
पाती लेकर फिर पतझड़ की जो गया शिशिर
भौरों संग फूलों के इतराने का मौसम आ गया
वक़्त के हवाओँ से जुदा जब हुए बूढ़े पत्ते
टहनियों पर फिर कोपलों का मौसम आ गया
चले गए जो अपने और सपने हमसे दूर कभी
उन रूठे अपनों को मनाने का मौसम आ गया
तन – मन रंग कर जो छुप गए थे तुम कहीं
आ जाओ फिर से, रंगों का मौसम आ गया
ख्यालों में ही देखो तो खुद से बाहर आकर
खिलने और मुस्कराने का हंसीं मौसम आ गया
मरने-जीने की खायी थी जो कसमें हमने
देखो उन्हें निभाने का फिर मौसम आ गया।
शैल अग्रवाल

कहीं कोई गीत गूंजा है फिर गोरी की पायल की रुनझुन में
कारी कोयरिया कूकी है फिर बासंती धनक लिए उपवन में
बदरी के आगे-पीछे डोलेगा बावरा वह चंदा बरजोरी में
चूड़ी बिछुआ बज रहे अनोखी खनक लिए घर-आंगन में
ठिठोली करती बहक गईं हवाएँ मदमस्त-सी किस जोश में
चांदनी उजेरी जा चढ़ी चमेली पर बेहोश अपनी ही महक में
मनुहार करतीं हवाएँ सांकल खटका रहीं दर-दर गली-गली में
बाँटती देखी फिर पीले चावल यह बेसुध-सी नई एक पुलक में।
-शैल अग्रवाल
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कैसे कह दूँ आया बसंत!
सौरभ की सूनी साँझ ढले
मुरझाई आशा की कलियाँ ,
आतंक बिछाती रातों की ,
अब भी जागी हैं स्मृतियाँ,
… बेरंगे सपनों ने देखा ,
जीवन का इतना करूँण अंत,
कैसे कह दूँ आया बसंत
अधनंगे भूखे चेहरों की ,
सहमी सहमी सी आवाजें ,
ममता की प्यास लिए प्रतिपल,
नन्हीं आँखों की फरियादें
आंसू के झिलमिल दर्पण सा,
शबनम में डूबे दिग दिगंत .
कैसे कह दूँ आया बसंत
हर गाँव ,गली हर डगर डगर
हर डाल डाल बिखरा बसंत,
पर जिनकी खुशियाँ रूठी हैं ,
उनके आँगन कैसा बसंत ?
यह एकाकी मन साथ लिए ,
कैसे कह दूँ आया बसंत?
-पद्मा मिश्रा
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उसको कभी मैंने ख्वाबों में देखा| ख्यालों में पाया इरादों में समझा||
चेहरा था उसका मेरे दिल में रोशन| खुशबू से उसकी मेरा मन था महका||
निगाहों के तीरों ने भेदा था मुझको| होठों की हंसी ने घायल किया था ||
जुल्फों में उसने बाँधा था मुझको| दिल को मेरे उसने काबिज़ किया था||
ख्वाबों में हर दिन मिलती थी मुझसे| सपनों में हरदम हम साथ होते||
रहेंगे सदा साथ वादा किया था| मिलते अगर अफसाना ना होते ||
जिंदगी के नए फलसफे बन रहे थे| ख्यालों में सही हम पास तो आ रहे थे|
ख्वाबों की दुनिया थी बेहतर असल से| हम जो वहां मोहब्बत पा रहे थे||
सोंचा कभी ना तन्द्रा ये टूटे| ना सपना ही टूटे ना दिलबर ही रूठे|
किसी की छुअन का एहसास भी था| किसी के स्वर मेरे कानों में फूटे|
सपने से निकल मैंने जब आँख खोली| उसे मैंने देखा वो मुझसे बोली||
हुआ क्या है तुमको कोई सपना है देखा| या सपने में तुमने मुझको ही देखा||
मैंने भी सपने में तुमको था देखा| ख्वाबों में तुमसे मैं ही मिली थी||
हमीं ने मोहब्बत के वादे किये थे| हमें ही अलौकिक खुशी वो मिली थी||
मेरे मन में भावों का उफान था| मगर शब्दों का भी अकाल था|
समझ ना आया कि हो क्या रहा| मैं सपने में तब था या अब जी रहा|
या जिंदगी ने मेरी लिए मोड़ ऐसे| अफसाने हकीक़त में बदलते हैं जैसे||
-अर्जित मिश्र

सरसों मटरफलियों की
गमक के बीच हूँ ।
पुरवा की बहक
चिड़ियों की चहक के बीच हूँ ।
दाने चुनती चंचल गौरैया निर्भय
चहचह की सरगम में है कलरव की लय
बीच बीच में कावा काटती हैं गिलहरियां
निरुद्विग्न लगती है जीवन की हर शय
नमक तेल जीरे की सोंधी सोंधी खुशबू
दाल छौंकती माँ की पुलक के बीच हूँ ।
पुरवा की बहक
चिड़ियों की चहक के बीच हूँ ।
अभी अभी कई मुरैले दीखे टहलते
पंख खोलते हौले – हौले से डोलते
पत्तों से आती है कोयल की मधुर कुहुक
कौवे भी यदा-कदा काँव काँव बोलते
ढुलक रही हवा मंद-मंद आम्र-पल्लव-सी
महमह अमराई की महक के बीच हूँ ।
पुरवा की बहक
चिड़ियों की चहक के बीच हूँ ।
कितने दिन हुए आज बेटा घर आया है
दरवाजे पर कितना सन्नाटा छाया है
नहीं रहे बाबा अब, बाबू जी नहीं रहे
केवल माँ को खुद से बतियाते पाया है
गोशाला सूनी है,खाली दालान है
चुप-चुप से आँगन में
दो पल की खनक के बीच हूँ ।
सरसों मटरफलियों की
गमक के बीच हूँ ।
पुरवा की बहक
चिड़ियों की चहक के बीच हूँ ।
-ओम निश्चल