
हिंदी के यशस्वी कवि कुंवर नारायण गत 15 नवंबर को 90 वर्ष की आयु में साहित्याकाश को अंधेरा करते हुए अस्त हो गए।
हाल ही में उनके लिए आयोजित एक शोक सभा में अशोक वाजपेयी ने कहा कि युवा कवियों और लेखकों से कुंवर जी का अद्भुत रिश्ता था. उनके ज्ञान के विस्तार में केवल एक समाज ही नहीं था बल्कि संपूर्ण संस्कृति और इतिहास था. भारतीय अंग्रेजी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर एन दारूवाला ने कहा कि कुंवर जी बहुत बातों में अपवाद थे. मेरी समझ से वे पहले मानवतावादी कवि थे. उनकी कविताएं बोलती नहीं हैं बल्कि संवाद करती हैं. मंगलेश डबराल ने उन्हें नैतिकता के बड़े कवि के रूप में याद करते हुए उनकी भाषा को प्रिज्म के जैसा कहा और गीत चतुर्वेदी ने कहा कि कुंवर नारायण एक ऐसे लेखक थे जो न यशाकांक्षी थे और न ही यशाक्रांत । कुंवर नरायण की सोचती समझती कविताएँ पाठक को भी सोचने पर , थमने पर मजबूर करती हैं और आज जब हमें ऐसे मानवतावादी कवि की बेहद जरूरत है, वह हमसे बिछुड़ गए। लेखनी परिवार की तरफ से कुंवर नरायण जी को विनम्र श्रद्धांजलि।
उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का सौभाग्य लेखनी पत्रिका को भी मिला था। समय की तीन-तीन बड़ी विभूतियों ( कुंवर नरायण जी, विद्यानिवास मिश्र जी और अशोक चक्रधर जी) के साथ लिया गया चित्र सन 12 या 13 का है और आयोजन अक्षरम् पत्रिका का हैः
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