हिमालय की गोद मेंः हर्षिल- राजश्री अग्रवाल

हर्सिल !
यहाँ अपने छोटे से प्रवास गृह को देख कर इतनी विभोर हो उठी हूँ जैसे मन पर से जीवन के सारे पर्दे हट गए हो। छोटा सा,प्यारा सा कॉटेज ! सर्व सुविधा युक्त ! बिल्कुल चीडो के पेड़ो से घिरा कॉटेज …..मुश्किल से छ: फुट का लॉंन पारकर पीछे से गंगा का एक झरना …..जो इतनी तेजी से उछलता- कूदता पीछे हिमालय से आ रहा था कि चौबीसों घंटे ज़ोर ज़ोर से बतियाता रहता …….पिछले तीन दिन से जाने अपनी ही भाषा मे क्या-क्या बाते करता रहा …….एकदम बर्फ जैसा ठंडा और पारदर्शी पानी …इतनी ऊँचाई पर इसकी धारा मे नीरी वनस्पति और पर्वत के लवण के सिवाय और कुछ नहीं था ……एक दम पवित्रतम “निर्झर “
हाँ! निर्झर के कमीशन कि पहली पोस्टिंग! हर्सिल ! प्रकृति इनमे नहीं बंधी …..वो तो अविरल अपनी क्रीडा मे रत ,अपने गंतव्य की और ……..

बिल्कुल सामने 40-50 कदम पर मुख्य गंगा ! जिसमे यह निर्झर भी जा मिलता है । उसके बगल मे ही हिमालय के ऊंचे पहाड़ जिस की चोटी पर बर्फ जमी रहती है …..और चीड़ के पेड़ो मे बादल दौड़- दौड़ कर, लुका छिपी दिन भर खेलते रहते है…. दिनभर क्या ,रातभर भी । सूरज अपने रथ पर आता है और अपनी कायनात के सिर पर रोशनी की चुनडी सवांर जाता है । अजीब खेल है चौबीसों घंटे…बिना थके……शायद घंटे ,दिन –रात तो हमारे लिए होते है …प्रकृति इनमे नहीं बंधी …..वो तो अविरल अपनी क्रीडा मे रत ,अपने गंतव्य की और ……..
26 मई !आज बहुत सुबह इस सलामी कोर्ट पर जो चीड़ों के बीच मात्र 12-15 फिट का ,बहुत छोटा सा गंगा के झरने पर है ,उस पर बैठी हूँ ….सुबह-सुबह सामने के हर एक पेड़ ,हर पत्थर को निगाहों से छूने की कोशिश कर रही हूँ ……सामने एकाएक दाई तरफ उछलती गंगा की धवल धारा पर सूर्य किरण मचल उठती है ….मै टकटकी लगाए देख रही हूँ …धाराओं के शब्दो पर ध्यान देने की कोशिश कर रही हूँ …गंगा मुझसे क्या कह रही है ? मगर सुनू इससे पहले ही धारा तो जैसे मुझे आवाज दे कर ,कोई कहानी कह कर, कोई गीत गाती हुई तेजी से आगे दौड़ जाती है और पीछे वाली धारा उसी सुर को पकड़े चल देती है …….कौन संगीतकर है ये ….जिसने सैकड़ो मीलो तक धारा को एक सुर मे पिरो दिया और पूरी कायनात गा उठी …..किसी का सुर नहीं टूटा …निरंतर मीठा सुरीला सुर ……सामने रोशित क्षितिज से चीड़ों की नुकीली पत्तियों से सूर्य किरणों के झरने …पता नहीं कौन अद्रश्य रंगरेज है जो इस सतरंगी चुनडी को झरा कर जर्रे ज़र्रे पर ओढा रहा है और उर्मिया तो देखो, ऐसे उचक कर इसे ओढ़ती है कि क्या कहूँ और दूसरे पल शरमा कर नीचे दुबक जाती है ।
जाने कितना वक्त निकल गया, पता ही नहीं कि वेटर चाय लेकर आया तो ध्यान टूटा । हाँ! मै इस ठंडी फिज़ा मे कप से उठती भाँप की हल्की गर्माहट महसूस करने लगी ….जाने क्यो ख्याल आया कि कप से उठता एक बादल घंटा डेढ़ घंटे मे सामने हर्सिल हॉर्न पर पहुँच ही जाएगा । सामने एक लंबी पूंछ वाली चिड़िया झरने के किनारे एक पत्थर पर बैठी उछलती बूंदे पीती रही …………………………
आज हम सुबह गंगा माँ के पीहर मुक्बा गाँव के लिए निकल गए थे । सारे रास्ते जैसे इंसान ने ही पहाड़ियों के बीच चल कर बनाए हुए थे । पहाड़ियों पर घने चीड़ और देवदार के पेड़। आज तो वैसे सुबह से ही बूँदा बाँदी है फिर रास्ते मे जगह जगह सड़क को काटते हुए गंगा के छोटे बड़े झरने उतर रहे थे । दो झरने तो बहुत बड़े या कहे खतरनाक झरने है। एक झरने के बगल मे भयंकर तबाही, हाल ही मे उत्तरा खंड की त्रासदी की कहानी बयान कर रही थी। वहाँ रास्ते और पहाड़ को बांधने के लिए बनाई जाने वाली दीवार का काम आज भी चल रहा है। खैर ! गंगा के पीहर जाने के लिए उसी का चौड़ा पाट पार करना था कि ड्राइवर जी बोले –“पहले शिव मंदिर जो पुल से पहले नीचे गंगा के बेसिन मे है वहाँ हो आए। “
हम वहाँ गए। हिमालय मे पाये जाने वाले पुराने मंदिर की शैली का शिवालय। जमीन से तकरीबन 20 फिट नीचे उतर कर मंदिर का शिखर। जो तीन खंड पत्थर से बना है । उसके नीचे शिव मंदिर है, जहाँ अब पूरा पानी भरा हुआ था केवल नौ इंच दरवाजा शिखर के नीचे खुला दिख रहा था लेकिन हम मंदिर पानी मे डूबा होने से उसके अंदर नहीं जा सकते थे।
पंडित जी ने बताया –“इसे कल्प-केदार के नाम से जाना जाता है। ये आठ केदार मे से एक केदार है जो पहले नम्बर का केदार है…..इस मंदिर मे शिवरात्रि के समय शिखर और चौक मे जहां पूरी बर्फ जमी होती है लेकिन मंदिर के गर्भ-गृह मे केवल दो फिट पानी होता है। उसे नीचे उतर कर निकाला जाता है फिर शिव-बाबा की पुजा आरती की जाती है। यह शिवलिंग पाँच-मुखी स्फटिक लिंग है जिसमे नीली झाई है ………इस पुजा के दूसरे दिन से ही इस मंदिर मे फिर से पानी भरने लग जाता है ……..इसके द्वार के चार फिट ऊपर सूर्य देव को शिखर के पाषाण पर उकेरा गया है । ऊपर भूतल पर बाई तरफ नांदिया और शिव परिवार विराजमान है। सारे साल इसकी ही पुजा की जाती है।
पंडित जी ने ये भी बताया –“पांडवो के हिमालय वास के समय उन्होने इस केदार की स्थापना की थी। सामने ऊंचे पहाड़ पर जहां अब भी बर्फ जमी थी, वहाँ से थोड़े नीचे पांडवो द्वारा फोड़ा हुआ झरना है जो बर्फीली सर्दी मे भी बराबर झरता है। ये साक्षात गंगा अवतरण है । आप देखे कि इस भैरों घाटी मे गंगा तेरह रास्तो से अवतरित होती है वैसे तो सैकड़ो छोटी छोटी निर्झरा बन गंगा यहाँ उतरी है लेकिन पूरी भैरो घाटी मे जैसे शिव ने अपनी तेरह जटाएँ खोल दी है और गंगा उतर आई है। यदि धार्मिक द्रष्टिकोण को हटा भी दे तो भी फरवरी की सर्दियों मे जहां कल्प केदार के भूतल पर बर्फ जमी होती है लेकिन गर्भ गृह मे पानी रहता है। वैसे ही जहाँ सब झरने बर्फ मे जम जाते है लेकिन पांडवों की मन्दाकिनी की धारा नहीं जमती ……यह सत्य विशेष भूगोल और किसी मिनरल विशेष की कहानी ही कहता है।
खैर !गंगा के चौड़े पाट के सामने की पहाड़ी पर ‘मुक्बा ‘ गाँव, जो गंगा माँ का पीहर है, उस के लिए हम चल पड़े । यहाँ नदी पर लोहे की रस्सियों का पुल है जिस पर पैदल ही जाना होता है जो तेजी से दौड़ने या लोगो के एकसाथ चलने से हिलता है। वैसे उत्तरकाशी के आगे हिमालय के अधिकांश पुल सिंगल वे ही है। यह भी कह सकते है कि आर्मी इंजीनियर्स ने बनाए है। गर्डर, टिन और रस्सियों से बनाए है। खैर! हम कच्ची पगडंडियों के साथ ऊपर चले। यहाँ भी चट्टानें धसके नहीं इसलिए स्थनीय लोगो और पंचायत ने पगडडियो की किनारियों पर पत्थर जमा कर उन्हे बजरी के कट्टो से लोहे की जालियाँ को बाँध कर रास्ता बनाया है। नदी के चोड़े पाट और पहाड़ की ऊंचाई से यहाँ हवा बहुत तेज चलती है और सारे मकान कम ऊँचाई के नक्काशी दार लकड़ियों के, झरोंखे दार, पारंपरिक शैली के होते है। जमीन बर्फ जैसी ठंडी होने से मई मे भी गर्म गलीचे बिछाये रहते है। गंगा के पट बंद थे लेकिन मंदिर के प्रांगण मे खेलते बच्चे सामने की दो मंजिली हवेली से पंडित को बुला लाये। जिन्होंने चाबी आते तक हमे बगल के एक स्वागत गृह मे बैठाया। उन्होने बताया-“ मुक्बा मूल रूप से पण्डितों का गाँव है। इस समय गंगोत्री मे जो संजीव आचार्य गए हुए है वो अक्टूबर मे वहाँ से गंगा माँ की मूर्ति छ माह के लिए इस सामने मंदिर मे ले आएंगे और गंगोत्री के पट आगे छ माह के लिए बंद हो जाएंगे। बिल्कुल वैसे ही जैसे बेटी को पीहर लाया जाता है, गंगा को भी धूम धाम से, गाजे बाजे के साथ, पालकी मे बैठा कर लाते है। तब यहाँ भारी उत्सव, नाच-गान किया जाता है। सेना तो इस समय यहाँ सब के लिए भंडारा अपनी सेवा के साथ करती है। उन्होंने यह भी बताया कि भागीरथ के तप से जिस स्थान पर गंगा माँ उतरी, वो गंगोत्री कहलाई और गंगा ने तो स्वर्ग ही रच दिया …..तब वायुदेव ने उनसे प्रार्थना की –“ हे माँ आप यही रहे और मेरे साथ साथ अपने कलेवर को आगे भेज दे ।“
आपने देखा गंगा का दिव्य स्वरूप यही बस गया…….. आगे तो गंगा की धाराएँ गयी है …..लेकिन आज हजारो वर्ष बाद भी गंगा यहाँ अपने मूल स्वरूप मे है …….”
पंडित जी ने इस छोटे से गाँव के लिए बताया –“बाबू! पण्डितों का यह गाँव अपनी गंगा के साथ पुरानी जड़ों से आज भी जुड़ा है। यहाँ स्कूल प्राइमरी तक है, इंटर करने के लिए पाँच किलोमीटर दूर हर्सिल के एकमात्र राजकीय इंटर स्कूल मे जाना पड़ता है….. भाई इन्ही पहाड़ी, नदी, नालो के रास्ते। आज भी यहाँ पुराने जमाने के कम ऊँचाई वाले लकड़ी के मकान बनाए जाते है। फिर गंगा के इतने चौड़े पाट और पहाड़ी की इतनी ऊंचाई के कारण तेज हवा चलती है जिस कारण पहले लकड़ी का ढाँचा बना कर उसमे पत्थर भरते है, फिर उस पर मकान बनाया जाता है| जिससे वो तेज हवा मे गिरे नहीं या उड़े नहीं। मुकबा के इस तरफ ही पहाड़ी पर सूर्य की किरणे पड़ती है इस लिए इस ओर ही आबादी है सामने की पहाड़ी जहां हमेशा छाया रहती है वहाँ नहीं।“
मै सोच रही थी यहाँ प्रक्रति के मुक्त आँगन मे कितना सरल मन और कितना कठिन जीवन है। ये लोग आज भी अपनी जड़ो से जुड़े है। यहा सब कुछ आसानी से उपलब्ध ही कहाँ है? जीवन के रोज़मर्रा के समान, पढ़ाई, रोजगार सभी कुछ तो ………ये लोग दुनिया से केवल टी वी से जुड़े है। यहाँ भारत की हजारो कल्याणकारी योजना ढूँढने से इक्की दुक्की मसलन स्कूल, पुल आदि खतरनाक रास्तो मे जिन्हें ज़्यादातर सेना ही सहेजती है और बनाती है।
पंडित जी बोले –“सड़क के तो हाल ये है कि हर्सिल से पहाड़ी के पीछे पीछे एक सड़क मुकबा पहुंचता है। जो पिछली साल हिमालय सुनामी मे कई जगह पहाड़ टूटने से क्षति ग्रस्त हो गयी, जिसे सरकार ने अभी तक बनवाया नहीं है, इसलिए आपको गंगा का पाट और पहाड़ी चढ़ कर आना पड़ा। “
मुझे अब समझ आया कि जब मै ऊपर आ रही थी, तब दो लड़के मोटर साइकिल को लगभग उठा कर ले जा रहे थे। शायद इसी लिए उनके पास पट्रोल की बोतल थी ।
—————————————————————————————————————————— समझ नहीं आता एक परिवार का एक बच्चा ऐसी जगह हो, जहां सारे रास्ते टूट जाए, उससे सारे संपर्क टूट जाये ……एक साल गुजर गए, हमने उसे अपने से जोड़ा ही नहीं , रास्ते आज भी टूटे पड़े है ….हम इतने लापरवाह कैसे हो सकते है?
कल गंगोत्री दर्शन को गए थे, हर्सिल से करीब 22 किलोमीटर दूर। सारे रास्ते सैकड़ो छोटे बड़े झरने जो उनके बगल से नीचे उतर रहे थे, बिना रुके, बिना थके, हर पल, हर क्षण। देवदार और चीड़ के पेड़ इस कद्र पहाड़ी के आँचल पर उभरी थी मानो किसी ने पहाड़ी के आँचल पर चारो तरफ कशीदे किए हो। पहाड़ीयां इतनी पास जैसे सुरंग के बीच गंगा की सफ़ेद धराए और उनसे 800-1000 फुट की ऊंची पहाड़ी रास्ते पर हमारी जिप्सी । इतनी क्षति ग्रस्त घांटिया, कि जरा सी चूक हो जाए तो सीधे नीचे नदी मे……….
कितनी बार तो भगवान को याद किया। मालूम हुआ, यहाँ रास्ते मे एक लंका पुल है, जो एतिहासिक और बहुत गहराई मे है। मन मे नीरत प्रक्रति के भयानक ख्याल आते रहे, आखिर हम उस पुल के सामने पहुंचे । जो मुश्किल से 250-300 मीटर का था। जो दो बहुत ऊंची पहड़ियों को करीब धारा से 600-700 फुट ऊंचे पर जोड़ता है और नीचे वही सुरंग नुमा पहाड़ीयां मानो माँ ने दो हाथो से गोद बना कर गंगा को लेटा रखा है…….कई मीलो तक ये दो पहाड़ीयां गंगा को गोद मे लिए चलती है। आज भी ये पुराना लोहे का भारी भरकम लंका पुल यो की यो है । हालांकि पहाड़ी के इतने नीचे इस पुल पर अब आवाजाही नहीं है लेकिन उस जमाने मे इतने बीहड़ सुरंगनुमा पहाड़ो मे नीचे से उफनती गंगा पर पुल बनाने को इतना भारी लोहा भला कैसे पहुचा और कैसे पुल बंधा ? बड़ी हैरत होती है ……सोच सोच कर।
इधर साल भर मे उत्तराखंड की सरकार ने कुछ भी तो नहीं किया। रास्ते मे आज तक सडको मकानो के झूलते लेंटर है, जैसे अभी अभी त्रासदी हुई हो और अब जून के बाद फिर बरिश का मौसम आ जाएगा। इतनी ऊंचाई जहाँ पेड़, झरने, जीव जन्तु के सिवाय कुछ तो नहीं। मानो इंसान की कलम यहाँ लगी ही नहीं । इतनी ऊंचाई पर बिना घर पहाड़ियो के झरनों मे रास्ता बनाने को कुछ् मजदूर पड़े है जिनके बच्चे आधे अधूरे कपड़े पहने इतनी ठंड मे फटेहाल चीथड़ों के शामियाने के तम्बू मे रह रहे है। खट खट ……..पहाड़ से गिरे पत्थरो की गिट्टियाँ तोड़ रहे थे। ये लोग झरनों से पानी और वनस्पति से कंद-मूल, खाद्य ले कर जीते है। यहाँ भेड़े बहुत पालते है। गंगोत्री के रास्ते से ही शेलाँग 17 किलोमीटर आगे ऊंचाई पर है इससे भी आगे जहाँ कोई भी नहीं रहता वहाँ केवल हमारे देश के रक्षक रहते है, बर्फ मे । सामने बर्फ ही बर्फ है इसके पीछे पहाड़ी पर शेलांग है, हमारे ड्राइवर ने बताया। जून की गर्मी मे सुकून देने वाला हिमालय मे रहने वाले ये लोग कितनी मुश्किल और मेहनत कश ज़िंदगी को जीते है। फिर इनसे भी दूरस्थ बर्फ मे गर्मी –सर्दी मे रहने वाले हमारे जाँबाज सैनिक …….सच मे देश के प्रहरी तो ये लोग है। मन श्रद्धा से उन्हे नमनकर झुक गया।
मेरे पति ने पूछा “फिर पिछले साल हिमालय सुनामी मे ये लोग वहाँ कैसे रहे होंगे? उनको रसद, समान सप्लाई कैसे हुआ होगा? जब सारे रास्ते ही बंद हो गए, तब?”
एकाएक हमारे साथ जा रहे लेफ़्टिनेट साहब बोले- “सर !हमारी आर्मी का जवाब नहीं। हमारी यूनिट से सब पैदल अपनी पीठ पर 26-26 किलो का वजन रसद बांध कर देश के आखिरी पोस्ट तक पहुंचा कर आए थे?”
“आप लोग खुद?’
“जी सर! हम तो क्या हमारे सी॰ ओ॰ साहब खुद अपनी पीठ पर 26किलो रसद का समान बांध कर अपने जवानो को पहुंचाने गए थे।“
“यही वो जज्बा है जो हर सैनिक दूसरे सैनिक के लिए मरने को तैयार रहता है। “ मेरे पति गर्व कर उठे।
उन्होने हमे बताया कि उस समय सारे रास्ते टूट जाने से बंद थे और उत्तर काशी से ही भारत के अन्तर्राज्जीय सीमा तक सप्लाई होती है अत उन दिनो हम पैदल पहाड़ो पर एक-एक पग चल कर उत्तर काशी जो यहाँ से करीब 78 किमी है, समान लाते और लाकर आगे सप्लाई देते थे।
मै सोच रही थी कि सिविल लाइफ मे लाख साधन होने पर भी काम होते ही नहीं। हम तो ऐसे ही जीते है लेकिन जब आदमी मे इच्छा शक्ति जागी, तो हिमालय को भी उसने कदमो मे नाप लिया……………………
खैर! गंगोत्री एक कल्पनातीत सौंदर्य! एकाएक आंखे बन्द हो गयी….. मन ने कहा यही किसी चित्र-प्रेमी ह्रदय ने तूली उठाई और कैनवास को रंग दिया होगा । बेहद सुंदर ! सामने हिमाच्छादित पहाड़ियों से घूम लेते हुए गंगा इठलाती, गुनगुनाती, किलकारी मारती पत्थरो के मुँह धो कर ,उन्हे आईना दिखा कर खिलखिला कर आगे चली आती है। एक चित्रकार की तरह सब कुछ एक कैनवास पर रखू तो असंख्य रंगो मे रंगी प्रक्रति और ये विराट चित्रकला का दर्शन…ऊंची धवल चोटियो से भीगकर जैसे जैसे नीचे ब्रुश चलती है एक-एक पत्थर, एक-एक पेड़, मिट्टी, चट्टान को अलग अलग हजारों रंगो मे रंगती जाती है। बहुत ही सुहावन श्वेत पवित्र रोशनी बिछाये इस पूरे कैनवास पर गंगा माँ के मंदिर की चटक लाल ध्वजा और रंग-बिरंगा शिखर मानो कैनवास मे जान डाल रहे हो और हर पल घणटो के स्वर माँ की धड़कन सुनती रहती है।
सच मे सजीव ! गंगा माँ की पवित्र धारा ही नहीं माँ की मूरत भी एकदम अलौकिक! गंगा के इस चौड़े पाट पर गंगा को पूजते समय पंडित जी के शब्द जैसे वायु-मण्डल मे स्थिर से हो गए हो –“हे पवित्र पावनी माँ गंगा! हर एक का कल्याण करो। “
वो हमसे कहते है-“ आप कुछ भी इच्छा माँ से रखो। ये साक्षात माँ है ……एक बार को पिता बच्चे को मना कर दे लेकिन माँ तो बच्चे के पुकारते ही सब कुछ उसे देगी, जैसे भी हो….वो कभी मना नहीं कर सकती। हे माँ गंगे ! तुमने तो भागीरथ की पीढ़ियो को ही नहीं तारा, तुम आज तक सब बच्चो को देती ही आई हो। हे पवित्र पावनी माँ…………
और जैसे सारे शब्द वायुमंडल मे घूम जाते है बार-बार ……गंगा जैसी पुनीत नदी के चरण अर्पित स्थल पर ये शब्द बार-बार …हर दिन …हर माह…..हर वर्ष…….हर काल से हवा मे विस्तार लेकर जैसे कण-कण मे शिला-लेख बन गए है ।
वापिस लौटते गौरी कुंड, सूर्य कुंड भी देखे। पत्थरो से नीचे उतरते जैसे सफ़ेद चट्टानों मे प्रक्रति ने अनबूझी आकृति वाले हल्के -गहरे रंग की ब्रुश चला दी हो। अनमेल हो कर भी बहुत सुंदर……..पत्थरो से नीचे जाते जैसे पाषाण युग की कोई कन्दरा से गुजरने पर, एकाएक नीचे गंगा की धवल धाराए …….हमने कई कोणों से कैमरे की छोटी सी खिड़की मे इसे कैद करने की कोशिश की । लेकिन हमारे हाथ छोटे ही है …..छोटा छोटा टुकड़ा कैद हुआ…..और गंगा के शोर ने सारे शब्द जीत लिए। वो तो बहुत तेजी से चट्टानों के नीचे से अल्हड़ की तरह इतरा कर, बल खा कर निकल रही थी।
गंगा की गोद मे आज का दिन अप्रतिम ! मेरी कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा इसे पढ़ सकू ….हिमालय को भी । ….कोशिश कर रही हूँ ….देखे………
लौट कर हर्सिल आए । यहाँ किवदंती है कि जागंधर की पत्नी महासती थी। जिस कारण जगंधर को कोई पराजित नहीं कर सकता था और वो इस मद मे अभिमानी हो स्वम को भगवान मान कर उत्पात मचाता था। अत: भगवान विष्णु ने छल से उस सती केको सतीत्व डोला दिया और जैसे ही उसे सच पता लगा उसने विष्णु को श्राप दिया- ‘हरी! तुम शीला हो जाओ।‘
हर +सील यानि हर्सिल नाम इस जगह का पड़ा। लेकिन विष्णु ने कहा – ठीक है! तुम दोनों भी यही मेरे साथ रहो। बताते-बताते एकाएक लेफ़्टिनेट ने खुशी से लगभग चीख कर बोले-“वो देखो हर्सिल होर्न्स ।“ हमारे बाई ओर दो सीधी पहाड़ीया जो ऊपर से नुकीली थी। उन पर जमी बर्फ सूर्य की सीधी किरणों से बुरी तरह चमक रही थी। इतनी सफ़ेद चमकीली बर्फ देखते आंखे लगभग चौंधिया जाती थी।
आइबेक्स ! हिमालय मे पाये जाने वाला गोल सिंगो वाला मेष जैसा जानवर! दसो झरनो के बीच छोटी सी स्थली । इससे गुजर कर ही 50 परिवारों का गाँव हर्सिल है। जिसमे मुश्किल से 10 दुकाने भी नहीं है । एक मिडिल स्कूल है गाँव मे, एक विष्णु भगवान का मंदिर है। जो अब बंद मिला था लेकिन यहा मंदिरो मे जाली के दरवाजे होते है। अत: हम दर्शन कर सकते थे। मंदिर के पीछे गंगा का चौड़ा पाट ,सामने ऊंची पहाड़ी करीब 350-400 मीटर ऊंची…….ये एक मात्र उत्तर काशी से आने वाली घाटी है। हम नदी के पत्थरो पर कुछ देर बैठे वहाँ एक अजीब सी चिड़िया की कक-कक सुनते रहे। वो जब कक बोलती तो उसकी लंबी सारी पूंछ ऊपर खड़ी हो जाती है। नदी की गुन –गुन जो तो पिछले तीन दिनो से हमारी धड़कन की हमराही बनी हुई है । हल्की बारिश आकाश को जैसे धरती पर लाने की जिद करती रही।
मंदिर के बाहर बारिश मे भी एक स्त्री वहाँ खुरपी चला रही थी, काली मिट्टी मे ….उसने बताया इस टेरेस फील्ड मे एक ओर सेव का बागान है ओर एक ओर राजमा! यहाँ की राजमा विश्व की सबसे उन्नत किस्म की राजमा होती है। मुझे याद आया कि रिज़ॉर्ट मे कल राजमा की सब्जी बहुत मुलायम और स्वादिष्ट थी।
आगे भगोरी गाँव केवल 25-30 घरों का गाँव है। 8-10 महिलाए सामने दो मंजिल मकान मे लकड़ी के झरोखे मे बैठी स्वेटर बुन रही थी। मालूम हुआ इस समय ये लोग सारी भेढ़ो को लेकर हिमालय की ऊंची पहाड़ियो पर जाते है। वो लोग जुलाई मे लौट आएंगे और फिर इनकी ऊन उतारेंगे। वहाँ बर्फीली ठंड के कारण उन्नत किस्म की गरम और मुलायम ऊन निकलती है। इन लोगो की आजीविका यहा की सेव, राजमा, ऊन की पैदावार से ही है। हिमालय मे इतने छोटे और दूरस्थ गाँव होने के कारण विश्व स्तरीय पैदावार का व्यवसायीकरण ही नहीं हुआ। ये लोग गंगा की गोद मे बड़ा भोला और सादा जीवन जी रहे है। यहाँ बुरास नाम का फूल होता है जिसका यहाँ शर्बत बनाया जाता है। मुझे बताया गया कि यह शर्बत ह्रदय के लिए बहुत अच्छा होता है। इस लिए इसे प्रदेश मे बहुत पीया जाता है। वाकई रास्ते मे हर दुकान पर इसके 5-10 लीटर की बोतले रखी हुई थी। बात ये भी है कि पहाड़ी इलाको मे चढ़ाई पर ह्रदय स्वस्थ होना जरूरी भी है …………………………………………………………………………………………………………………..
सामने विलियम हाऊस है। ले॰ साहब ने बताया कि मिस्टर विलियम अँग्रेजी शासन मे आर्मी ऑफिसर थे। इन्हे हर्सिल शायद इतना अच्छा लगा कि भारत आजाद होने पर सब इंग्लैंड लौट गए मगर इन्होने रिटायर्ड होकर यही अपनी कॉटेज बनाई और पूरी ज़िंदगी यही गुजारी। उनके बाद सरकार ने इस प्रॉपर्टी को स्व्म संरक्षित कर, इसमे वन विभाग का ऑफिस बना दिया है। यहाँ और भी कई कंपनियो के सुंदर रेजोर्ट है।
भगोरी के मकानो मे मुख्य द्वार के बाद छोटा सा बागान, फिर रिहयशी मकान होता है,2-3 कमरो का। मकान के मुख्य द्वार की चौखट के उपर टिन या खपरैल का सुंदर सा शेड बना होता है। मानो मुख्य द्वार पर कोई छत्र हो, एसे ही जैसे हमारे यहाँ गणेश द्वार।
आगे गंगा का खुला आँगन! वो आरक्षित क्षेत्र है। कई जगह जैसे गंगा को बांधने के लिए नाले बनाए। वहाँ केवल कल कल का जोरों का शोर……और जब वो बंधी नहीं तो लोहे के, लकड़ी के पुल थे ,पैदल पुल। मै सोचती रही, गहरी रात मे भी हमारे जाँबाज यहाँ चौकसी करते है। कभी पुर्णिमा, कभी अमावस्या, कभी तेज तूफान, कभी स्नोफल कुछ भी हो, ये जाँबाज डेढ़ –दो किमी गंगा के बिच केवल चैक करने के लिए रात और दिन में घूमते है कि सब कुछ सुरक्षित है। सामने मुक्तांगन की एक अलग दुनिया मे रोमांच से तन मन सरोबार हो गया।
आज वहाँ से लौट रही हूँ। आखिरी बार जाकर रिसोर्ट के पीछे बहते गंगा के झरने पर आई। सामने 10-12 हाथ की दूरी पर ही चीड़ के वृक्षो से लदी तलहटी पर सूरज पत्ते-पत्ते हटा कर देख रहा था…….इतना समीप था …सूरज, गंगा, चीड़ और सामने बर्फ ओढ़े हर्सिल हॉर्न……..उफ! सब कुछ इतने पास कि काश! मै बाहों मे भर लू ….
पता नहीं जलधारा से कुछ अनबूझे शब्द उछल कर आते रहे और अन्तर्मन उन्हे कविता की वेणी मे गूँथता रहा था। लौट रही हूँ एक स्वप्निल दुनिया से…….. आगे फिर शुरू हो गया। हर्सिल से उत्तरकाशी तक तीन घंटे की यात्रा। न जाने कितनी पहाड़ियाँ चढ़े-उतरे….क्षतिग्रस्त रास्ते……अधिकांश पहाड़ीया ठोस चट्टानों की नहीं थी। वहाँ पिछली अति व्रष्टि से उखड़े हुए पेड़ आज भी लटके पड़े है और ये पहाड़ियाँ हजारो पेड़ उखड़ने से पसर गयी। फिर वही सिलसिला चल पड़ा…. सैकड़ो झरनो पर बनी पुलिया । आठ बड़े आर्मी ब्रिज…… मानो हमारी गाड़ी इस पहाडी से उस पहाड़ी पर कूदते व लांघते चली जा रही थी ……….
राजश्री अग्रवाल
सर्वाधिकार सुरक्षित @ www.lekhni.net
Copyrights @www.lekhni.net

error: Content is protected !!