संस्मरण बाबूजी- शैल अग्रवाल


श्रीनाथ गुप्त
(19-8-1915, 1-4-1992)
जिन्हें हम पल-पल याद करते हैं , उन पर लिख पाना, विशाल और उद्दात्त व्यक्तित्व को शब्दों में उकेर पाना कतई आसान नहीं, विशेषतः तब जब वह हमारे हृदय के बेहद करीब हों वह और आजीवन उन्हें ही अपना आदर्श माना हो हमने।

फिर बाबूजी का तो पूरा जीवन ही संघर्ष, त्याग और संयम की अतुलनीय गाथा रही है। आदर्श और कर्तव्य की डगर चाहे कितनी भी कटीली हो, कभी उससे डिगे नहीं, ना ही कर्तव्य की किसी पुकार को नकारा कभी और ना ही किसी जरूरत मंद को।
यह वह वक्त था,जब जागृति की एक लहर थी देश में। जिसके लिए राष्ट्रकवि और उनके समकालीन कवि दिनकर ने लिखा था,
“दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।”

जोश, उत्साह और बेचैनी से भरा समय था वह हर युवा और देशप्रेमी के लिए स्वाधीनता के सिंहनाद से गूजता हुआ।

बात कर रही हूँ पिछली सदी के तीसरे दशक की, जब क्रांति की चिनगारी देश के कोने-कोने में धधक उठी थी और हर भारतवासी स्वतंत्रता सेनानी था। बात अब ‘ पराधीन सपनेहु सुख नाहीं’ की थी, और सदियों से चली आ रही पराधीनता की बेड़ियाँ असह्य और बोझिल लगने लगी थीं सभी को।

गांधी, नेताजी और भगत सिंह व सरदार पटेल जैसे नेताओं के नेतृत्व में देश की सोई अस्मिता जगी, तो परवाह नहीं रह गई किसी को कि पूरे गांव को फांसी के फंदे पर लटका दिया जाएगा या फिर दौड़ते घोड़ों के पैरों से बांधकर घिसटती और दर्दनाक मौत की सजा दे दी जाएगी, या फिर तोप के मुंह पर बांधकर उड़ा दिया जाएगा। इकबाल का जोशीला गीत – सर फरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है- नेताजी की आजाद हिन्द सेना की फौज में ही नहीं अब देश की गली-गली और घर-घर में गूंज उठा था।

ऐसे ज्वलंत वक्त का इतिहास लिखना किसी के लिए भी आसान नहीं। लिखते समय कई छूट गए, जिन्होंने अपना सर्वस्व लुटाया, जी-जान से प्यार किया मातृभूमि को। हर घर , हर परिवार के पास अपनी एक अलग कहानी है इस वक्त की। इन सेनानियों की। उनके अद्भुत और समर्पित साहस, त्याग और वीरता की।

हर परिवार और कुनबे में एक दो सदस्य तो ऐसे अवश्य ही मिल जाएंगे जो सिर पर कफन बांधकर कूदे थे इस संग्राम में कूदे और रामकथा में आई गिलहरी की तरह ही अपना विशिष्ट योगदान भी था इनका। हम और हमारी आने वाली पीढ़ी ऋणी हैं और रहेंगे सदा ही इनके भी। ऱथ निर्विघ्न आगे बढ़े इसमें हर नट बोल्ट और हर तीली का भी उतना ही योगदान रहता है जितना कि एक कुशल चालक का।

गीता-रामायण-सी ही प्रेरक हैं ये गुमनाम जीवनियाँ भी।

हमारी यह कहानी शुरु होती है उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के बेसवाँ नाम के एक छोटे-से गांव में। साधारण-सा गांव था और साधारण से ही लोग थे, परन्तु आजादी की सोच ने बेचैन कर दिया था इन्हें भी। कहते हैं ऋषि विश्वामित्र ने बसाया था बेसवाँ गांव को और किसी जमाने में यहाँ सिर्फ ब्राह्मण, बनिए और क्षत्रियों के ही घर हुआ करते थे । धरनीधर तालाब आज भी ज्यों-का-त्यों है-जिसके किनारे खड़े होकर विश्वामित्र जी ने अपने प्रण की घोषणा की होगी। ऐसी ही एक घोषणा इन युवाओं ने भी कर दी थी एक दिन अंग्रेजों के खिलाफ, बिना किसी परिणाम या खतरे के बारे में सोचे। निडर और निर्भीक होकर ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ने का संकल्प ले लिया। विश्वामित्र के क्रोध और संकल्प की कहानी हममें से किसने नहीं जानी और यह युवा भी तो उन्ही के वंशज ही थे।

स्वतंत्रता की यह लड़ाई आसान नहीं थी और खूब लम्बी भी चली। एक शक्तिशाली शासक और देश में छुपे हज्जारों गद्दार। खून-खराबे की जगह, चरित्र और इरादे दोनों की दृढ़ता के साथ-साथ अदम्य साहस और त्याग की ही डगर चुनी इन्होंने । देश सशक्त और संगठित हो इसके लिए देश के युवाओं में आत्मबल और चरित्र-निर्माण की भी उतनी ही जरूरत थी जितनी की शस्त्रों की। संगठन के नेता बने वहीं के कपड़े के व्यापारी शंकरलाल जी के बुद्धिमान व साहसी. सोलह वर्षीय मझले पुत्र श्रीनाथ गुप्त जी।

भारत की आजादी के लिए, इसकी समृद्धि व खुशहाली के लिए छटपटाते इन युवकों का साहस और जजबा इतना अधिक था कि गली-गली घूमकर स्वराज फेरी लगाने लगे। जुनून ऐसा कि एक दिन राजा तक के यहाँ पहुंच गए और स्पष्ट शब्दों में कह दिया- ‘अंग्रेजों का साथ देना बन्द करो, क्योंकि यह देश के साथ गद्दारी है। ‘

राजा ने भी इस लहर-सी उठती युवा शक्ति की बात समझी और पगड़ी भारत माता के चरणों में रखकर सौगंध ली कि जी-जान से साथ देगा। फिर तो मानो हौसलों को प्राण-वायु ही मिल गई। घर-घर जाकर विदेशी सामान का बहिष्कार करो- समझाने लगे और विदेशी कपड़े व सामान की कोने-कोने होली जली। किसी को एतराज भी नहीं था, एक ही मांग पर रानी और सेठानी व साधारण महिलायें सभी ने, जिसके पास जो विदेशी सामान था, खुशी-खुशी पूर्ण आहुति दे दी ।

परन्तु इस क्रान्ति की आंधी को देखकर खुद उनके व्यवसायी पिता शंकर लाल जी असहज हो चले । किशोर बेटे की जान तक पर खतरा नजर आने लगा उन्हें। समझाया -‘ बनिए का बेटा लीडरी और डीलरी एक साथ नहीं कर सकता। एक को तो तुम्हें छोड़ना ही होगा।‘

बेटे के पैरों में शादी की बेड़ियाँ डाल दीं, इस उम्मीद से कि घर गृहस्थी में पड़ा, तो शायद देश भक्ति का जुनून भी सिर से उतर ही जाए। कारोबार में मन लगाने और दुकान पर बैठने की सलाह भी दी गई और बड़े भाई ने भी अपने ही अंदाज में धमकाया इन्हें- ‘ यह नहीं संभव कि तुम दिन भर झंडा लेकर घूमो, और हम तुम्हारी बीबी को खिलायें। ऐसे नहीं चलेगा। काम करो तुम भी अब हमारे साथ। ‘

पर वह जुनूँ ही क्या, जिसकी खुमारी आसानी से उतर जाए। हाँ, परिवार में बढ़ती कलह देखकर एक दिन कुछ भी लिए बगैर ही, जिन कपड़ों में थे वैसे ही नव-व्याहता पत्नी का हाथ पकड़े बेसवाँ छोड़कर दिल्ली आ गये श्रीनाथ जी। हाँ, पत्नी से एक बार पूछा अवश्य था- ‘ न रह पाये आने वाले कठिन हालत में तो मैं तुझे मायके छोड़ आऊँ? कुछ व्यवस्था होते ही बुला लूंगा, वापस। ‘

साधारण नहीं, एक साहसी और देशभक्त परिवार से थी पत्नी रेवती देवी, उतनी ही स्वाभिमानी और साहसी। मानी नहीं।

‘ नहीं जी, अब तो जहाँ आप, वहीं पर मैं भी।‘

वे दिल्ली के संघर्ष भरे दिन थे । पर संकल्पों को और-और उर्जा और साहस ही देते चले गए। न तो पढाई का ही सपना छूटा और ना ही देश की आजादी के लिए कुछ कर गुजरने का।

कर्मठ थे, दूरदर्शी थे और किस्मत के धनी भी श्रीनाथ जी ।

दिल्ली में ही सहपाठी की तरह लाला हंसराज जी से जान-पहचान और दोस्ती हुई इनकी। प्रतिभा और गुणवत्ता को पहचानते हुए उन्होंने इन्हें अपनी फर्म देहली आयरन स्टील की कानपुर में ब्रांच खोलने का जिम्मा दिया और मैनेजर बनाकर भेज दिया।

कहते हैं न- होइहै सोई जो राम रचि राखा- बानक कुछ ऐसे बने कि पीछे छूटे तीनों बेसवाँ के पुराने लंगोटिया यार भी कानपुर में ही आकर बस गये थे। अब न सिर्फ सूझ-बूझ से व्यापार में दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की हो रही थी, अपितु एक बार फिर आजादी के संघर्ष की वे पुरानी गतिविधियाँ भी तेज हो गई थीं। परिचय व सहयोग का दायरा बढ़कर गणेश शंकर विद्यार्धी और भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों तक जा पहुंचा था। मित्र और परिचितों की मंडली में रफीक अहमद किदवई जैसे सच्चे और ईमानदार कुछ अन्य युवा भी आ जुड़े थे। एक मिलीजुली गुप्त प्रेस स्थापित की गईं, जहाँ रात भर पर्चियाँ छपती, जिनपर सदस्यों के लिए तरह-तरह के संदेश होते और पौ फटने से पहले ही वितरित भी कर दी जातीं। पर पूरी कार्यवाही पूर्णतः गोपनीय रखी जाती, इनके अलावा अन्य किसी को कानों-कान खबर न हो पाती। घरवालों को भी नहीं।

कानपुर की फर्म स्थापित हो चुकी थी और सुचारु व व्यवस्थित चल रही थी।

एकबार फिर इन्हें एक और नए शहर बनारस भेज दिया गया, जहाँ पर एक और देहली आयरन स्टील की नयी ब्रांच खुलनी थी। ब्रांच खुली और अच्छी तरह से सफल भी हुई यह भी। पर इस बार शिव का सच्चा आशीर्वाद मिला इन्हें। साल भर भी नहीं हुआ था बनारस पहुंचे कि घर में शादी के सोलह साल बाद पत्नी की गोद भर गई। यही नहीं देश को भी आजादी मिली इसी वर्ष। इनकी खुशी की कोई सीमा नहीं थी अब। भगवान मानो छोली भर-भर कर सपने पूरे कर रहा था ।

पहली बार देश के साथ-साथ स्वयं के घर-परिवार पर ध्यान गया इनका।

मित्र के होनहार पुत्र को मैनेजर की नौकरी दिलवाई और खुद नौकरी से इस्तीफा दे दिया और बेटी के भविष्य के बारे में सोचते हुए खुद अपनी फर्म की स्थापना की। फिर तो पीछे मुड़कर नहीं देखा। यह अब आजादी के बाद की परिवार निर्माण और देश निर्माण की दूसरी पारी थी इनकी।

पूरे परिवार को बेसवाँ से बनारस बुला लिया गया । व्यापार इतना बढ़ चुका था कि हर सदस्य के लिए जगह थी। सारी गल्ले की चाभियाँ भाइयों को सौंपकर एक बार फिर बेटी और समाज सेवा में डूब गए यह।

मित्रता का आलम यह था कि जो भी मित्र बनाया दिल से बनाया। अमीरी-गरीबी का कोई दखल नहीं था इसमें। हाँ, वफादारी और नेक चरित्र का था। एक बात जो हमें समझाते रहते थे कि जीवन हो या सिद्धांत काठ की हडिया कभी दुबारा आंच पर नहीं चढ़ती-इस बात का जीवन में सदा ध्यान रखना। और देश की आजादी की लड़ाई तो इनकी नजर में कभी खतम ही नहीं हुई थी।

अक्सर कहते थे कि असली लड़ाई तो अब शुरु हुई है। देश को इन काले अंग्रेजों और झूठे-गद्दार फरेबियों से मुक्त कराना है अभी तो। लम्बी पराधीनता की त्रासदी और संघर्ष से जर्जर देश को नव निर्माण और निरंतर सूझ-बूझ की जरूरत है। और सीनो भाई ( श्रीनाथ गुप्त जी) मरते दम तक तन-मन-धन से अपने नन्हे-नन्हे योगदानों के साथ सदा हाजिर रहे देश और समाज की सेवा के लिए।

कई कुरीतियों से आजाद कराने के लिए आज भी तो ऐसे कर्मठ सेनानियों के लिए कराह रहा है अपना देश।

हमारी लड़ाई अभी खतम नहीं हुई-आजादी के बाद भी अक्सर कहा करते थे- ‘देश में निस्वार्थ और समझदार, चरित्रवान युवा हों यह दायित्व भी अब हमारा ही तो है- घर सुधारोगे तभी समाज सुधरेगा। और समाज सुधरेगा तभी देश भी।‘

बनारस में कई नए साथी जुड़े, जिनमें मुझे रघुनाथ सिंह, कनकट चाचा व पठान चाचा विशेष याद हैं। करीब-करीब हर शाम साथ देखा मैंने इन्हें । सभी कांग्रेसी घर आते थे-कमलापति त्रिपाठी, सम्पूर्णीनंद, श्रीराम माली आदि… नेता आए दिन घर आते थे, परामर्श करते, मशवरा लेते। पर साठ तक आते-आते कांग्रेस पर भरोसा टूट गया था बाबूजी का। कहने लगे थे-सभी तो बस अपनी ही झोली भरने में लगे हैं यहाँ भी।

कोई पद या औफिस नहीं लिया, परन्तु सूझबूझ के सभी कायल। एक विश्वनीय नाम था श्रीनाथ गुप्त बनारस शहर के राजनैतिक और व्यापारी समाज में ही नहीं, दीन-दुखियों में भी।

आजीवन दीन दुखियों की जी भरकर सेवा की और जो भी बन पड़ा निस्वार्थ भाव से जरूरतमंद को दिया। कहते थे कि कमाई का तीस प्रतिशत दान में देना ही चाहिए। घर के दरवाजे सभी के लिए खुले रहते और हर अतिथि का भरपूर स्वागत सत्कार होता। मेहमान अमीर हो या गरीब कभी अनचाहा नहीं रहा घर में। खुद हमेशा खद्दर पहनते और इस्तेमाल भी करते। नई पीढ़ी मजाक बनाती, कांग्रेसियों को, खद्दर पहनने वालों को चोर कहती, तो मुस्कराती आंखें अचानक गंभीर दिखने लग जातीं- ‘ तुम नहीं समझोगे गृह उद्योग की कितनी जरूरत है आज देश में…कितनों को रोजगार मिलता है इससे …कितनों का पेट भरता है आज भी यह। हम सभी को प्रोत्साहन देना चाहिए कुटीर उद्योगों को।‘

अक्सर जेल में जाकर कैदियों को खाना बांटते देखा था मैंने। विशेषकर मेरे जन्मदिन पर तो अवश्य। पता नहीं किन स्मृतियों से प्रेरित होकर, किस खुशी के लिए और क्या-क्या सोचकर ऐसा किया करते थे वह। सोते भिखारियों पर कंबल डलवाना, और अस्पताल आदि को चंदा देना, मानो आदत थी उनकी। कला और संस्कृति की संस्थाओं को भी कभी खाली हाथ नहीं लौटने देते थे।

सर्वाधिक करीब होकर भी उनके बारे में खुद उनके मुंह से कभी कुछ नहीं सुना। ना ही मां ने ही कभी कुछ बताया। हाँ दादी , मित्र और रिश्तेदार अवश्य़ बताते रहते थे, जो हमेशा अच्छा ही होता था, मुंह पर तारीफ और पीठ पीछे बुराई के बिल्कुल ही विपरीत।
किसी वाद में , किसी राजपाट में विश्वास न करते हुए भी , गांधी के सेवा और सच के आदर्शों पर चलते असली गांधीवादी और देशभक्त व मानवता के हितैषी थे बाबूजी। ज्ञान की , नया सीखने की बेइन्तिहाँ भूख थी उनके अंदर। और वही उन्होंने बचपन से ही मुझ में भी भरी।

किशोरावस्था से ही स्वावलंबी और आजाद भारत का न सिर्फ सपना देखा, अपितु इस सच और स्वावलंबन के आदर्श को आचरण में उतारने की भी पूरी कोशिश करते रहे आजीवन। प्रार्थना एक ही रहती थी कि मरते दम तक इस लायक रखना भगवान कि हाथ किसी से मांगने को नहीं, देने को ही उठें। कबीर के इस दोहे को अक्सर दोहराया करते थे बाबूजी- सांई इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय, मैं भी भूखा ना रहूं, साधु न भूखा जाय।

संयुक्त परिवार और कौमी एकता में अटूट विश्वास था उनका और जात-पात व छुआछूत को समाज का कोढ़ मानते थे। वे ही थे जो बिना किसी लालच के, बिना किसी फोटोग्राफर के धोबी, ग्वाला और भंगी तीनों के घर गए , खाना भी खाया, उतने ही प्रेम से जितने आदर और स्वच्छता से उन्होंने पकाया व खिलाया था। तीन चार महीने गांधी जी के साबरमती आश्रम में भी जाकर रहे थे।

बीमार असहायों की सेवा को ही नहीं, सत्य, शिव और सुंदर के सिद्धांत को भी जीवन में पूजा की तरह ही अपनाया। अन्य किसी और तरह की पूजा-पाठ में कोई विश्वास नहीं था उनका। पर इसका यह अर्थ नहीं कि नास्तिक थे । भगवान को अपना सबसे बड़ा सखा और हितैषी मानते थे। दया-करुणा इतनी कि आदमी ही नहीं जानवरों का दुख भी बेचैन कर देता था उन्हें। घर का कुत्ता जब मुँह के कैंसर से मर रहा था तो सब उससे कतराते पर बाबूजी नहीं। वह भी उनकी गोदी में सिर रखकर बैठा रहता , बाबूजी उसका सिर सहलाते रहते , बिना परवाह किए कि उसकी खून सनी लार उनके कुरता -धोती भिगो रही है। माँ याद दिलाती तो कहते -‘ इसके भी तो जी प्राण हैं। इसे भी तो चाहिए कोई अपना!’

एक सम्मोहन भरी सच्चाई और ईमानदारी थी उनकी बातों और व्यवहार में-जहाँ रूपरंग और जातपात का कोई भेद नहीं था। इंगलैंड मेरे पास आए तो आपदकालीन अस्वस्थता में अस्पताल में भी रहना पड़ा था। पंद्रह दिन में ही इतने दोस्त बन गए उनके कि डॉ. ही नहीं, नर्स और वार्ड बौय तक घंटों आकर बैठे रहते। व्यक्तिगत. आर्थिक और सामाजिक समस्याएँ सुनाते, सलाह लेते। कई तो हमारे फ्लैट में भी मिलने आते। चुम्बकीय और प्रेरक थे बाबूजी।

गृहस्थ होकर भी स्वभाव से सन्यासी, पर-हिताय आजीवन हर सुख का त्याग करने वाले, हर कला में , सूझबूझ में अप्रतिम होकर भी अपने को बहुत साधारण व्यक्ति मानने वाले बाबूजी धुन के पक्के और विलक्षण व्यक्तित्व के स्वामी थे। सफलता ने सदैव उनके पैर चूमे पर उन्होंने कभी इसे अपने सिर पर नहीं चढ़ने दिया। ना ही कभी यह परवाह की कि दूसरे क्या सोचेंगे या कहेंगे, जो मन और आत्मा को सही लगा वही करते थे। पैसा खूब कमाया परन्तु उसके मोह में नहीं थे कभी…आदमी के हाथ का मैल कहते थे इसे। कमल की तरह सारे वैभव के बीच रहकर भी उससे पूर्णतः अछूते।

उनके आदर्श और सिद्धांत ऊंचे ही नहीं , अक्सर ही असंभव और अव्यवहारिक भी लगते थे। लोग विश्वास नहीं करते कि ऐसे भी होते हैं, जो अपने पराए में भेद न करें। अपने से पहले दूसरे के हित की सोचें और कुछ भी त्याग दें दूसरों की जरूरत पर!
यही हर प्राणी को अपने-सा समझना बाबूजी की असली ताकत थी और अपनी हर लड़ाई शस्त्रों से नहीं, इसी विचार और आचरण की दृढ़ता व स्पष्टता से ही आजीवन लड़ी थी उन्होंने ।

आज भी आभार में आँखें छलक आती हैं याद करके कि भगवान ने एक ऐसे देवतुल्य हमदर्द , समझदार और देशप्रेमी व देशबन्धु इन्सान की बेटी बनाकर भेजा, उनका स्नेह व सानिध्य दिया और उन्हें जानने का, उनसे सीखने का,… अपने आदर्श और विचारों का अक्षुण्ण साम्राज्य दिया है मुझे।

आज भी उनके सपनों को सच कर पाना, उन पर खरे उतरने की जिम्मेदारी निभा पाना… अक्सर अपने असमर्थ कंधों पर आसान नहीं। एकमात्र उत्तराधिकारी होना भी तो आसान नहीं पर। सफल-असफल, छोटी-बड़ी और ईमानदार कोशिशें तो करनी ही होगी आजीवन।

बाबूजी की आँखों में खुशी और संतोष देखना ही तो मेरे जीवन का सबसे बड़ा ध्येय रहा है, जैसे कि हर आंख में खुशी और संतोष देखना उनका सपना था सदा।…

शैल अग्रवाल
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