
दो लघुकथा
शालिनी खन्ना
न्यू देहली
लघु कथा-१
गुड टच बैड टच
महीनों बाद फुर्सत का वह रविवार उसके हाथ आया था। समाजसेविका थी, हमेशा व्यस्त ही रहती। बाबूजी (ससुरजी) के द्वारा स्थापित संस्था खूब फल-फूल रही थी। पर बाबूजी की उम्र हो चली थी और पति विदेश थे सो उसे ही सब संभालना पड़ता। उसने अपनी किशोर बिटिया को ‘गुड टच बैड टच’ के बारे मे समझाया, “चाहे कोई भी व्यक्ति हो, गलत तरीके से छुए तो डरना छोड़ फौरन एक थप्पड़ लगाना”
सुनते ही बेटी ने कहा था, “मम्मा, दादाजी ने……..”
उसने बिटिया के होठों पर उँगली रख दी, “तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ, यह बात किसी और को मत बताना।”
***
लघुकथा-२
रईसी
रईस सहेली के शॉपिंग, मूवी, लंच के खर्चों को देख नेहा की आँखें फटी रह गई थी।
लौटते हुए रिक्शेवाले को पुकारा, “पुराना चौक का क्या लोगे?”
“चालीस रुपये” रिक्शेवाले ने गमछे से मुँह पोछा ।
“क्या ? लूट मचा रखी है ?” काजल चिल्लाई ।
“बहुत दूर है, चढ़ान भी है। और धूप भी तो देखिए कितनी तेज है।” उसने बेचारगी दिखाई।
” ना ना, तुम्हारे रिक्शे में नहीं जाना, और भी खड़े हैं।” कहते हुए उसने दूसरी तरफ हाथ हिलाया।
नेहा सोचकर हैरान थी। यह कैसी रईसी थी, वेटर को दो सौ फटाफट दे दिए थे, जबकि रिक्शेवाले की मेहनत के चालीस रुपये भारी पड़ रहे थे।

दो लघुकथा
डंडा लखनवी
लघुकथा-१
करतल ध्वनि
वर्षों से जिस एयर शो की चर्चा थी आखिरकार वह पिछले माह संपन्न हो गया। आयोजन सफल रहा— प्रदर्शन आकर्षक थे, दर्शकों की भीड़ उत्साहित थी और माहौल में देशभक्ति की सरगर्मी थी। लेकिन विवाद तब खड़ा हुआ जब पुरस्कारों की घोषणा हुई। कुछ टेक्नोक्रेट्स का दावा था, कि “हमारे विमानों की तकनीक और निर्माण गुणवत्ता सर्वोत्तम है। पुरस्कार हमें मिलने चाहिए थे।” वहीं, पुरस्कार विजेता पक्ष ने पलटवार किया, “हमें जो पुरस्कार मिले हैं, वे पूर्णतः न्यायसंगत हैं। हमारी गुणवत्ता प्रमाणित है।”
विवाद बढ़ने लगा। तकनीकी तर्कों और आँकड़ों की बौछार होने लगी, पर नतीजा शून्य रहा। अंततः एक वरिष्ठ ब्यूरोक्रेट को हस्तक्षेप करना पड़ा। उसने फैसला सुनाया— “जो निर्णय हुआ है, वह बिल्कुल सही है।” एक विरोधी टेक्नोक्रेट ने शालीनता से पूछा, “सर! आप यह किस आधार पर कह रहे हैं?”
ब्यूरोक्रेट मुस्कराया और बोला, “निर्णय गुणवत्ता मापक यंत्र के आधार पर लिया गया है।”
-“लेकिन सर, वो मापक यंत्र कहाँ है? हमने तो ऐसा कोई यंत्र यहां पर देखा ही नहीं!”
संयोग से वह ब्यूरोक्रेट एक कवि था। उसने गंभीर लहज़े में उत्तर दिया— “आपने दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट नहीं सुनी थी- क्या? वही गुणवत्ता मापक यंत्र है।”
एक टेक्नोक्रेटस ने अचंभित होकर कहा— “सर! तालियाँ तकनीकी गुणवत्ता का पैमाना कैसे हो सकती हैं? गुणवत्ता का निर्धारण तो ‘क्वालिटी कंट्रोल विभाग’ करता है— उड़ान स्थिरता, ईंधन दक्षता, सुरक्षा, पुर्जों की बारीकी… ये सब जांच के विषय होते हैं।”
ब्यूरोक्रेट गंभीर हो गया— “आपका विभाग अपनी जगह सही है। पर हमारा मापक यंत्र जनता की भावना है। यह वह पैमाना है। इसे वर्षों से में हिंदी पखवाड़ों में कविताओं की गुणवत्ता परखने के लिए प्रयोग करता आया हूँ। अब उसे विमानों की गुणवत्ता परखने हेतु लागू किया जा सकता है।”
टेक्नोक्रेट चुप हो गया। ब्यूरोक्रेट ने अंतिम चोट की— “आई एम वेरी सॉरी, परन्तु अगली बार की तैयारी शुरू कर दीजिए। अधिक से अधिक तालियाँ बटोरिए—क्योंकि आजकल अच्छी गुणवत्ता वहीं मानी जाती है, जहाँ सबसे ज़्यादा तालियां बजती हैं।”
यह सुनकर विरोधी टेक्नोक्रेट्स के चेहरों पर मायूसी झलकने लगी।
वे अगले एयर शो के लिए ुसिर्फ इंजन नहीं, तालियों के साउंड सिस्टम पर भी शोध करने लगे।
***
लघुकथा-२
ट्रेंड
” हेलो सुरेखा!”
” हाँ बोल रीता ”
” क्या हुआ…इतना सुस्त क्यों लग रही है…तबीयत तो तुम्हारी ठीक है न!!”
” …नहीं रीता ! तबीयत तो ठीक है बस ऐसे ही..”
” ..ऐसे ही क्या…कुछ लिखाई- विखाई नहीं की !!”
” नहीं यार…कुछ मन नहीं कर रहा, कहीं छप ही नहीं रहा ”
” देख सुरेखा! किसी विमर्श पर लिख…स्त्री पर लिख ,यही ट्रेंड चल रहा है…अच्छा आज शाम मेरा ऑनलाइन कविता पाठ है आजाना ,मैं लिंक भेज दूंगी…ओके, बाय ” कहते हुए रीता ने फोन रख दिया।
सुरेखा के मन मस्तिष्क के तन्तुओ के बीच जद्दोजहद शुरू हो गई। ‘ स्त्री पर क्या कविता लिखूं…कुछ छपने लायक…हाँ कुछ ऐसा..
‘ मन की गठरी
एक कोने में रख दी..
क़ीमती फूलदान के पीछे
और…
जिंदगी का स्वाद जाता रहा… ‘
हाँ ये ठीक रहेगा फिर मोबाइल बंद कर उसने सामने पनीर, रायता पापड,बिरियानी सलाद आदि से सजी थाली से स्वाद ले कर खाना शुरू किया और टीवी ऑन कर नेटफ्लिक्स पर अच्छी सी फिल्म चला दी।
दो लघुकथा
डिंपल लीला शर्मा
लघुकथा-१
आठवां बंधन
विवाह की प्रथम रात्रि । शौर्य अपने कमरे के ठीक सामने खड़ा था । कमरे का दरवाज़ा खोलने ही जा रहा था कि तभी व्हाट्सअप नॉटिफिकेशन पर नज़र जा पड़ी । मितेन के असंख्य मेसैज या कहिए विवाह हेतु बधाई सन्देशों का तांता लगा हुआ था । एकबारगी देखकर सोचने लगा सुबह ही सबके उत्तर दे दूँगा फिर अचानक नज़र पड़ी कि बॉस ने भी शुभेक्षा भेजी है ! उसके मन ने कहा -शौर्य यार उनका तो जवाब देना ही पड़ेगा । वह सूने पड़े हॉल में सोफे पर पसर गया और बॉस के संदेश का जवाब देते-देते उसे पता ही नहीं चला कि कब वह एक के बाद एक न जाने कितने ही मित्रों को धन्यवाद लिखता चला गया ।अचानक जब उसके हाथ थमें तो सिर चकरा गया! पूरे एक घँटे उसने मित्रों को जवाब देने में खपा दिए थे ।
मोबाइल स्क्रीन पर चमकता वक्त उसे मानो चिढा सा रहा था । रात के पौने एक बजे चुके थे । वह धीमे से उठा और अपने कमरे का दरवाजा खटखटाने लगा । अंदर से कोई प्रतिक्रिया न मिलने पर शौर्य ने सोचा हो सकता है कि आशवी सो गई हो ! उसने आशवी के नंबर पर कॉल किया तो तुरंत ही आशवी ने फोन उठा लिया !
“अरे आशवी,, डोर खोलो न ।”
“हाँ बस अभी आयी”
और तुरंत ही दरवाज़ा खुल गया ।
” लगता है सो गईं थी आप”
” नहीं नहीं, ऐसी कोई बात नहीं थी ”
“सॉरी,, एक्चुअली, मैं मोबाइल में लग गया था”
“मैं भी! दरअसल मेरी फ्रेंड्स हैं वीडियो कॉल्स पर । आपका फोन आने के कारण हम लोगों की बातचीत बीच में ही बन्द हो गयी! आप रेस्ट कीजिये, मैं बात खत्म करके आती हूँ !”
***
लघुकथा-२
सैकंड इनिंग
देहरादून पहुँचते ही सचिन सीधे यहाँ आ पहुँचा ।
कार्यालय में केवल दो लोग थे। दोनों काम में पूरी तरह से डूबे हुए थे । सचिन उनमें से एक के सामने जाकर खड़ा हो गया। ,,,,” नमस्कार जी, क्या आप यशोधरा से मिलवा देंगे ? वह व्यक्ति अपनी नाक पर चढ़े ऐनक को दुरुस्त करते हुए अपनी जगह से उठ गया। “आइए मेरे साथ । आपकी परिचिता लगती हैं । वैसे एक बात कहूँ, भगवान इनके संतान जैसी संतान किसी दुश्मन को भी न दे ।” फुसफुसाते हुए उसने सचिन के कानों में कहा।
अब तक वे दोनों बरामदे को पार कर भवन के दूसरी ओर बने हिस्से में आ पहुँचे थे । वहाँ पंक्तिबद्ध अनेक कमरे बने हुए थे । पंक्ति के आख़िरी कमरे के सामने पहुँच उस व्यक्ति ने दरवाज़ा खटखटाया। ज्यों ही दरवाज़ा खुला! सचिन भौचक्का रह गया! उसके साथ आया व्यक्ति उल्टे पैर लौट गया । हैरान परेशान सा सचिन उस संकरे कमरे में दाख़िल हो गया।
“ये क्या दशा बना रखी है तुमने यशोधरा! मैंने तुम्हें कहाँ-कहाँ नहीं खोजा। ”
” देखो न सचिन,, नियति मुझे कहाँ ले आई ।” कहते हुए उसकी निस्तेज आँखों से अश्रुधारा बह निकली । सचिन अपने रुमाल से उसके ढलकते आँसुओं को पौंछते हुए बोला – ” नहीं नहीं यशोधरा ! अब और नहीं ! बहुत बह चुके हैं ये आँसू । इन्हें अब तुम्हारी आँखों में रहने का कोई अधिकार नहीं है । यशोधरा की पनीली आंखों में अपलक निहारते हुए उसने अपना बोलना जारी रखा–“सुनो ,,तुमसे कुछ माँगना चाहता हूँ । देखो, मना मत करना ।माना जीवन की रुपहली भोर में हम साथ नहीं रह सके, किंतु जीवन की इस एकाकी साँझ में, तुम्हारी साझेदारी चाहता हूँ यशोधरा ।”
जीवन रूपी युद्ध में पूरी तरह से पराजित हो चुकी यशोधरा इन नेह भरे शब्दों को सुन मौन ही रही । सचिन को उसके मौन की भाषा समझते देर न लगी । उसने यशोधरा के कांपते हाथ अपनी हथेली में भरे और सीधे कमरे से बाहर निकल आया ।
उसी समय इस ओल्ड होम से सटी पहाड़ियों के पीछे से झांकता सिंदूरी सूरज भी नई उम्मीदों के साथ उदित होने का वायदा करते हुए, धीरे-धीरे अस्त होने लगा था ।

दो लघुकथा
सिद्धेश्वर
“सिद्धेश सदन “, ( किड्स कार्मेल स्कूल के बाएं ), द्वारिकापुरी रोड नंबर 2, पोस्ट : बीएचसी, हनुमान नगर कंकड़बाग, पटना :800026 (बिहार )/मोबाइल नंबर:92 3476 0365
email:sidheshwarpoet.art@gmail.com
लघुकथा-१
साहित्य
मेरी लघुकथा को प्रथम पुरस्कार कैसे नहीं मिलता? इसके पीछे काफी मेहनत किया है मैंने, अपनी लघुकथा “कामचोर” पर ढेर सारे लाईक बटोरने के लिए, कुछ देर रुक कर फिर उसने आगे कहा, “तू तो बुद्धू हो रे,बुद्धू। कम से कम अपने दोस्तों को मिठाई खिलाने की बात कहकर लाइक तो करवा ही सकते थे अपनी लघुकथा “प्रलोभन” पर! कम से कम सांत्वना पुरस्कार तो तुझे जरूर मिल जाता!”
” तुम ठीक कह रही हो प्रियंका, लेकिन मैं क्या करता? मेरी तबीयत तो कल से ही खराब चल रही है। यह सच है कि अपनी लघुकथा पर पुरस्कार पाने के लिए मैं कोई सार्थक प्रयास नहीं कर सका, वरना मेरा एक मित्र तो धर्म गुरु है। यूट्यूब पर उनके दो लाख फौलोवर हैं। फेसबुक पर उनके लाखों ऐसे चेले हैं, जो उनके इशारे पर, बिना पढ़े लिखे, बिना सोचे समझे अपना अंगूठा लगाने को तैयार हो जाते हैं। मैं अपने उस धर्मगुरु मित्र को सिर्फ कह देता तो वे मेरी लघुकथा पर उन हजारों चेलो का अंगूठा, लाइक के बटन पर अवश्य लगवा देते! ओह! बहुत मिस कर गया यार!”
दोनों के बीच बैठी तीसरी मित्र मीना, दोनों की बातें बड़ी गंभीरता से सुन रही थी। उसने आश्चर्य प्रकट करते हुए पूछा,
” तो, साहित्य की विशेषता का मापदंड अंगूठे से किया गया फेसबुक लाइक है क्या?”
” हां यार, आजकल साहित्य जगत में भी यही कुछ तो हो रहा है। प्रेमचंद, निराला जैसे रचनाकारों ने कभी ऐसी साहित्य प्रतियोगिता में हिस्सेदारी की है क्या?”
” हां। यह बिल्कुल सही बात है। आज ऐसे ही साहित्यकारों की वजह से साहित्य का बाजार फल फूल रहा है। साहित्य के सौदागर खूब लूट-खसोट कर रहे हैं।”
” मीना! एक बात पूछूं मैं तुमसे? फिर साहित्य के पाठक गए कहां? ”
दोनों की बातों पर पहले मित्र ने हंसते हुए और अपना अंगूठा दिखाते हुए कहा –
” साहित्य पाठक गए फेसबुक पर और साहित्य गया ठेंगे पर!”
***
लघुकथा-२
संतान
“लेकिन मैं तो आपको पिछले साल 1300 रुपए दिया था सदस्यता शुल्क। तब से अब तक आपने मेरी सिर्फ एक रचना प्रकाशित की है। इस वर्ष तो मेरी कोई रचना प्रकाशित हुई नहीं।” सत्येंद्र ने फोन पर ही हिन्द ज्योति के संपादक अमरेंद्र को कहा।
अमरेन्द्र ने भी उखड़ते हुए जवाब दिया,
“आपने सदस्यता शुल्क दी, तो हमने आपकी एक रचना प्रकाशित भी तो की! एक सदस्यता शुल्क में और कितनी रचनाएं प्रकाशित करवाइएगा! हमारे और भी तो सदस्य हैं!’
” तो क्या इस साल मेरी एक और रचना प्रकाशित हो जाएगी?”
“देखिए भाई सत्येंद्र जी। आपका यह पैसा एक साल के लिये है, जो अगले माह समाप्त हो जाएगा। अब हमारी इस पत्रिका से आप आगे भी जुड़ना चाहें तो पुनः आप ₹1300 भेज दीजिए, वर्ना पीछे हट जाईये। वैसे भी हम बिना सदस्यता वाले लेखकों की रचनाओं के प्रकाशन को प्राथमिकता नहीं देते!”
” लेकिन यह तो हम लेखकों के साथ ज्यादती है सर। हमारी रचना अच्छी है तो प्रकाशित कीजिए वरना सदस्यता लेने न लेने की बात आप क्यों कर रहे हैं?”
” सदस्यता की बात क्यों ना करूं? आजकल कोई आम पाठक पत्रिका खरीदता है क्या? अब आप जैसे लेखक भी नहीं खरीदेंगे तो इसे पढ़ेगा कौन, खरीदेगा कौन?”
” लेकिन यह तो सरासर अन्याय है सर हम नए पुराने लेखकों के साथ। हम लेखकों के पैसों पर पत्रिका कब तक प्रकाशित कीजिएगा?”
” जब तक आप लेखकों का सहयोग मिलता रहेगा। मैं अपने घर का आटा कितना गीला करूं? हर 3 महीने पर ₹20000 नहीं लगा सकता! घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खाएगा क्या?”
” तो क्या यह आपका व्यवसाय है? फिर घाटा देखते हुए आप इसका प्रकाशन बंद क्यों नहीं कर देते हैं?”
” क्योंकि आप जैसे सिर फिरे लेखक कम है और पैसे देकर हर महीने सर्टिफिकेट पाने वाले और कविता छपवाने वाले अधिक! मैं उसका फायदा ना उठाऊँ तो और क्या करूं?”
” साहित्य सेवा भी समाज सेवा है सर। सच्चा साहित्य सेवा कीजिए, सच्चे साहित्यकारों को सम्मानित और प्रकाशित कीजिए। वह भी उनसे बिना पैसा वसूल किए, ताकि आने वाला समय आपके इस सत्कर्म के लिए आपको याद करें!”
” कोई ऐसा व्यक्ति है जो अपने घर से हर 3 महीने पर 20000 का खर्च करते हुए प्रसन्न दिखेगा? और फिर भी साहित्य सेवा करता रहेगा?”
” हां सर आपके मित्र! सुकेश बाबू है न! एक पैसा लेखकों से नहीं मांगते। जिन लोगों को देना होता है, वे स्वयं स्वेच्छा से देते हैं। मगर रचना प्रकाशन के लिए वे ऐसी कोई शर्त उनका सामने कदापि नहीं रखते।”
” लेकिन सुकेश बाबू हर तीन चार महीने पर बर्थडे पार्टी भी तो नहीं मनाते हमारी तरह। मेरे तीन बच्चे हैं और उनका बर्थ पार्टी भी मैं बड़े शान शौक से मनाता हूं!”
” एक बात बोलूं सर? ”
” हां हां बोलो!”
” किसी भी लेखक के लिए पुस्तक और संपादक के लिए पत्रिका भी उसके बेटे के समान ही होता है। उसकी रचना उसकी संतान होती है। और उसका प्रकाशन बर्थडे पार्टी । तो क्या बर्थडे पार्टी के लिए हम लेखक रूपी अतिथियों से पैसा मांगना शोभा देगा क्या?”
दो लघुकथा
बहू में बेटे का प्रतिरूप
रेवती ने अपने पति सूरज से कहा–मैं तुम्हारे साथ रहने के लिए शहर चलने को तो चल सकती हूं सूरज लेकिन तुम जरा अपनी उस बूढ़ी मां के बारे में सोचो जिन्होंने तुम्हें अपने पांव पर चलने के लिए तुम्हारी अंगुलियां पकड़ी, तुम्हें अपनी हाथों का सहारा दिया आज तुम्हारी मां के वे हाथ बूढ़े हो गए है अब उनकी बूढ़ी अंगुलियों को भी हमारे तुम्हारे हाथों के सहारे की जरूरत है.
फिर तुम अपनी मां के अकेले बेटे हो सूरज ऐसे में शहर की खुशी मां की खुशी के आगे बहुत छोटी खुशी है. फिर तुम घर और गांव से इतनी दूर भी नौकरी नहीं करते हो कि हफ्ते में एक-दो दिन मेरे और मां के पास आ ना सको. लेकिन सूरज यह कहां सुन रहा था. उसकी आंखें तो बस यह सोचकर बरस रही थी कि जिस मां की खुशी के बारे में वह बेटा होकर नहीं सोच पाया उसे रेवती ने बहू होकर सोच लिया. तभी सूरज ने रेवती से कहा कि, तुम केवल एक बहू ही नही रेवती बल्कि तुम बहू के रूप में एक बेटे का प्रतिरुप हो.
***
सवाल आदमी होने का
एक लाश सड़क पर सुबह से ही पड़ी हुई है. उसके आस-पास तमाम मक्खियां भिन-भिना रही हैं, लोग बाग इधर-उधर से नाक पे रुमाल रखकर चले जा रहे थे,बस! किसी ने इतनी सी मानवता दिखाई थी कि उसने फोन करके जिम्मेदार महकमे को यह सूचना दे दी थी कि,– यहां सड़क पर एक लाश पड़ी है वे आकर उठा ले जाए. लेकिन महकमे वाले भी कहां इतनी जल्दी सुबह आते. अतः उन्होंने भी अभी पहुंचते है कह करके फोन काट दिया.
फिर लगभग पूरे दो घंटे तक यूं ही सड़क पर लाश पड़ी रही किसी तरह जब सुबह के करीब 10 बज गए तो उस महकमे के लोग आए और उस लाश को सड़क से उठाकर गाड़ी में ऐसे रखने लगे की जैसे सड़क पे कोई व्यक्ति नही बल्कि कुत्ता मरा हो. जिसे वे कही जल्दी से फेक-फांक कर अपने इस कार्य की इति श्री कर लेंगे. लेकिन वे आदमी इस सड़क पर मर तो गया पर इस सड़क पे वे तमाम जिंदा चलने वालो के लिए एक सवाल छोड़ गया उनके आदमी होने का।
रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियापुर
जिला–जौनपुर 222002 (U P)
दो लघुकथा
मुखर कविता
जयपुर
लघुकथा-१
“मापदण्ड”
वह बुझे मन से काजू व मूंगफली रोस्ट किये जा रही थी। उधर मियां जी का भजन जारी था ।
“क्यों जाती हो तुम वहाँ ? मैं तुम्हें लिखने पढ़ने से नहीं रोकता हूँ तो मतलब यह तो नहीं कि यूँ चौराहों पर ..”
“चौराहा कहाँ जी वो तो सभागार . ..”
“मुंह मत खुलवाओ मेरा!आइस क्यूब्स निकाल कर दो !… स्वतंत्रता का अर्थ अपनी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ना नहीं होता ! पिछले शनिवार जो तुम वो महफ़िल … ”
“महफ़िल नहीं काव्य गोष्ठी !”
“हाँ वही ! लंच कैसा ठंडा खाना पड़ा था उस दिन ! और हाँ, ये महफ़िलों के लिए हाँ न भरा करो ! लौटते लौटते अँधेरा हो जाता है। बच्चे घर आएं उसके पहले …”
“दोनों कोचिंग से पौने नौ से…”
“तुम भी तभी आओगी ? कैसी बेहूदा बातें करती हो !” देवेंद्र ने आखिरी घूँट ख़त्म कर गिलास मेज पर रख दिया था । सिगरेट सुलगाते हुए, “और मैं सब समझता हूँ कैसे लोग आते हैं वहां पर ! साहित्य के नाम पर सब नाकारा लोग ! बस खाने-पीने वाले होते हैं सब साले ! बिना शराब बिना कश दो शब्द नहीं निकलते उनके मुँह से !”
स्त्री ने हथियार डाल दिए थे, होठ सिल लिए थे। अब जा कर देवेंद्र को चैन पड़ा था। थोड़ा रुक कर दीवान से उठा, “खाना लगा दो, मैं भीतर जा कर आता हूँ। और वो बोतल मत उठाना, एक पेग अभी बाकी है उसमें !” कह वह गुसलखाने में घुस गया।
***
लघुकथा-२
सरनेम
“देखो ना भाभी ! अब आप ही समझाओ भैया को ! हनी रुआंसी हो गई थी .
“तुमने भी क्या जिद पकड ली है !” रौनक के कंधे पर थपकी लगाती रीमा ने कहा, “जमाना कितना तो बदल रहा है और फिर ननदोई जी भी तो मान गए हैं !”
“ज्यादा शह मत दो तुम इसको !” रौनक बिफर पड़ा. फिर थोडा संयत होते हुए कहा,”धानी” से इसके पसंद के दो सूट दिला लाना. और हाँ, क्रेडिट कार्ड ले जाना , तनिष्क से कान के दो बूंदे भी दिला लाना .”
“नहीं चाहिए मुझे कुछ !” पैर पटकती हुई हनी ने कमरे में जा दरवाज़ा अन्दर से बंद कर लिया.
“इतना लाड़-प्यार रखते हो अपनी लाडली बहन से और अब इतनी सी बात पर …”
रौनक के नजदीक ही बैठते हुए रीमा धीमे से कहने ही जा रही थी कि –
“तुम इसे इतनी-सी बात कहती हो ? सरनेम चेंज नहीं करना जरा सी बात है ? हुंह ! तुमने क्या नहीं बदला अपना सरनेम शादी के बाद ? कहो ? आखिर परम्परा भी …”
“अरे भई ! मेरी बात अलग है ! हनी हमेशा से ही आधुनिक सोच रखती है, खुले विचारों वाली है. पिछले पांच वर्षों से देख रही हूँ उसको. एकदम आत्मनिर्भर है हर मामले में.”
“मैं भी जन्म से देख रहा हूँ उसको… !” रीमा ने देखा रौनक जुबान पर आती बात को घोंट गया.
रीमा भी तैश में आ गई, ” सरनेम बदलने ना बदलने से क्या होता है, क्या बेटियों से वंश आगे नहीं बढ़ता ? हाँ ?”
“वंश तो आगे बढ़ता ही है, बेटा हो या बेटी.” रौनक की आवाज धीमी पड गयी थी .”बायोलोजिकलि तो वंश लड़कियों से भी आगे बढ़ता ही है …”
“फ़िर ?” रीमा आश्वस्त हुई कि लिंगभेद के भाव तो नहीं है यहाँ. वह बोली, “जब तुम जानते हो, मानते हो …”
“हाँ मैं जनता हूँ ! मानता भी हूँ ! मगर तुम भी कुछ दिमाग लगाओ !” वह रीमा की कुर्सी करीब खींचते हुए बोला, “आज वह पापा का सरनेम कंटिन्यू करना चाहती है, वंश उससे भी आगे बढ़ता है समझ रही है तो कल को इन दोनों मकानों में से भी एक माँग लेगी ! समझी तुम ?”
“ओह्ह ! ऐसा तो मैंने सोचा ही नहीं !” रीमा गहरे सोच में पड़ गई थी | वह कोल्ड कॉफी के दो मग और पनीर पेटीज के कर हनी के कमरे में गई।
भीतर कमरे में ननद भाभी में खुसुर फुसुर हो रही है, “बहुत दिक्कत होती है …सरकारी कागज़ात बनवाने में. पैन कार्ड, आधार कार्ड, पासपोर्ट वीज़ा, जॉब के लिए सब जगह।”
दो लघुकथा
अन्नपूर्णा बाजपेयी अंजू
कानपुर
लघुकथा-१
एको भुक्तः
ए ! अम्मा तुम हमका कुल्फी खिलाओगी जैसे वो लड़का खा रहा है ?? माँ के साथ साथ चलते हुए उस अधनंगे बालक ने अपनी माँ से पूछा ।
माँ सिर पर कुछ कपड़ों की गठरी लादे आगे की तरफ लपकी जा रही थी । बालक पुनः दौड़ माँ के पास पहुँचा और हाथ पकड़ कर उसे झकझोरा । माँ ने मुस्कुराते हुए बालक की ओर देखा और आइसक्रीम खाते हुए बच्चों की ओर निगाह दौड़ायी । अपने कुर्ते की जेब में हाथ डाला उसमें से कुछ सिक्के निकले जिन्हें हाथ पर रख कर गिना । कुछ सोचते हुए उसने उन सिक्कों को वापस अपनी जेब में डाल लिया । बालक को समझाते हुए बोली , ‘ मेरा बचवा! कुल्फी तो तुम्हारे जितने बच्चे नहीं खाते हैं उनके छोटे छोटे दाँत होते है , कुल्फ़ी खाने से वो पिघल कर पेट में चले जाते हैं । और तुम भी तो छोटे हो तुम्हारे दाँत भी पिघल जाएँगे तब तुम रोटी नही खा पाओगे ।’
बच्चा सकपकाया ,’ हैं ! हम एस्किरिम खायेंगे तो दाँत पिघल जाएँगे । फिर वो बच्चे कैसे खा रहे हैं ।’ उसने सवालिया निगाहों से दूसरी ओर देखकर इशारा किया । माँ ने कहा , ‘बचवा! वो सब लोग खा सकते हैं क्योंकि वो डॉक्टर के पास जाते हैं ।’
भोलेपन से बालक ने कहा , ‘ अच्छा ! ये लोग एस्किरिम खाते हैं और डॉक्टर के पास जाते हैं डॉक्टर इनको सुई लगाता है , हम एस्किरिम नहीं खाते , हम डॉक्टर के पास नही जाते , हमको सुई भी नही लगती , और हम चंगे रहते है ।’
माँ ने विवशता और सुकून भरी निगाहों से उसको देखकर कहा , ‘ हाँ बचवा !’
बच्चा खुशी से माँ का हाथ पकड़ चलने लगा । माँ की आँख से दो बूंद छलक कर गिर पड़े ।
***
लघुकथा-२
फैशन
“अरी रंगीली ! सुन तो जरा!” मुँह में पान का बीड़ा दबाते हुए जुलेखा ने कहा , ” भाग के जा सब बहनों को बुला ला ।”
“क्यों??” रंगीली बोली,”कहीं प्रोग्राम में जाना है क्या?”
“हाँ ! ऐसा ही समझ ले” जुलेखा के स्वर में कुछ तल्खी थी ।
“अच्छा नही बताना तो मत बता, सूखे मिर्चे की तरह मुँह क्यों बना रही है ।” और बल खाती हुई वहाँ से चली गयी ।
“चलो – चलो सखियों ! गुरु मां बुला रही हैं ।” रंगीली अभी भी मटक रही थी ।
सबने हैरत से उसको देखा फिर सोचा लगता है कोई मुर्गा फिर फँसा । और सबकी सब उसके साथ चल दीं ।
जुलेखा जो इन सबकी बड़ी बहन , गुरु मां, सखी सब कुछ थीं ,सबको आते देख मुस्कुरायी और बोली ,”चलो सभी खूब अच्छी तरह तैयार हो जाओ, आज शाम पाँच बजे सम्मान समारोह में जाना है ।”
सभी के मुँह आश्चर्य से खुल गए ,”सम्मान समारोह!!”
“हाँ!” जुलेखा बोली ।
“वहाँ हमारा क्या काम ??? ” ,सबने एक साथ बोला ।
“है न ! हमारा सम्मान !” जुलेखा ने कहा ।
सभी एक दूसरे का मुँह ताकने लगीं। ऐसा तो कभी नही हुआ हमें तो पैदा होते ही बिरादरी से निकाल दिया जाता है । सम्मान कैसे ?
“मरी! इतना बड़ा डिब्बे सा मुँह न खोल ! आजकल ये भी फैशन है फैशन। अपना नाम बनाने के लिए लोग हमें भी पहचानने लगे है। अब तो हम पर किताबें लिखी जा रहीं किताबें। तो इतना न सोच चल तैयार हो जा । लोग अपनी लोकप्रियता के लिए आज हम किन्नरों का भी सम्मान करने लगे हैं । ” जुलेखा ने कड़वा सा मुँह बनाया ।
इस सबसे इतर सारी बहनों के चेहरों से खुशी टपक रही थी ।
दो लघुकथा
मंजु तिवारी कुमार
लघु कथा-१
गृहप्रवेश
भाईसाहब ,आपका घर बनकर तैयार है ।आप आँख़री पेमेंट कर दीजिए , मैंने कल सुबह ही चाबी आपके माता – पिता को दे दी थी । ठेकेदार का सुबह ही फ़ोन आ गया था । प्रकाश बेहद खुश हुआ सुनकर । उसकी सालों की मेहनत रंग लायी । उसने बिना किसी लोन के अपनी जमापुंजी से अपना दोमंजिला घर बनवा दिया था । पंद्रह साल लगे थे दुबई में रहकर घर के लिए पैसे जोड़ने में । भरा पूरा परिवार था तो ज़िम्मेदारियों को निभाते निभाते ही प्रकाश चालीस का हो गया था। बहनों की शादी के बाद उसकी शादी हुई बच्चे अभी छोटे ही थे । पिता का बनाया हुआ घर अब काफ़ी पुराना हो गया था हर बरसात में घर पानी से भर जाता और सभी लोग उस से ऐसे शिकायत करने लगते जैसे घर केवल उसी का है । कभी बड़ी बहन तो कभी छोटी बहन सभी उसे फ़ोन करके बस घर बनाने को कहते रहते ।
छोटे भाई की बात करो तो पढ़ने लिखने में कमजोर था तो हर बात में कमजोर ही रहा।माता पिता का लाड़ उसे इतना मिला कि उसने कभी अपने लिए मेहनत करनी ही नहीं चाही ।
प्रकाश और पिताजी ही घर में आमदनी का ज़रिया थे।तीन साल पहले वो भी रिटायर हो गये थे ।घर से जब भी फ़ोन आता हर बार कोई नयी डिमांड होती ।
ऐसे में प्रकाश के लिये दो- दो घर चलाना मुश्किल हो रहा था ।थोड़ा सोच-विचार कर उसने ये निर्णय लिया कि पुराने घर को नया और बड़ा बनाया जाये, उसका परिवार भी माता पिता और बाक़ी सब के साथ भारत में ही रहे । छह महीने बाद उसकी यही इच्छा आज पूरी हो गई थी।अभी पतिपत्नी ख़ुशी बाँट ही रहे थे,तभी मम्मी का फ़ोन आया।अच्छा बेटा सुन ,हम कल ही गृहप्रवेश कर रहे हैं मुहूर्त अच्छा है ।
और समान भी सब शिफ्ट कर लिया है।तुझे ये भी बताना था कि ऊपर वाले हिस्से में तेरे छोटे दीदी जीजा जी रहने आ गये हैं ।अभी उनका समय ठीक नहीं चल रहा है।बहुत तैयारी करनी है कल के लिए फिर बात करूँगी कहकर माँ ने फ़ोन रख दिया ।
ठगा हुआ सा प्रकाश समझ नहीं पा रहा था कि ख़ुशी मनाए या अफ़सोस ।
***
लघु कथा-२
कठपुतली
ओहो मम्मी,तुम क्या करोगी इंस्टा अकाउंट खोलकर ! सवि ने अपनी माँ को लगभग चिल्लाते हुए जवाब दिया ।
वर्तमान युवा होती पीढ़ी की यही परेशानी है कि उन्हें अपने आगे सभी लोग पिछड़े हुए लगते हैं ।
रजनी कई दिनों से बेटा – बेटी को देख रही थी । दोनों में बस साल भर का अंतर था । सोलह और सत्रह साल के ही थे । लेकिन व्यवहार ऐसा जैसे किसी और ही ग्रह से आये हों ।सारा दिन बस फ़ोन या टेबलेट हाथ में रहता । बेटी सारा दिन सीसे के सामने मेकअप लगाकर नाचती सी रहती, और बेटा हर वक़्त लैपटॉप या फ़ोन पर गेम खेलता रहता ।
पति काम के चक्कर में अक्सर बाहर ही रहते । दो बच्चों के साथ रजनी सब कुछ सम्भालती हुई हर वक़्त परेशान सी रहती । बच्चों से कुछ कहती तो जवाब मिलता, अरे मम्मी तुम्हें कुछ नहीं पता ।बस हर वक़्त पढ़ाई और काम के पीछे पड़ी रहती हो । बेटी तो उसे अपने मौलिक अधिकार भी गिनाने लग जाती ।
अभी कल ही उसे पड़ोस वाले गुप्ता जी ने बताया था कि आपकी लड़की के तो बहुत फॉलोवर हैं इंस्टा पर काफ़ी फ़ेमस है बिटिया सोशल मीडिया पर !
रजनी को समझ नहीं आया था,कि क्या जवाब दे । उसका तो दूर दूर तक सोशल मीडिया से कोई लेना देना नहीं था । लेकिन गुप्ता जी की कुटिल मुस्कान उसे चुभने लगी थी ।
इसलिए घर आते ही उसने बेटी सवि को अपना अकाउंट खोलने के लिए कहा था, लेकिन बेटी ने झल्लाकर साफ़ मना कर दिया।
रजनी ने सोचा बेटे से बोलकर अकाउंट खुलवा लेगी।
बेटे के पास अपनी इच्छा लेकर जा ही रही थी कि सोफ़े पर लेटकर पकड़े हुए फ़ोन पर देखा, बेटा किसी लड़की से बात कर रहा था जिसने ना के बराबर कपड़े पहने हुए थे। रजनी को देख बेटा थोड़ा सकपका गया। लेकिन रजनी उस से कुछ कहती, वो ख़ुद रजनी से बोल पड़ा,
मम्मी, तुम ना फेसबुक जॉइन कर लो। ये इंस्टाग्राम है ना तुम्हारे मतलब का नहीं है। तुम्हारी उम्र वालों के लिए एफबी बेस्ट है। आओ बैठो मैं तुम्हारा अकाउंट बना देता हूँ।
और अकाउंट बन गया। सब बहुत आसान था, बेटे ने समझा दिया अच्छे से ।
धीरे- धीरे रजनी भी फेसबुक चलाना सीख गई । अब गुप्ता जी ही नहीं बल्कि आसपास के और भी लोग उसकी फ्रेंड लिस्ट में जुड़ गये थे।
धीरे-धीरे उसे भी हर वक़्त फ़ोन हाथ में लेकर रहने की आदत पड़ गई। हर वक़्त नोटिफिकेशन बजता ही रहता। कहाँ तो उसने सोचा था कि इंस्टाग्राम पर जाकर बच्चों को देखेगी कि क्या करते रहते हैं। फिर उन्हें सही ग़लत समझा कर फ़ोन पर कम रहने के लिए प्रोत्साहित करेगी, पढ़ाई की अहमियत समझायेगी, पर यहाँ तो स्वयं ही सोशल मीडिया के हाथों की कठपुतली बन कर रह गई।

दो लघुकथा
सुनीता त्यागी
गाजियाबाद
लघुकथा-१.
परिवार
एकमात्र पुत्री के विवाह के उपरांँत मिसिज़ गुप्ता एकदम अकेली हो गयी थी। गुप्ता जी तो उनका साथ कब का छोड़ चुके थे। नाते रिश्तेदारों ने भी औपचारिकता निभाने के लिए एक-दो बार कहा भी था कि अब बुढ़ापे में अकेली कैसे रहोगी, हमारे साथ ही रहो। बेटी ने भी बहुत अनुरोध किया; परन्तु मिसिज़ गुप्ता किसी के साथ जाने को सहमत नहीं हुईं।
शाम के वक्त घर की छत पर ठंडी हवा में घूमते हुए घर के पिछवाड़े हॉस्टल के छात्रों को क्रिकेट खेलते देखना उन्हें बहुत भाता था।
कई बार बच्चों की बॉल छत पर आ जाती। वे दौड़कर उसे फेंकतीं तो लगता मानो उनका बचपन लौट आया है। कई बार वह छत पर नहीं होतीं तो बच्चे स्वयं गेंद लेने आ जाते। तब मिसिज़ गुप्ता उनसे पल भर में ढेरों सवाल पूछ बैठतीं, “बेटा कौन से साल में पढ़ते हो, घर में कौन कौन है घर की याद नहीं आती क्या, यहाँ खाना कैसा मिलता है?…”
बच्चों से बातचीत का सिलसिला धीरे-धीरे बढने लगा। जब कभी वो अपनी गेंद लेने आते तो वह जबर्दस्ती उन्हें कभी अपने हाथ की खीर खिलातीं; तो कभी तीज-त्यौहार पर सारे बच्चों को खाने का न्यौता दे देतीं और फिर ढेर सारा पकवान बनाकर बडे़ प्यार से खाना खिलाकर भेजतीं।
कई बार उन्हें झगड़ते देख कर उन्हें डांट लगाने में भी पीछे नहीं रहतीं।
बच्चों को भी उनमें एक माँ दिखने लगी थी।
छात्रों की परीक्षा समीप आ गयीं थीं । खेल के मैदान में उनका आना कम हो गया था।
मिसिज़ गुप्ता कुछ उदास-सी रहने लगीं थी। कुछ दिन से स्वास्थ भी खराब रहने लगा था।
पढ़ाई करते हुए एक छात्र को एकाएक आंँटी की याद आ गयी तो वह कुशलक्षेम पूछने उनके घर पहुँच गया।
देखा कि मिसिज़ गुप्ता तेज बुखार से तप रहीं थीं। बात पूरे छात्रावास में आग की तरह फैल गयी।
कई लड़के आनन-फानन में उन्हें लेकर हस्पताल पहुँच गये। अनेक जाँचों के बाद डाक्टर ने बताया ‘कमजोरी बहुत ज्यादा आ गयी है, खून चढ़ाना पडेगा। इनके परिवार से कौन हैं?’
यह सुनते ही वहाँ उपस्थित सारे छात्र एक स्वर में बोल पडे़, “मैं हूंँ डाक्टर साहब।”
अपने इतने विशाल परिवार को देखकर मिसिज़ गुप्ता की आँखों से खुशी के मोती लुढ़क पडे। डॉक्टर भी अपनी भावुकता को छिपा नहीं पाये।
***
लघुकथा-२.
निवाला
” ले कमला चल पहले तू भी खाना खा ले, काम बाद में निपटा लेना ” मिसिज़ चड्ढा ने सुबह से काम में लगी अपनी मेड कमला को खाने की प्लेट थमाई तो खाना देख कर कमला को घर पर बैठे अपने भूखे बच्चों की याद सता लगी।
” अरे! खाना? मेम साब आज घर जाने में बहुत देर हो गयी है,वहाँ घर पर मेरे बच्चे भूखे बैठे होंगे तो यहाँ मेरे मुँह में निवाला कैसे उतरेगा मेमसाब!” बोलते हुए कमला रुआँसी हो गयी।
” बहुत दिनों से उनको कुछ अच्छा खाने को भी नहीं मिला है, सोच रही हूँ आज ये खाना उन्हीं के लिये… “सकुचाते हुए कमला ने कहा ।
” ठीक हैs उनके लिये भी ले जाना, पर इसे तो तू ही खा ले “।
फिर चलते वक्त मिसिज़ चड्ढा ने बच्चों के लिये भी बहुत सारा खाना कमला को पैक कर दे दिया।
कमला घर जाकर बड़े प्यार से अपने बच्चों को खाना खिलाने लगी। बच्चे भी चटकारे ले कर पार्टी का सा आनन्द लेने लगे।
वहीं दरवाजे पर पड़ी हुई हड्डियों का ढांचा बनी कुतिया जो अक्सर सुस्ताने के लिये उन्हीं के दरवाजे पर लेटी रहती थी और कमला के बच्चों की रूखी सूखी झूठन पर गुजारा करती रहती थी , खाने की खुशबू से वह भी उठ बैठी और बच्चों के हाथों से मुँह तक जाते एक एक निवाले को गिनने लगी।
उसकी आँखों में कमला को याचना नजर आ रही थी, जिसे देख कर कमला ने दो पूड़ियाँ उस की ओर भी उछाल दीं ” ले तू भी खा ले , क्या याद करेगी ,आज मेम साब के बेटे का जन्मदिन था “।
कुतिया कुछ देर उन पूड़ियों को उलट-पलट कर सूंघती रही फिर मुँह में दबा कर वहाँ से निकल गयी। कमला को ये देख कर बहुत बुरा लगा।
” कितने प्यार सेे अपने बच्चों के मुँह से निवाला निकाल कर दिया था इसे, पर जाने कहाँ ले कर चल दी है चुड़ैल,यहीं बैठ कर ना खा लेती! देखूँ तो कहाँ जाती है लेकर !! ”
देखा गली के छोर पर तीन चार छोटे पिल्लेअपने पैरों में मुँह छिपाये धूप में लेटे हुए थे,कुतिया ने उनके सामने जाकर अपना मुँह खोल दिया।
पिल्ले पूड़ियों पर झपट पड़े। देख कर कमला की आंखें नम हो गयीं। ” अरी! मैं ये कैसे भूल गयी कि तू भी तो मेरी तरह एक माँ ही है। और माँ अपने लाडलों को खिलाये बिना कैसे खा सकती है।
दो लघुकथा
अभय कुमार भारती
राजेन्द्र नगर, भतौड़िया
(मुर्गी फार्म के दक्षिण)
नाथनगर-सजौर मार्ग
भागलपुर(बिहार).८१२००६
मो.७६३४८६६५४५.—
गाँठ
रजनी चाय लेकर ज्योंहि बैठक में आई, राकेश के साथ बैठा सुरेश अनायास उठ खड़ा हुआ और उसका अभिवादन करते हुए बोल पड़ा : ” नमस्ते भाभीजी!”
” जी नमस्ते।” होंठो पे हल्की मुस्कान बिखेरे रजनी ने छोटा सा जवाब दिया। अगले ही पल उसने दोनों को चाय परोसी और फिर दबे पाँव अंदर अपने कमरे में चली गई। चाय की घूँट लिये दोनों बातचीत करने लग गये।
होंठो से कप लगाते ही सुरेश ने उसे छेड़ा :
” राकेश तुम बड़े भाग्यवान निकले यार। इतनी सुंदर और सुशील पत्नी कहाँ सबको मिलती है? मुझे तो जलन होने लगी है।”
सुरेश के मुँह से पत्नी की बड़ाई सुनकर राकेश फूला नहीं समाया। प्रफुल्लित होकर उसने एक बात और जोड़ दी : “एम.ए.पास है न। कुछ तो काबिलियत दिखेगी ही।”
राकेश को लगा कि उसकी यह बात सुनकर सुरेश और भी खुश होगा, मगर इससे सुरेश की मुखड़ा सोच की मुद्रा में सिकुड़ गया। गम्भीर स्वर में बोला : ” देखो राकेश,सबकुछ तो ठीक है,मगर एक जगह तुझसे चूक हुई है। पत्नी अगर पति से ज्यादा पढ़-लिख लेती है,उसे पति पर हावी होते देर नहीं लगती है। तूने तो बस किसी तरह बी.ए. कर लिया है। इसपर पत्नी का एम.ए.पास होना… क्या तुझे अखर नहीं रहा है? क्या तुझे नहीं लगता,इसे लेकर लोगों में कानाफूसी होती होगी। चोरी -छुपे तुझपर फिकरे कसते होंगे?”
सुनते ही राकेश का मुँह लटक गया। उसके मन में गाँठ बन गई कि वह पत्नी से कम पढ़ा- लिखा है। लोग तो उसका उपहास उड़ाएंगे ही,पत्नी भी उसे दोयम दर्जे का समझेगी। इस गाँठ के घर कर जाते ही झटके में उसके सारे उछाव -उमंग काफूर हो गई और चेहरे पे मुर्दांगी छा गई। वह मुँह लटकाये कमरे में इस तरह गड़ गया,मानो उसपर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा हो।
सुरेश तो जा चुका था,लेकिन राकेश उसी तरह कमरे में पड़े अपनी किस्मत कोसता। रहा। दिमाग पर चिंता की मोटी परत चिपकी रही। सुरेश के कहे शब्द अब भी उसके कानों में बज रहे थे।
इसी बीच रजनी ने उसके कमरे में कदम रखा। पति को इस तरह गड़े देखकर उसे माजरा समझते देर नहीं लगी। उसने सुरेश की बातें सुन ली थी।
आते ही बोली : ” चिंता करने से क्या बात बन जाएगी? अब ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है।”
“क्या मतलब?” राकेश ने अकचका कर पूछा।
” मतलब यह कि कल आप बी.ए.के सभी कागजात लेकर हमारे साथ पीजी डिपार्टमेंट चलेंगे। आपको एम.ए में दाखिला लेना है।” रजनी ने पूरे आत्मविश्वास के साथ उसे उकसाया।
“मगर आज अचानक। क्या तुम भी…? अब मैं एम.ए.करूँगा? मुझसे अब पढ़ाई-लिखाई नहीं होगी।” राकेश ने हाथ खड़े कर दिये। निराशा अब भी उसपर हावी थी।
” क्यों न होगी? मन धर लेने से कुछ भी संभव है। सिर्फ आप हाँ बोलिये,बाँकी सब मुझपर छोड़ दीजिए। मैं आपको पढ़ाऊँगी। कम से कम मन में पड़ी गाँठ तो दूर हो जायेगी।”
रजनी की बातें सुनकर राकेश अवाक् रह गया। उससे कुछ कहते नहीं बना। बस इतना ही बोल पाया : “अब मैं क्या बोलूँ। जैसी तुम्हारी मर्जी।”
सुनते ही रजनी मुस्कुरा पड़ी।
***
लघुकथा-२
नया सबेरा
गाड़ी आयी और धड़धड़ाती हुई गुजर गई।अगर मोहित ने एक भी एक कदम और बढ़ा लिया होता तो वह गाड़ी के नीचे आ जाता और आज उसकी जिंदगी हमेशा-
हमेशा के लिए खत्म हो जाती। पल भर के लिए उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा गया। दिल की धड़कनें तेजी से ऊपर नीचे होने लगी। तभी उसे लगा किसी ने उसे मजबूती से थाम लिया है। वह हठात पलटा। सामने पत्नी को बाँहें थामे देखकर वह दुःख और आत्मग्लानि से भर उठा।
” ये आप क्या करने जा रहे थे? सोचिये, अगर आप नहीं रहेंगे तो मेरा क्या होगा? क्या आपके बिना मैं जी पाऊँगी? फिर हमारी बेटी का क्या होता?कैसे होती उसकी परवरिश?क्या उसके हाथ पीले हो पाते? ये कलयुगी बाज तो उसकी बोटी-बोटी…!” कहते-कहते उसकी आँखें छलछला आयी थी।
“तो क्या करता मैं? कब तक मैं चिथड़े में लिपटी बीवी को अभावों का दंश झेलते देखता? प्यारे बच्चों को भूख से बिलखते देखता? मैं बीवी बच्चों के लिए कुछ नहीं कर सका। इससे बड़ा गुनाह और क्या हो सकता है? आत्महत्या नहीं करता तो क्या करता? कौन सा मुँह लेकर मैं जीता?” कहते-कहते वह बच्चों की तरह बिलख पड़ा।
उसकी आँखों से बहते आँसू पोंछ पत्नी स्नेहसिक्त स्वर में बोली : “आत्म हत्या करना किसी समस्या का समाधान नहीं मोहित। यह तो कायरता है। दिल छोटा मत करें। माना किरानी की नौकरी छूट गयी है। पूँजी नहीं रहने से कोई धंधा भी नहीं हो पा रहा है! खाने-पीने की दिक्कत हो गयी हो तो क्या हम मर जाएं। नहीं मोहित, नहीं। कुछ नहीं है तो हट्टा- कट्टा शरीर तो है। कट्टा-दो कट्टा अपनी जमीन तो है। चलिये चमक लाल से बात कीजिये। उससे कहिये, वह हमारी जमीन को छोड़ दे। हम दोनों मिलकर उसमें खेती करेंगे। घाम चुला-चुलाकर अन्न उपजायेंगे। जो कुछ मिलेगा, उसी में गुजारा कर लेंगे।”
पत्नी की बातों को सुनकर उसका मस्तिष्क चकर घिन्नी की तरह घूम गया। इससे उसे बल मिला और उसकी आँखों में एक नयी चमक आ गयी।
उसने सामने खेत की ओर देखा चमकलाल खेत मे कुदाल चला रहा था। आत्महत्या की बात पर शर्मिंदगी महसूस करते हुए उसने पत्नी से कहा : “आज तुमने मेरी आँखें खोल दी है। तुमने मेरी अंधेरी जिंदगी में एक नया सबेरा ला दिया है। अब मैं चमकलाल की जगह अपने खेतों में स्वयं खेती करूँगा। तुम्हारे साथ ही मिलकर।”
एकाएक उसे लगा खेत में चमकलाल नहीं, वह खुद कुदाल चला रहा है। मोहित के इस जोश और संकल्प को देखकर उसकी पत्नी के साथ साथ गुनगुनी धूप भी मुस्कुरा उठी थी।

दो लघुकथा
लघुकथा-१
मरिया
मनोवैज्ञानिक मरिया नगरनिगम का काम समाप्त कर अम्स्टेल सिटीहॉल पहुंचती है| निगम द्वारा आयोजित इस सत्र में, वक्ता के रूप में उसका यह अनवरत 12वा सत्र था।
एम्सर्डम की नवंबर २०२३ की शरद ऋतू में पौने पांच बजे सूर्यास्त हो गया था| ६ बजे के इस सत्र में शीत ऋतू और दिन भर के काम से थकी मरिया सत्र हॉल में रुख करती है।
सत्र में अपने ही जैसे सभी उक्रेनी अभिभावकों को देख वह संतुष्टि महसूस करती है|
युद्ध, विस्थापन,विस्थापन के आक्रोश के बाद मनोवैज्ञानिक मरिया पुरे एम्स्टर्डम में विस्थापित उक्रेनी बच्चो एवं अभिभावकों की आशा की किरण थी| इस जिम्मे को देख मरिया को अभी रुकना मना था|
सत्र शुरू हो जाता था| वह ९० मिनट अपना उद्बोधन करती है| सत्र को सुनने वाले श्रोता अर्थात अभिभावक कभी तालियां बजाते, युद्ध के प्रति गुस्सा व्यक्त करते,कभी भावुक हो जाते, कभी आपस में गले मिलते है|
स्थितप्रज्ञ मरिया सभी देख अंत में यह अभिभावकों से अनुरोध करती है कि वे अपने बच्चो के साथ खासकर किशोरावस्था वाले बच्चों से सुसंवाद बनाये रखें|
सत्र समाप्त होता है|
(तालियों की गड़गड़ाहट)
मारिया सभी लोगों के बीच से मार्ग बनाकर शौचालय की ओर प्रस्थान करती है| और सरहद पर खड़े अपने पति दमित्रों को, पापा की याद में २ दिनों से बिना कुछ खाएं, बिना किसी से संवाद बनाएं और २ दिनों से स्कूल भी नहीं गए अपने किशोरवयीन बेटे युरा को याद कर फूटफूटकर रोती है|
***
लघुकथा-२
निर्देशक वेबर
“मंच पर तीन बार अकादमी पुरस्कार विजेता तथा जर्मन ब्यूटी, किंटानिक जैसी फिल्मों के निर्देशक कार्ल वेबर आप का स्वागत है!”
हॉलैंड की शरद ऋतु तालियों की गड़गड़ाहट से गर्मी पाती है|
“मित्रों शुभ संध्या, सर्वप्रथम मुझे आमंत्रित करने हेतु हार्दिक आभार। मैं केवल ५ मिनटों में, बदलती फिल्म जगत को आपके सामने पेश करता हूँ।”
“समय बदल गया है। आज के दौर में पात्र के रंग, भाषा, लिंग,वर्ण, उम्र से परे पात्र की प्रतिभा ही श्रेयस्कर है|”
वेबर से सहमत हो कर सभी जोर से तालियां बजाते हैं। सभी को शांत करते हुए वे आगे कहते है “मुझे सुंदर पात्र नहीं सक्षम पात्र चाहिए।”
(तालियों की जोरदार गड़गड़हट)
“भेदभाव या पूर्वाग्रह से ऊपर कला और कलाकार है|”
(फिर तालियों की गड़गड़हट)
“मुझे सुनने के लिए आप सभी को धन्यवाद अर्पित करता हूँ|”
निर्देशक वेबर के उद्बोधन के बाद कार्यक्रम सम्पन्न होता है। हॉल के सभी लोग वेबर की ओर उनका हस्ताक्षर (ऑटोग्राफ) लेने आगे बढ़ते हैं।
इसी समय, वेबर के सामने एक बिलकुल सीधी तीखी नाक वाला, काले रंग की दाढ़ी, काले घुंघराले बाल, साफ़ रंग, छह फुट कद वाला युवक सामने आता है। वह स्पष्ट जर्मन में अभिवादन करता है।
तभी वेबर अपनी निजी सचिव से कान में धीरे से कहते हैं, “इसका फ़ोन नंबर लेना। अगली फिल्म के लिए शरणार्थी का पात्र तय हो गया है।”
अश्विनी के. हौलैंड

दो लघुकथा
पदम गोधा
गुरूग्राम
दरकते रिश्ते
उसे धीरे धीरे होश आ रहा था। धुंधले धुंधले अक्स उसे नजर आ रहे थे। सफेद कोट पहने डाक्टर को देख वह समझ गया कि वह किसी अस्पताल में हैं। उनके साथ एक सिविल ड्रेस में जवान खड़ा था।रील की तरह उसके दिमाग में पिछली घटनाएं घूम गई।
“यह हरामी साले आदतों से बाज नहीं आयेंगे!”-वह चिल्लाया था।वह उस गांव के सरपंच का लड़का था।
“तुम ठीक कहते हो सरे आम हमारी लड़कियों को छेड़ गये और हम चूड़ियां पहन कर बैठे रहे?”- पंडित का लड़का अफसोस कर रहा था।
“हमें उस सम्प्रदाय के लोगों को सबक सिखाना पड़ेगा ! देखते हैं उनका खुदा उन्हें कैसे बचाता है?”-एक और युवक ने जोश दिलाया
“अरे भाई वह गुंडे थे …उसमें सारे सम्प्रदाय का क्या दोष ? थोड़ा होश से काम लो और पुलिस में रिपोर्ट करा दो?” -एक बुजुर्ग ने समझना चाहा
“आप लोग तो अंधे होकर बैठे हो दादा जी,आप इस कौम को नहीं जानते?”-सब युवक जोश में बोले
फैसला हुआ उनके कस्बे में आग लगा दी जाय तभी बदला पूरा होगा ! एक जीप मंगाई गई उसमें तोड़फोड़ और आगाजनी का सामान रखा गया और चार पांच जोशीले नो जवान सवार होकर चल दिए।वह कस्बा
हाई वे पर चल कर कुछ दूर पर था। वह जीप चला रहा था!
जैसे ही हाई वे पर आया सामने से आते हुए तेज रफ्तार ट्रोले को देख कर घबराकर बहक गया और डिवाइडर पर जीप चढ़ा दी। जीप तीन चार पलटियां खा गई ।बस उसे इतना ही पता था। फिर क्या हुआ उसे होश नहीं था।
उसने आहिस्ता से पूछा -“हमें यहां कौन लाया डाक्टर साहब?”
डाक्टर ने मुस्कुरा कर पास खड़े नो जवान की तरफ इशारा किया -” बड़ी मेहनत से आप सबको यह लाये हैं !
अगर यह नहीं लाते तो खून बह जाने से आपके एक दो साथियों की जिंदगी चली जाती!”
उसने कृतज्ञता से युवक को देखा और हाथ जोड़ दिये।
युवक मुस्कुरा कर बोला -“आप परेशान न हों यह तो हर नागरिक का कर्तव्य है!”
वह आहिस्ता से बोला -“क्या मैं अपने मददगार का नाम जान सकता हूं?”
“अब्दुल “- जैसे एक तेज धमाका हुआ।
वह किंकर्तव्यविमूढ़ सा उस युवक को जाते हुए देख रहा था।
***
लघुकथा-२
हौसलों के पंख
शोर मच गया कि अबला सांकलें तुड़ा कर भाग गयी है और अपने साथ सारी अफवाओं को ले गई है।घबराई हुई परम्परा चाची,धर्मी बुआ ,जुल्मी ताई,खड़ूस दादा और हिटलर नाना इकट्ठे हो गये।
परम्परा चाची ने बताया -” उस कम्बख़त पर गहरी नजर रखी,सारी परम्पराओं की बेड़ियां उसके पैरों में डाल दी पर वह न जाने कैसे भाग गई ?”
धर्मी बुआ ने पूछा -“उसे स्वर्ग और नरक का डर नहीं दिखाया तूने?”
“अरे सब दिखाया उसे..! अच्छा खाना, महंगे गहने,भारी भरकम कपड़ों में दबा कर रखा ! कम्बख़त फिर भी भाग गई।”- परम्परा चाची हताशा से बोली।
“डांट-डपट कर रखना था…! वैसे भी ज्यादा प्रेम अच्छा नहीं होता यह समझाया था न तुझको?”-जुल्मी ताई झल्ला कर बोली।
“हां ताई ठीक कहती है! उसे हमेशा खानदान की इज्जत की दुहाई देकर उरझाये रखना था। समाज में परिवार की ऊंची नाक कटने का डर उसके ज़ेहन में बिठाये रखना था।”-खड़ूस दादा बोले।
“मैं नहीं कहता था लड़की को ज्यादा मत पढ़ाओ,वह पढ़ लिख कर हाथ से निकल जायेगी।”- हिटलर नाना कहां पीछे रहने वाले थे ।
परम्परा चाची सिर पकड़ कर बैठ गई ।
“अब बैठी क्या हो…? चलो सब मिलकर उसे पकड़ते हैं।”
“नहीं अब उसे नहीं पकड़ सकते!”- निराशा से परम्परा चाची बोली।
“क्यों…?”
“सारी अबलाऐं अब बदल गई है। कोई हवाई जहाज उड़ा रही है, ट्रेन चला रही है, बैंक की कुर्सी पर बैठी है,थाने कचहरी हथिया ली है,और तो और सत्ता नसीन भी हो गई है। उन्होंने अबला का चोला जो हमने सदियों से पहना रखा था अब उतार कर फेंक दिया है।पता नहीं कहां से उनमें हौसलों के पंख निकल आये हैं।वे बेखोफ आसमान में उड़ रही हैं।”- परम्परा चाची हताशा से बिलख पड़ी-“न जाने क्या होगा हमारा?”
धर्मी बुआ,जुल्मी ताई,खड़ूस दादा,और हिटलर नाना सब हाथ उठा कर दुआ मांग रहे थे-” हे प्रभु हमारी परम्परागत सत्ता की रक्षा करना।”

अर्विना गहलोत
नागपुर महाराष्ट्र
लघुकथा-१
तन्हाई
सृजना आफिस के लिए तैयार हो ही रही थी कि माँ ने उसे पुकारा।
‘मां जल्दी कहो क्या कहना है?’
‘बेटा ललिता मौसी का फोन आया है। उन्हें क्या जवाब देना है?’
‘मां आप समझती क्यों नहीं? आपसे पहले भी कई बार तो कह चुकी हूँ। मुझे अभी शादी नहीं करनी है, अभी अभी मैंने नौकरी ज्वाइन की है। आप है कि जब देखो शादी की रट लगाए रहती हैं।’
‘बेटा कुछ तो खयाल करो तुम्हारे पापाजी इसी साल रिटायरमेंट है। मैं चाहती हूँ, रिटायर होने से पहले तुम्हारे हाथ पीले कर दूंँ।’
‘तुम हो कि कुछ समझना ही नहीं चाहती हो।’
‘ये क्यों भूल जाती हो कि तुम्हारी एक छोटी बहन भी तो है? उसकी पढ़ाई भी पूरी हो गई है। हमें उसका भी तो ब्याह करना है।’
‘माँ! ये भी हो सकता है मेरे ससुराल वालों को मेरा नौकरी करना पसंद ही ना आए। मैं इस नौकरी को गंवाना नहीं चाहती। मुझे आजाद जिंदगी जीना पसंद है, बंधन में बंधना नहीं चाहती।’
‘सृजना तुमने जब शादी नहीं करने का फैसला कर ही लिया है, तो ठीक है। मेरा तो यही ख्याल है कि सही उम्र में शादी ब्याह के कार्य सम्पन्न हो जाए, बाकी तुम जैसा उचित समझो। ऐसा ना हो तुम्हे अपने इस निर्णय पर बाद पछताना पड़े। फिर न कहना समझाया नहीं था।’
‘मां! सुनो आप मौसी को मना कर देना, मैं दफ्तर के लिए निकल रही हूँ।’
‘ठीक है, अपना ख्याल रखना।’
इसी तरह वक्त गुजारने लगा। पहले तो बहुत से रिश्ते माँ ने सुझाए लेकिन सृजना को तरक्की की राह में शादी का बंधन रोड़ा ही लगा। वहं हर रिश्ते को ठुकराती चली गई। उसके पापा रिटायर होने के बाद बीमार रहने लगे। छोटी बहन का ब्याह हो गया, वह पीहर कभी कभी आती है। सृजना अपने कमरे में जब भी तनहा होती है यही सोचती है- ”मेरे दिल की बात सुनने वाला कोई तो हो। मन करता है मुझे भी कोई चाहने वाला हो, लेकिन किससे कहूँ? क्या पता था एक दिन अकेलापन काटने को दौड़ेगा? मैं अब अकेली अपनी ही तन्हाइयों लड़ रही हूँ।
***
लघुकथा-२
पुराना कैनवास
भारती अब तो शादी कर ले एक एक कर सभी बहनें विदा हो गई । भारती अपना बैग उठा कर अनमनीसी बोली स्नेहा चल देर हो रही है बस निकल जायेगी ।
भारती सुनो ! तुम मेरी बात को आज कल अनसुना कर देती हो ।
भारती सुना नहीं क्या ?
तुम ने मेरी बात का जवाब नहीं दिया।
स्नेहा तुम तो सब कुछ जानती हो फिर भी पूछ रही हो मेरे लिए अब इस उम्र में शादी करना असंभव है ।
भाई की शादी करनी है ।
साथ ही माँ की देखभाल का जिम्मा भी है।
निभाती रहो जिम्मेदारी तुम, मैं कब मना कर रही हूँ ,मैं तो बस याद दिला रही थी ।
तुम्हारी सब बहने तो जिम्मेदारी से बच कर निकल गई और अपनी अपनी ग्रहस्थी बसा ली तुम्हारे लिए किसी ने नहीं सोचा ।
स्नेहा शायद भगवान की यही मर्जी है ।
भारती तुम्हारी भी तो कुछ मर्जी है जिसे तुम शायद इग्नोर कर रही हो ।
अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है चाहो तो सब संभव हो जायेगा ।
मेरी बात मानो वरना पछताओगी जीवन संध्या में किसी के पास वक्त नहीं होगा जो तुम्हारा ख्याल रखे ।
पति पत्नी ही एक दूसरे के पूरक होते हैं ।
मेरी मान संजीव जी को हाँ करदे भाई की शादी करले उसके बाद अपनी ।
संजीव जी भी परिस्थिति वश अभी तक कुआंरे हैं, तुम कहो तो मैं मिटिंग फिक्स करु ।
स्नेहा जीवन से सारे रंग उड़ गए तुम पुराने कैनवास पर नया रंग भरना चाहती हो। जी हां ! शुभस्त शीघ्रम ।
स्नेहा जैसी तुम्हारी मर्जी भारती तो तुम्हारी बात अब और टाल नहीं सकती।
स्नेहा तुम ना …पीछे ही पड़ जाती हो।
स्नेहा ने कंधों को उचकाया- आखिर सहेली किसकी हूंँ। भारती तुमने अपने मन की जमीन को बंजर बना लिया था। लेकिन अब इसमें कोंपले फूटेंगी।
भारती के दिल में एक नई आशा के अंकुर ने जन्म ले लिया था।
बस का हार्न बजा तो दोनों मुस्कुराते हुए बस में सवार हो गई ।

दो लघुकथा
अनिल कुमार जैन
आदर्श नगर ‘‘ए’’
सवाई माधोपुर (राजस्थान)
मोबाईल नं. 9462113435
लघुकथा-१
स्नेह
‘‘अरे मधु, आज मकर संक्रांति है, तिल के लड्डू, नमकीन, भजिया, बनाये होंगे ना? ला कुछ तो खिला।’’
पति शिव ने बडे प्रेम से कहा।
‘‘मैने कुछ नहीं बनाया, किसके लिए बनाऊ? मन्नू, छोटू दोनो बच्चे तो बाहर है। हम बुढ्डे-बुढ्डी कितना खायेंगे? पिछली बार भजिया खाए तो दस्त लग गए।’’
मधु ने हल्का गुस्सा प्रकट करते हुए जवाब दिया।
‘‘रहने दे, रहने दे ।’’
शिव निराशा से बोला। उसी समय दो-तीन बच्चों के साथ काम वाली का बेटा आया और बोला, ‘‘आंटी-आंटी, हमें आपकी छत पर पतंग उडा लेने दो ना।’’
‘‘बेटा चले जाओ छत पर, सावधानी से पतंग उडाना, गिरना मत ।’’
बच्चो को पतंग उड़ाने की अनुमति मिली तो सभी बच्चे छत पर चले गए। कुछ देर बाद छत से आवाजे आने लगी,
‘‘रघु धीरे-धीरे ढील दे … अरे वो काटा …।’’ और बहुत तेज शोर होने लगा।
बच्चे तालियां बजाने लगे। ‘‘अरे श्यामू, तेरा भी पेच लड़ गया,धीरे-धीरे ढील दे, वो काटा। शोर बढता गया। बच्चों की आवाजें सुन मधु बुदबुदानें लगी,
‘बच्चे यहां होते तो मकर संक्रांति के दिन श्वांस लेने की भी फुर्सत नहीं मिलती। मां ये बनाओ, ये लाओ, दिन भर।’’
मधु उठी और पकौड़े तलने लगी।
शिव ने पूछा,‘‘क्यूँ जी, हमने कहा तब तो कुछ नहीं, अब ये पकौड़े किसके लिए?’’
“बच्चों को पतंग उडाते-उडाते खाना बहुत अच्छा लगता है।”
कहते-कहते मधु पल्लू से आंसू पौंछती हुई पकौड़े लेकर छत पर चली गई।
***
लघुकथा-२
असम्भव
विभाग के बडे अधिकारी के बंगले पर ठेकेदार पहुंचा तो पत्नी ने कहा,
‘‘नवरात्रा चल रहे है, साहब पूजा कर रहे है।’’
‘‘कितनी देर में फ्री होंगे?’’, ठेकेदार ने प्रश्न किया।
“अभी तो आधा घण्टा हुआ है, लगभग 02 घण्टे और लगेंगे।’’
‘‘इतनी देर पूजा करते है साहब!’’
‘‘हाँ क्यूं नहीं, नौ दिन नवरात्रि के तो साहब बीसियों नियमों का पालन करते है, दाढी नहीं बनाते, सुबह-शाम पूजा करते है, दिन में एक बार ही खाना खाते है, लहसुन-प्याज नहीं खाते और …।’’
‘‘अरे साहब तो संत बन जाते है, इन नौ दिनों में, पर …’’ ठेकेदार ने आश्चर्य से कहा। ‘‘पर क्या ठेकेदार जी’’, मैडम ने कहा।
‘‘कुछ नहीं, कुछ नहीं ।’’
‘‘बताओ-बताओ।’’
‘‘मैं तो यूं कह रहा हूँ कि पूजा-पाठ तो सब ठीक है। इनसे लाभ होगा ही होगा, पर सोने पर सुहागा हो जाये यदि इन नौ दिनों में कमीशन भी लेना बन्द कर दे… ’’
अचानक मैडम के मुंह से निकला,
‘‘असम्भव।’’

दो लघुकथा
पूनम वर्मा
राँची, झारखंड ।
लघुकथा-१
नाम
“क्या नाम है तुम्हारा ?”
मैंने कन्यापूजन के लिए आई बच्चियों में से एक का नाम पूछा तो वह शरमाकर अपनी बड़ी बहन की ओर देखने लगी । संयोग से इस बार गाँव में हूँ इसलिए नौ लडकियों को जुटाने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी ।
मैंने उसकी बड़ी बहन से उसकी बहनों का नाम पूछा तो उसने सहजता से उत्तर दिया ।
“ताईजी ! इसका नाम मनतुड़नी है और दूसरी का असतुरनी ।”
“अरे ! ये कैसा नाम है भला ! तुम्हारी अम्मा को और कोई नाम न मिला ?”
“ताईजी ! मेरी अम्मा इसके जन्म के समय बेटा चाहती थी पर मनतुरनी आ गई तो अम्मा का मन टूट गया और दूसरी बार फिर अम्मा की आस तोड़ने असतुरनी आ गई ।”
मैं इस दस साल की बच्ची के परिभाषित उत्तर को सुनकर अचंभित रह गई ।
***
लघुकथा-२
विस्थापन
आज सुबह स्कूल असेंबली में राउंड लगाते हुए मेरी नज़र मैदान के एक कोने में पड़े बिल्कुल सूख चुके पाम ट्री पर पड़ी । उसकी डालियाँ असहाय-सी लटक रही थीं । न जाने क्यों, उसकी दयनीय दशा देखकर मन में अजीब-सी बौखलाहट होने लगी। मैंने माली काका को बुलाकर पूछा,
“ये वही पाम है न! जो ऑफिस के गेट के पास रखा था ?”
“जी मैडम !”
तभी मुझे ध्यान आया कि यह पाम कुछ दिनों से वहाँ नजर नहीं आ रहा था । न जाने कबसे वह वहाँ दरबान की तरह खड़ा था । स्कूल में पदार्पण होते ही, गार्ड की गुड मॉर्निंग बाद में होती पहले वह अपने पत्तों को हिलाकर सहर्ष अभिवादन करता ।
“ये पाम ऐसे क्यों फ़ेंक दिया है, ? यह तो सूखता जा रहा है।” मैंने चिंतित होते हुए पूछा ।
“क्योंकि इसे गमले से बाहर कर दिया गया है ।”
“गमला टूट गया क्या ?”
“नहीं मैडम ! पौधा बहुत बड़ा हो गया था, गेट पर अच्छा नहीं लग रहा था। इसलिए गमला खाली कर उसमें दूसरा नया पौधा लगा दिया ।”
माली के ये शब्द झनाक से मेरे कानों में जा लगे । मैंने तुरत ही अपने पति को फोन लगाया ।
“सुनो विपिन ! बाबूजी का बेड उसी कमरे में रहने दो ।”

दो लघुकथा
शकुल्तला प्रसाद
यू.के.
लघुकथा-१
बड़ी शिक्षा
वह एक सफ़ाई कर्मचारी थी ।मुस्कुराता चेहरा , क़द छोटा ,गोरा रंग ,छोटी – छोटी आँखें । सारे बाल समेटकर एक छोटा – सा जूड़ा बांध लिया था ।जब भी आती हँसकर हाल जरुर पूछती ,”कैसे हो ? ठीक – ठीक ?”जवाब में मैं मुस्करा देती।जीवन में कई लोग मिलते हैं । कोई – कोई याद रह जाते हैं ।एक दिन वह थोड़ी फ़ुर्सत में थी । बातें करने के मूड में ।मैंने पूछा ,” आपका नाम क्या है ?” “ शकुन्तला “
“ अरे मेरा भी यही नाम है “ खुश होते हुए मैंने कहा ।और एक लगाव – सा हो गया ।
कुछ दिनों तक वह नहीं दिखी ।
एक दिन बह आई ।बातों – बातों में उसने बताया कि वह काठमांडू , नेपाल से है ।वह वहीं रहती थी ।पति यहाँ लंदन में काम करता था । छुट्टियों में घर जाता था ।शकुन्तला सास – ससुर , बच्चों तथा परिवार के अन्य छोटे – बड़े सदस्यों के साथ घर पर रहती ।कुछ साल पहले पति के गंभीर रुप से बिमार पड़ने पर उसे बुलाया गया । पति की हालत देखकर बुरी तरह घबड़ाई ।
उसने बताया कि हाथ जोड़कर डॉक्टरों से विनती की ,”आपलोग मेरे पति को थोड़ा – सा साँस दे दो…हम बहुत सेवा करेगा ।हम संभाल लेगा । बस थोड़ा साँस दे दो ।”डॉक्टरों के अथक प्रयास से वह चंगा हो गया ।अब बिल्कुल सही है और सारे काम करता है ।
गंभीर होकर कहा, परिवार , दोस्त सबको मिला के चलने से आप अकेला नहीं होते ।कभी नहीं ।अंत में भी साथ कोई होता है ।पर दिल से ऐसा करो।स्वार्थ से कभी नहीं ।तब जीवन के सफ़र में सच्चे हमराही बन जाते हैं जो ताउम्र साथ निभाते हैं ।
मैं अवाक , ऐसी व्यवहारिक और ज्ञानपरक बातें सुनकर उसकी सरलता और सहजता की क़ायल हो गई ।कभी भूल नहीं पाई ।
उसकी छोटी सी बात ने बहुत बड़ी शिक्षा दे डाली ।
***
लघुकता-२
उदारता का क़र्ज़
डोर – बेल बजने पर गुप्ताजी ने दरवाज़ा खोला ।एक सुदर्शन युवक खड़ा था ।”कौन ? “ जवाब में दोनों हाथ जोड़कर चरणों पर झुक गया ।”मैं विपुल….अंकल , बचपन में सुबह में मैं पेपर ….” “अरे , पहचान गया ।इतने दिनों के बाद सूट – बूट में देखकर मैं हैरान था ।” और उसे गले लगा लिया !
विपुल ११-१२ साल का था ।स्कूल जाने के पहले अख़बार बाँट कर कुछ कमाई कर लेता ।एक बार पिता के बीमार पड़ने
पर गुप्ताजी की कार धोने गया ।काम करते हुए बातें भी करता- भविष्य में कुछ करने की इच्छाओं , पैसे का अभाव , बिमार पिता ,परिवार की ज़िम्मेदारी आदि अनेक बातें।सहानुभूति हो गई गुप्ताजी को उसके ईमानदार और बेबाक़ व्यक्तित्व से ।
सारी परीक्षाएँ अच्छे नम्बर से पास करता हुआ विपुल के सामने I I T परीक्षा के फार्म भरने का समय आ गया । पैसे की समस्या थी । गाड़ी साफ़ करते उसने लाचारी बताई । गुप्ता जी थोड़ा सोचे पर तुरत कहा – “मैं तुम्हारी मदद करुँगा …!”
“ अंकल , मैं उधार नहीं लूँगा । लौटाऊँगा कैसे ? “
“तुम्हे फ़िक्र नहीं करना है । मैं वसूल लूँगा ।”
उन्होंने एक न सुनी । फार्म भरा गया ।विपुल ने खूब मेहनत की ।अच्छे से पास हुआ । ख़ुशख़बरी अंकल को सुनाई ।मुस्कुराकर उन्होंने गले से लगा लिया ।पीठ थपथपाकर आशीर्वाद दिया ।
फिर विदेश में पोस्टिंग….काफी अरसे के बाद भारत आना हुआ ।आज अपने शहर पहुँचा । मौक़ा मिलते ही हाज़िर हो गया अपने प्रति की गई उदारता का क़र्ज़ उतारने ।
गुप्ताजी कमजोर नज़र और वृद्धावस्था -जन्य कई अन्य दुर्बलताओं की वजह से हठात् पहचान न पाए ।पर तुरंत सब समझकर आँखों में खुशी स्नेह एवं प्रेम के आँसू छलक गये । आगे बढ़कर विपुल को गले लगाकर सीने से चिपका लिया ।
नेकी बहुत लोग करते हैं ।पर वक्त पर की गई सहायता को न भूलकर कृतज्ञता ज्ञापित करना कम ही याद रखते है ।
विपुल की आँखों से अंकल के प्रति भावनायें निर्वाध बह निकलीं ।श्रद्धा , भक्ति और विश्वास से वह विनत था ।शब्दों की यहाँ कोई आवश्यकता ही नहीं थी ।उसका रोम – रोम पुलकित था !
आज उसे क़र्ज़ उतारने का मौक़ा मिल गया था ।

दो लघुकथा
पूनम कतरियार
पटना
तपिश
शीतलहर चल रही थी। जूठे बर्तन रात में ही अपनी झोपड़ी के बाहर धोकर अब अंदर रख, मद्धिम हो रहे अलाव में मुनिया ठिठुरे हाथ सेकने लगी। चिथड़े में जिस्म सिकोड़े क्षोभ से भरी वह शंकर को एकसुर में ताना मार रही थी–
” शादी करके जिनगी नरक हो गयी। कोई सुख नहीं…”
दिनभर का थका-माँदा शंकर उसकी बातों का जवाब देकर,गर्मागर्म भात-तरकारी खाने का मजा खराब करना नहीं चाहता था। वह उसे कनखी से ताकते हुए बुदबुदाया,
” ब्याह करके लाया था तो कितनी भोली थी, मुँह से बोल नहीं फूटते थें। बेचारी…खटते-खटते मुँहजोर हो गई है।”
उसकी आँखें मूँदने लगी और अब वह गहरी नींद में था। मुनिया को ठंड से थोड़ी राहत मिली तो उसका ध्यान शंकर पर गया जो सपने में बड़बड़ा रहा था,
” रुपया के बारे काहे पूछ रहे हो जी? अच्छा वाला दिखाओ, बारहों मास खून-पसीना जलाते हैं तो घरवाली के वास्ते एगो बढ़िया गरम शाल नहीं खरीद सकते है का! ”
मुनिया के गाल पर दो बूँद गरम आँसू के टपके। तत्क्षण, बर्फीली ठंड, गुलाबी ठंड में बदल गयी। वह हौले से अपना फटा शॉल शंकर पर डालकर उसके बाजू में सटकर सोने का प्रयास करने लगी।
***
मुक्ति गाथा
डुबकी लगाने के बाद रेत पर धूप सेकती निधि ने देखा कि बाजू में बैठी वृद्धा अपने झोले से दो- तीन गठरी निकालती बड़बड़ा रही है,
“मुझे ब्रह्म मुहूर्त में डुबकी लगवा लाई और अपने जाने कौन नहान नहा रही है जो अबतक न लौटी है! सूरज इतना चढ़ आया है!”
फिर अचानक निधि को पूछा,
” बिटिया कितने बज रहे हैं?”
“जी, साढ़े दस…क्यों परेशान हो अम्मां?”
” बहुरिया नहाकर न लौटी है…जवान औरत है, कहीं कुछ…”
चिंतातुर वह पुन: बड़बड़ाने लगी।
अकस्मात् निधि के कानों में इलाहाबाद वाली भाभी की बात गूँजने लगी,
” हर कुंभ के बाद अचानक से हमारे शहर में वृद्ध भिखारियों की बाढ़ आ जाती है!”
निधि आशंका से बेचैन हो गई,
“कहीं बेचारी बुढ़िया को भी…नहीं- नहीं, ऐसा नहीं होगा! भीड़ भी तो इतनी है, बहुरिया रास्ता भूल गई होगी…”
अपने मन को आश्वस्त करती निधि बिस्किट का पैकेट वृद्धा की ओर बढ़ाती हुई बोली,
” अम्माँ, वो आ जायेगी, तबतक तुम कुछ खा लो…”
निधि की बात पर बुढ़िया ने इतराकर कहा,
“नहीं बिटिया,अभी खाने का मन नहीं है। देख रही हो कितना कुछ बाँधकर लाई है बहुरिया…”
उनकी आँखें पास रखे गठरियों को टटोलती चमक उठी। वह मुग्ध हो कहने लगी,
“बहुरिया जरा तेज मिजाज की है,पर मन की अच्छी है! बहुत श्रद्धा से मुझे कुंभ नहाने लिवा लाई है। देखो न, इन गठरियों में लइया- चना, चूड़ा- सत्तू, बाजरे की रोटी- अचार, मिरचा- प्याज, जाने क्या- क्या भर दी है! … जैसे अब पूरी जिनगी इधर ही बसर करनी है…”
अंतिम बात कहते-कहते अचानक वह सहमकर चुप हो गई,फिर फफककर रो पड़ी।

दो लघुकथा
नीता शर्मा
शिलांग, मेघालय
लघुकथा-१
आदमखोर
जबसे भेड़ियों का एक झुंड राह भटक कर गांव में घुस गया था सब और अफरातफरी मची हुई थी। गांव के लोग दहशत में आ गए थे। वन विभाग, पुलिस विभाग और गांव वाले सब चौकन्ने होकर उन्हें भगाने में जुट गए थे। रातों को पहरा देते हुए नारे लगाते,
“आदमखोर से बचके रहना!”
“आदमखोर से बचके रहना!”
इसी प्रकरण के बीच एक भेड़िया अपने बच्चे के साथ अपनी जान बचाने की होड़ में भागते भागते एक खेत के बीचों बीच जाकर छुप गया। रात गहरी हो चुकी थी और चारों और सन्नाटा। कुछ दूर उन्हें एक खंडहरनुमा घर दिखा जहां से कुछ आवाजें आ रही थी। बच्चा भूख से बिलबिला रहा था इसलिए पिता ने सोचा शायद वहां कोई जानवर या कुछ खाने का मिल जाए तो उसी को मार कर खा लेंगे। इसी सोच से वो आगे बड़े और चुपके से अंदर झांकने की कोशिश को।
लेकिन ये क्या, इतना भयावह दृश्य! देखकर दंग हो गया भेड़िया। अंदर एक लड़की को कुछ दुराचारी दैत्य प्रवृति वाले व्यक्ति मिलकर नोच रहे थे। लड़की उनके चुंगल से निकलने के लिए छटपटा रही थी पर मुंह कपड़े से बंधा होने के कारण असहाय थी। कुछ ही पलों में अपनी क्षुब्धा शांत होने पर उसके शरीर को क्षत विक्षिप्त कर वहीं मरने को छोड़ सभी व्यक्ति चुपचाप निकल गए। ये नज़ारा देख छोटा भेड़िया जो पहली बार वन से बाहर निकला था बोला,”बाबा ये कौन से जानवर है? इन्हें तो मैंने जंगल में कभी भी नहीं देखा। क्या कर रहे हैं ये।”
“बेटा ये इंसानरूपी जानवर हैं जो गांवों और शहरों में रहते हैं। हम तो अपने पेट की भूख मिटाने को आदमखोर बने हैं परंतु ये अपने तन की भूख मिटाने के लिए आदमखोर बन गए हैं। इनसे सदा बचकर रहना।”
लघुकथा-२
वसीयत
“आइए आइए वकील साहब, बैठिए। मां आपका इंतजार ही कर रही थी।” वकील साहब को अंदर लाते हुए गौरव ने कहा।
“कैसी हो अम्मा! अभी तो भली चंगी हो। इतनी जल्दी क्या है वसीयत बनाने की?” मज़ाक में हंस दिए वकील साहब।
“फिर भी देख-पढ़ लो एक बार सब अच्छे से। जैसा कहा था आपने सब वैसा ही लिखा है मैंने। सब कारोबार और घर की जिम्मेदारी गौरव और उसके बच्चों के नाम लिख दी है।” वसीयत के कागज़ अम्मा को दिखाते हुए बोले।
“अरे ठीक है भैया। आपसे क्या छिपा है अब। मरने के बाद भी तो सब इसका और इसके बच्चों का ही है। अब कौन ऑफिस के कागज-पत्तर देखे। चेक साइन करे। सब कुछ इसके नाम कर जान छूटे इन झंझटों से मेरी।” कागजों पर नज़र डालते मुस्कुरा दी अम्मा।
“ये जान छूटे क्या होता है अम्मा?”
“कल मां भी पापा से कह रही थी कि अम्मा जल्दी से साइन करे कागजों पर और जान छूटे इनसे हमारी?” पास बैठी छः वर्षीय पोती ने दादी से बड़ी मासूमियत से पूछा और …….
कागज़ पर साइन करती अम्मा के हाथ अचानक से रुक गए।