कविता आज और अभीः बहुरूपिया सच

कला

झूठ को सच की तरह बोलना
सच को झूठ के धुंध में गुम कर देना
रंग में बेरंग की छींटाकशी
बात में बेबात की
कल को विकल कर देने का फ़न
तिल को ताड़
धरती को आकाश
और दिशाओं को क्षितिज पर लाकर खड़ा कर देने का हुनर
अस्मिता, पहचान और अस्तित्व को संकटग्रस्त कर
उसके जैविक क्रियापदों के आगे
मन- मन भर के विशेषण जोड़कर
जिंदगी को ‘ जोक ‘ में बदल देने का नाम है –
कला
जिसे कविता में हम उसकी कारीगरी कहते हैं!

मिलते रहा करो यार
डॉ. शैलजा सक्सेना

हम अपने-अपने
ज़िरहबख़्तर पहने हुए मिले,
जब मिले……

बोले
तो शब्दों से ज्‍यादा
आँखों से… भोंहों से!!

काफी पीने तक हमने जाँच डाली
एक दूसरे की आर्थिक हालत….!

दूसरे को सुनते हुए खड़ा कर लिया
अर्थों का
अपना एक समानांतर संसार,

मन में कहा …
“तो यह है असलियत तुम्हारी”!

अलग होते समय,
घड़ी देखी
कि “समय बर्बाद हुआ”।

खींच कर लाई गई मुस्कान के साथ कहा,
“मिलते रहा करो यार”!!

खेल-खेल
डॉ. शैलजा सक्सेना

अखबार खेल रहे हैं खबर-खबर
नेता खेल रहे हैं वोट-वोट
औरतें मगन हैं खेलने में घर-घर
आदमी खेल रहा हैं पैसा-पैसा
युवक खेल रहे हैं नौकरी-नौकरी
बच्चे खेल रहे हैं पढ़ाई-पढ़ाई,
लड़कियाँ खेल रही हैं डर और प्रेम
दुनिया खॆल रही हैं तेरा- मेरा
लेखक खेल रहे हैं किताब-किताब
विद्वान खेल रहे हैं ज्ञान-ज्ञान
श्रोता खेल रहे हैं ऊब..ऊब!
वक्त खेल रहा है थकान-थकान!
सब खेल रहे हैं, दूसरे को मोहरे मान,
हाय, कोई तो कर पाता इस खेल की पहचान!!

श्रवण कुमार
डॉ. शैलजा सक्सेना

पिता बिना,
अकेले घर कैसे रहेगी माँ?
चिंतित बच्चे,
ले आये उसे सुविधापूर्ण वृद्धाश्रम!

शुरूआत में,
बात होती हर सप्ताह,
फिर उसके ललक कर फोन करने पर
व्यस्त बच्चे, झींकते!
माँ ने फोन की ओर बढ़ती अँगुलियों को
सिकोड़, गाड़ना सीख लिया
हथेली में!

फिर महीने पर होने लगी
वृद्धाश्रम को चैक भेज, फोन पर बताते
बड़ी तसल्ली, अधिकार स्वर में पूछते,
’और सब ठीक माँ?’
इस वाक्य में
गुंजाइश नहीं होती माँ के लिए,
अपनी बात की
छोटी भी सेंध लगाने की!

यह वाक्य प्रारंभ भी था और अंत भी,
प्रश्न भी था और उत्तर भी,
कर्तव्य भी था और अधिकार भी!

’हाँ-हाँ, ठीक, मुझे क्या हुआ है!”
धीमे स्वर में व्यर्थ दोहराती,
जैसे स्वयं को बताती माँ
देर तक अकेलेपन की
सच्चाई से मुँह चुराती,

अवसाद

-हरिहर झा

गंदा न करे कोई कालीन
मिली है तालिम बचपन से
बेदाग रखने की।

आज्ञा बड़ों की
पालन आसान भी तो है
निर्णय लेने की फजीहत से दूर
पर टकराए जब भीतर की माटी से
आदेश के वस्त्र में छेद दिखाई पड़े
झांकता हुआ छल कपट
परंपरा को बनाए रखने का;
पर चुप रहने का नाम हो संस्कृति।

फिर सुलगता हो ज्वालामुखी
और जवानी की समर्थता नष्ट हो
कुरेदती हुई ताकत को नकारने में;
शिष्टाचार की चालाकी से
मन की मुराद पूरी होना चाहे
पर सरल दिमाग इतना परिपक्व कहाँ?
शिशु का पराक्रम जूझता है
मन की महाशक्तियों का संतुलन रखने के लिए।
भीतर की उष्णता को
कैसे शांत करे कोई शब्द शक्ति –
भावनाओं के हथियार लिए हुए।
टकराव मूल्यों का –
पीसा जा रहा अंतर्मन
मद्य ने मधुशाला में
सांत्वना की रकम दी – पठानी ब्याज पर।
चढता रहे सूद पर सूद
बलि चढ़े फिर एक ’होरी’ की

धोखा दे, छूमंतर हो जा
-हरिहर झा
अकल लगा दे मक्कारी में,
अपना लाभ देखते जाना
जज्बातों में उलझना नहीं
समझाता मैं अपने दिल को।

बॉयफ्रेंड हूँ गर्लफ्रेंड का
पंच पुजारी से क्या रिश्ता
छोरी को बस कर ले राजी
तेरा क्या कर लेगा काजी
धोखा दे, छूमंतर हो जा,
ढूँढ न पाये तुझे फरिश्ता

सफेद झूठ भले बोल दिया
करने दे अब अटकलबाजी
हरा सके ना तुझको कोई
धोखा देने में काबिल को।

कह दे छोरी से बँटवारा,
धन मेरा, बच्चे हैं तेरे
तेरा क्या बिगड़े तू शातिर,
चाल चली तेने जो धाँसू
ज़मीर कुत्ती चीज कमीनी
गाड़ दे बहुत भीतर गहरे

हक की वह क्या बात करेगी
नयनो में जिसके हैं आँसू
भाड़ में जाय नाटक करती,
रोता-मुख चितवन गाफिल को।


1

क्षणिकाएँ
डॉ. मिथिलेश दीक्षित

सच को सूली
झूठ हमेशा करे
वसूली!
2
मिला बेईमान को
झूठ का सहारा,
ईमान हारा!
3.
मक्खन लगा कर
खायी मलाई,
सुन री माई,
मैंने न रिश्वत खायी!
4
सच्चाई की देवी का घर
लुटते देखा,
फटेहाल पांचाली देखी,
मैंने अपनी नगरी में
बदहाली देखी!
5.
क्षीण होती जा रही थी
तैल रूपी चेतना,
वर्तिका जलती रही और
नाम दीपक का हुआ ¡

6.

जीतने से पहले वादे
बाद में
बदले इरादे !
7.
एक हाथ में
रिश्वत साधी,
एक हाथ में माला,
फँसे हुए हैं
खुद ही बुनकर
मकड़ी का जाला!
8.
नहीं अब तक नज़र से
पर्दा हटा है,
पोथियों को बाँचते
जीवन कटा है!
9.
काली कमाई
खूब लुटायी,
बोले सफ़ेद झूठ,
आँच न आयी।

मिथिलेश दीक्षित


बदलती इस जिन्दगी में
शैल अग्रवाल

बदलती इस जिन्दगी में
बदलते मौसम सी बदल जाती हैं बातें
सच-झूठ कुछ भी नहीं अब
बस असर और अवसर के सब पक्षधर
तीर लक्ष पर हो और बिखर जाएं आकाश पर तारों-से
पूरे ही बेतरतीब पर लुभाते भरमाते जाते हैं
फूल फूल पर उडते भंवरे और सपने फूलों के नीचे पंखुरियों में चुभते कांटे डालियां जिन्हें रहती हैं साधे
कभी ठंडी सड़क महकती बौरभरी टालियां
कभी पतझड़ का मौसम रूखा और बदसूरत
एक-सा तो यहाँ पर कुछ भी नहीं
फिर सच से ही क्यों हम करें यह अपेक्षा
जब माया ही जीवन और खुशियाँ यबढ़ती घटती छाया
कभी एक मासूम झूठ बहलाने को
कभी सफेद झूठ के चक्रव्यूह में फंसाने को
जाने कितनों ने कितनों को यूं बहलाया
लड़ाया आपस में मरवाया और कटवाया
इस व्यापारी युग में , व्यापारी जीवन में
सब सही और सब चलता
प्यार मोहब्बत हो या दुश्मनी और धोखा
एक ही बात, एक ही सिक्के के दो पहलू
चाहो मत मांगो मत दुखी मत हो बेवजह ही
जो है अब नहीं रहेगा सदा के लिए
बदलती इस नपी तुली जिन्दगी में…

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