्दर्य!
नहीं , नहीं हो सकता ।
फिर एक सवाल ,
तब क्यूँ उगाए हमने
शहर रूपी जहरीले पौधे ,,,?
किस विकास की चाहत ,,?
किस आनन्द की तलाश ,,?
(डॉ इन्दु)

खेत-खलिहानों में धूमना, कच्ची इमली और कैरियाँ पेड से तोडना, फिर सभी को दिखाना ,किसने कितना जमा किया, रात को बिजली न रहने पर छत पर अपनी-अपनी चादर -तकिया लेकर जाना और कभी तारों की गिनती, तो कभी नींद ना आने पर अंताक्षरी खेलना, भूत बनकर डराना। सुबह गंगा के किनारे जाना, ढंठे पानी में डुबकी लगाना और मिट्टी की सौंधी खुशबू को अपने अन्दर भर लेना ,,,सबकुछ बडा ही मनभावन होता था, फिर बुआ के हाथों के गरम -गरम पराठे और प्याज की कचरी ,,,कभी-कभी लिट्टी-चोखा भी ।बुआ को बनाकर खिलाने का बहुत शौक भी था, फिर हम कभी- कभी ही आते थे , अतः हमारी फरमाइशें भी बुआ पूरी करती थी शौक से। बुआ हमें प्यार भी बहुत करती थीं।

इसलिए मैंने जिद्द की, तो माँ ने अजीब निगाहों से देखा, कुछ कहती उसके पहले ही बुआ आ गई और बोली ,”ठीक ही तो कहती है गुडिया, ये अभी नहीं जाएगी । तुम लोगों को जाना हो तो जाओ ।
बुआ की बात न मानने का तो सवाल ही नही था । बस माँ-पापा के साथ वापस चली गई ।
पर दूसरे दिन ही पापा मुझे लेने भी आ गए और बुआ से कहा कि इसकी माँ की तबीयत ठीक नहीं है और भाई की भी। इसलिए इसे ले जाना होगा। बुआ भेजना तो नही चाहती थी पर इस बहाने के कारण कुछ नही कह सकी ।
भैया की तबीयत थोडी खराब तो थी, पर ये नई बात नहीं थी, मैं समझ गई, माँ के शक ने ही हमें बुलाया है। खैर बात आई गई हो गई ।

कुछ दिनों बाद ही शाम को बुआ के लडके के साथ उनका वह दोस्त भी हमारे घर आया , जिसने मेरी दाल का आम का टुकडा खा लिया था ।
उन्होंने बताया कि उन्हें किसी अच्छे ज्योतिष की तलाश है और हमारी बुआ ने उन्हें बताया है कि मेरी माँ किसी ज्योतिषी को जानती है , इसलिए वे लोग आए हैं ।
मेरी माँ को उस लड़के का घर आना बिल्कुल पसंद तो नही आया, पर बुआ ने भेजा था इसलिए चुप रही और उसे लेकर ज्योतिष के पास भी गई ।
इसी प्रकार फिर से वो किसी-न-किसी काम के बहाने घर आने लगा।
माँ अब समझ गई थी। आखिर उन्होंने अपने बाल धूप में सफेद तो नही किए थे ना ।
पर बुआ का डर ,,,ना माँ कुछ बोल पा रही थी ना पापा ।
बस जब वो आता माँ किसी -न-किसी बहाने से मुझे ऊपर भेज देती ।

जब सिलसिला रुका नही तो अन्ततः पिता जी बुआ के घर गए और डरते-डरते इतना ही कह पाए कि जवान लडकी घर में हो, तो इस तरह लड़कों का आना-जाना ठीक नहीं ।
बुआ को थोडा बुरा लगा, क्योंकि वो उनके बेटे का दोस्त था, और अब समझ में आताहै कि बुआ क्या चाहती थी,,, उन्होंने गुस्से से कहा ,”क्या तेरे घर में ही लडकी है, मेरे घर में भी तो है और वो तो अपनी जात-बिरादरी का ही है, भले घर का लड़का है ।”
पापा चुपचाप सुनते रहे और वापस आ गए।
माँ को सारी बात बताई तो मैंने भी सुना ।

पहली बार बुआ पर क्रोध आया मुझे ।
क्या जात-बिरादरी एक होने से भला होने का ठप्पा लग जाता है क्या ।
खैर बात आई गई हो गई और मैं भी भूल गई उसे ।
————-

स्कूल से कालेज,,, इंटर से डिग्री में पहुंच गई , पर मेरा अल्हड़पन कम नही हुआ , पढने में अच्छी तो थी ही , कालेज में शिक्षक -शिक्षिकाओं की भी चहेती बन गई ।
घर के सामने वाला लड़का जिसका नाम उस हादसे के बाद जान गई थी नीरज , कभी- कभार आने लगा था ।
पर मेरा ध्यान अपनी पढाई और सहेलियों पर ही रहता था ।

अचानक एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि वो भी मेरे जीवन का एक शाप ही बन गया, तब तो बात बहुत खास नही लगी थी मुझे ।

मैं कालेज जाने के लिए निकली , बाहर मेरी बुआ के बेटे का वो दोस्त इतने दिनों या कहूँ कुछ सालों बाद अचानक मेरे सामने आ गया । मैं चौंक उठी, उसने कहा,
” मैं किसी काम से निकला था ,रास्ते में तुम्हारा घर आया और इत्तिफाक से तुम मिल गई ।”

मैं आगे बढती गई और वो मेरे साथ-साथ ही चलने लगा। मेरे माता-पिता की तारीफ और उधर-उधर की फालतू बातें,,, मुझे जल्दी थी कालेज पहुँचने की ,बस हूँ, हाँ करती हुई मैं बढती जा रही थी ।
कालेज करीब एक किलोमीटर दूर था । मुझे पैदल चलना अच्छा लगता था और वैसे भी उस समय रिक्शा आदि का उपयोग हम कम ही करते थे, आज अंजू भी साथ नहीं थी, उसे कुछ काम था , इसलिए नहीं आई थी ।
आधे रास्ते में मेरे ममेरे भाई ने देख लिया मुझे और साथ में उस लडके को भी। उसे समझ नही आया मैं किसके साथ हूँ, उसने पहली बार उस लडके को देखा था।
वो वक्त वास्तव में आज की तरह नही था, जहाँ लड़के- लडकी की दोस्ती ,धूमना-फिरना आम बात हो ।

मेरा ममेरा भाई मेरा पीछा करने लगा । मैं इन सबसे बेखबर अपनी धुन में चली जा रही थी। महाविधालय के दरवाजे पर वो भैया मेरे सामने आ गए और पूछा यह कौन है, मैं उसका नाम भी भूल चुकी थी, आज भी नहीं पूछा था, सो भैया से बताया कि वो बुआ के बेटे का दोस्त है, भैया ने कुछ नहीं कहा और चले गए। कालेज की गेट से अन्दर की ओर थोडी दूर पर मेरे संगीत के गुरूजी ने भी उस लडके को देख लिया था मेरे साथ उन्होंने भी देखा । गुरू जी अब मुझे संगीत सिखाने मेरे घर भी आने लगे थे, मुझे सगी बेटी की तरह प्यार करते थे वो । जब गेट पर पहुँच कर मैंने उस लडके से विदा ली और अन्दर चली गई , तभी मेरे गुरूजी ने मुझे पास बुलाया और उस लडके के बारे में पूछा, मैंने मासूमियत से सब बता दिया, तब उन्होंने मुझे समझाया कि इस तरह रास्ते में चलते हुए किसी लडके से बातें नही करनी चाहिए, अगर किसी को बात करनी हो तो उसे घर आना चाहिए ।

मै इनसब बातों से अनजान-सी थी । इसलिए भाई और गुरूजी के टोकने पर मुझे उस लडके पर भी गुस्सा आया ।
घर आकर मैंने माँ को सारी बात बता दी ।
माँ तो वैसे ही मुझे लेकर डरती रहती थी, यह सब सुनकर उन्हें बहुत क्रोध आया, शाम को उन्होंने पापा को सारी बात बतलाई और कहा कि अब गुडिया बच्ची नही । बदनामी होते देर नही लगती । अतः अब बुआ के पास जाकर उन्हें कहना ही होगा कि उस लडके से कहदे कि अब कभी भी गुडिया से मिलने की कोशिश ना करे ।

पापा को भी यह बात नागवार गुजरी थी, उन्होंने कहा-” आज दो लोगों ने देखा है कल चार देखेंगे ,किस-किस का मुहँ बन्द करेंगे । अब तो बुआ को बतलाना ही होगा। ”

पापा बुआ के घर गए और उन्हें सारी बात बताई । पर बुआ तो किसी और ही प्लानिंग में थी। जैसे ही पापा ने बोलना शुरू किया उस लडके की हरकतों के बारे में, बुआ बोल उठी,” क्यों ना दोनों की शादी कर दे । अच्छा लड़का है, खानदान भी अच्छा है। जात-बिरादरी का भी है, और वो गुडिया को पसन्द भी करता है। ”

पापा मुझसे बहुत प्यार करते थे। मेरी शादी की बात तो अभी सोच ही नही सकते थे, मुझसे दूर जाने की बात उन्हें चोट पहुंचाती, और फिर अभी तो ना मेरी शादी की उम्र हुई थी, ना ही पढाई पूरी हुई थी । इसलिए उन्होंने बुआ से कहा,”नही अभी तो वो पढ रही है , अभी शादी की बात नही कर सकते और अभी तो छोटी भी है ।”

बुआ को एक बार फिर बुरा लगा ,पर पापा की दृढता देख वो कुछ बोल नही पाई ।
पापा ने वापस आकर जब यह बात बताई तो मुझे बुआ पर बहुत क्रोध आया ।
अब पहले वाला आदर कम होने लगा था ।

गुस्सा आया कि “अगर वो लडका इतना ही अच्छा है तो बुआ की बेटी तो मुझसे बडी है, क्यूँ नही बुआ उनकी शादी कर दे । मेरे पीछे पडी हैं” ,मैंने गुस्से से पापा को कहा । पापा मेरे गुस्से पर ना जाने क्यूँ मुस्कुराने लगे ।
मैं चिढ गई , माँ भी आश्वस्त होकर हँसने लगी। बात वही खत्म हो गई ।
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इन्दु झुनझुनवाला

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