
चोट
एक अनपढ़ मूर्तिकार बहुत सारे पत्थर को तराश कर मूर्ति का रूप दे रहा था। दूर से मूर्ति क्रेता बन कर आये शिक्षक वहाँ बैठे चुपचाप सब देख रहे थे। उनसे रहा नहीं गया, तो उन्होंने मूर्तिकार से मुखातिब हो पूछा- “भई, तब से देख रहा हूँ, आपने अनेक पत्थर तराशे हैं, लेकिन आपके हथौड़े से एक भी पत्थर नहीं टूटा। आप गज़ब के हुनरमंद हैं!”
अपने धुन में मस्त मूर्तिकार ने हँस कर जवाब दिया- “ नहीं साब जी! ऐसी बात नहीं है। दरअसल मैं मूर्तिकार हूँ, पत्थर को भला टूटने कैसे दूँ! पत्थर… जब टूट जाय तो कंकड़ हो जाय, लेकिन हथौड़े का चोट सह जाय तो वह शंकर बन जाय!”
यह सुनकर शिक्षक की आँखें खुली की खुली रह गई!
मिन्नी मिश्रा, पटना, बिहार

संघर्ष से सफलता
जो भी व्यक्ति संघर्ष से सफलता प्राप्त करता है उस व्यक्ति का जीवन सदा ही सबके लिए प्रेरणादायक होता है और हमारा सौभाग्य तो यह रहा है कि हम उन की छत्रछाया में ही पले बड़े है और हमेशा उन्होंने हमसे यही कहा है कि बिना संघर्ष के कोई भी व्यक्ति सफलता अर्जित नहीं कर सकता है।
बिल्कुल सही कहते हैं वें, बिना संघर्ष के किसी भी सफलता की कहानी नहीं लिखी जा सकती, यदि मैं अपनी बात करूं तो मैं अभी भी संघर्षरत हूं अपनी सफलता के लिए। बहुत से मुकाम हासिल किए हैं परंतु अभी भी यही लगता है कि मेरी सफलता अधूरी है। जीवन के 50 सावन देख चुकी हूं। अपने आसपास रह रही सभी महिलाओं से बहुत आगे हूं, शिक्षा में भी और सफलता में भी परंतु इसका श्रेय मैं अपने आप को न देकर अपने माता-पिता को देना चाहती हूं और यहां मैं जिसके संघर्ष की कथा आप लोगों को सुनना चाह रही हूं वह मैं नहीं मेरे पिता के संघर्ष की कहानी है जो जन्म से ही अपने समाज की सोच से बहुत आगे की सोच रखते है। मैं उनकी सात संतानों में से सबसे बड़ी संतान हूं। मेरे जन्म के पश्चात मेरे एक भाई का जन्म हुआ और मेरे माता-पिता, दादा-दादी व पूरा परिवार बहुत प्रसन्न था कि चलो परिवार पूरा हुआ परंतु भगवान का निर्णय कभी कोई समझ नहीं पाया है। मेरा भाई सिर्फ अपने जीवन के पांच महीने ही पूरा कर पाया, उसके पश्चात वह भगवान को प्यारा हो गया। परिवार में दुख का सागर उमड़ गया। मेरे पिता के परिवार में एक बड़े भाई और दो बड़ी बहने थी अर्थात चार भाई बहनों में मेरे पिता सबसे छोटे थे। इतने छोटे की अपने बड़े भाई जो कि मेरे दादा की दूसरी संतान थे उनकी शादी के पश्चात पैदा हुए थे। अर्थात मेरे पिताजी की उम्र अपने बड़े भाई के बच्चों की उम्र के बराबर थी। पापा जी के पिता अर्थात मेरे दादा जी उनके साथ न रहकर अहमदाबाद में एक टेक्सटाइल मिल में काम करते थे, क्योंकि दादा जी कभी परिवार के साथ नहीं रहे। जीविका के लिए वह सदा अहमदाबाद में ही रहे, इनका बचपन पिता विहीन ही बीता और मेरी दादी अपने ही गांव में इसका-उसका काम करके परिवार के दैनिक खर्चे वहन करती थी। पिताजी को पढ़ने भेजती थी परंतु पिताजी का मन पढ़ाई में न लगकर खेलकूद में ज्यादा लगता था। मैंने तो यहां तक भी सुना है, दादी जी के मुंह से ही कि वह घर से पैसे ले जाकर फिल्में देखने का भी शौक रखते थे,और सच कहूं उनका यह शौक आज 75 साल की उम्र में भी जिंदा है। वह बचपन से ही मेहनती थे। वह अपने गांव के पास ही जिला एटा में होटल पर काम करके अपने शौक पूरा करने के खर्चे निकालते थे। काफी छोटी उम्र में ही उन्हें बीड़ी पीने का शौक भी लग गया था। आप लोग यह कहेंगे कि मैं अपने पिता की बुराई कर रही हूं परंतु बचपन ऐसा ही होता है। सही गलत की पहचान नहीं होती। जब कुछ बड़े होते हैं तब पता लगता है कि यह सब जो हम कर रहे थे वह गलत है या सही। लेकिन तब तक समय निकल जाता है और शौक लत में तब्दील हो चुके होते हैं। अहमदाबाद से रिटायर होकर दादा जी गांव में आ चुके थे। दादाजी ने अपने छोटे बेटे के रंग-ढंग देखकर उनके साथ कुछ सख्ती का व्यवहार भी किया, परंतु छोटा बेटा कहते हैं मां का लाडला होता है इसलिए दादी जी हमेशा उनकी बुराइयों को छुपा जाती थी। एक घटना तो दादी जी ने मुझे भी बताई की रात में एक बार बीड़ी गिरने की वजह से पूरी चारपाई जल गई तो पापा जी को दादा जी से बचाने के लिए सुबह तक वह चारपाई बुनकर दादी जी ने तैयार कर दी, तो ऐसा होता है मां बेटे का प्यार, संघर्षों से गुजरते हुए पापा जी की उम्र 16 साल चुकी थी। मेरे नाना जी मेरी मम्मी जी के लिए वर की तलाश में मेरे दादाजी के घर पहुंचे। अपनी पुत्री के लिए मेरे पापा को योग्य जानते हुए उन्होंने मेरे दादाजी के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया। पर मेरे दादाजी अपने बेटे की हरकतों से वाकिफ थे अतः उन्होंने शादी का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया परंतु नाना जी ने पता नहीं पिताजी के अंदर कौन सी क्षमता को जांचा और वह शादी के प्रस्ताव पर अड़े रहे। ऐसा मुझे मेरी दादी ने बताया कि वह कम से कम एक हफ्ते तक अपना बोरिया बिस्तरा लेकर हमारे गांव में पड़े रहे कि मैं शादी के प्रस्ताव पर जब तक सहमति नहीं होगी मैं यहां से नहीं जाऊंगा, सहमति लेकर ही जाऊंगा। अंततः नाना जी के सामने दादाजी को झुकना पड़ा और मम्मी जी और पापा जी की शादी हो गई। परंतु भाग्य को कुछ और ही मंजूर था । समय का चक्र कुछ इस प्रकार घुमा के मम्मी जी और पापा जी की शादी के चंद महीने बाद ही मेरे दादाजी का देहांत हो गया। मेरा जन्म तो तब तक हुआ भी नहीं था मैं भी अपने दादा जी के प्यार से वंचित ही रही। एक तो पिताजी खुद ही बच्चे थे उपर से कुछ आर्थिक सहयोग नहीं, तब पापा जी के बड़े भाई उन्हें अपने साथ हाथरस जहां वे स्वयं कार्यरत थे वहां ले गए। परंतु वहां मेरे पिताजी का मन नहीं लगा। कुछ समय वहां रहने के बाद वह वापस अपने घर आ गए। आर्थिक तंगी से गुजरते हुए उन्होंने काफी संघर्ष किया मां साथ थी और कामकाजी थी तो परिवार चल रहा था। कि अचानक नियति में कुछ अलग रंग दिखाया। मेरे जन्म के पश्चात मेरी ताई जी का निधन हो गया और मेरे ताऊ जी तनाव की स्थिति में आ गए और अपना मानसिक संतुलन खो बैठे। एक दिन इसी स्थिति में उन्होंने मेरे पिताजी पर घास काटने वाले गंडासे से न जाने क्यों सोते समय प्रहार किया। भाग्य अच्छा था कि गर्दन और आंख का बचाव होते हुए गंडासा गाल पर पड़ा और दादी जी पास ही थी। जब दादी ने यह सब देखा तो ताऊ जी को संभालते हुए एक तरफ किया और अपनी ही सूती साड़ी के पल्लू से पापा जी के गाल पर रखकर फौरन एटा की तरफ भागी और वहां पहुंचते पहुंचते अपने पल्लू को खोलते खोलते लगभग उनकी आधी साड़ी खून से लथपथ हो चुकी थी। दाद देती हूं मैं दादी की हिम्मत की जो उन्होंने इस अवस्था में भी पूरी हिम्मत से काम लिया और उन्हें डॉक्टर के पास सही सलामत पहुंचाया। डरी सहमी दादी पापा जी की सेवा में लगी रही और उनके ठीक होते हैं उन्होंने पापा को कुछ पैसे पकड़ाये और अपनी छोटी बेटी यानी मेरी बुआ जी जो कि पापा जी से बड़ी थीं के पतिदेव अर्थात मेरे फुफा जी जो उस समय फरीदाबाद में रहते थे, उनके पास भेज दिया। फरीदाबाद में वे उस समय की परिस्थितियों के हिसाब से एक छोटी-सी झुग्गी में तीन लोग सांझा किराये पर रहते थे। अब पापाजी के आने के बाद चार लोग हो गये थे। जगह इतनी कि एक चारपाई डालने पर कमरे में घूम भी नहीं सकते थे।अत: सभी जमीन पर कपड़ा बिछाकर सो जाते थे। अब चारों लोग अपने खर्च को डायरी में लिखते और आपस में मिलकर बांट कर गुजारा करने लगे। उस समय फरीदाबाद में इंडस्ट्री तो लग गई थी लेकिन मजदूर कम थे तो काफी इधर-उधर मारामारी के बाद पापा जी को फरीदाबाद में “वियरवेल साईकिल कम्पनी” में एक हेल्पर की नौकरी 90/- रु महीना मिल गई। पापा जी केवल दसवीं फेल थे और कोई काम भी नहीं आता था उन्हें। मगर पिता का साया नहीं, बड़े भाई मानसिक रोगी, बुढ़ी मां, एक अदद पत्नी और मैं जोकि इतनी बिमार थी कि कोई भी यह नहीं कहता था कि यह लड़की जिंदा रहेगी और बड़े भाई के दो लड़के, सभी गांव में थे। जिम्मेदारी का पूरा पहाड़ था उनके ऊपर, गांव में थोड़ा बहुत काम ताऊ जी के बड़े बेटे करते थे। पर उनकी शादी सर पर थी और ताऊ जी ठीक नहीं थे, अत: ऐसे में दादी और पापा जी की जिम्मेदारी बढ़ गई थी। पापा ने लोगों से बातचीत कर के पता लगाया कि किस काम में सही तनख्वाह मिल सकती है। तो पता लगा इस इंडस्ट्रियल एरिया में डाई फिटर और डाई मेकर्स की बहुत अधिक मांग है और घर-घर छोटी-छोटी वर्कशॉप्स में डाई मेकिंग और डाई फिटिंग का काम होता है। पापा जी ने 8:00 से 4:30 नौकरी के घंटों के बाद 5:00 से 9:00 बजे तक एक वर्कशॉप में फ्री काम किया और डाई फिटर का काम बिना पगार लिए मन लगाकर सीखा। डेढ़-दो साल तक ऐसे ही चलता रहा। फिर मथुरा रोड पर स्थित यूनिवर्सल कंपनी में डाई फिटर के पद पर काम किया। पापा जी ने याद करते हुए बताया कि एक विनोद नाम का व्यक्ति जो उस कंपनी में शेपर के पद पर काम करता था, उन्होंने पापा का काम वहां लगवाया और उन्हें डेढ़ सौ रुपए प्रति माह की तनख्वाह मिलने लगी। पापा जी उस वक्त तक जवाहर कॉलोनी से मथुरा रोड लगभग 10-11 किलोमीटर, अपनी कंपनी तक जो कि आज के मेगपाई रिजॉर्ट के पास हुआ करती थी, पैदल ही आते थे। यहां काम लगने के बाद उन्होंने ₹25 की एक पुरानी साइकिल खरीदी। उसके कुछ समय बाद हमारे एक अंकल “मेहरा अंकल” जिन्हें हम आज भी जानते हैं, वह अब दुनिया में नहीं है, उन्होंने पापा जी की नौकरी “प्रेस्टो लाइट कंपनी” में लगवाई। जहां पर वे स्वयं स्टोर कीपर हुआ करते थे। “प्रेस्टो लाइट कंपनी” में उनकी तनख्वाह डेढ़ सौ से ढाई सौ रुपए हो गई। उसके बाद उन्होंने कई कंपनियां बदली।जैसे “के स्ट्रीट लाइट” जो कि फरीदाबाद प्रेस क्लब के पास आज भी स्थित है, प्रेस्टीजियस स्टेपिंग, सेक्टर 24, प्लॉट नंबर 106, उसके बाद “अमेरिकन यूनिवर्सल” सेक्टर 12, और फिर 1976 में आखिरकार उन्होंने एस्कॉर्ट्स लिमिटेड में काम किया, अपनी सेवानिवृत्ती तक। 1975 में मेरी छोटी बहन के जन्म के बाद पापा जी ने मम्मी जी को गांव से फरीदाबाद लाने की बात सोची। मम्मी बीच में भी एक-आध बार फरीदाबाद आई थी। मेरे छोटे भाई की मृत्यु फरीदाबाद में ही हुई थी। उसके बाद मम्मी गांव वापस चली गई थी। फिर छोटी बहन के जन्म के बाद ही वह फरीदाबाद आई और 1977 मे पापा जी ने मेरा दाखिला प्राइवेट स्कूल में दूसरी कक्षा में करवा दिया। तब से हम निरंतर फरीदाबाद में ही रहे। हमारा पालन पोषण और पढ़ाई लिखाई यहीं हुई। लेकिन इसके बाद भी पापा की जिंदगी का सफर कोई आसान सफर नहीं था। लगातार चार लड़कियों का जन्म और समाज के ताने कि इनके लड़का नहीं है, पापा को परेशान करता था। चार बहनों के बाद हमारे दो भाई हो गए। लड़कियों की शादी की चिंता में पापा निरंतर कार्यरत रहे नौकरी, पार्ट टाइम, एक दुकान, फिर दो दुकानें, एक्सपोर्ट का बिजनेस, उसके बाद डाई मेकिंग वर्कशॉप, निरंतर काम करते हुए वह आगे बढ़ते गए फरीदाबाद में अपना मकान बनाया। अपने सभी बच्चों को उच्च शिक्षा प्राप्त करवाई। सबको आत्मनिर्भर बनाया। आज सभी बच्चे ऊंचे-ऊंचे पदों पर आसीन हैं और मेरे पिता का समाज में बहुत नाम है। वह समाज के प्रधान भी रहे। एस्कॉर्ट्स लिमिटेड में यूनियन लीडर भी रहे। गांव का एक साधारण सा इंसान साधारण सी शिक्षा के बावजूद अपनी मेहनत और लगन और संघर्ष से खुद भी बड़े बने और अपने सभी बच्चों को उन्होंने काबिल बनाया। उनकी इस संघर्षरत जिंदगी से हम सभी बहुत ही प्रेरित है और उन्ही की उर्जा हमारी रगों में भी खून बन कर दौड़ती है की उनको अपना प्रेरणास्रोत मानते हुए मैं उनका शत-शत वंदन करती हूं।
सरोज कुमार ‘श्वेता’
फरीदाबाद
हरियाणा
9971262462
saroj.kumar1109@gmail.com

मेरे बचपन की दौलत
पिता और माँ
जीवन फूलों की सेज कभी भी नहीं होता है। किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अटूट संघर्षों का सामना करना पड़ता है, जिन्हें हमारे माता-पिता ने बड़ी ही कुशलता से अपने संघर्षमय जीवन से अपने परिवार को परिश्रम रूपी जल से सिंचित किया और हम सभी को पल्लवित , पुष्पित और पोषित किया और अपने त्याग व तपस्या से परिवार को उत्कृष्ट श्रेणी में पहुँचाया, हम सभी को पूर्णता पाने के लिए प्रेरित किया। आपका हर कदम हमारे लिए प्रेरणा-स्पंदन थे। उनको कोटि -कोटि प्रणाम करके मैं यह ही कहती हूँ कि –