पाँच लघुकथा

कान्ता रॉय

कांता रॉय
लघुकथा-1
प्रबंधन गुरू
साम, दाम, दंड, भेद सब आजमाने के बाद पाँच साल लगातार कोर्ट-कचहरी करते-करते आखिर आज मगररमच्छ को उस हाई प्रोफाईल मर्डर केस में क्लीनचिट मिल गयी है।
सभी न्यूज चैनल वाले जोर-शोर से मगरमच्छ से जुड़ी जानकारियाँ दे रहें हैं। क्यों ना हो! आखिर करोड़ों का बजट मिला है मिडिया को भी।
छिहत्तर बँगले पर जहाँ मगरमच्छों का आवास है, चहल-पहल बनी हुई थी। बाहर पटाखों के शोर में कार्यकर्ताओं का जश्न जारी था।
इधर मगरमच्छ के मंत्रीमंडल में गम्भीर बैठक चल रही थी। चुनाव नजदीक है, अब क्लीनचिट के बाद मगरमच्छ को अगले चुनाव में प्रमोट कैसे किया जाए!
गहन विमर्श! मैनेजमेंट के महारथी सभी घड़ियालों को भी अर्जेंट में बुलाया गया है।
चुनाव! यह इतना आसान नहीं है क्योंकि मगरमच्छ पर अनैतिक प्रेम सम्बंध, बलात्कार और हत्या जैसी जघन्य अपराध में दोषी पाये जाने के बाद नारी-मोर्चा के हंगामे से जनता-जनार्दन अभी जागी हुई थी।
देर से सबको सुनता हुआ कुर्सी पर पसरा मगरमच्छ सहसा उदंड हो गया। वह जिद पर अड़ा था।
“मुझे किसी भी हाल में महिला और बाल विकास मंत्रालय ही चाहिये!”
“जीतेंगे तब ना….?” देर से चुप बैठै बूढ़ा मगरमच्चछ सुगबुगाया।
“ये मैनेजमेंट वाले, इनको मच्छर मारने को थोड़ी ना बिठाया हुआ है? इस बार भी जीत पक्की है!” कहकर उसने एक आँख धीरे से दबाया।
“हो हो हो हो…. मगरमच्छ, तुम नहीं सुधरोगे!” सुनते ही बूढ़ा मगरमच्छ खी-खी कर हँसने लगा।
लेकिन यह सुन वहाँ चिंतन-विमर्श में लीन महारथी घड़ियाल पसीने के मारे घमियाने लगे।
उनमें से एक ने कचोट को दबाते हुए मुँह खोला।
“लोहा ही लोहे को काटता है इसलिए नारी-मोर्चा पर नारी-शक्ति को ही भिड़ाना होगा।”
“नारी-मोर्चा पर नारी-शक्ति! इसका मतलब क्या है?”
” जनता-जनार्दन समेत महिलाएँ, ये सब महिलाओं की ही सुनेंगी, मतलब ये कि कम से कम दो सौ महिलाओं की अगुवाई में अपना चुनाव-प्रचार करना होगा।”
सुनते ही मगरमच्छ फूटते पॉपकॉर्न-सा उछला, “कहाँ से आयेगी इतनी महिलाएँ?”
“ठेकेदार व्यवस्था कर देगा बस आप खर्चे-पानी की भरपूर व्यवस्था कर दें।”
“खर्चे-पानी की चिंता ना करो, जितना चाहोगे मिल जायेगा।” आश्वति से मगरमच्छ ने उद्योगपतियों को इशारा किया, अगले ही पल मगरमच्छ, मैनेजमेंट के महारथी घड़ियाल समेत सब शैम्पेन में नहा रहे थे।
लघुकथा-2
पगहा: कान्ता रॉय
हुकुमत सिंह को इस बार चुनाव में टिकट नहीं मिला तो वह तिलमिला गया। छिनती ताकत के भय से हाड़ में कंपकंपी उठी तो थी। घर लौटते ही चुन्नीदेवी पर नजर पड़ी। उसको कपड़े धोते हुए देख ठिठक गया। घर की चारदीवारी से बाहर की दुनिया से बेखबर चेहरे पर दो हाथ की घूंघट डाले लट्ठे की मोटी जाजिम को मोगरी से कूट रही थी। उसके लिए हुकुमत सिंह ही उसका ईश्वर। उसी के कहे सुने को गाँठ बांध सहचरी धर्म का पालन कर रही थी। उसने इस बार अलग नजर से चुन्नीदेवी को देखा था। चूल्हे की आँच फूंकते फूंकते चेहरे की त्वचा गहरी हो गई थी। जब से शादी होकर आई है तब से आज तक अकेले ही लम्बी चौड़ी गृहस्थी को ढोया है। गऊ की तरह खूंटे से बंधी, जब जहां हाँक दिया। घूंघट कभी दो हाथ से कम नहीं होती थी। सोचते ही हुकुममत सिंह ने राहत की सांस ली।
अबकी उसे न सही, चुन्नी को तो इस क्षेत्र से टिकट मिल सकता है। महिलाओं को ही इस क्षेत्र में टिकट दिया जाना था।
वह तुरंत पार्टी ऑफिस लौट गया। वापस आया तो कागजों का पुलिंदा हाथ में था।
चुन्नी देवी लोटे में पानी लिए दौड़ी आई, “आकर कहां चले गए थे। मन में शंका लिए कबसे इंतजार कर रही हूँ।”
“जरूरी काम याद आ गया था इसलिए….! जरा स्याही लेकर तो आओ।”
“यह लीजिए।”
“यहां अंगूठा लगाओ।”
“अंगूठा नहीं, हम तो दस्तखत करेंगे।” चुन्नी देवी ने घूंघट को जरा ऊपर करते हुए बोली।
“दस्तखत करेगी? लिखना आता है?” अनपढ़ चुन्नी देवी की बात सुनकर वह भौंचक्का रह गया।
“हाँ।” चमकती आँखों से जवाब दिया।
“कब सीखी?” हुकुमत सिंह ने आश्चर्य से पूछा।
“रामकिशोर की लड़की से। मैंने उसको चटाई बुनना सिखाया और उसने मुझे पढ़ना।”
हुकुमत सिंह सुनकर बिदक गया। उसे यह बात अच्छी नहीं लगी थी।
“अच्छा, अच्छा। अब अधिक शेखी बघारने की कोशिश मत कर।चल यहां दस्तखत कर।”
वह दिन था और आज का दिन।
चुन्नी देवी को टिकट मिला। चुनाव प्रचार में आगे-आगे हुकुमत सिंह और पीछे दो हाथ की घूंघट डाले चुन्नी देवी चलती थी।
चुन्नी देवी की सामाजिकता का परिणाम था या हुकुमत सिंह का दबदबा यह तो राम ही जाने। परिणाम कुल मिलाकर यह निकला कि चुन्नी देवी ने अपने प्रतिद्वंद्वी को 7 हजार 300 वोट से हरा दिया था।
भारी मतों से जीत की खुशी में हुकुमत सिंह ने घर घर लड्डू बँटवाए। वह खुश था कि चुन्नी देवी तो नाम मात्र के लिए थी, असल में तो कुर्सी उसने ही जीती थी।
घर के बाहर प्रेस वाले इंतजार कर रहे थे।
वह रेशमी अंगरखा लगा कर इंटरव्यू के लिए बाहर निकला। चुन्नी देवी पीछे पीछे बाहर आई थी। मिडिया के सामने चुन्नी देवी ने अपनी लम्बी घूंघट घटा ली थी।
मिडिया ने हुकुमत सिंह को किनारे हो जाने को कहा। और चुन्नी देवी की तरफ कैमरा घूमाया। कैमरामैन और रिपोर्टर आपस में बात करते हुए सामांजस्य स्थापित किया और चुन्नी देवी से प्रश्नोत्तरी शुरू कर दिया
चुन्नी देवी ने मिडिया के कहने पर उनका अनुसरण करते हुए अपना पहला इंटरव्यू सफलतापूर्वक पूरा कर लिया था। इंटरव्यू के वक्त वह हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का इस्तेमाल कर रही थी। अब तक गऊ की तरह खूंटे से बंधी रहने वाली चुन्नी देवी को कुर्सी पर विराजमान देख हुकुमत सिंह पहली बार जीत प्राप्त करने के बाद भी पूरी तरह से हारा हुआ महसूस कर रहा था।
लघुकथा-3
प्रकाश के मुहाने पर
माँ,
मैं इस बार भी चुनाव जीत गई। मैंने अपने प्रतिद्वंद्वी को सात हजार वोट से हरा दिया है। अब मैं अपने राज्य की मुख्यमंत्री बनने जा रही हूँ। तुम्हें यह सुनकर अच्छा नहीं लगेगा। मैं जानती हूँ कि तुम पुराने जमाने की सोच विचार वाली महिला हो। तुम मुझे घर की चारदीवारी में भरी-पूरी गृहस्थन देखना चाहती थी। तुम्हारी इस सोच के कारण ही मैंने शादी न करने का निर्णय लिया था। माँ, तुम मुझे कॉलेज पढ़ाना नहीं चाहती थी। तुम्हें लगता था कि मैं कॉलेज जाकर बिगड़ जाऊँगी।
पापा चाहते थे कि मैं कॉलेज जाऊँ। शायद इसीलिए कि उनके सभी दोस्तों की लड़कियां भी कॉलेज में पढ़ रही थी। कारण चाहे जो भी रहा हो, मेरे लिए तो वरदान ही साबित हुआ।
बचपन से तुमने जैसा चाहा वैसा ही मैंने खाया और पहना| जब से होश संभाला, पाया कि मैं तुम्हारी सभी बातों को ध्यान से सुनती और उनका अनुसरण करती। मैंने कई बार सुना-देखा था कि तुम मेरे पीठ पीछे बहुत तारीफ किया करती थी। लेकिन सामने पड़ते ही सख्त व्यवहार करती थी।
मुझे याद है कि पापा ने जब मेरा दाखिला स्नातक की पढ़ाई के लिए उस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में करवाया था तब तुमने उनसे हफ्ते भर बात नहीं की थी। तुम कहीं न कहीं मन में यह आशा लगाए हुए थी कि मैं कॉलेज जाने के पश्चात भी नहीं बदलूंगी। तुमने जो मुझे संस्कार दिए थे उस पर तुम्हें बहुत यकीन था।
लेकिन माँ, तुम नहीं जानती थी कि मैं अपने स्कूल के दिनों में तेज छात्राओं में गिनी जाती थी। भला कैसे जान सकती थी तुम, मेरे स्कूल के पैरेंट्स टीचर्स मीटिंग में तो कभी गई नहीं, या यूं कहें कि पापा तुम्हें कभी लेकर नहीं गए। उन्हें लगता था कि विद्यालय सम्बंधित चीजों को तुम नहीं समझ पाओगी। स्कूल में बिताये साढ़े पांच घंटे तुम्हारे संस्कार पर भारी पड़ गए थे|
माँ, तुमने ठहराव को जीवन माना था और पापा परिवर्तनशील, आधुनिक विचारों में आगे रहते थे। तुम्हें मालूम था कि पीजी की डिग्री लेते-लेते मैंने छात्रसंघ का चुनाव भी जीता था और अध्यक्ष भी बनी थी| कॉलेज से निकलते-निकलते मेरी दुनिया ही बदल गयी थी| तुमने मेरी इस नई दुनिया को बड़ी भद्दी सी गाली दी थी|
माँ, तुमसे जो मैंने गालियाँ खायी वो बाद में जाकर राजनीति में बड़ी काम आई| साल दर साल सफलता के पायदान चढ़ती रही और तुमसे शनैः शनैः दूर होती गयी| इस बीच पापा मेरे चुनाव कैम्पेन में भाग लेने के लिए यहाँ आते रहे| उनको मेरे आस-पास का माहौल बड़ा रास आता है| वे यहाँ के लोगों से काफी घुलमिल गए हैं|
मुझे तुम्हारी चिंता होती रहती है| समय के साथ सब कुछ बदल गया है| बस एक तुम ही नहीं बदली|
माँ, तुम ठहरी रही और तुम्हारी दुनिया पैरों के नीचे से सरकती चली गई।
यह पत्र मैं ड्राइवर के हाथों भेज रही हूँ। माँ, मैं फिर से निवेदन करती हूँ कि अब झगड़ा यहीं खत्म करो और आकर मुझे आशीर्वाद दो।
शेष तुमसे मिलने पर….
तुम्हारी नालायक बेटी
सघुकथा-4
सुरंग
“माँ, आप तो चित्रा के बारे में सब जानती हैं, तो अब किस बात का संशय है?”
अभि के कहते ही उसने चित्रा की ओर देखा, “हाँ, बहुत खूबसूरत है। इसमें मुझे मेरी खोई बेटी नजर आती है।” कहते हुए वह भावातिरेक में बह गई।
“आँटी, मैं चाय बना लाऊँ?”
“नहीं, रहने दो, मैं बना लाती हूँ!”
“आप तो रोज बनाती हैं। आज मैं बना लाती हूँ?”
मन भँवर में फंसा हुआ था। क्या करें, होने दे जो होने वाला है। दायित्व-विहीन हो जाए। बेटे के व्याह का सपना, उसकी पीली हथेली, वर्षों से बहू आँखों के सामने नाचती थी। आज उसका प्रश्न स्वप्न पूरा होने के लिए सामने है। इजाज़त उसे देनी होगी।
“अभि, तू ऐसा कर, बाज़ार से कुछ मीठा ले आ।” अचानक जैसे कुछ सूझ गया।
“आँटी, रहने दीजिए ना!”
उसके हाथों को धीरे से दबा दिया, “जाने दो उसे, पढ़-लिख कर इतना बड़ा बन गया लेकिन अक्ल नाम का नहीं! जा, मीठा लेकर आ!”
वह झुँझलाकर सीढ़ियों की तरफ निकल गया।
“मैं जानती हूँ कि तुम दोनों स्कूल के दिनों से दोस्त हो।”
“जी, आँटी!”
“कितना जान पाई हो अभि को अब तक?”
“अभि? वे एक बहुत अच्छे इंसान हैं।”
“सही कह रही हो। आजकल के लड़कों के मुकाबले वह बहुत अच्छा है। शराब-सिगरेट कुछ नहीं पीता, आज तक कभी किसी लड़की को नहीं छेड़ा है।”
“जी, आँटी, मैं उनसे बहुत प्यार करती हूँ।”
“हाँ, तुम दोनों की नौकरी भी अच्छी है।”
“जी, इसलिए तो हमारे विचार भी मिलते हैं।”
“हाँ, तुम दोनों के विचार मिलते तो हैं लेकिन एक बात है उसकी…”
“क्या आँटी, कौन सी बात है, बताइए न!”
“तुम उसके साथ विधिवत विवाह करो, यह मेरा सपना था, लेकिन मैं नहीं चाहती हूँ कि तुम उससे बँधकर रहो। क्या तुम लिव-इन में नहीं रह सकती उसके साथ?”
“क्या! आपने यह क्यों कहा, ऐसा तो आज तक किसी माँ ने नहीं कहा होगा!” वह भयभीत-सी हो उठी। मानो साँप सूंघ गया था।
“सुनो, उसकी हाथ उठाने की आदत है। वह बात-बात पर, मुझ पर भी अक्सर हाथ उठा लेता है। माँ हूँ, इसलिए सहना मेरी क़िस्मत है, लेकिन तुम …” कहते-कहते उसकी आँखें भर आईं।
“क्या कह रही हैं आप? लेकिन वह तो आपसे बहुत प्यार करते हैं।”
“हाँ, वह मुझसे बहुत प्यार करता है, और तुमसे भी, इसलिए तो कह रही हूँ!” कहते हुए वह कराह उठी, पसली का दर्द अचानक से हड्डियों में जाग उठा था।
करम के ठाठ
चारपाई, तख्त, पीढ़ा, कुर्सी, मचिया, आलमारी, हल, चौकठ, खिड़की, दरवाजे इत्यादि सब बनाते-बनाते काष्टकार ऊब चुका था, इसलिए बड़े जतन से उसने आखिरी बार अलग प्रकार की चीजें बनायी थी। इस काम के बाद वह संन्यास लेना चाहता था। काम सम्पन्न करते हुए, काष्टकार फिर से अपने द्वारा बनाए सारे किरदारों को ध्यान से देख रहा था। राजा, वजीर, हाथी, प्यादे, स्त्री-पुरुष, बच्चे, सब अपने आकार-प्रकार से लुभावने बने थे।
आखिरी बार रंदा, आरी, बसुला, फन्नी, रुखानी सहित अन्य औजार के प्रति अपना लगाव जप्रकाश के मुहाने पर : कान्ता रॉय
माँ,
मैं इस बार भी चुनाव जीत गई। मैंने अपने प्रतिद्वंद्वी को सात हजार वोट से हरा दिया है। अब मैं अपने राज्य की मुख्यमंत्री बनने जा रही हूँ। तुम्हें यह सुनकर अच्छा नहीं लगेगा। मैं जानती हूँ कि तुम पुराने जमाने की सोच विचार वाली महिला हो। तुम मुझे घर की चारदीवारी में भरी-पूरी गृहस्थन देखना चाहती थी। तुम्हारी इस सोच के कारण ही मैंने शादी न करने का निर्णय लिया था। माँ, तुम मुझे कॉलेज पढ़ाना नहीं चाहती थी। तुम्हें लगता था कि मैं कॉलेज जाकर बिगड़ जाऊँगी।
पापा चाहते थे कि मैं कॉलेज जाऊँ। शायद इसीलिए कि उनके सभी दोस्तों की लड़कियां भी कॉलेज में पढ़ रही थी। कारण चाहे जो भी रहा हो, मेरे लिए तो वरदान ही साबित हुआ।
बचपन से तुमने जैसा चाहा वैसा ही मैंने खाया और पहना| जब से होश संभाला, पाया कि मैं तुम्हारी सभी बातों को ध्यान से सुनती और उनका अनुसरण करती। मैंने कई बार सुना-देखा था कि तुम मेरे पीठ पीछे बहुत तारीफ किया करती थी। लेकिन सामने पड़ते ही सख्त व्यवहार करती थी।
मुझे याद है कि पापा ने जब मेरा दाखिला स्नातक की पढ़ाई के लिए उस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में करवाया था तब तुमने उनसे हफ्ते भर बात नहीं की थी। तुम कहीं न कहीं मन में यह आशा लगाए हुए थी कि मैं कॉलेज जाने के पश्चात भी नहीं बदलूंगी। तुमने जो मुझे संस्कार दिए थे उस पर तुम्हें बहुत यकीन था।
लेकिन माँ, तुम नहीं जानती थी कि मैं अपने स्कूल के दिनों में तेज छात्राओं में गिनी जाती थी। भला कैसे जान सकती थी तुम, मेरे स्कूल के पैरेंट्स टीचर्स मीटिंग में तो कभी गई नहीं, या यूं कहें कि पापा तुम्हें कभी लेकर नहीं गए। उन्हें लगता था कि विद्यालय सम्बंधित चीजों को तुम नहीं समझ पाओगी। स्कूल में बिताये साढ़े पांच घंटे तुम्हारे संस्कार पर भारी पड़ गए थे|
माँ, तुमने ठहराव को जीवन माना था और पापा परिवर्तनशील, आधुनिक विचारों में आगे रहते थे। तुम्हें मालूम था कि पीजी की डिग्री लेते-लेते मैंने छात्रसंघ का चुनाव भी जीता था और अध्यक्ष भी बनी थी| कॉलेज से निकलते-निकलते मेरी दुनिया ही बदल गयी थी| तुमने मेरी इस नई दुनिया को बड़ी भद्दी सी गाली दी थी|
माँ, तुमसे जो मैंने गालियाँ खायी वो बाद में जाकर राजनीति में बड़ी काम आई| साल दर साल सफलता के पायदान चढ़ती रही और तुमसे शनैः शनैः दूर होती गयी| इस बीच पापा मेरे चुनाव कैम्पेन में भाग लेने के लिए यहाँ आते रहे| उनको मेरे आस-पास का माहौल बड़ा रास आता है| वे यहाँ के लोगों से काफी घुलमिल गए हैं|
मुझे तुम्हारी चिंता होती रहती है| समय के साथ सब कुछ बदल गया है| बस एक तुम ही नहीं बदली|
माँ, तुम ठहरी रही और तुम्हारी दुनिया पैरों के नीचे से सरकती चली गई।
यह पत्र मैं ड्राइवर के हाथों भेज रही हूँ। माँ, मैं फिर से निवेदन करती हूँ कि अब झगड़ा यहीं खत्म करो और आकर मुझे आशीर्वाद दो।
शेष तुमसे मिलने पर….
तुम्हारी नालायक बेटी
लघुकथा-4
सुरंग
“माँ, आप तो चित्रा के बारे में सब जानती हैं, तो अब किस बात का संशय है?”
अभि के कहते ही उसने चित्रा की ओर देखा, “हाँ, बहुत खूबसूरत है। इसमें मुझे मेरी खोई बेटी नजर आती है।” कहते हुए वह भावातिरेक में बह गई।
“आँटी, मैं चाय बना लाऊँ?”
“नहीं, रहने दो, मैं बना लाती हूँ!”
“आप तो रोज बनाती हैं। आज मैं बना लाती हूँ?”
मन भँवर में फंसा हुआ था। क्या करें, होने दे जो होने वाला है। दायित्व-विहीन हो जाए। बेटे के व्याह का सपना, उसकी पीली हथेली, वर्षों से बहू आँखों के सामने नाचती थी। आज उसका प्रश्न स्वप्न पूरा होने के लिए सामने है। इजाज़त उसे देनी होगी।
“अभि, तू ऐसा कर, बाज़ार से कुछ मीठा ले आ।” अचानक जैसे कुछ सूझ गया।
“आँटी, रहने दीजिए ना!”
उसके हाथों को धीरे से दबा दिया, “जाने दो उसे, पढ़-लिख कर इतना बड़ा बन गया लेकिन अक्ल नाम का नहीं! जा, मीठा लेकर आ!”
वह झुँझलाकर सीढ़ियों की तरफ निकल गया।
“मैं जानती हूँ कि तुम दोनों स्कूल के दिनों से दोस्त हो।”
“जी, आँटी!”
“कितना जान पाई हो अभि को अब तक?”
“अभि? वे एक बहुत अच्छे इंसान हैं।”
“सही कह रही हो। आजकल के लड़कों के मुकाबले वह बहुत अच्छा है। शराब-सिगरेट कुछ नहीं पीता, आज तक कभी किसी लड़की को नहीं छेड़ा है।”
“जी, आँटी, मैं उनसे बहुत प्यार करती हूँ।”
“हाँ, तुम दोनों की नौकरी भी अच्छी है।”
“जी, इसलिए तो हमारे विचार भी मिलते हैं।”
“हाँ, तुम दोनों के विचार मिलते तो हैं लेकिन एक बात है उसकी…”
“क्या आँटी, कौन सी बात है, बताइए न!”
“तुम उसके साथ विधिवत विवाह करो, यह मेरा सपना था, लेकिन मैं नहीं चाहती हूँ कि तुम उससे बँधकर रहो। क्या तुम लिव-इन में नहीं रह सकती उसके साथ?”
“क्या! आपने यह क्यों कहा, ऐसा तो आज तक किसी माँ ने नहीं कहा होगा!” वह भयभीत-सी हो उठी। मानो साँप सूंघ गया था।
“सुनो, उसकी हाथ उठाने की आदत है। वह बात-बात पर, मुझ पर भी अक्सर हाथ उठा लेता है। माँ हूँ, इसलिए सहना मेरी क़िस्मत है, लेकिन तुम …” कहते-कहते उसकी आँखें भर आईं।
“क्या कह रही हैं आप? लेकिन वह तो आपसे बहुत प्यार करते हैं।”
“हाँ, वह मुझसे बहुत प्यार करता है, और तुमसे भी, इसलिए तो कह रही हूँ!” कहते हुए वह कराह उठी, पसली का दर्द अचानक से हड्डियों में जाग उठा था।
लघुकथा-5
करम के ठाठ: कान्ता रॉय
चारपाई, तख्त, पीढ़ा, कुर्सी, मचिया, आलमारी, हल, चौकठ, खिड़की, दरवाजे इत्यादि सब बनाते-बनाते काष्टकार ऊब चुका था, इसलिए बड़े जतन से उसने आखिरी बार अलग प्रकार की चीजें बनायी थी। इस काम के बाद वह संन्यास लेना चाहता था। काम सम्पन्न करते हुए, काष्टकार फिर से अपने द्वारा बनाए सारे किरदारों को ध्यान से देख रहा था। राजा, वजीर, हाथी, प्यादे, स्त्री-पुरुष, बच्चे, सब अपने आकार-प्रकार से लुभावने बने थे।
आखिरी बार रंदा, आरी, बसुला, फन्नी, रुखानी सहित अन्य औजार के प्रति अपना लगाव जताते हुए जतन से सबको समेट कर वह हाथ-पैर धोने नलके पर गया। वापस आकर किरदारों को उठाने बढ़ा, वह चौंक उठा। सारे किरदार जीवित हो, अपना-अपना वजूद तलाशने में हिल-डुल रहे थे।
काष्टकार कौतूहल से पीछे हट गया। उसने देखा, राजा धीरे-धीरे महल में रनिवास की ओर बढ़ रहा था। अचानक जोर-जोर से बाहर घंटा बजा। राजा मुड़ कर वापस बाहर आया। एक दुखियारी अपने लिए न्याय माँगने आयी थी। काष्टकार की नजर दूसरी ओर गई, देखा, वजीर झुक कर राजा से न्याय के लिए आग्रह कर रहा था। और राजा को यह अरूचिकर लग रहा था।
“मैं राजा हूँ, राज-ठाठ मेरा धर्म है। यह घंटा अपने घर के बाहर लगाओ और तुम प्रजा के लिए न्याय करो।” उसने वजीर को आदेश दिया।
यह कैसा फरमान! वजीर, हाथी ने एक-दूसरे की ओर अप्रत्याशित रूप से देखा। वजीर ने प्यादे को इशारे से घंटा अपने हवेली के सामने लगाने का आदेश दे दिया। अब वजीर के घर से घंटा के बजने के साथ-साथ अक्सर जयकारे की आवाजें आने लगी थीं।
वहाँ खेल जारी था। काष्टकार चुपचाप सफेद-काले चौरस पर रचे, कई दिनों में बँटे, दिन-रात के क्रमानुसार चल रहे इस राजनैतिक खेल का लुत्फ उठाने लगा।
महल में राज करते हुए राजा को अचानक राज्य की सैर करने की सूझी और वह अपना रथ लेकर रनिवास से निकल आया।
खेल में काष्टकार की नजरें अब राजा पर केन्द्रित थी|
राजा का रथ राजमार्ग से निकला। प्रजा अपने दैनिक कार्यों में लीन थी। प्रजा संतुष्ट है, कहीं किसी को किसी से शिकायत नहीं, इसलिए किसी ने उसकी उपस्थिति पर ध्यान नहीं दिया।
तभी वहाँ वजीर के सवारी की ध्वनि आयी।
उस ध्वनि को सुनकर प्रजा में हलचल हुई, काम छोड़कर सभी अपने-अपने घरों से बाहर निकल कर वजीर के लिए जयकारे लगाने लगे। यह देख राजा हताशा में घिर गया।
काष्टकार चुपके से राजा की मनोदशा जानने के अभिप्राय से रथ की ओर नजदीक सरक गया।
देखा, राजा अब उत्तेजना में हुँकार रहा था, “मैं राजा हूँ, तुम सब मेरी जयकारे लगाओ, मेरे समक्ष सिर झुकाओ, तुम सब पर राज करना मेरा धर्म है।”
राजा की हुंकार सुन प्रजा रोष में आ गई थी। सबने मुठ्ठी भींच लिया और राजा को चारों ओर से घेर लिया। राजा में विरोध करने की ताकत नहीं बची थी। वह सकते में था, आज उसी के प्यादे उसे मात देने के लिए तैयार हो गए थे। हालत की गंभीरता को भाँप वजीर ने तेजी से अपना रथ राजा के रथ के सामानांतर लाकर खड़ा कर दिया और कहा, “आपको महल के बाहर नहीं निकलना चाहिए था।”
“क्यों नहीं निकलना चाहिए था?” राजा का स्वर काँपा।
“क्योंकि अब आपके पास ताकत नहीं है। आप सिर्फ डग भर ही चल सकतें हैं, इसलिए रनिवास लौट अपने उसी दायरे में रहकर राज करें, एवं मुझे राज्य सम्भालने दें। राजा ने अपना सिर झुका लिया और रथ रनिवास की ओर मोड़ लिया।
काष्टकार के भीतर की उठा-पटक अचानक बंद हो गयी। हसरत से उसने रंदा, आरी, बसुला, फन्नी, रुखानी सहित अन्य औजार को देखा। वह फिर से चारपाई, तख्त, पीढ़ा, कुर्सी, मचिया, आलमारी, हल, चौकठ, खिड़की, दरवाजे इत्यादि गढ़ने के लिए तुरंत दूसरी लकड़ी तलाशने विदा हो गया।
पाँच लघुकथा

मीनू खरे

मीनू खरे
लघुकथा-१
गौरैया का घर
लेखिका:डॉ. मीनू खरे
सृष्टि अपर्टमेंट्स की 9वीं मंज़िल की बाल्कनी में खड़े नन्हे नीटू ने मानसी से पूछा -“माँ गौरैया कैसी होती है?
मानसी ने बताया- “गौरैया एक चिडिया होती है”
“माँ गौरैया कहाँ रहती है?
“गौरैया पेड़ों पर रहती है और फुदक – फुदक कर चूँ- चूँ बोलती है.”
“पेड़ तो हमारे अपर्टमेंट्स में नही है माँ फिर गौरैया कहाँ रहती होगी ? कहाँ चूँ- चूँ बोलती होगी? नीटू ने परेशान हो कर पूछा.
“आँगन में चूँ- चूँ बोलती है गौरैया” -मानसी ने बात टालते हुए कहा.
“आँगन क्या होता है माँ?” नीटू ने अगला प्रश्न बिना देरी किए दागा.
ऑफ़िस से थक कर चूर हो लौटी मानसी में नीटू के प्रश्नों की रेलगाड़ी को हरी झंडी दिखाने की की ताब नही थी.उसने अपने चारों ओर उगे कंक्रीट के जंगल पर एक चुभती निगाह डाली और नीटू को लेकर कमरे में आ गई.नीटू अभी भी मचल रहा था -“ माँ मुझे गौरैया देखनी ही है.”
“ अभी दिखाती हूँ बेटे.” कह कर
मानसी ने तुरंत लैपटॉप आन किया.गूगल खोलते ही गौरैया सामने थी.फुदकती गौरैया देख नीटू ताली बजाने लगा.
किसी दिन क्लास में टीचर पढ़ा रही थीं.
“शेर के घर को माँद कहते हैं.”
“चूहे के घर को बिल कहते हैं.”
“मधुमक्खी के घर को छत्ता कहते हैं.”
“गौरैया के घर को ….
टीचर के वाक्य को बीच में ही काट कर नीटू चिल्लाया “गौरैया के घर को गूगल कहते हैं.”
लघुकथा-२
बढ़त
हिन्दूवादी नेता लाला शिवचरन की नृशंस हत्या के बाद सिलसिलेवार हत्याओं से शहर दहल चुका था।मामला हिन्दू-मुसलमान का बन चुकने के बाद,बदले और दूसरी क़ौम पर बढ़त हासिल करने की कार्यवाही दोनो ओर से जारी थी।
जगन बहुरूपिया शाम के शो में बजरंग बली बनने के लिए बदन पर घी और पीला सिंदूर लेपने ही वाला था कि किसी ने ज़ोर से दरवाज़ा पीटा।कुंडी खुलते ही बुरी तरह हाँफता एक नौजवान जगन को धक्का दे घर में घुस आया।
“मुझे छुपा लो । मार डालेंगे वो मुझे!”
“कौन मार डालेगा तुझे?”
“वो पीछे आ रहे..जल्दी छुपा दो मुझे ”
“तू मुसलमान है?”
“हाँ”
“तब तो मुश्किल है!तुम लोगों को ढूँढ-ढूँढ के मार रहे हैं ये लोग!”
“जल्दी छुपाओ मुझे।आते ही होंगे वो!” कहते हुए लड़का जगन के ही पीछे छुपने लगा।
अपने एक कमरे के मकान में लड़के को छुपाने की एक ही तरकीब सूझी बहरूपिये जगन को।आव देखा न ताव उसने कटोरे में रखा घी और सिंदूर का लेप पलक झपकते लड़के के बदन पर पोत मारा।लाल लंगोटा, चोला, माला,मुकुट और पूँछ लगा कर लड़का साक्षात बजरंग बली लग रहा था।
“अब आराम से जा।अब कोई न मारेगा तुझे! उलटा वो हाथ जोड़ेंगे,पैर छुएँगे तेरे!”
लड़का अब निर्भीक हो, सड़क पर जा रहा था।कुछ बाइक सवार पास से गुज़रे।
“गज़्ज़ब!इन लोगों के भगवान भी सड़क पर मारे-मारे घूमते हैं!”
“ही ही ही ही”
“कल हमारा आदमी मरा है।ये मौक़ा बढ़िया है बढ़त लेने का..”
“मतलब?”
“चलो आज भगवान जी को अल्लाह मियाँ के घर की सैर करा दें”
कई गोलियाँ एक साथ चलीं। भगवान और अल्लाह का घर बढ़त के लहू से पुत गया।
लघुकथा-३
– पॉलिसी
*********
“सर खुदा के वास्ते मेरा ट्रांसफ़र रोक दीजिए.”
“अशफ़ाक़ साहब ट्रांसफ़र पॉलिसी, एक शहर में केवल 4 साल रहने की है !आपको जाना ही होगा!”
“सर फ़ैमिली में बस मैं और मेरे अब्बू ही हैं.वो चल फिर भी नहीं पाते।मैं चला गया तो अब्बू को कौन देखेगा सर?”
“मेरे पिता भी इसी उम्र के हैं पर मैं भी तो नौकरी कर ही रहा हूँ !”
“सर यह तो आपका होम टाउन है !माशाल्लाह भरा पूरा घर है!मेरे यहाँ अब्बू अकेले पड़ जाएँगे!”
“ बहानेबाज़ी छोड़िये!परसों आपकी रिलीविंग है.”बॉस का निर्णय अंतिम था।
अशफ़ाक़ को ट्रांसफ़र भूल,काम पर लगना पड़ा।
“सर एक आरटीआई आई है.”
“क्या पूछा है आरटीआई में?”
“पूछा है कि आप यहाँ कितने दिनों से पोस्टेड हैं ?”अशफ़ाक़ झिझकते हुए बोला।
प्रश्न सुन कर बॉस भड़क गये.
“13 साल से हूँ पोस्टेड।आपको कोई तकलीफ़?”
“नो सर मैं तो बस आरटीआई ..”
बात काटते हुए बॉस गुर्राये,
”पक्का यह आरटीआई सुबोध सिंघल की है… पर बहुत पछताएगा वो …”
बॉस को ग़ुस्सा देख अशफ़ाक़ कमरे से चला गया.
उसके जाते ही बॉस ने कॉल लगाई.
“हेलो कृष्णा! एक बहुत ज़रूरी काम तुरंत करो ”
“बताइए भैया”
“तुम्हारे यहाँ जो क्लर्क नेहा सिंघल है उसका ट्रान्सफ़र आज ही चाहिए मुझे”
“भैया नेहा तो केवल 6महीने पहले यहाँ आई है।ट्रान्सफ़र पॉलिसी के हिसाब से तो …”
“ट्रांसफ़र पॉलिसी गई भाड़ में!मेरी इज़्ज़त दाँव पर है।मुझे आज ही उसका ट्रान्सफ़र चाहिए!”
पीसीएस अधिकारी कृष्णा अपने भाई की इज़्ज़त से भला कैसे खेलती?सुबोध सिंघल की पत्नी नेहा सिंघल का ट्रान्सफ़र ऑर्डर जारी हो गया।अब सुबोध सिंघल भला अपनी पत्नी को ट्रांसफ़र पर कैसे भेजता? उसने बॉस के ख़िलाफ़ आरटीआई वापस ले ली।आरटीआई वापस होते ही नेहा का ट्रांसफ़र रद्द हुआ ।सबकी परेशनियाँ दूर हो गईं।नियत तिथि पर अशफ़ाक़ रिलीव हुआ।सब लोग अशफ़ाक़ की फ़ेयरवेल पार्टी में हँसी ख़ुशी शामिल हुए.
लघुकथा-४
सीक्रेट पार्टनर
चाइल्ड-काउंसिलर चित्रा बेहद अपसेट थी।इसलिए नहीं कि एक 10 साल की बच्ची के साथ अपने ही घर में रोज़ दरिंदगी हो रही थी , ना ही इसलिए कि शराबी बाप ही मासूम से वेश्यावृत्ति करवा रहा था।ऐसे घिनौने केस तो चित्रा पहले भी डील कर चुकी थी पर आज का केस बिल्कुल जुदा था। इस बच्ची को तो पता भी न था कि उसके साथ कुछ ग़लत हो रहा है।उसे समझाया गया था कि यही परिवार की मदद का तरीक़ा हैं।रोज़ की हैवानियत के कारण बिस्तर लग चुकी बच्ची दुखी थी कि बीमारी के कारण वो घर की ‘ज़रूरी मदद‘ नहीं कर पा रही। बाल शोषण के इस नये वेरिएन्ट ने चित्रा को अन्दर तक हिला दिया था। मन हल्का करने को वो इस समय तफ़सील से अपने क्लीनिक पार्टनर संदीप के साथ फ़ोन पर थी।
“बच्ची शेल्टर होम जाने को तैयार ही नहीं थी ! उसकी इच्छा जल्दी स्वस्थ होकर फिर से ‘परिवार की मदद’ करने की थी! ज़बरदस्ती शेल्टर होम ले जाते समय अपराध बोध से ग्रस्त बच्ची ने घर की दीवार पर लिखा – सॉरी पापा !”
“वेरी स्ट्रेंज ऐंड सैड!” निराश भाव से संदीप बोला।
चित्रा ने कहा; “ज़्यादातर बच्चे यौन शोषण से अनजान होते हैं।आजकल लोग ऐसे बच्चों को बरग़ला कर उस ऐक्ट को जस्टिफ़ाई कर देते हैं जिसके बाद बच्चे विरोध नहीं करते और शोषण आसान हो जाता है।”
“हमें बच्चों को यौन अपराधों के बारे में बताना चाहिए।” संदीप की इस बात से चित्रा असहमत थी। वो बोली ; “इससे बच्चों की मासूमियत नहीं छिन जायेगी?”
“न बताने से शोषण का ख़तरा बढ़ता है।”
“उसके लिए अभिभावक सतर्क रहें न कि बच्चों को गन्दगी में खींचा जाय।” दृढ़ता से बात कह कर चित्रा ने फ़ोन रख दिया।उसकी नौ वर्षीय बेटी मून अब कमरे में आ चुकी थी।
“किसका फ़ोन था?”
“पार्टनर अंकल का। “
“तुम उन्हें पार्टनर क्यों कहती हो मम्मी ?”
“क्यों कि वो क्लीनिक में मेरे पार्टनर हैं।”
“पापा भी तो तुम्हारे पार्टनर हैं !”
“वो मेरे लाइफ़ पार्टनर हैं।”
“मम्मी तुम्हारा सीक्रेट पार्टनर कौन है?”
“सीक्रेट पार्टनर तो कोई भी नहीं है मेरा! “
“झूठ! हर किसी का एक सीक्रेट पार्टनर ज़रूर होता है मम्मी !”
“अच्छा! ये सीक्रेट पार्टनर होता कौन है?”
“जिसके साथ आप अकेले में बिना डरे चले जाते हो।जो आपकी बॉडी में कहीं पर भी टच करे तो आप करने देते हो।आप रोते नहीं , ना ही किसी को बताते हो।”
बेहद सशंकित हो चुकी चित्रा ने पूछा; क्या तुम्हारा भी कोई सीक्रेट पार्टनर है मून?”
“वो तो सबका होता है!”
चित्रा धैर्य खो रही थी ; “कौन है तुम्हारा सीक्रेट पार्टनर मून ?”
“सीक्रेट पार्टनर का नाम सीक्रेट रखते हैं मम्मी नहीं तो पापा की डेथ हो जाती है!”मून ने समझाते हुए कहा।
लघुकथा-५
कई मौसमों की स्त्री
18 जुलाई 2005
पिछले 4 वर्षों के जुनूनी मोहब्बत के सफ़र की परिणति, आज से अथर्व के संग लिव-इन में हो गई।। माँ चाहती थीं कि शादी करके ही अथर्व के साथ रहूँ पर मुझे माँ और दीदी जैसी नीरस मैरिड लाइफ़ नहीं चाहिए.. आय एम डिफ़रेंट एंड ऐडवेंचरस..
18 जुलाई 2006
अथर्व के साथ एक साल बीता। हम एक दूसरे के साथ बहुत कम्फर्टेबल हैं, पूरा स्पेस देते हैं बिना किसी अवांछित दख़लन्दाज़ी के । प्यार के बन्धन में बँध कर भी मैं स्वतन्त्र हूँ मनचाहे ढंग से जीने को।सो लकी!
22 सितम्बर 2007
लिव-इन की दुनिया के अपने नियम, उतार चढ़ाव और प्रयोग हैं।दो महीनों से अपने सहकर्मी राहुल से चल रहीं बेबाक़ नज़दीकियाँ आज मैंने अथर्व से साझा कीं।डर था कि वो कहीं नाराज़ न हो पर वो ज़रा भी असहज नहीं हुआ बल्कि उसने मुझे बधाई दी।ही इज़ ग्रेट!
18 जुलाई 2014
क्या हर रोग का इलाज एक दवा से हो सकता है? नहीं ना! संगीत सुनने के लिए मेरे पास आईपॉड है, वीडिओ एडिटिंग के लिए कम्प्यूटर, वॉट्सएैप के लिए स्मार्टफोन, किताबें पढ़ने के लिए किंडल। जैसा हर चीज़ में है, वैसा ही मेरे संबंधों में भी है।मानसिक,शारीरिक, कलात्मक..
जितनी मेरी ज़रूरतें उतने ही ब्वायफ़्रेंड्स.. सो सिंपल ! अथर्व के साथ लिव-इन संबंध के अलावा अब मेरे अन्य प्रगाढ़ संबंध भी हैं।
27 अगस्त 2014
आज अथर्व का कज़िन घर आया था।मेरे बारे में बात करते हुए अथर्व ने मुझे ‘कई मौसमों की स्त्री’ के रूप में वर्णित किया। यह परिभाषा मुझे पसंद आई ।मुझे लगता है कि यह मेरे अस्तित्व का सार है।
8 जनवरी 2016
पिछले तीन दिनों से अथर्व की गर्लफ़्रेंड
भी हमारे साथ हमारे बेडरूम में रह रही है। पता नहीं क्यों आज असुरक्षित महसूस कर रही हूँ … हट! लिव-इन में क्या असुरक्षित? फिर भी …
11 जनवरी 2016
अथर्व की गर्लफ़्रेंड चली गयी।जाते समय मन कर रहा था उसका मुँह नोच लूँ…
12 जनवरी 2016
अथर्व ने मुझे बाहों में भरने की कोशिश की मैंने झिड़क दिया। वह नहीं समझा मेरे ऐसे व्यवहार का कारण … शायद मैं भी नही।
14 फरवरी 2016
वैलेंटाइन डे पर आज घर में इनोवेटिव फ़न पार्टी थी।सबको अपने अपने एक्स को इन्वाइट करना था।अथर्व की दो एक्स गर्लफ़्रेंड्स आयीं। मेरा कोई एक्स नहीं ! मैं प्यार में पड़ती हूँ तो यह कभी ख़त्म नहीं होता। हर व्यक्ति जिसके साथ मैं अंतरंग महसूस करती हूँ, वह मेरे दिल में एक प्रकाशित मोमबत्ती की तरह है। लपटें कभी बुझती नहीं हैं। मैं कभी-कभी आगे बढ़ जाती हूँ पर वे मेरे दिल में रहते हैं, मुझमें अपनत्व और रोमांस भरते हुए।यह सब कॉम्प्लिकेटेड है ना! पर है…!मैंने पार्टी में अपने सभी ब्वायफ़्रेंड्स को बुलाया है।अथर्व ने मुझे आज भी *कई मौसमों की स्त्री* कह कर सम्बोधित किया… जाने क्यों आज अच्छा नहीं लगा।
20 फ़रवरी 2017
जाने मुझे क्या होता जा रहा… उचाट लगता है ..सब व्यर्थ! ऋतु वसन्त है पर मुझमें उग आया है एक पतझर.. अथर्व का प्यार बिल्कुल पहले जैसा है पर मेरे अन्दर बसी स्त्री बदली-बदली सी है…
22 फ़रवरी 2017
आज पड़ोस में खेल रहे बच्चे को देख कर बहुत अच्छा लगा। लाल टोपा पहन कितना प्यारा लग रहा। क्या उठा लूँ इसे गोद में? नहीं इसकी माँ मुझे पसंद नहीं करती .. हिक़ारत से देखती है..
24 फ़रवरी 2017
मुझे माँ बनना है…
मेरे बच्चे का पिता कौन होगा?
27 फ़रवरी 2017
कल मेरी दीदी के बेटे की शादी है …ज़रूर जाऊँगी वर-वधू के सफल वैवाहिक जीवन की ढेरों मंगलकामनाओं संग…
पाँच लघुकथा

मनोरमा जैन पाखी
लघुकथा-1
दीवारें सुनती हैं
“तू फिर वहीं गया था?”
रजनी ने दरवाज़ा बंद करते हुए पूछा। स्वर में घृणा नहीं थी—बस एक थकी हुई जिज्ञासा।
“हाँ,” अर्जुन ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा, “वहाँ सन्नाटा बोलता है, और मैं सुनता हूँ।”
रजनी ने चाय का कप उसकी ओर बढ़ाया। “तू जानता है, ये जो तू करता है… वो अपराध है। मानसिक बीमारी है।”
“बीमारी?” अर्जुन हँसा नहीं, बस आँखें झुका लीं। “क्या कोई बीमारी है जो सिर्फ़ रात में जागती है, और सिर्फ़ उनसे बात करती है जो बोल नहीं सकते?”
रजनी ने दीवार की ओर देखा—वहाँ तस्वीर थी उसकी बहन की, जो दो साल पहले एक सड़क दुर्घटना में मारी गई थी। अर्जुन तब से बदल गया था।
“तू उसे भूल नहीं पाया, मैं समझती हूँ। पर ये जो तू कर रहा है… ये प्यार नहीं है अर्जुन। ये विकृति है।”
“प्यार?” अर्जुन की आवाज़ काँप गई। “प्यार तो वो था जब मैं उसकी साँसें गिनता था। अब तो बस उसकी ख़ामोशी में खुद को ढूँढता हूँ।”
रजनी ने पहली बार उसकी आँखों में देखा—वहाँ कोई वासना नहीं थी, कोई हिंसा नहीं। बस एक टूटा हुआ आदमी था, जो अपनी टूटन को शवगृह की दीवारों में ढूँढ रहा था।
“कल पुलिस आई थी,” रजनी ने धीरे से कहा। “तुझे बुलाया है।”
अर्जुन ने सिर हिलाया। “मैं जाऊँगा। शायद वहाँ भी कोई शव होगा, जो मेरी कहानी सुनना चाहे।”
रजनी ने चाय का कप उठाया, और दरवाज़े की ओर बढ़ते हुए कहा
“अब तेरा मौन कोई नहीं सुनेगा अर्जुन। अब तुझे बोलना होगा।”
लघुकथा-2
आजादी कैद है
सरकारी दस्तावेज़ों में राधा के गाँव को “नारी स्वतंत्रता का आदर्श मॉडल” घोषित किया गया। उद्घाटन में मंत्री बोले—“यहाँ हर स्त्री स्वतंत्र है—सोचने, बोलने, निर्णय लेने में।” तालियाँ तेज गडगडाहट से बज उठीं।
गाँव की लड़कियाँ रंगीन दुपट्टों में राधा के साथ मंच के पीछे खड़ी थीं प्रस्तुति के लिए।परंतु गाँव के सरपंच मुखिया और नेताओं के भाषण के साथ सभा संपन्न हुई।
राधा व उसकी सखियों को मंच पर बुलाया नहीं गया। पत्रकारों के पूछने पर कारण बताया गया—“हमारे गाँव की मर्यादा व संस्कृति।”
आयोजन के बाद राधा ने माँ से कहा, “मैं शहर जाकर पढ़ना चाहती हूँ।”
माँ ने कहा, “यहाँ सबकुछ है—पढ़ाई, मोबाइल, आज़ादी। शहर क्यों?”
वहीं बैठे पिता ने भी कुछ कठोर आवाज में कहा “तुम स्वतंत्र हो पढ़ने लिखने या कुछ भी करने को पर निर्णय मेरा होगा। तुम्हें शहर नहीं भेज सकता।”
राधा चकित मौन हो गयी ।दिन ढलते ढलते
सरकारी टीम आई सर्वे के लिए। रिपोर्ट में लिखा गया—“गाँव की लड़कियोऔ के पास मोबाइल है, कॉलेज में नामांकन है, परिवार सहायक है। स्वतंत्रता पूर्ण है।”
राधा नेअपने मोबाइल को खोल कर रिपोर्ट देखनी चाही। उसमें रसोई टिप्स, सिंदूर के फायदे, और पति को प्रसन्न रखने के उपाय जैसे बहुत से लेख और फीचर थे।
व्यथित हुई राधा ने उसी पल एक वीडियो बनाया।
मैं आदर्श गाँव की बेटी हूँ। मेरे पास सबकुछ है—बस निर्णय नहीं।”
वीडियो मिनिटोंमें वायरल हुआ। मंत्री बोले, “यह तो विपक्ष की साज़िश है।”
राधा ने खिड़की से झांका बाहर बोर्ड चमक रहा था—“यूटोपिया: स्त्री स्वतंत्रता का प्रतीक।”
मन ही मन उसने कहा “यहाँ प्रतीक बहुत हैं,परंतु स्वतंत्रता ??।”
लघुकथा-3
गवाहबाबू
पुराने कस्बे के चौक पर एक मूर्ति खड़ी थी—हाथ में संविधान, चेहरे पर धूल। लोग उसे “गवाह बाबू” कहते थे।
हर चुनाव के बाद वहाँ बहसें होतीं। हर बार पक्ष-विपक्ष के आरोप प्रत्यारोप उछलते। नारे लगते योजनाएं बनती।पर गवाह बाबू कोई हस्तक्षेप न करते।
इस बार विपक्ष ने सरकार पर आरोप लगाया—“जनता भूखी है, योजनाएँ कागज़ पर हैं, और सत्ता सिर्फ प्रचार में है।” जोर शोर से इस काप्रचार हुआ
सरकार ने जवाब दिया—“विकास दिखता नहीं, महसूस होता है। विपक्ष सिर्फ भ्रम फैला रहा है।”
गवाह बाबू अब भी चुप थे।
एक युवती वहाँ आयी । फटे कपड़े, कहीं कहीं बदन पर खरौंचे ।उसने मूर्ति से पूछा, “आपने सब देखा होगा—सच क्या है?”
मूर्ति ने कुछ नहीं कहा।
लड़की बोली, ‘लड़कियों के लिए उनकी शिक्षा ,सुरक्षा के लिए कानून बने फिर भी असुरक्षित हर जगह। अस्पताल में बिना पहुँच सही इलाज नहीं मिलता, थाने में बिना #सबूत रिपोर्ट नहीं लिखी जाती। लेकिन टीवी पर सब ठीक दिखता है।न्याय होता दिखता है।”
उसी समय एक नेता आया, फूलों की माला लेकर। मूर्ति पर चढ़ाई, फोटो खिंचवाई, और चला गया।
युवती फीकी मुस्कान फेंक बोली —“आप गवाह हैं, लेकिन बोलते नहीं। शायद पत्थर होना ही आज की सच्चाई है।”
मूर्ति के चेहरे पर धूल कुछ और गहरी हो गई।
लघुकथा-4
कीमत के रंग
“कितने की है यह मूर्ति ?”
“सा’ब जी ,पाँच सौ रुपये की।”निरीह कातर स्वर उभरा
“क्या..?लूट मची है क्या ?ऐसा क्या है तेरी इस मूर्ति में ?”मुँह बनाते बोला वह
“सा’ब जी ,बचपन से मूर्तियाँ बना कर आपको बेचती रही ओना-पोना जो आपने दिया ,ले लिया।माँ का आपरेशन कराना है सा’ब जी। हजारों रुपये जमा करना है।”रूँधा गला और आँख के आँसू शामली की व्यथा -वेदना कह रहे थे।
“न, मैं तो डेढ़ सौ दूँगा ,लेना है तो ले ..।”
शामली ने चुपचाप रुपये लिए और आँसू पौंछते वापिस मुड़ गयी ।
“सुन , अगर जैसी मूर्ति कहूँ वो बनायेगी?अच्छी कीमत मिल जाएगी!”
“जी सा’ब जी …कैसी ?”एक आस उभरी
“मैथुनरत् युगल ..।”अधेड़ आबनूसी चेहरे पर कुटिलता उभरी।
“पर सा’ब जी ….मैं इस तरह की मूर्तियाँ नहीं बनाती। क्षमा करें।”
“सोच ले फिर से, कला है तेरे पास ।माँ का जीवन चाहिये या…।”उसने बात अधूरी छोड़ी।आँखों से काइयाँपन झलकने लगा था। शामली के किशोर तन को पीछे छोड़ते युवावस्था आने लगी थी।
“ठीक है सा’ब…।शाम को ले आऊँगी।”एक गहरी उसाँस ले शामली ने
“लो सा’ब …..आपकी मूर्ति।”मूर्ति से कपड़ा हटाते बोली शामली
“गज़ब,..वाह !!क्या शाहकार है।”अधेड़ की आँखें विस्मय से फैल गयीं
“ला सा’ब 1500रुपये ।”
“अरे पागल है क्या ?मात्र 500 मिलेंगे।ये ले …”कहते हुये अधेड़ ने पाँच सौ का नोट बढ़ाया।
“सा’ब जी जिस विवशता का लाभ उठाते रहे अब तक ,वो तो सुबह ही खतम हो गयी। अब इस के पूरे 1500ही लूँगी।”
“मतलब…।”अधेड़ दुकानदार शामली के बदले तेवर से हैरान था।
“माँ नहीं रही ।पर वादा किया था ये मूर्ति देने का ….सो ले आई। देते हो या कहीं और ले जाऊँ ?दुगनी कीमत कोई भी देदेगा सा’ब!” कहते हुये शामली ने मूर्ति उठाई आवाज में विवशता नहीं आत्मविश्वास था।
लघुकथा-5
कुछ तो लोग कहेंगे
“देविका , ये तुम्हारा रोज रोज का समाज सेवा मुझे पसंद नहीं।आखिर क्या मिलता है तुम्हें वहाँ ?”निखिल के स्वर में क्रोध था
“निखिल ,कितनी बार कहा है आपसे कि एक बार चलके तो देखो,स्वयं समझ जाओगे।पर….।”देविका ने चाय का कप पकड़ाते बात अधूरी छोड़ी
“मुझे तो बख्शो,मेरा दिमाग खराब नहीं हुआ अभी । मेरे सर पर जिम्मेदारियाँ हैं घर की,बच्चों की-उनकी पढ़ाई,होस्टल का खर्च और भी बहुत कुछ..।”निखिल ने तल्ख स्वर में कहा
” आपका मतलब है कि मुझे कोई चिंता ही नहीं किसी बात की…।”भावुक देविका का गला रुंध गया ।
“देखो देविका, हम मध्यम वर्गीय लोग है। मैं बाहर रहता हूँ कभी कभी रात को ओवर टाइम कर देर से भी लौटता हूँ तो किसलिये?आखिर तुम सब के ही लिये तो न ! फिर फालतू बातें सुनने मिलें तो क्रोध तो आयेगा ही न !” निखिल ने अपने स्वर को भरसक नम्र करने की कोशिश की
देविका की आँखों में सवाल देख कर निखिल ने बताया कि कल ही पड़ोस वाले दुबे जी बोल रहे थे कि आपकी पत्नी आपके जाते ही अक्सर अकेली कहीं जाती है और तीन चार घंटे में लौटती है। दो दिन पहले बबलू के पापा ने भी इशारों में..।”
“ओहहह…!.निखिल आज मैं एक अस्पताल गयी थी जहाँ मनोरोगियों का एक वार्ड है । लगभग बढ़ती उम्र के लोगों के बीच एक बच्चे को देख मैं चकित थी। दस बारह साल का बच्चा मनोरोगी ? मैं उसके पास गयी तो वह सहम गया। जब उसे प्यार से पुचकारा और साथ रखे बिस्किट दिये तो वह बिलख उठा ..”आँटी मैं पागल नहीं हूँ ..मुझे बचा लो। ” जब थोड़ा स्थिर हुआ तो उसने बताया कि वह अनाथ है। किसी ने उसे गोद लिया था अनाथालय से । कुछ समय तक सब ठीक रहा। वह भी अपने माँ बाप पाकर खुश था ..पर धीरे धीरे स्थिति बदली ..उससे घर के ,बाहर के काम करवाये जाने लगे ।अपना समझ सब करता रहता, पर जरा सी गलती पर पिटाई होती और भूखा रखा जाता। समय गुजर रहा था एक रात को जिस माँ ने उसे गोद लिया उसका बेटा और दो दोस्त कमरे में आये ।दरवाजा अंदर से बंद कर के उसे नंगा कर ….।”
देविका आगे शब्द पूरे नहीं कर पाई और बिलख उठी। निखिल हतप्रभ था ।उसने पास आकर देविका को गले लगा तसल्ली दी । “देविका…मत रोओ…।”
“निखिल मुझे अपने बच्चे नज़र आने लगे ।वो भी हमसे इतनी दूर रहते हैं।पता नहीं क्या क्या सह रहे होंगे। बस यही सोच मैं थर्रा उठी। उस दिन वृद्धाश्रम गयी तो वहाँ देखा उन बूढ़ी आँखों को अपनों का इंतजार करते जो शायद उनके मरने पर भी न आये।”
देविका बिलख रही थी और निखिल जड़वत् था। जिसे वह समय की बर्बादी और घूमना समझ रहा था वह तो रोती आँखों को हँसी और सूखे होंठों को मुस्कान देने जाती थी।
“दविका…इस इतवार और बाकी छुट्टियों में आज से मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगा।” देविका की आँखें आसमान की ओर उठ गयीं जहाँ एक पतंग काफी ऊँचाई पर इठला रही थी।
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