दो लघुकथाएँः हेर-फेर-शैल अग्रवाल

१.

पक्का व्यापारी था वह, चालाक और तेज। गधे बेचकर घोड़े खरीदने के मुनाफे को समझता था ।वह भी उतने ही और उतने ही पैसे में जितने के गधे उसने बेचे थे-सौदा घाटे का नहीं था। पर सामने वाला भी तो बुद्धू नहीं। पहले ही सौदे में न तो उसके पास गधे ही रह गए और ना घोड़े ही आए और ना पैसे ही।
सामने वाले को कितना कम आंकता है इनसान लालच के इस हेर-फेर में !
शिवजी हंसकर बोले, पर सुनो पार्वती, यह हेर-फेर का खेल है बहुत खतरनाक और घातक हम देवताओँ के लिए भी, एटम बम की चपेट में आने से भी ज्यादा नष्ट करने वाला, तुमने समुद्र-मंथन की कहानी तो सुनी ही है न? …

***

२.

चील ध्वज लेकर उड़ चुकी थी, वह भी मंदिर के गुंबद के शीर्ष से।
‘अब तो निश्चित ही प्रलय आएगी, बड़ी लड़ाई या विध्वंस कुछ-न कुछ भयानक और विनाश भरा, जैसे युद्ध या दैवीय आपदा याद नहीं पिछली बार ध्वज जला था तो करोना आया था?’
महंत जी ने भविष्य वाणी कर दी थी कि दुनिया के लिए अच्छा शगुन नहीं।
श्रद्धालुओं में बात तुरंत आग-सी फैल गई।
अनहोनी की आशंका से डरे लोग घरों में जा छुपे। मंदिर आना तक छोड़ दिया सभी ने। हालांकि पंडित जी भलीभांति जानते थे कि हवा के वेग ने ही दिशा के विपरीत लहलहाते ध्वज को आधे से अधिक बाहर निकाल फेंका था।
‘शिष्य से ठीक करवाएँ, इसके पहले ही यह कांड हो गया। वरना चील की चोंच में इतनी ताकत कहाँ थी कि ध्वज को उखाड़ ले ?
और यह करोना भी तो ध्वज जलने से पहले ही फैल चुका था!
पर इतना किसको याद रहता है यहाँ ?’
पंडित जी ने मुस्कराकर ख़ुद को आश्वस्त कर ही लिया था।
वैसे भी आदमी तो ठहरा गलतियों का पुतला पर महत्वाकांक्षी…बाज कब आया है ईश्वर-ईश्वर खेलने से! फिर महंत जी तो चौबीसों घंटे ईश्वर के साथ ही सोते-जगते थे! …


शैल अग्रवाल
संपर्क सूत्रः shailagrawal@hotmail.com
shailagrawala@gmail.com

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