संघर्ष से सफलता तकः मिन्नी मिश्रा, सरोज कुमार श्वेता, मंजु गुप्ता

चोट
एक अनपढ़ मूर्तिकार बहुत सारे पत्थर को तराश कर मूर्ति का रूप दे रहा था। दूर से मूर्ति क्रेता बन कर आये शिक्षक वहाँ बैठे चुपचाप सब देख रहे थे। उनसे रहा नहीं गया, तो उन्होंने मूर्तिकार से मुखातिब हो पूछा- “भई, तब से देख रहा हूँ, आपने अनेक पत्थर तराशे हैं, लेकिन आपके हथौड़े से एक भी पत्थर नहीं टूटा। आप गज़ब के हुनरमंद हैं!”

अपने धुन में मस्त मूर्तिकार ने हँस कर जवाब दिया- “ नहीं साब जी! ऐसी बात नहीं है। दरअसल मैं मूर्तिकार हूँ, पत्थर को भला टूटने कैसे दूँ! पत्थर… जब टूट जाय तो कंकड़ हो जाय, लेकिन हथौड़े का चोट सह जाय तो वह शंकर बन जाय!”
यह सुनकर शिक्षक की आँखें खुली की खुली रह गई!

मिन्नी मिश्रा, पटना, बिहार

संघर्ष से सफलता
जो भी व्यक्ति संघर्ष से सफलता प्राप्त करता है उस व्यक्ति का जीवन सदा ही सबके लिए प्रेरणादायक होता है और हमारा सौभाग्य तो यह रहा है कि हम उन की छत्रछाया में ही पले बड़े है और हमेशा उन्होंने हमसे यही कहा है कि बिना संघर्ष के कोई भी व्यक्ति सफलता अर्जित नहीं कर सकता है।
बिल्कुल सही कहते हैं वें, बिना संघर्ष के किसी भी सफलता की कहानी नहीं लिखी जा सकती, यदि मैं अपनी बात करूं तो मैं अभी भी संघर्षरत हूं अपनी सफलता के लिए। बहुत से मुकाम हासिल किए हैं परंतु अभी भी यही लगता है कि मेरी सफलता अधूरी है। जीवन के 50 सावन देख चुकी हूं। अपने आसपास रह रही सभी महिलाओं से बहुत आगे हूं, शिक्षा में भी और सफलता में भी परंतु इसका श्रेय मैं अपने आप को न देकर अपने माता-पिता को देना चाहती हूं और यहां मैं जिसके संघर्ष की कथा आप लोगों को सुनना चाह रही हूं वह मैं नहीं मेरे पिता के संघर्ष की कहानी है जो जन्म से ही अपने समाज की सोच से बहुत आगे की सोच रखते है। मैं उनकी सात संतानों में से सबसे बड़ी संतान हूं। मेरे जन्म के पश्चात मेरे एक भाई का जन्म हुआ और मेरे माता-पिता, दादा-दादी व पूरा परिवार बहुत प्रसन्न था कि चलो परिवार पूरा हुआ परंतु भगवान का निर्णय कभी कोई समझ नहीं पाया है। मेरा भाई सिर्फ अपने जीवन के पांच महीने ही पूरा कर पाया, उसके पश्चात वह भगवान को प्यारा हो गया। परिवार में दुख का सागर उमड़ गया। मेरे पिता के परिवार में एक बड़े भाई और दो बड़ी बहने थी अर्थात चार भाई बहनों में मेरे पिता सबसे छोटे थे। इतने छोटे की अपने बड़े भाई जो कि मेरे दादा की दूसरी संतान थे उनकी शादी के पश्चात पैदा हुए थे। अर्थात मेरे पिताजी की उम्र अपने बड़े भाई के बच्चों की उम्र के बराबर थी। पापा जी के पिता अर्थात मेरे दादा जी उनके साथ न रहकर अहमदाबाद में एक टेक्सटाइल मिल में काम करते थे, क्योंकि दादा जी कभी परिवार के साथ नहीं रहे। जीविका के लिए वह सदा अहमदाबाद में ही रहे, इनका बचपन पिता विहीन ही बीता और मेरी दादी अपने ही गांव में इसका-उसका काम करके परिवार के दैनिक खर्चे वहन करती थी। पिताजी को पढ़ने भेजती थी परंतु पिताजी का मन पढ़ाई में न लगकर खेलकूद में ज्यादा लगता था। मैंने तो यहां तक भी सुना है, दादी जी के मुंह से ही कि वह घर से पैसे ले जाकर फिल्में देखने का भी शौक रखते थे,और सच कहूं उनका यह शौक आज 75 साल की उम्र में भी जिंदा है। वह बचपन से ही मेहनती थे। वह अपने गांव के पास ही जिला एटा में होटल पर काम करके अपने शौक पूरा करने के खर्चे निकालते थे। काफी छोटी उम्र में ही उन्हें बीड़ी पीने का शौक भी लग गया था। आप लोग यह कहेंगे कि मैं अपने पिता की बुराई कर रही हूं परंतु बचपन ऐसा ही होता है। सही गलत की पहचान नहीं होती। जब कुछ बड़े होते हैं तब पता लगता है कि यह सब जो हम कर रहे थे वह गलत है या सही। लेकिन तब तक समय निकल जाता है और शौक लत में तब्दील हो चुके होते हैं। अहमदाबाद से रिटायर होकर दादा जी गांव में आ चुके थे। दादाजी ने अपने छोटे बेटे के रंग-ढंग देखकर उनके साथ कुछ सख्ती का व्यवहार भी किया, परंतु छोटा बेटा कहते हैं मां का लाडला होता है इसलिए दादी जी हमेशा उनकी बुराइयों को छुपा जाती थी। एक घटना तो दादी जी ने मुझे भी बताई की रात में एक बार बीड़ी गिरने की वजह से पूरी चारपाई जल गई तो पापा जी को दादा जी से बचाने के लिए सुबह तक वह चारपाई बुनकर दादी जी ने तैयार कर दी, तो ऐसा होता है मां बेटे का प्यार, संघर्षों से गुजरते हुए पापा जी की उम्र 16 साल चुकी थी। मेरे नाना जी मेरी मम्मी जी के लिए वर की तलाश में मेरे दादाजी के घर पहुंचे। अपनी पुत्री के लिए मेरे पापा को योग्य जानते हुए उन्होंने मेरे दादाजी के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया। पर मेरे दादाजी अपने बेटे की हरकतों से वाकिफ थे अतः उन्होंने शादी का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया परंतु नाना जी ने पता नहीं पिताजी के अंदर कौन सी क्षमता को जांचा और वह शादी के प्रस्ताव पर अड़े रहे। ऐसा मुझे मेरी दादी ने बताया कि वह कम से कम एक हफ्ते तक अपना बोरिया बिस्तरा लेकर हमारे गांव में पड़े रहे कि मैं शादी के प्रस्ताव पर जब तक सहमति नहीं होगी मैं यहां से नहीं जाऊंगा, सहमति लेकर ही जाऊंगा। अंततः नाना जी के सामने दादाजी को झुकना पड़ा और मम्मी जी और पापा जी की शादी हो गई। परंतु भाग्य को कुछ और ही मंजूर था । समय का चक्र कुछ इस प्रकार घुमा के मम्मी जी और पापा जी की शादी के चंद महीने बाद ही मेरे दादाजी का देहांत हो गया। मेरा जन्म तो तब तक हुआ भी नहीं था मैं भी अपने दादा जी के प्यार से वंचित ही रही। एक तो पिताजी खुद ही बच्चे थे उपर से कुछ आर्थिक सहयोग नहीं, तब पापा जी के बड़े भाई उन्हें अपने साथ हाथरस जहां वे स्वयं कार्यरत थे वहां ले गए। परंतु वहां मेरे पिताजी का मन नहीं लगा। कुछ समय वहां रहने के बाद वह वापस अपने घर आ गए। आर्थिक तंगी से गुजरते हुए उन्होंने काफी संघर्ष किया मां साथ थी और कामकाजी थी तो परिवार चल रहा था। कि अचानक नियति में कुछ अलग रंग दिखाया। मेरे जन्म के पश्चात मेरी ताई जी का निधन हो गया और मेरे ताऊ जी तनाव की स्थिति में आ गए और अपना मानसिक संतुलन खो बैठे। एक दिन इसी स्थिति में उन्होंने मेरे पिताजी पर घास काटने वाले गंडासे से न जाने क्यों सोते समय प्रहार किया। भाग्य अच्छा था कि गर्दन और आंख का बचाव होते हुए गंडासा गाल पर पड़ा और दादी जी पास ही थी। जब दादी ने यह सब देखा तो ताऊ जी को संभालते हुए एक तरफ किया और अपनी ही सूती साड़ी के पल्लू से पापा जी के गाल पर रखकर फौरन एटा की तरफ भागी और वहां पहुंचते पहुंचते अपने पल्लू को खोलते खोलते लगभग उनकी आधी साड़ी खून से लथपथ हो चुकी थी। दाद देती हूं मैं दादी की हिम्मत की जो उन्होंने इस अवस्था में भी पूरी हिम्मत से काम लिया और उन्हें डॉक्टर के पास सही सलामत पहुंचाया। डरी सहमी दादी पापा जी की सेवा में लगी रही और उनके ठीक होते हैं उन्होंने पापा को कुछ पैसे पकड़ाये और अपनी छोटी बेटी यानी मेरी बुआ जी जो कि पापा जी से बड़ी थीं के पतिदेव अर्थात मेरे फुफा जी जो उस समय फरीदाबाद में रहते थे, उनके पास भेज दिया। फरीदाबाद में वे उस समय की परिस्थितियों के हिसाब से एक छोटी-सी झुग्गी में तीन लोग सांझा किराये पर रहते थे। अब पापाजी के आने के बाद चार लोग हो गये थे। जगह इतनी कि एक चारपाई डालने पर कमरे में घूम भी नहीं सकते थे।अत: सभी जमीन पर कपड़ा बिछाकर सो जाते थे। अब चारों लोग अपने खर्च को डायरी में लिखते और आपस में मिलकर बांट कर गुजारा करने लगे। उस समय फरीदाबाद में इंडस्ट्री तो लग गई थी लेकिन मजदूर कम थे तो काफी इधर-उधर मारामारी के बाद पापा जी को फरीदाबाद में “वियरवेल साईकिल कम्पनी” में एक हेल्पर की नौकरी 90/- रु महीना मिल गई। पापा जी केवल दसवीं फेल थे और कोई काम भी नहीं आता था उन्हें। मगर पिता का साया नहीं, बड़े भाई मानसिक रोगी, बुढ़ी मां, एक अदद पत्नी और मैं जोकि इतनी बिमार थी कि कोई भी यह नहीं कहता था कि यह लड़की जिंदा रहेगी और बड़े भाई के दो लड़के, सभी गांव में थे। जिम्मेदारी का पूरा पहाड़ था उनके ऊपर, गांव में थोड़ा बहुत काम ताऊ जी के बड़े बेटे करते थे। पर उनकी शादी सर पर थी और ताऊ जी ठीक नहीं थे, अत: ऐसे में दादी और पापा जी की जिम्मेदारी बढ़ गई थी। पापा ने लोगों से बातचीत कर के पता लगाया कि किस काम में सही तनख्वाह मिल सकती है। तो पता लगा इस इंडस्ट्रियल एरिया में डाई फिटर और डाई मेकर्स की बहुत अधिक मांग है और घर-घर छोटी-छोटी वर्कशॉप्स में डाई मेकिंग और डाई फिटिंग का काम होता है। पापा जी ने 8:00 से 4:30 नौकरी के घंटों के बाद 5:00 से 9:00 बजे तक एक वर्कशॉप में फ्री काम किया और डाई फिटर का काम बिना पगार लिए मन लगाकर सीखा। डेढ़-दो साल तक ऐसे ही चलता रहा। फिर मथुरा रोड पर स्थित यूनिवर्सल कंपनी में डाई फिटर के पद पर काम किया। पापा जी ने याद करते हुए बताया कि एक विनोद नाम का व्यक्ति जो उस कंपनी में शेपर के पद पर काम करता था, उन्होंने पापा का काम वहां लगवाया और उन्हें डेढ़ सौ रुपए प्रति माह की तनख्वाह मिलने लगी। पापा जी उस वक्त तक जवाहर कॉलोनी से मथुरा रोड लगभग 10-11 किलोमीटर, अपनी कंपनी तक जो कि आज के मेगपाई रिजॉर्ट के पास हुआ करती थी, पैदल ही आते थे। यहां काम लगने के बाद उन्होंने ₹25 की एक पुरानी साइकिल खरीदी। उसके कुछ समय बाद हमारे एक अंकल “मेहरा अंकल” जिन्हें हम आज भी जानते हैं, वह अब दुनिया में नहीं है, उन्होंने पापा जी की नौकरी “प्रेस्टो लाइट कंपनी” में लगवाई। जहां पर वे स्वयं स्टोर कीपर हुआ करते थे। “प्रेस्टो लाइट कंपनी” में उनकी तनख्वाह डेढ़ सौ से ढाई सौ रुपए हो गई। उसके बाद उन्होंने कई कंपनियां बदली।जैसे “के स्ट्रीट लाइट” जो कि फरीदाबाद प्रेस क्लब के पास आज भी स्थित है, प्रेस्टीजियस स्टेपिंग, सेक्टर 24, प्लॉट नंबर 106, उसके बाद “अमेरिकन यूनिवर्सल” सेक्टर 12, और फिर 1976 में आखिरकार उन्होंने एस्कॉर्ट्स लिमिटेड में काम किया, अपनी सेवानिवृत्ती तक। 1975 में मेरी छोटी बहन के जन्म के बाद पापा जी ने मम्मी जी को गांव से फरीदाबाद लाने की बात सोची। मम्मी बीच में भी एक-आध बार फरीदाबाद आई थी। मेरे छोटे भाई की मृत्यु फरीदाबाद में ही हुई थी। उसके बाद मम्मी गांव वापस चली गई थी। फिर छोटी बहन के जन्म के बाद ही वह फरीदाबाद आई और 1977 मे पापा जी ने मेरा दाखिला प्राइवेट स्कूल में दूसरी कक्षा में करवा दिया। तब से हम निरंतर फरीदाबाद में ही रहे। हमारा पालन पोषण और पढ़ाई लिखाई यहीं हुई। लेकिन इसके बाद भी पापा की जिंदगी का सफर कोई आसान सफर नहीं था। लगातार चार लड़कियों का जन्म और समाज के ताने कि इनके लड़का नहीं है, पापा को परेशान करता था। चार बहनों के बाद हमारे दो भाई हो गए। लड़कियों की शादी की चिंता में पापा निरंतर कार्यरत रहे नौकरी, पार्ट टाइम, एक दुकान, फिर दो दुकानें, एक्सपोर्ट का बिजनेस, उसके बाद डाई मेकिंग वर्कशॉप, निरंतर काम करते हुए वह आगे बढ़ते गए फरीदाबाद में अपना मकान बनाया। अपने सभी बच्चों को उच्च शिक्षा प्राप्त करवाई। सबको आत्मनिर्भर बनाया। आज सभी बच्चे ऊंचे-ऊंचे पदों पर आसीन हैं और मेरे पिता का समाज में बहुत नाम है। वह समाज के प्रधान भी रहे। एस्कॉर्ट्स लिमिटेड में यूनियन लीडर भी रहे। गांव का एक साधारण सा इंसान साधारण सी शिक्षा के बावजूद अपनी मेहनत और लगन और संघर्ष से खुद भी बड़े बने और अपने सभी बच्चों को उन्होंने काबिल बनाया। उनकी इस संघर्षरत जिंदगी से हम सभी बहुत ही प्रेरित है और उन्ही की उर्जा हमारी रगों में भी खून बन कर दौड़ती है की उनको अपना प्रेरणास्रोत मानते हुए मैं उनका शत-शत वंदन करती हूं।
सरोज कुमार ‘श्वेता’
फरीदाबाद
हरियाणा
9971262462
saroj.kumar1109@gmail.com

मेरे बचपन की दौलत

उत्तराखंड की देवभूमि , आध्यात्मिकता- धार्मिक,  साहित्यक, ऐतिहासिक , नैसर्गिक , भौगोलिक , ऋषियों ,  मुनियों   प्रबुद्ध वर्ग की की तपस्थली है। ऐसी पावन गंगा –  माँ के तीर्थ धाम ऋषिकेश में  मैं जन्मी हूँ . शिक्षिका  माँ  शान्ति देवी वार्ष्णेय और  – पिता स्वप्रेमपाल वार्ष्णेय विद्यालय की संस्थापक और  भरतमन्दिर कॉलिज में अंग्रेजी , इतिहास के प्रोफ़ेसर संग   प्रधानाध्यापक , वक्तृत्वपटु थे । माँ –   पिता ,प्रेमपाल वार्ष्णेय सामाजिक कार्यकर्ता भी थे। उन दोनों के  व्यक्तित्व ,  संस्कारों , आदर्शों ने मुझे संस्कारित किया है । वे समाज , देश के नायक , युगपुरुष , समाज सुधारक थे। वे दोनों जीवन की यात्रा में  फलों से भरे वृक्ष की तरह विनम्र थे।
     शख्स तो हर कोई होता है लेकिन शख्शियत तो स्वयं को बनानी होती है।उत्तर प्रदेश के  अलीगढ़ से १९४२ में भारत छोड़ो आन्दोलन के समय ये विवाह करके नव-युगल ऋषिकेश में आए थे ।बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी  हमारे माँ – पिता थे। गुलाम भारत के अज्ञान , निरक्षरता ,  छुआछूत , लैंगिक भेदभाव , भ्रूण हत्या , सती प्रथा आदि के काले अन्धकार  में ,उन्होंने  स्त्री सशक्तिकरण , विधवा विवाह , बेटी बचाओ –  बेटी पढ़ाओ , लैंगिक समानता ,  सामाजिक समरसता  , भ्रूण हत्या न करने का प्रण और  नफरत की दीवारों को तोड़कर मानवता की रोशनी की और वहाँ  पर इन्होंने अज्ञान के अंधकार वाले समाज में शैक्षिक क्रांति कर के ज्ञान का दीप जलाकर दहलीज के भीतर और बाहर यानी समाज  में साक्षरता की चेतना प्रस्फुटित  की  ।इसी कारण माँ – पिता की साकारात्मक  व्यापक मानसिकता के कारण सातों  भाई – बहनों ने बिना लैंगिक भेद भाव के शिक्षा प्राप्त की  थी ।  उन्होंने’ बेटी बचाओ – बेटी पढाओ – आगे बढ़ाओ’ के सिद्धांतों को, नैतिक  मूल्यों  प्रेम , मैत्री , ईमानदारी , ज्ञान का प्रकाश परिवार के साथ समाज में फैलाया । समाज कल्याण के संग सबकी खुशहाली का बीड़ा उठाया।
पतित पावनी गंगा माँ के वे शरणागत होकर गंगा मैया की नित  पूजा – अर्चना ,  गंगा स्नान किया करते  थे। ग़रीबों , पीड़ितों के  हमनवाज बन के अपनी सामर्थ्य के अनुसार  दान- पुण्य करते  थे।
वे दोनों गो सेवा हेतु  गुड़ – गेहूँ , सेंधा नमक चौराहे पर डालते थे क्योंकि उस तीर्थ स्थल पर वहाँ पर निरीह पशु  गाय  बैल आदि का डेरा रहता था और विश्व शान्ति हेतु  चौराहे पर देशी घी ,हवन सामग्री , आम की लकड़ियों से यज्ञ हुआ करते  थे। धार्मिक कार्यों में उनकी आस्था रहती थी।
हमारी माता  स्व शांतिदेवी वार्ष्णेय  और स्व  पिता  प्रेमपाल वार्ष्णेय जी  ने खून  – पसीने से परिवार हेतु प्यारा दिव्य , भव्य आध्यात्मिक, स्वधर्म , स्वघर ‘ शांति निकेतन ‘ बनाया था।
वे संसार से  चले गए , पर वह घर  शांति निकेतन ईंट – गारे का नहीं था । वह  घर हम सब भाई – बहनों , माँ -पिता के मधुर संबंधों के जुड़ाव का था, जिस तरह घर में हर कमरा आपस में प्यार , भाईचारे , धार्मिक , साहित्यिक, सामाजिक  क्रियाकलापों से  जुड़ा होता है,  वे कमरे निर्जीव नहीं बल्कि  जीवन के दुःख -सुख , संवेदनाओं के साथी होते थे ,  जहाँ नकारत्मकता का तमस नहीं था , वहॉं  दैवीय गुणों और सात्विकता का वास था ,  मूल्यों की ज्योत संस्कारों के रूप में प्रज्वलित रहती थी , उसी प्रकाश में मेरा मस्त , अल्हड़ , मनचला , सहज , बेफिक्र बचपन संस्कारित हुआ।
   जब मैं छोटी थी तब  ऋषिकेश,( उत्तरप्रदेश )अब उत्तराखण्ड में भारत के प्रथम राष्ट्रपति महामहिम डॉ राजेंद्र प्रसाद   जी आए थे । मैंने राष्ट्रपति की महिमा में  माल्यार्पण करके स्वागत गान गाया था ।उनसे मेरी मुलाकात , सान्निध्य, आशीर्वाद की फोटो संलग्न है। इस पर मैंने आलेख भी लिखा ।
भाई – बहनों के साथ  समाज को साक्षर करने में माता -पिता की सोच , मूल्यों , संकल्पों से परहित में देश , समाज के  कल्याण  के लिये शैक्षिक क्रांति की । जो उनके सोच की ऊँचाई को दर्शाता है ।घर में   पढ़ना – पढ़ाना को ही मेरे  बचपन ने देखा था।
   माँ  के रूप में सरस्वती , लक्ष्मी , दुर्गा  तीनों देवियाँ हमारे घर में साक्षात विराजमान थीं ।  माँ ने हमें संस्कृत श्लोकों से संस्कारित किया।
    हम सब भाई -बहनों का बिस्तर से उठने पर नित्य सुबह का आगाज  अपने हाथ देखकर इस श्लोक के साथ  होता था ।
  ॐ कराग्रे बसते लक्ष्मी ,कर मध्ये सरस्वती ।
करमूले च गोविन्दः , प्रभाते करदर्शनम्।।
श्लोक बोलने  से हमारी सुबह की शुरुवात होती थी,  फिर हरि , भू माता की कृपा पाने के लिए पैर जमीन पर रखने पर यह श्लोक का मैं  ताउम्र वाचन करती हूँ।
समुद्र वसने देवी पर्वत स्तन मंडिते।
विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्श क्षमश्र्वमेव।।
आज इन्हीं संस्कारो को मैंने अपनी दोनों बेटी डाक्टर   हिमानी  , डॉ शुचि के  संस्कारों में घोला है । वे दोनों भारतीय संस्कृति संवाहक बन नयी पीढ़ी को मूल्यों से जोड़ रहे थे, क्योंकि उन्हीं शाश्वत  मूल्यों की विरासत मेरे अंतर्मन को मिली हैं।
राष्ट्र मूल्यों से जिंदा रहता है। मानव जीवन मूल्यों से  जीवित रहता है। किसी राष्ट्र की प्रगति उन्नति वहाँ के रहनेवाले लोगों से होती है। आज की नयी पीढ़ी में मूल्यों  में गिरावट आयी है। इसी वजह से राष्ट्र , समाज  में सामाजिक विषमताओं ,  हिंसा , आत्महत्या , अवसाद , सामाजिक बुराइयों , लैंगिक असमानता, भ्रूण हत्या आदि देखने को मिलती है
हम किसी भी इंसान में जबरदस्ती मूल्यों को थोप नहीं सकते हैं । बचपन के परिवेश से , संस्कारों को अर्जित किये जाते हैं ।ताउम्र हमारे जीवन सफर में चलते हैं  क्योंकि मनुष्य का बचपन ही बड़े होने पर उसके व्यक्तित्व की नींव होता है।
  मुझे खुशी है कि ये श्लोक  जिन स्कूलों में मैंने पढ़ाया है , उन  स्कूल के  छात्रों , समाज  के दिलों में भी घर कर पाए।
इन मूल्यों से गढ़ा चरित्र से निर्मित चेतना ही भारत  को आध्यात्मिक ऊँचाई के साथ , विकसित देश बना सकती है।
    हमारे माँ –  पिता की तप – तपस्या की साधना  का परिणाम है कि हम सातों भाई  – बहन पढ़ – लिख के समाज सेवा , राष्ट्रीय विकास , राष्ट्र के नव  निर्माण  में योगदान दे रहे हैं।
हमारे बड़े भाई  स्व विजय कुमार वार्ष्णेय  आई.ए.एस बने , अब वे नहीं रहे है । इनकी श्रवण कुमार- सी भक्ति , मात -पितृ सेवा  ऋषिकेश परिवार  ,समाज , राष्ट्र की मिसाल है।
हमारी विदुषी माँ हमारे साथ शिक्षिका ही नहीं थी , बल्कि वह  नारियल की तरह बाहर से कठोर और अंदर से यानी हृदय से  नारियल की गिरी की तरह मुलायम थी । घर  में अनुशासन के साथ  एक दोस्त की तरह ममता ,  प्यार लुटाती थी। हर खाने की चीज को हम सब में  बाँट कर खाती थी, जिससे हम सब में बाँट के खाने का संस्कार आया। उन्हें  मूल्यों से गढ़ी  रामचरित मानस की चौपाई , गीता के श्लोक  कंठस्थ थे और हमें सिखाती थी , जिससे हमारे में साकारात्मक ऊर्जा के साथ मानवीय मूल्यों की चेतना जागी।
‘ महाभारत ‘ , चारों वेद ‘ भगवदगीता ‘ गीता आश्रम ‘ , ऋषिकेश से हमारे पढ़ने के लिए लाए थे ।  घर  में विविध विषयों ,  लेखकों की किताबों का बड़ा -सा पुस्तकालय था। बाल – पत्रिका चंदामामा , नन्दन , पंचतंत्र भी हम सबने पढ़ी ।
जब भी कोई अतिथि बचपन में हमारे माँ – पिता से मिलने  आते थे , तब माता – पिता  हम सब भाई – बहनों को उनके  सामने गाने को कहते थे और हम देश – भक्ति , देश – प्रेम के गीत  , श्लोक गाया करते थे . राष्ट्रीय चेतना के बीज वहीं प्रस्फुटित हुए .  इस तरह से दूरदर्शी  माता – पिता ने हमारा स्टेजफियर   का डर दूर कराया ।  स्कूल  में बाल सभा होती थी । उसमें हमें  कविता , गीत , वक्तृत्व कला  आदि में भाग लेना होता था । जिससे हमारी सर्जन शक्ति  रचनात्मक क्षमता   का विकास हुआ  जिन्होंने मेरी रचनात्मकता की गतिविधियों को पंख लगाए। उस तरह धीरे -धीरे मेरे लेखन ने साहित्य जगत में प्रवेश किया।
मुझ में माता – पिता के संस्कारों से मूल्यों , राष्ट्रीय चेतना, देश – भक्ति , देश – प्रेम  के बीज प्रस्फुटित हुए . किशोरावस्था में में डायरी लेखन करती थी उसमें दिनचर्या की बातें ,  मेरी कविताओं की  आज भी युवा डायरी साक्ष्य की रूप में साक्षी है , जिसके  आधार पर  मैंने  कृति ‘सृष्टि ‘  खंड  – काव्य प्रकाशित किया है।
उनके चरित्र में  दृढ संकल्प, साहस, ईमानदारी , विनम्रता , उदारता,  सुशीलता , सेवा – भाव , बड़ों का सम्मान ,छोटों  को प्यार और कर्त्तव्य पालन जैसे उदात्त गुण कूट – कूट के भरे थे । उन्हीं के लिये कहती हूँ –
दोहों में माता -पिता
मात-पिता के प्यार से , जग में जन्मे जीव।
कुटुम्ब पालन के सदा,   होते पक्की नींव।।
मात सृजन का मूल है ,पितृ प्रेम की धार ।
ईश्वर सम है वे लगे   , महिमा अपरंपार ।।
हर पीड़ा सह कर सदा , बड़ा करें सन्तान ।
बदले में लेते न कुछ , दोनों लगे महान ।।
दृग की पुतली हैं पिता , माता नयन कटोर ।
माँ के दुख से है दुखे , पितृ जीवन की  पोर ।।
हमारी माँ पतिव्रता ,  पति – भक्ति में सती अनसुइया थी , अनसुइया की तरह स्त्री धर्म के पालन की शिक्षा  हम बहनों को  देती थीं ।पतिव्रता धर्म में वह सावित्री थी ।
वट अमावस्या के पावन पर्व पर हमारे पिता जी यानी अपने सुहाग की रक्षा , स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए  निर्जला व्रत रख के गंगा तट के पास हमें वट वृक्ष के नीचे  पूजा करने लाती थी । वहाँ आयी अन्य स्त्रियों के संग बिठा कर  हमें सावित्री  – सत्यवान की कहानी सुनाती  थी ।
स्वरचित दोहे में सावित्री की मिसाल देखिए –
बनी सावित्री प्रेम की ,  जग में है  पहचान।
यम से लायी  थी स्वयं , सत्यवान की जान।।
योगी  महर्षि पंतजली की योग साधना की साधिका – सी बनके  बचपन में शरीर को चुस्त – दुरुस्त रखने के लिए हमें आसन – प्राणायाम सिखाती थीं जिससे हम शारीरिक , मानसिक , संवेगात्मक रूप में स्वस्थ रहें वे होशियारी , चतुराई , तेजस्वीता में  द्रौपदी   – सी तेजस्वनी   थीं ।
 हमारी  माँ  सत्यम् का सूरज – चाँद , शिवम् – सी शिव की तरह सामाजिक संघर्षों के विष पी के  मानवीयता का अमृत बरसाने वाली  और माँ के रूप में  ईश का सत्य थी सत्य हर परिस्थिति में सत्य ही रहता है ।
 सत्य को झूठ की तरह सौ बहाने नहीं बनाने पड़ते हैं । सत्य को कडवा भी लगता है जो पीड़ा भी देता है ।सत्य तो शाश्वत , स्थायी होता है सत्य तो सदा विजयी रहता है जबकि झूठ हार जाता है ।
 अस्थाई होता है ।
 माँ-पिता अपने कर्तव्यों , दायित्वों में  फूलों के गुणों सम  भरभूर –   सुंदरम् थे।क्षणभंगुर संसार में सुंदर फूल अपनी सुंदरता ,  महक से अपनी और आकर्षित करता है । ऐसे ही अच्छे लोग अपने गुणों के परमार्थ , कर्मठता  , परिश्रम से समाज के  प्रेरणा स्रोत होते हैं ।
स्कूल में  शिक्षिका  होने के नाते माँ खुद  विद्यार्थियों के संग कृषि के  प्रयोगात्मक पीरियड में स्कूल के परिसर में  औषधीय पेड़- पोधे लगाती थी ।
छात्रों को हरियाली  पर्यावरण के प्रति जागरूक करती थीं ।
वनमहोत्सव पर छात्रों  के संग पौधों को स्थानीय  स्कूलों में उपहार स्वरूप देकर वृक्षारोपण करवाती थीं जिससे पर्यावरण प्रदूषित नहीं हो  ।
 पिताजी ने उस जमाने में छात्रों को साथ लेकर उबड़- खाबड़ गंगा घाट पर स्थानीय भक्तों ,   यात्रियों के जाने के लिए फावड़े , कुदाली से खोद कर रास्ता बनाकर श्रमदान करवाया था। जिससे छात्रों में आलस न रहे , लगन ,   परिश्रम , काम करने में स्फूर्ति  को जगाया। आज वहाँ पर राज्य सरकार द्वारा सौन्दर्यकरण से सुंदरता में चार चाँद लगा दिए।
पिकनिक का कार्यक्रम बनाते हुए मुझे शैशव की याद आ गयी और उन   स्थानों की याद आ जाती हैं, जहाँ हम पहले कभी गये थे, भविष्य में भी जाएँगे। ऋषिकेश उत्तराखण्ड के अधिकतर स्थल प्रकृति की वादियों की गोद में बसे हैं , जहाँ ऊँचे – ऊँचे पहाड़ ईश से साक्षात्कार कर आँखें मिलाते हैं, वहॉं पर  बहती पावन नदियाँ के नज़ारे , दिव्य मनमोहक मंजर से मेरा मन  सराबोर  हो जाता है।
हमारे पिता जी  कॉलिज में  प्रधानाचार्य ही नहीं थे , बल्कि वे पूरे समाज ,राष्ट्र  के लिए ईश का आशीर्वाद थे। उनकी ईमानदारी , संयम , त्याग आदि के किस्से आज भी नई पीढ़ी के लिये मिसाल है।
 जब हमारे प्राचार्य पिता जी कॉलेज की एसेम्बली में पिकनिक पर ले जाने की तारीख बताते थे सभी छात्रों में खुशी होंठों पर छा जाती थी ।शिक्षकों के साथ विद्यालय के विद्यार्थियों को जब वे  लक्ष्मण झूला , परमार्थ निकेतन  आदि स्थलों  पर पिकनिक पर ले जाते थे , रास्ते में खड़े पेड़ों , पहाड़ों , पक्षियों के माध्यम से दृश्य , श्रव्य सामग्री की तरह  उनका जीवंत प्रयोग करके अँग्रेजी और हिंदी भाषा की व्याकरण, जैसे कारक चिन्हों ,  संज्ञा , सर्वानाम आदि  के पाठ को सरलता से सीखा देते थे। सारे छात्र  मनोरंजन , रोचकता के साथ इस ज्ञानवर्द्धक जानकारी को आसानी से  प्राप्त कर लेते थे।  इसी वजह से  परीक्षा में मैं व्याकरण में  पूरे अंक  लेती थी। सबका ज्ञानवर्द्धन के साथ मनोरंजन भी हो जाता था। पर्यावरण बचाते वृक्ष हमारी साँसों के लिए ऑक्सीजन का सिलिंडर बन कर काम करते थे। ऊँची पहाड़ियों पर चढ़ाई करने पर साँसें नहीं फूलती थीं ।
 वहाँ पर प्रख्यात चोटी वाला का शाकाहारी  होटल में पूरे छात्र संग शिक्षक दोस्त बनके चाय , नाश्ता ,शुद्ध  देशी घी का खाना खाते थे  और गंगा का पानी पीने को मिलता था । इस होटल  की विशेषता थी कि यहाँ पर हनुमान का रूप धरे व्यक्ति सबको को मोहक मुस्कान से स्वागत करता था।बच्चों , बड़ों में वह लोकप्रिय था। अब वह स्वर्ग चला गया , यह आकर्षण भी कम हो गया। तकनीकी के आधुनिक जमाने में  उसकी जगह अब किसी ओर ने नहीं ली है।
 हम सब दोस्त घाटों पर स्नान कर एक दूसरे पर गंगा की फुहारें  डाल करके सत्यम् -शिवम्-सुंदरम् का चरम आनंद लेते थे। यही फुहारें अब आधुनिक रिसोर्ट में रेन बो बन गए ।
 हम सभी जन गंगा आरती पंडितों के साथ करके प्रभु का प्रसाद लेके आध्यात्म  की तरंगों के संग  मोक्षदायिनी गंगा को गंगाजलि में भरके प्रस्थान की तैयारी करते थे।उस समय यातायात के साधन बस रिक्शा आदि नहीं थे । शाम को सभी जन पैदल चल कर थके -हारे  अपने घर लौट आते थे।
मैं सौभाग्य शाली हूँ कि मेरे बचपन को इतनी ठोस संस्कारी , शैक्षणिक , सामाजिक और आध्यात्मिक पृष्ठ भूमि मिली।
  मैं अक्सर स्कूल में निबंध, कविता ,वक्तृत्व स्पर्धा आदि में अव्वल आती थी , स्कूल की ज्योति मैगजीन में कविता , आलेख आदि प्रकाशित होते थे , वहाँ से लेखन की शुरुआत हुई थी।  मां , पिता मेरी प्रेरणा हैं ।वहाँ के अखबार में मेरी प्रथम  कविता प्रकाशित हुई थी । कविता के नीचे खुद का  नाम देखा था , उस नाम की खुशी  ने लिखने को प्रेरित किया । सरस्वती माँ की कृपा से पत्रिकाओं में लेखन का सिलसिला बन गया।
मेरा जवाँ , ख़ूबसूरत यौवन  भी अपना रंग दिखा रहा था ।   मौसम बदला ।अरमानों की बारात चढ़ी ।
गंगा की तरह मैं दुल्हन बनके यौवन की सपनों  से भरी मैके की  दहलीज को पार कर के  धीर , गम्भीर,गहनता , प्यार का घूँघट ओढ़ के  बॉलीबुड की फिल्मी महानगरी ,  भारत की आर्थिक राजधानी  ,  अरब सागर के महानगर मुम्बई में  स्वतंत्र  गुप्ता जी इंजीनियर   से विवाह करके आयी और  खुशहाल यौवनावस्था के द्वार पर गंगा का सागर से  अलबेले  मिलन का पूर्णत्व  की पराकाष्ठा  को लिए जीवन भर के  गंगा जल –  सी मिठास  भरी सागर के खारे जल को  अंगीकृत कर के एकरस हुई।
मुम्बई  मेरे  सपनों की, लेखन की  कर्मभूमि बनी। शादीशुदा दो डॉक्टर बेटियों  की माँ हूँ।  बेटियाँ की जब शादी नहीं हुई तब वे  प्रथम पाठक और श्रोता होती थीं । उनकी शादी हो गयी । अब वे भी हम सब की तरह  विविध गतिविधियों में सक्रिय रहती हैं ।
उपलब्धियों से भरा मेरा जीवन  रहा  है । मेरी साहित्यक कृतियों हेतु मानद वाचस्पति की उपाधि मिली । भारत की साहित्यिक संस्थाओं द्वारा साहित्यिक सेवा हेतु सम्मान पुरस्कार से नवाजा है। हाल ही में विश्व हिंदी सचिवालय द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी – गीत लेखन स्पर्धा 2025 की, 5 महाद्वीप के एशिया महाद्वीप भारत , महाराष्ट्र से मैं यानी मंजु गुप्ता  तृतीय पुरस्कार से पुरस्कृत हुई।नववर्ष जनवरी 2026  के शुभ अवसर पर विश्व हिंदी सचिवालय  द्वारा भेजा प्रमाणपत्र आया ।
कृतियाँः प्रांतपर्वपयोधि (काव्य), दीपक (बाल नैतिक कहानियाँ ), सृष्टि (खंडकाव्य), संगम (काव्य) अलबम (नैतिक कहानियाँ), भारत महान (बालगीत) सार (निबंध), परिवर्तन (सामाजिक कहानियाँ ) 923 दोहों में मनुआ हुआ कबीर, पारसमणि (आलेख-संग्रह ) अंतस् की कुहूक़ (हाइकु-संग्रह ) अप्प दीपो भव (अतुकांत कविता-संग्रह)  महाराष्ट्र हिंदी अकादमी के आर्थिक सहयोग से।हाल ही में सृजन के स्वर ( सुविचार -संग्रह)
मेरी प्यारी माँ (साझा काव्य-संग्रह की संकलक)
ऑपरेशन सिंदूर(साझा संग्रह)
प्रेस में-
मूल्यों  की मणि (आलेख-संग्रह) छंद की कोख से (छंद-संग्रह), एक भारत- श्रेष्ठ भारत (लघुकथा-संग्रह ) भारत से कनाडा की उड़ान (संस्मरण)।माँ – पिता ने     6 दशक  के  कालखण्ड तक पहाड़ी , पंजाबी , सिंधी , पारसी, गढ़वाली , मुस्लिम , बंगाली , वंचित वर्गों की संस्कृतियों को समाज के बीच स्नेह, मैैत्री  की शीतलता से सींच के  एकता का पाठ को पढ़ाया ।
ऋषिकेश  समाज हमारे माता – पिता को  सफलतापूर्वक किए अभियान जैसे स्वच्छता , साक्षरता ,  भूदान आंदोलन,  बेटी – बचाओ बेटी पढ़ाओ के लिए याद किए जाते हैं  । आज भी ये प्रासंगिक हैं । समाज देश , विद्यार्थी  उनका ऋणी है । उनके द्वारा पढ़ाए गए  छात्रों में से कोई विद्यार्थी मंत्री , कलेक्टर , पायलेट , वकील , साहित्यकार   स्व गंगा प्रसाद विमल जी , योगी जी उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री  आदि नामचीन हस्तियाँ बनी  हैं ।


पिता और माँ
जीवन फूलों की सेज कभी भी नहीं होता है। किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अटूट संघर्षों का सामना करना पड़ता है, जिन्हें हमारे माता-पिता ने बड़ी ही कुशलता से अपने संघर्षमय जीवन से अपने परिवार को परिश्रम रूपी जल से सिंचित किया और हम सभी को पल्लवित , पुष्पित और पोषित किया और अपने त्याग व तपस्या से परिवार को उत्कृष्ट श्रेणी में पहुँचाया, हम सभी को पूर्णता पाने के लिए प्रेरित किया। आपका हर कदम हमारे लिए प्रेरणा-स्पंदन थे। उनको कोटि -कोटि प्रणाम करके  मैं यह ही कहती हूँ कि –

‘माँ’ की गरिमा जहाँ, भूमि से भारी है
वहीं ‘पिता’ का स्थान, आकाश से भी ऊँचा है।
अंत में
दोहे में
भावनाओं की  निर्झरणी बह रही है ।पिताजी ने70 वें वर्ष में सन् 21 /4 / 1988 को अंतिम साँस ली ।
 शुक्ल  पंच वैशाख की , तज्यो प्रेम  शरीर ।
  गोद शांति की  थी मिली , हरी हरे सब पीर।।डॉ मंजु गुप्ता
प्रेरणानेत्री  हमारी माँ 16 अप्रैल  2012 को ज्योति से ज्योति में मिल के आलोकित  हो  गयी ।
डॉ मंजु गुप्ता
19 , द्वारका , प्लाट 31,
सेक्टर – 9 A
वाशी ,नवी मुंबई .
writermanju@gmail. com
error: Content is protected !!