
साईकिल पर दादी
रविवार की सुबह थी। रिया मोबाइल पर गेम खेल रही थी, तभी घर के बाहर घंटी बजी— ट्रिंग ट्रिंग !
रिया भाग कर बालकनी में गई— और जो देखा उस पर यकीन नहीं हुआ !
दादी बैंगनी साड़ी में, सिर पर पीला हेल्मेट लगाए, नए स्पोर्ट्स शूज़ पहनकर साईकिल चला रही थीं — और वो भी बिना थके !
“दादी! ये क्या?” रिया ने हैरानी से पूछा।
दादी मुस्कुराईं, “बिटिया, अब उम्र नहीं, जज़्बा देखा करो!”
पास के बच्चे दादी के साथ सेल्फी लेने लगे— “वाह, क्या दादी हैं!”
मम्मी ने हल्के गुस्से से कहा, “माँ! आपको ज़रूरत क्या थी इतनी स्टाइल मारने की?”
दादी हँसी, “कमर दर्द गया, बी पी कम हुआ और सबकी बोलती भी बंद कर दी !”
रिया तालियाँ बजा रही थी, “दादी, आप तो असली हीरो निकलीं !”
दादी ने रिया को सिखाया कि ज़िंदगी में उम्र नहीं, नजरिया मायने रखता है।
रिया ने मोबाइल छोड़ा, अपनी छोटी साईकिल उठाई… और हेल्मेट पहनकर दादी के पीछे दौड़ पड़ी।
अगले दिन दादी और पोती साईकिल पार्क जा रही थीं। रास्ते में दादी ने देखा कि कई प्लास्टिक की बोतलें और पुराने अख़बार सड़क पर फेंके हुए थे। दादी कुछ पल रुकीं, फिर पार्क में खेल रहे बच्चों को पास बुलाया।
दादी ने मुस्कुराकर कहा,
“बच्चों, इन चीज़ों को कूड़ा समझकर फेंकने के बजाय हम इन्हें दोबारा इस्तेमाल कर सकते हैं।”
पोती ने उत्सुकता से पूछा, “कैसे दादी?”
दादी ने समझाया,
“प्लास्टिक की बोतलों को काटकर गमले बनाए जा सकते हैं। बोतल में छेद कर पानी भरकर पौधों के पास रख दो, पौधे धीरे-धीरे पानी लेते रहेंगे। पुराने अख़बारों से सुंदर लिफाफे बनाए जा सकते हैं।”
बच्चों की आँखें चमक उठीं।
सभी ने मिलकर सड़क से बोतलें और अख़बार उठाए और घर ले गए; घर पर पुनः प्रयोग किया।
अगले दिन वे अपने-अपने बनाए गमले, लिफाफे और पानी देने की बोतलें लेकर पार्क पहुँचे और दादी को दिखाया।
दादी बच्चों की प्रयोगात्मक शक्ति देखकर फूली नहीं समाईं। खेल-खेल में बच्चों ने नए-नए प्रयोग किए और अपनी विलक्षणता व सृजनात्मकता का परिचय दिया।
बच्चों के माता-पिता भी बहुत खुश हुए। अब बच्चे टीवी और मोबाइल से चिपके नहीं रहते थे, बल्कि कुछ नया बनाने और सोचने में लगे रहते थे और रचनात्मकता की ओर अग्रसर हो चुके थे। इससे उनकी प्रयोगात्मक शक्ति भी बढ़ रही है और खेल-खेल में बच्चे पार्क को भी साफ रख रहे हैं।
दादी मन ही मन बोलीं—
“जब सीख, खेल बन जाए, तो आदतें भी अपने आप सँवर जाती हैं।”
भाव से ज्यादा शब्दों पर अटके रहना हमारी भूल !
बच्चा- हे ईश्वर मैंने 12 बार क ख ग़ घ बोला है आप इनसे अपने लिए प्रार्थना, मंत्र , भजन आदि बना लीजिए !
पुजारी- पूजा ऐसे नहीं करते।
बच्चा- मुझे तो बस ‘क ख ग घ’ ही आता है। टीचर ने बताया था- क ख ग घ से ही सारी प्रार्थना, मंत्र, भजन बनते हैं। 
नीलमणि
साईकिल पर दादी