
तू अपना इतिहास कहेगा
उदय अस्त में सुख की दुःख की
कभी कमल ने बात नहीं की
कभी पतिंगे ने रो-रोकर पूरी
अपनी रात नहीं की
कभी सूर्य के आ जाने पर
तारों ने क्या आँसू ढाले
वज्राहत होकर क्या बादल ने
सुख की बरसात नहीं की
फिर ऐसा क्यों हुआ कि पगले
तू अपना परिहास करेगा
तू अपने सुख का या दुःख का
शब्दों में इतिहास कहेगा?

कठपुतली
कठपुतली
गुस्से से उबली
बोली- यह धागे
क्यों हैं मेरे पीछे-आगे?
इन्हें तोड़ दो;
मुझे मेरे पाँवों पर छोड़ दो।
सुनकर बोलीं और-और
कठपुतलियाँ
कि हाँ,
बहुत दिन हुए
हमें अपने मन के छंद छुए।
मगर…
पहली कठपुतली सोचने लगी-
यह कैसी इच्छा
मेरे मन में जगी?

कठपुतली
गुस्से से उबली
बोली — ये धागे
क्यों हैं मेरे पीछे – आगे ?
तब तक दूसरी कठपुतलियाँ
बोलीं कि हाँ हाँ हाँ
क्यों हैं ये धागे
हमारे पीछे – आगे ?
हमें अपने पाँवों पर छोड़ दो,
इन सारे धागों को तोड़ दो !
बेचारा बाज़ीगर
हक्का – बक्का रह गया सुनकर
फिर सोचा अगर डर गया
तो ये भी मर गईं, मैं भी मर गया
और उसने बिना कुछ परवाह किए
ज़ोर – ज़ोर धागे खींचे
उन्हें नचाया !
कठपुतलियों की भी समझ में आया
कि हम तो कोरे काठ की हैं
जब तक धागे हैं, बाज़ीगर है
तब तक ठाट की हैं
और हमें ठाट में रहना है
याने कोरे काठ की रहना है

चार कौए उर्फ चार हौए
बहुत नहीं थे सिर्फ चार कौए थे काले
उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले
उनके ढंग से उड़ें, रुकें, खायें और गायें
वे जिसको त्योहार कहें सब उसे मनायें ।
कभी-कभी जादू हो जाता है दुनिया में
दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गये
इनके नौकर चील, गरूड़ और बाज हो गये ।
हंस मोर चातक गौरैयें किस गिनती में
हाथ बांधकर खडे़ हो गए सब विनती में
हुक्म हुआ, चातक पंछी रट नहीं लगायें
पिऊ-पिऊ को छोड़ें कौए-कौए गायॆं ।
बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को
खाना-पीना मौज उड़ाना छुटभैयों को
कौओं की ऐसी बन आयी पांचों घी में
बड़े-बड़े मनसूबे आये उनके जी में
उड़ने तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले
उड़ने वाले सिर्फ रह गये बैठे ठाले ।
आगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन है
यह दिन कवि का नहीं चार कौओं का दिन है
उत्सुकता जग जाये तो मेरे घर आ जाना
लंबा किस्सा थोड़े में किस तरह सुनाना ।

जबड़े जीभ और दाँत
जबड़े जीभ और दाँत दिल छाती और आँत
और हाथ पाँव और अँगुलियाँ और नाक
और आँख और आँख की पुतलियाँ
तुम्हारा सब-कुछ जाँचकर देख लिया गया है
और तुम जँच नहीं रहे हो
लोगों को लगता है
जीवन जितना
नचाना चाहता है तुम्हें
तुम उतने नच नहीं रहे हो
जीवन किसी भी तरह का इशारा दे
और नाचे नहीं आदमी उस पर तो यह
आदमी की कमी मानी जाती है इसलिए
जबड़े जीभ और दाँत दिल छाती और आँत
तमाम चीज़ों को इस लायक बनाना है
वे इसीलिए जाँची जा रही हैं
और तुम्हें डालकर रखा गया है बिस्तरे पर
यह सब तुम्हारे भले कि लिए है
इस तरह तुम नाचने में समर्थ बनाए जाओगे
यानी जब घर आओगे अस्पताल से
तब सब नाचेंगे कि तुम

मैं फिर आऊँगा
गतिहीन समय ने
मुझे इस तरह फेंक दिया है
अपने से दूर
जिस तरह फेंक नहीं पाती हैं
चट्टानें लहरों को
मैं समय तक आया था यों
कि उसे भी आगे बढ़ाऊँ
मगर उसने
मुझे पीछें फेंक दिया है
मैं चला था जहाँ से
अलबत्ता वहाँ तक तो
नहीं ढकेल पाया है वह मुझे
और कुछ न कुछ मेरा
समय को भले नहीं
सरका पाया है आगे
ख़ुद कुछ आगे चला गया है उससे
लाँघकर उसे छिटक गए हैं
मेरे शब्द
मगर मैं उसे अब
समूचा लाँघकर
आगे बढ़ना चाहता हूँ
अभी नहीं हो रहा है उतना
इतना करना है मुझे
और इसके लिए
मैं फिर आऊँगा।
भवानी प्रसाद मिश्र

जन्म 29 मार्च 1913 गाँव टिगरिया, तहसील सिवनी मालवा, जिला होशंगाबाद (मध्य प्रदेश), मृत्यु नरसिंहपुर 20 फरवरी 1985।
1972 में ” बुनी हुई रस्सी ” नामक रचना के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार और भी अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कारों से विभूषित प्रेरक कवि ।