चंद्रेश कुमार छतलानी, संजीव तोमर, अशोक गुजराती

पाँच लघुकथा

डॉ.चंद्रेश कुमार छतलानी

लघुकथाः1

फिर वही निर्णय

वह एक अजीब कोर्ट रूम था. पांच लोगों के अलावा किसी और को अंदर आने की इजाज़त नहीं थी. वादी, प्रतिवादी, उन दोनों के वकील और जज.
और उसे उसी कोर्ट रूम में खडा किया गया. उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब उसने देखा कि वादी भी वही है, प्रतिवादी भी वही और तो और, दोनों वकील और जज भी वही है.
कुल मिलाकर वही खुद अपने ही पांच रूपों में वहाँ खडा था.
बहस छिड़ गई. वादी का वकील बन वह खुद पर ही आरोप लगाता गया और प्रतिवादी का वकील बन खुद उनका जवाब भी देता गया. ख़ास बात यह थी कि वह अपने किसी भी रूप में झूठ नहीं बोल पा रहा था.
बहस चलती रही. काफी आरोप लग गए. कुछ उसने खुद वकील बन कर साबित किये, कुछ उसने खुदने माने, कुछ कसूरों का उसने खंडन किया तो कुछ का उसने सबूत दिया कि वह कसूरवार नहीं. कुछ देर बाद सारी बहस ख़त्म हो गई. अब जज के रूप में उसे खुद ही को निर्णय करना था.
उसने खुद पर लगाए हुए आरोप पढ़े, खुद ही के द्वारा दी गईं दलीलें भी पढीं.
और उसने निर्णय दिया, “अभी बहुत कुछ बाकी है. फिर से वहीं जाना पडेगा, जहां से आया है. जन्म… और… जीवन का वक्त खत्म होने के बाद फिर यहाँ पेश होना…”
इसके आगे जज बना वह खुद ही कुछ और नहीं कह पाया, उसे पता ही नहीं था कि क्या कहना है.
और वे पाँचों आपस में मिल गए. वह एक होकर चिल्लाता रहा कि, “मुझे फिर नहीं जाना है, वहां बीमारियाँ हैं, दर्द है, अपमान है, दुःख ही दुःख है…”
लेकिन कोर्ट रूम तो खाली था. सुनता कौन?
फैसला भी तो उसी का अपना ही था.

लघुकथा- 2
इन खोपड़ियों से दिमाग नहीं लेंगे
उस आदमी ने अपनी बाएँ हाथ की खुली हथेली में चमक रहे पाम-गेजेट में दाहिने हाथ की अंगुली से ‘प्रतीक चिन्हों के द्वारा तीव्र लेखन’ और फिर ‘भ्रमण रिव्यू’ का विकल्प चुना। गेजेट में सबसे ऊपर तारीख और स्थान अपने आप ही दिखाई देने लगे: 15 दिसंबर 2121 स्थान: प्राचीन संग्रहालय, भारत। अब उसने अपनी दाहिने हाथ ही की अंगुली से पाम-गेजेट पर नीचे की तरफ उभर रहे कुछ बटन दबाए। गेजेट में ऊपर शब्द स्वतः ही बन रहे थे। वे थे, मैं अपने परिवार के साथ प्राचीन संग्रहालय में 45 मिनट के लिए गया। इन 45 मिनटों में हमें संग्रहालय की सिर्फ 5 वस्तुएं देखनी और समझनी थीं। लेकिन मैं पाँच वस्तुएँ देख नहीं पाया। दूसरी वस्तु देखते समय ही मेरा बेटा एहतिशाम मुझे एक अन्य टेबल के पास ले गया। वहाँ सौ साल पुरानी छह खोपड़ियाँ एक साथ रखीं हुई थीं। उसने पूछा, “इन सभी खोपड़ियों में क्या फर्क है?” मैंने ध्यान से देखा लेकिन मुझे कुछ समझ में नहीं आया। मैंने मेरी पत्नी ब्रोनी को बुलाया, उसने भी उन खोपड़ियों को देख कर अपना सिर ना की मुद्रा में हिला दिया। तभी मेरी नज़र पास में लगे हुए इन्क़्वायरी टूल पर गयी। वहीं रखी ऑटो-रिकोग्नाइज़-चेयर्स पर हम तीनों बैठ गए और टूल में लगी ईयरसाउंड वाली छोटी स्क्रीन पर अपने-अपने अंगूठे रख कर अपने कानों की दूरी और सुनने की फ्रिक्वेन्सी सेट कर ली। अगले दो सेकंड ही में हमारी आँखों के सामने लगी बड़ी स्क्रीन में हलचल हुई और सौ साल पुरानी सभ्यता के लोग सामने आ गए। और आश्चर्य था! वे सभी खोपड़ियाँ थीं तो इन्सानों की ही। लेकिन उनमें से एक खुद को हिन्दू कहता था, दूसरा मुसलमान, तीसरा सिक्ख और चौथा ईसाई। पाँचवी खोपड़ी दलित की और छठी खोपड़ी एक किन्नर की थी। उस समय इन सभी को अलग-अलग माना जाता था। मेरे मुंह से शब्द निकलते-निकलते बचे। बिना समय गँवाए मैंने पहले डिस्प्ले स्क्रीन ऑफ कर एहतिशाम की ईयर फ्रिक्वेन्सी को अनसेट किया और बाद में हम दोनों की। ब्रोनी को मैंने इशारा किया कि पुराने पेड़ों को आज के पर्यावरण में उगाने के बारे में रोबोट्स से जानकारी ले रही हमारी बेटी कीरत को इस तरफ मत लाना। आप सभी को यह रिव्यू ब्रोडकास्ट करने से पहले मैंने संग्रहालय मैनेजर को भी इस डिस्प्ले के फ्युचर इफैक्ट का मेरे पर्सनालाइज़्ड ऑटो थॉट अण्डरस्टैंडिंग रोबो द्वारा इंस्टेंट वीडियो बनवा कर भेजा है जिसमें यह स्पष्ट है कि संग्रहालय से इन खोपड़ियों और उनके इन्क़्वायरी टूल को फौरन हटा दें अन्यथा यह हमारे बच्चों के ब्रेन्स में विध्वंसक प्रदूषण पैदा करेगा। ब्रॉडकास्ट ह्यूमन – स्वर यह लिखकर उसने अपनी बाएँ हाथ की हथेली बंद की और उसी हाथ की अपनी छोटी अंगुली को दो बार दबा कर पाम-गेजेट को ऑफ किया फिर मेज की दराज से स्माइल-सप्लीमेंट की एक गोली निकाल कर मुंह में रख दी।

लघुकथा-3
इंटरनेट ऑफ बींग्स

उसका नाम सामनि था। सरगम के पहले, मध्यम और आखिरी स्वरों पर उसके संगीतकार पिता ने यह अजीबोगरीब नाम रखा था। लेकिन वह खुद को ज़िन्दगी कहती थी। साथ ही यह भी कहती थी, “ज़िन्दगी गाने के लिए नहीं है, गुनगुनाने के लिए है और गुनगुनाने के लिए सरगम के तीन स्वर काफी हैं।“ मैं तकनीक का व्यक्ति हूँ, इंटरनेट ऑफ थिंग्स पर काम करता हूँ। वह कहती थी कि इंटरनेट ऑफ थिंग्स की बजाय इंटरनेट ऑफ बींग्स पर दुनिया काम क्यों नहीं करती! कहती थी, काश! ऐसी एक चिप होती जो रोज़ रात को ठीक ग्यारह बजे उसके शरीर को शिथिल कर देती, दिमाग को शांत और आँखों में नींद भर देती। प्रेमिका तो नहीं, वह केवल एक दोस्त थी। सच कहूं तो मुझे बहुत पसन्द थी, एक दिन मैंने उससे शादी का प्रस्ताव भी रखा, हँसते हुए बोली, “ज़िन्दगी को छूना नहीं चाहिए, ज़िन्दगी को अपने इंटरनेट की तरह ही मानो… जीने का अर्थ ही आभासी होना है।” एक दिन तेज़ बारिश में भीगी हुई वह मेरे घर आई। कुछ सामान लेने गई थी कि बारिश हो गई। मैंने उसे पहनने को अपने कपड़े दिए और कमरे से बाहर चला गया। उसने दरवाज़ा बंद किया। मैं घर पर अकेला ही था। दिल का दानव दिमाग तक पहुंचा और मैंने दरवाज़े के की-होल से उसे कपड़े बदलते हुए भरपूर देखा। देखा क्या, बस अपनी स्मृति में हमेशा के लिए बसा लिया। वह बेखबर बाहर आई, हम दोनों के लिए चाय बनाई और हम पीते रहे। वह चाय पीती रही और मैं… न जाने क्या? उस बात को लगभग एक साल गुज़र गया है। आज शाम उसने खुद्कुशी कर ली। देर रात मैं उसके घर गया तो पता चला कि किसी ने उसके कपड़े बदलने का वीडियो बना लिया था और उसे इंटरनेट की किसी वेबसाईट पर अपलोड कर दिया। सुनते ही मुझे याद आया कि उस दिन मेरा लैपटॉप भी तो ऑन ही था, इंटरनेट भी चल रहा था और… लैपटॉप का कैमरा भी… हाँ-हाँ कैमरा भी तो ऑन था। शायद उसी वक्त मेरी तरह ही किसी और ने भी इंटरनेट के जरिये… मेरे लैपटॉप को हैक कर… उसे अपनी स्थायी मेमोरी में बसा लिया था। लेकिन सिर्फ बसाया ही नहीं, उजाड़ भी दिया उस उज्जड़ ने। दिमागी हलचल पैरों तक पहुँची, मैं उसके घर से भागा। अपने घर पहुंच कर अपने कमरे में गया। लैपटॉप आज भी ऑन था। उसे बंद किया तो कुछ चैन सा मिला। मैं अपने कमरे से निकल आया और दरवाज़ा बंद कर दिया। डाईनिंग रूम में जाकर बैठ गया और आँखें बंद कर लीं। इस तरह जैसे ज़िन्दगी को कभी देखा ही नहीं हो। आज भी घर में मैं अकेला था। रात के ग्यारह बज रहे थे। मेरा पूरा शरीर शिथिल होने लगा, आँखें चाह कर भी खोल नहीं पा रहा था, जैसे डार्क वेब के किसी हैकर ने आँखें हर ली हों। और उसी वक्त पता नहीं कैसे पूरा डाईनिंग रूम चाय की खूश्बू से महक उठा!

लघुकथा-4
देवी माँ
मुझे उस औरत से सख्त नफरत थी। और आज नवरात्रि के आखिरी दिन तो उसने हद ही कर दी। स्त्री अंग पर प्राइस टैग लगा उसे बेचने वाली होकर एक तो उसने नौ दिन देवी माँ की पवित्र मूर्ति को स्थापित कर अपने अपवित्र मकान में रखा और दूसरे, आज विसर्जन के लिए मूर्ति भेजते समय लाल साड़ी पहन, सिंदूर से मुंह पोत, सिर घुमा-घुमा कर वह ऐसे नाच रही थी जैसे उसमें देवी माँ खुद प्रवेश कर गईं हों। मेरा घर उसकी गली के ठीक सामने ही था सो सब देख पा रहा था। ‘देवी माँ और एक वैश्या के शरीर में… माँ का ऐसा अपमान!’ ऐसे विचार आने पर भी मैं कैसे अपने आप को संयत कर खडा था, यह मैं ही जानता था। उस औरत के मकान में रहने वाली और दूसरी अन्य भी जाने कहाँ-कहाँ से लड़कियां आ-आकर उसके पैर छू रहीं थी। यह दृश्य मुझे आपे से बाहर करने के लिए काफी था। उस वक्त मेरा एक पड़ौसी भी अपने घर से बाहर निकला। मैं मुंह बनाता हुआ उसके पास गया और क्रोध भरे स्वर में बोला, “ये सामने क्या नाटक हो रहा है!” उसने भी गुस्से में ही उत्तर दिया, “शायद मोहल्ले में अपनी छवि अच्छी करने के लिए यह ड्रामा कर रही है। इसे पता नहीं वैश्याएं आशीर्वाद नहीं देतीं, शरीर देती हैं।” “चलो इस नाटक को खत्म कर आते हैं।” अब तक मेरी सहनशक्ति मेरी ही निर्णय लेने की शक्ति से हार चुकी थी। वह पड़ौसी भी भरा हुआ था, हम दोनों उस औरत के पास गए और मैंने उससे गुस्से में पूछा, “हमें लग रहा है कि तुझे देवी नहीं आई है, तू ऐसे ही कर रही है।” वह वैश्या चौंक गई, उसने एक झटके से मेरी तरफ मुंह घुमाया। मैंने जीवन में पहली बार उसका चेहरा गौर से देखा। धब्बेदार चेहरे में उसकी आंखों के नीचे के काले घेरे आंसुओं से तर थे। वह मुझे घूर कर देखती हुई लेकिन डरे हुए शब्दों में बोली, “हां… आपको… ठीक लग रहा है।” उसके डर को समझते वक्त यह भी समझ में आया कि पहले कदम की जीत क्रोध को गर्व में बदल सकती है। उसी गर्व से भर कर मैं अब आदेशात्मक स्वर में उससे बोला, “आगे से ऐसा नहीं होना चाहिए। लेकिन तुमने ऐसा किया ही क्यों?” उस वैश्या ने आंखों के काले घेरों के आंसू पोंछते हुए उत्तर दिया, “क्योंकि… मैं भी माँ बनना चाहती हूँ।”

लघुकथा-5
मृत्यु दंड
हज़ारों वर्षों की नारकीय यातनाएं भोगने के बाद भीष्म और द्रोणाचार्य को मुक्ति मिली। दोनों कराहते हुए नर्क के दरवाज़े से बाहर आये ही थे कि सामने कृष्ण को खड़ा देख चौंक उठे, भीष्म ने पूछा, “कन्हैया! पुत्र, तुम यहाँ?”
कृष्ण ने मुस्कुरा कर दोनों के पैर छुए और कहा, “पितामह-गुरुवर आप दोनों को लेने आया हूँ, आप दोनों के पाप का दंड पूर्ण हुआ।”
यह सुनकर द्रोणाचार्य ने विचलित स्वर में कहा, “इतने वर्षों से सुनते आ रहे हैं कि पाप किया, लेकिन ऐसा क्या पाप किया कन्हैया, जो इतनी यातनाओं को सहना पड़ा? क्या अपने राजा की रक्षा करना भी…”
“नहीं गुरुवर।” कृष्ण ने बात काटते हुए कहा, “कुछ अन्य पापों के अतिरिक्त आप दोनों ने एक महापाप किया था। जब भरी सभा में द्रोपदी का वस्त्रहरण हो रहा था, तब आप दोनों अग्रज चुप रहे। स्त्री के शील की रक्षा करने के बजाय चुप रह कर इस कृत्य को स्वीकारना ही महापाप हुआ।”
भीष्म ने सहमति में सिर हिला दिया, लेकिन द्रोणाचार्य ने एक प्रश्न और किया, “हमें तो हमारे पाप का दंड मिल गया, लेकिन हम दोनों की हत्या तुमने छल से करवाई और ईश्वर ने तुम्हें कोई दंड नहीं दिया, ऐसा क्यों?”
सुनते ही कृष्ण के चेहरे पर दर्द आ गया और उन्होंने गहरी सांस भरते हुए अपनी आँखें बंद कर
उन दोनों की तरफ अपनी पीठ कर ली फिर भर्राये स्वर में कहा, “जो धर्म की हानि आपने की थी, अब वह धरती पर बहुत व्यक्ति कर रहे हैं, लेकिन किसी वस्त्रहीन द्रोपदी को… वस्त्र देने मैं नहीं जा सकता।”
कृष्ण फिर मुड़े और कहा, “गुरुवर-पितामह, क्या यह दंड पर्याप्त नहीं है कि आप दोनों आज भी बहुत सारे व्यक्तियों में जीवित हैं, लेकिन उनमें कृष्ण मर गया…”

पाँच लघुकथा

संजीव तोमर

लघुकथा-1
काबिलियत
हॉटबुक डॉट कॉम ने अपने कार्यक्रम में दिये जाने वाले साहित्य के विशिष्ट पुरस्करों की सूची प्रोफेसर कुलकर्णी को थमाते हुए कहा– “एक बार आप निगाह मार लें, कोई नाम छूट तो नहीं रहा?”
प्रोफेसर कुलकर्णी ने लिस्ट पर सरसरी नज़र डालते हुए कहा-“नामों को छोड़ो, ये बताओ मिस एकता पाटकर का साहित्य में क्या योगदान है जो उसे नवोदित प्रतिभा सम्मान दे रहे हो? अभी तो उसे लिखना भी नहीं आता, बस आपके ही प्रकाशन से उसकी कहानियों की पचास-एक पन्नो की किताब आई है। उसे न ही वाक्य विन्यास की समझ है, न ही वह कहानी के तत्व जानती है।”
“प्रोफेसर कुलकर्णी! लेखक होता कौन है, हम प्रकाशक उन्हें बनाते हैं, तरासते हैं। एकता पाटकर सुन्दर हैं, ग्लैमरस हैं, और उससे बढ़कर मेरे प्रकाशन के लिए नवोदित लेखक लेकर आती है, ये जो साझा संकलन पिछले एक साल में आए हैं, उनमें से अस्सी प्रतिशत बिजनेस उसकी ही बदौलत मिला है। रही बात उसकी कहानियों की, कितने ही लेखक ऐसे मिल जाते हैं, जिनकी पाण्डुलिपि खरीदकर मिस पाटकर के नाम से छापकर उसे रातोंरात उत्कृष्ट लेखिका जब हम चाहे बना सकते हैं।”
“लेकिन ये तो सरासर साहित्यिक बेईमानी है।”
“बेईमानी-ईमानदारी हम पर छोड़ दो। आपको हमने सलाहकार नियुक्त किया है, चयनकर्ता नहीं।”

लघुकथा-2
ओहदा
वह साहित्यकार था, उसके कमरे में हर तरफ किताबें अटी पड़ी थी। हर सफ़े में महान ग्रंथ, जिनमें धर्म से लेकर राजनीति, नीति, सब तरह की सामग्री थी।
रमेश ने उसके वाचनालय सरीखे पुस्तकालय में कदम रखते ही एक किताब पर नज़र टिकाते हुए कहा- “ये कौन सी किताब है लेखक बाबू जिसे सबसे ऊपर रखें हो?”
उसने कहा- “ये धर्म की सबसे पवित्र किताब है, इसका दर्जा सबसे ऊपर है इसलिए इसे सबसे ऊपर रखने की हिमायत है।”
रमेश ने एक दूसरी किताब उठायी और उसके ऊपर रख दी। वह किताब पर नज़र जमा शीर्षक पढ़ने की कोशिश करने लगा। लिखा था- “दा मदर।”

लघुकथा-3
संस्कार
घडी दो बजे का वक़्त बता रही थी, लकवे ने उसे इस कदर मजबूर कर दिया था कि बिना सहारे के उठकर वाशरूम जाना भी दूभर था। रमा भी तो जीवन की नैया बीच में छोडकर हमेशा के लिए चली गयी। रमा को याद कर सत्यनारायण परेशान हो उठे, कितना ख्याल रखती थी रमा उनके आज साथ होती तो हाजत के लिए इतना सोचना न पड़ता। सत्यनारायण यादों का गोता लगा पुनः यथार्थ में लौट आये और यथार्थ ये था कि वे पिछले चार साल से लकवे के चलते चलने-फिरने का काबिल नहीं रहे।
उन्होंने देखा, उनका एकमात्र सहारा उनका वॉकर उनकी पहुँच से इतना दूर है कि उस तक पहुँचना उनके लिए मुश्किल है, बेड से उतर उन्होंने हवाई चप्पल पहनने की कोशिश की, पाँच मिनट की जद्दोजहद में वे उस काम में विजयी हुए तो सरकते हुए वॉकर तक पहुँचे।
वाशरूम उनके कमरे से नजदीक ही है लेकिन कमरे से अटैच न होने के कारण वे वॉकर से चलकर दरवाजे तक आये, दरवाजा खोल ज्यों ही वाशरूम की ओर बढे, उनका पैर फिसला और वे गिर पड़े। गिरने की आवाज़ सुन बराबर के कमरे में सोया इकलौता बेटा उठकर बाहर आया । उसकी पत्नी भी हडबडाहट में उठ कर बाहर आ गयी।
“बाबूजी, आपको कितनी बार कहा है कि अकेले वाशरूम न जाया कीजिये, आप खुद को सम्भाल नहीं पाते, फिर क्यूँ….?”- सहारा देकर उठाते हुए बेटे ने पिता से शिकायत की।
“दिव्यम, तुम देर रात तक ऑफिस से लौटते हो, फिर खाना खाते हुए तुम्हे रोज ग्यारह बज जाते हैं, तुम्हें जगाकर मैं और ज्यादा तंग नहीं करना चाहता।”-नम आँखों से सत्यनारायण ने जवाब दिया।
“बाबूजी, याद है मुझे, जब बीटेक की तैयारी के समय आप मेरे साथ सिर्फ इसलिए जागते थे कि मुझे पढ़ते हुए बीच में भूख न लगे, अपनी नींद ख़राब कर आप मेरे लिए कॉफ़ी का मग तैयार कर किचेन से लाते थे। माँ जब दिन भर के कामों से थक जाती थी तब आप रात में मेरे लिए माँ बन जाते थे, आपको सुबह उठकर ड्यूटी भी जाना होता था। कुछ भी तो नहीं भूला मैं।”
सत्यनारायण कुछ देर मौन हो गए। सहारा देकर वाशरूम की ओर बढ़ते हुए बेटे ने कहा-“बाबूजी आपको कोई तकलीफ न हो इसलिए मैंने वर्किंग वीमेन की बजाय घरेलु-संस्कारी लड़की से शादी की, आपकी बहु आपको कभी किसी चीज की कमी नहीं होने देती फिर क्यूँ आप खुद को कष्ट देते हैं?”
“बस बेटा, और कितना कष्ट दूँ तुम दोनों को? मैं अभागा खुद तो कष्ट भोग रहा हूँ, तुम्हें और दिन-रात तंग करता रहूँ?“
बेटा पिता को हाजत करा उनके कमरे के दरवाजे की ओर बढ़ा, पीछे से बहु की आवाज़ आई-“पिताजी, आपके बेड के ठीक ऊपर ही घन्टी लगी है, आज सुबह ही मैंने उसकी बैटरी बदल दी थी, जब भी किसी चीज की जरुरत हो, बस एक बार बटन दबा दिया कीजिये। मैं या फिर ये आपके कमरे में आ जायेंगे।”
“हाँ बाबूजी, आप क्यों उस घण्टी का बटन भूल जाते हैं?”-बेटे ने सवाल किया।
सत्यनारायण के होंठ बुदबुदाये, मानो रमा को कह रहे हो, रमा तुम कितना डरती थी कि अगर मैं आपसे पहले चली गयी तो आप बाकि जीवन सब कुछ कैसे कर पाओगे? देखो तुम्हांरे बेटे-बहु कितना ख्याल रखते हैं मेरा।”
उनकी आँखों से दो आँसू उनके गालो पर ढलक गए, बेटा-बहु दोनों ही नहीं समझ पाए कि ये आँसू खुशी के थे या दुःख के।

लघुकथा-4
बटवारा
एक झबरू था तो दूसरा चितकबरा। दोनो जंगेजी थे। जो भी हारता उसका मालिक हार जाता। दोनो के ही मालिकों ने साल भर से उन्हें बड़ी अच्छी खुराक दी थी। दोनों में से कोई भी इस इक्क्यावन हजारा दंगल में हार देखना नहीं चाहता था। दोनो ही अपनी-अपनी पहलवानी का नज़ारा दिखा तालियाँ बटोर रहे थे। लड़ते-लड़ते दोनो के मुँह से खून आने लगा।
झबरू ने एक दाव चला और चितकबरा का मुँह भंभोड़ दिया। चितकबरा ने उसकी कमर को अपने नुकीले दांतों में भरा और पटकनी दे दी। अब चितकबरा ने झबरू के कान में कहा-“दोस्त! इन सबका मनोरंजन हो रहा है और हम दोनों के शरीर की हालत नाजुक हुई जा रही है।”
“हाँ, लेकिन हारने का मतलब- मालिक जान से मार देगा।”
“पता है हारने पर हमारे मालिक को इनाम की राशि भी नहीं मिलेगी।”
झबरू ने एक बनावटी दाँव चलते हुए चितकबरा को कहा- “हाँ दोस्त, एक काम करते हैं-दोनो ही एक-एक कदम पीछे हटते हुए उठ न पाने का ड्रामा करते हैं।”
“लेकिन उससे किसी के भी मालिक को एक भी फूटी कौड़ी नहीं मिलेगी।”
“न मिले फूटी कौड़ी। मुकाबला तो बराबरी पर छूटेगा। मौत से बेहतर बराबरी है।”
“ठीक है दोस्त, वैसे भी हम इन्सान तो हैं नहीं जो इनाम के लिए हार कर इनाम की राशि का बटवारा कर लें।”

लघुकथा-5
मुराद
अख्तर बेगम के शरीर ने जबसे साथ देना बन्द किया उसे लगने लगा कि उसका अंत उम्र ढल जाने के बाद या तो फुटपाथ पर पागलों की शक्ल में या कहीं दलालों के साथ कमीशनखोर के लैवल पर जा कर खत्म होगा। उसे महसूस हुआ कि वह न तो माँ रह पाई हैं, न बीवी, न बेटी और न बहन ही। उसे याद आया सकीना भी तो कभी उससे पहले यहीं एक सवारी की ट्रेनिंग लेकर आई थी, बाद में जब वह नाकाबिल हुई तो ‘सवारियों’ को लाने और उन्हें सफर पर भेजने तक का सारा कारोबार खुद करने लगी थी। उस के पास दलाल माल ला कर बेचते थे, ज्यादातर को वह खुद ही ट्रेनिंग देती थी।
उसने भी निर्णय कर लिया कि शकीना की तरह वह भी खुद को अब नए रूप में ढाल नया कारोबार शुरू करेगी। कुछ भी नया करने से पहले उसने अजमेर जाने का सोचा।
तमाम इंतजामात करने के बाद वह आखिर अजमेर पहुँच ही गयी।
अभी वह चादर चढाने की गरज से एक दुकान पर रुकी ही थी कि उसकी निगाह एक चेहरे पर पड़ी, उसे पहचानने में देर नहीं लगी, यह वही दलाल था जिसने उसे पहली बार सवारी बनाया था। हालाकि दलाल ने ऐसा दर्शाया जैसे वह उसे जानता ही नहीं, अख्तर बेगम चादर हाथ से छोड़ दलाल के करीब गयी, देखा- कमजोर सी पड़ी शकीना उसकी बगल में खड़ी है।
उसने कहा- “आपा! आप भी यहाँ चादर चढाने आई हैं?”
शकीना ने उसे पहचानते हुए कहा- “अरे अख्तर बेगम! तुम? एक बारगी तो तुम्हें पहचान ही नहीं पायी थी, लगता है अब सवारी पर नहीं जाती हो?”
“हाँ आपा, तुम्हारी तरह उम्र के ढलान पर जो आ गयी हूँ।”
“कोई बात नहीं, यहाँ चादर चढ़ाओगी तो सब ठीक हो जायेगा। यहाँ गरम गोश्त के कारोबारी अपनी ‘सवारियों’ और ‘गाडि़यों’ के लिए मन्नतें माँगने आते हैं, क्योंकि यहाँ हर किसी की मुरादें पूरी होती हैं।”
अख्तर बेगम ने शकीना के ऊपर उठते हाथों के कम्पन्न को खूब करीब से महसूस किया।

पाँच लघुकथा

अशोक गुजराती

लघुकथा-1
‘उजाले की मौत’ :
वह प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय में पढ़ाता है। अपनी युवावस्था में कविताएँ
लिखा करता था। साहित्य के क्षेत्र में अपेक्षित सफलता मिलने से पहले ही वह उसके प्रति
उदासीन-सा हो गया। लिखना-पढ़ना छूट गया और लग गयी शराब की लत।
धीरे-धीरे उसकी यह हालत हो गयी कि नशे में धुत वह रात में कहीं भी गिर पड़ता।
कोई परिचित देख लेता तो उसे घर के दरवाज़े छोड़ जाता। ग़नीमत यही थी कि दिन में वह
अपने होशो-हवास में रहता और कालेज की नौकरी में बना हुआ था।
एक रात भरपूर शराब पीने के बाद उसने एक परिचित रिक्शावाले से किसी अड्डे पर ले
चलने को कहा। रिक्शा उस क़स्बे की सुदूर स्थित एक झोंपड़ी के सामने जाकर रुका। रिक्शावाले
ने बाहर खड़ी अधेड़ स्त्री से बात की। फिर उससे कहा, ‘जाओ साब, अंदर चले जाओ।’
झोंपड़ी के भीतर दीया टिमटिमा रहा था। उस मरणासन्न उजाले में उसने अपनी हवस
पूरी की। कपड़े सम्भालते हुए उसने किसी व्यापारी की तरह पूछा, ‘कितना हुआ ?’
निगाहें नीची किये लड़की किसी मेमने की मानिन्द मिनमिनायी—‘‘आपसे क्या लेना
सर…’

लघुकथा-2
‘तुम क्या जानो’ :
चुनाव का मौसम था। निधि और अमोघ अपने पापा से ‘मतदान कैसे होता है’ पूछ रहे थे। पापा
ने समझाने की कोशिश की। फिर भी बच्चों को पूरी प्रक्रिया स्पष्ट नहीं हो पा रही थी। तब उनके
पापा ने चुनाव का खेल खेलने की योजना बनायी।
दो प्रत्याशी थे। मम्मी और पापा। चार मतदाता थे। निधि, अमोघ, मम्मी और पापा।
शर्त थी कि अपना-अपना मत हरेक को सदा के लिए गुप्त रखना होगा।
पापा ने चार मतपत्र बनाये। उन पर मम्मी और पापा के नाम लिखे। बच्चों को तरीक़ा
बताया। अमोघ का गुल्लक मतपेटी बना। बैठक बन गयी—मतदान-केन्द्र।
मतदान हुआ। चारों लोग मतों की गणना करने बैठे। मत-पत्र खोले गये। मज़े की बात कि
कोई नहीं जीता। दोनों को दो-दो मत मिले।
सभी ने चुनाव को लेकर ख़ूब हंसी-मज़ाक करते हुए खाना खाया। बच्चों के सो जाने के
पश्चात एकांत मिलते ही पति ने पत्नी से कहा, ‘‘हार-जीत महत्वपूर्ण नहीं है। मुझे ख़ुशी है कि
बच्चे हमको बराबर-बराबर चाहते हैं।’’
पत्नी ने पति के प्रसन्न चेहरे को पल भर निरखा। फिर अपने होंठ भींचते हुए मन-ही-मन
सोचा—‘‘अच्छा हुआ, मतदान गुप्त रखा गया। नहीं तो इन्हें पता चल जाता कि मैंने अपना मत
इन्हीं को दिया था।’’

लघुकथा-3
‘उजाले की मौत’ :
वह प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय में पढ़ाता है। अपनी युवावस्था में कविताएँ
लिखा करता था। साहित्य के क्षेत्र में अपेक्षित सफलता मिलने से पहले ही वह उसके प्रति
उदासीन-सा हो गया। लिखना-पढ़ना छूट गया और लग गयी शराब की लत।
धीरे-धीरे उसकी यह हालत हो गयी कि नशे में धुत वह रात में कहीं भी गिर पड़ता।
कोई परिचित देख लेता तो उसे घर के दरवाज़े छोड़ जाता। ग़नीमत यही थी कि दिन में वह
अपने होशो-हवास में रहता और कालेज की नौकरी में बना हुआ था।
एक रात भरपूर शराब पीने के बाद उसने एक परिचित रिक्शावाले से किसी अड्डे पर ले
चलने को कहा। रिक्शा उस क़स्बे की सुदूर स्थित एक झोंपड़ी के सामने जाकर रुका। रिक्शावाले
ने बाहर खड़ी अधेड़ स्त्री से बात की। फिर उससे कहा, ‘जाओ साब, अंदर चले जाओ।’
झोंपड़ी के भीतर दीया टिमटिमा रहा था। उस मरणासन्न उजाले में उसने अपनी हवस
पूरी की। कपड़े सम्भालते हुए उसने किसी व्यापारी की तरह पूछा, ‘कितना हुआ ?’
निगाहें नीची किये लड़की किसी मेमने की मानिन्द मिनमिनायी—‘‘आपसे क्या लेना
सर…’

लघुकथा-4
‘जादूगर’ :
जादूगर तरह-तरह के करिश्मे दिखा रहा था। लोग तालियाँ बजा-बजाकर उसे बार-बार दाद दे
रहे थे। यह रात का सेकिंड शो था। बढ़ती हुई उमस के कारण पंखों के चलते हुए भी खुली हवा
की ख़ातिर थिएटर के सारे दरवाज़े खोल दिये गये थे।
रंग-बिरंगी पोशाकें पहने ख़ूबसूरत नवयौवनाएं जादूगर के आसपास थिरक रही थीं।
उनकी मदद से जादूगर एक-से-एक नायाब खेल दिखा रहा था। लोग सम्मोहित-से अपनी सीटों
में जकड़े बैठे हुए थे। तभी एक कुष्ठरोगी भिखारन अपने बच्चे को छाती से चिपकाये पता नहीं
कैसे चौकीदार की निगाह बचाकर अहाते में घुस आयी। वह दरवाज़े की ओट में जादूगर को
अपलक निहारती खड़ी रह गयी।
जादूगर शून्य से बहुत-कुछ पैदा करने में मसरूफ़ था। उसके हाथ उठाते ही कभी अंडा,
कभी कबूतर, कभी सौ रुपए का नोट लगातार आते चले जा रहे थे। दो दिनों से भूखी भिखारन
जादूगर की शक्ति से इतनी प्रभावित हुई कि अपनी औक़ात भूल संवेदना में बहती हुई बच्चे को
सम्भाले जादूगर की दिशा में दौड़ पड़ी। जादूगर अवाक्! लोग भी चकराये। जादू देखने में खोया
गेट-कीपर जब तक उसे पकड़े-पकड़े, तब तक वह मंच पर पहुंच चुकी थी।
वह जादूगर के पैरों के पास बच्चे को लिये-लिये जैसे ढह गयी और रोती हुई उसकी
अनुनय करने लगी, ‘‘महाराज, दो दिन से कुच नई खाया… मेरेकू एक रोटी… बस एक रोटी
बुला दो… इत्ती मेहरबानी…’’
उसे हटाने का प्रयत्न करते गेट-कीपर को जादूगर ने इशारे से रोक दिया। फिर झुककर
भिखारन को उठाते हुए बोला, ‘‘काश! मैं रोटी पैदा करने का जादू जानता… पर तुम्हें रोटी
मिलेगी, ज़रूर मिलेगी!’’
लोगों ने देखा—जादूगर की आंखों में आंसू थे।
उस रात फिर जादूगर आगे खेल नहीं दिखा सका।

लघुकथा-5
‘मारना कितना आसान’ :
मैं क़बूल करता हूँ कि मैं ही था वह… हाँ, वही जिसने बाबरी मसजिद कांड के बाद भड़के दंगों
में अपने सैकड़ों विजातियों को मौत के घाट उतारा था। छोटे-छोटे बच्चे! हो-हो-हो…चलते-
चलते अपनी तलवार से उनके सर को धड़ से जुदा कर एक सुकून से तरबतर हो जाता था मैं।
जी हाँ, वही बंदा, जिसने मंटो की कहानियों के पात्रों को पुनर्जीवित कर दिया था। ‘खोल दो’
की बदहाल सकीना या ‘ठण्डा गोश्त’ की ख़ौफ़ज़दा मृत युवती को मन-माफ़िक़ रौंदते हुए मैं
अपनी पीठ ख़ुद ही थपथपाता रहा था। इनके सामने सामानों, जानवरों, इमारतों की शख़्सियत
ही क्या है। आगज़नी, लूटपाट तो मामूली चीज़ें ठहरीं। यान ओत्चेनाशेक के ‘रोमियो जूलियट
और अंधेरा’ की तरह मुझे मिली युवा लड़की के साथ भी मैं पूरी रंगरेलियां मनाता नहीं थका
था। यूँ समझो कि इस फ़साद को सौ टका मैंने अपनी दबी वासना और आपराधिक मनोवृत्ति के
उपभोग के हिसाब से भुनाया और क़ामयाब रहा। आख़िर में, शरीफ़ का शरीफ़ !
फिर… अब क्या हुआ? अब क्यों मैं ज़हर का प्याला अपने मुक़ाबिल रखे ख़ुदकुशी करने
पर आमादा हूँ… मैं तो इतना साहसी था, जोश से सराबोर—कुछ भी करने को तैयार। किसीने
कभी मुझ पर कोई शुबहा भी नहीं किया। न समाज में मेरी इज़्ज़त में कभी कोई कमतरी हुई। न
ब्लड प्रेशर का मरीज़ और न कायर। अच्छी-ख़ासी कमाई, छोटा… सुखी परिवार। मुस्तक़बिल
की पर्वाह और आज की फ़िक्ऱ मेरे लिए बेमानी रहे। तब… मैं क्यों अपनी जान का दुश्मन बना
जा रहा हूँ… जानना चाहते हैं… ठीक है… बताता हूँ; लेकिन अपने कमज़ोर दिल को थामे
रखिएगा…
ज़रा-सा वाक़या है। मेरी दूध-डेयरी है। मैं दुकान में बैठा ग्राहकों को निपटा रहा था।
डेयरी बंद करने का वक़्त क़रीब था। मैंने काउंटर से नोट निकाले। तरतीबवार लगाकर उन्हें
गिन रहा था। इतने में मेरा एक साल का बेटा नंग-धड़ंग ठुमकते हुए आया—‘‘पप्पा, मम्मी खाने
के लिए बुला लही हैं…’’ मैंने पप्पी लेते हुए उसे नज़दीक की कुर्सी पर बैठाते हुए कहा,‘‘आप
थोड़ा आराम से बैठिए, मैं अभी चलता हूँ… मैं फिर से शाम की आवक समेटने में लग गया।
कनखियों से निगाह रखे था कि छोटे मियां कुर्सी के हत्थे पकड़कर खड़े होने की कोशिश कर रहे
हैं। मैं उनकी इस भोली-भाली पर हिम्मतभरी अदा का क़ायल हो मन-ही-मन मुस्कराया।
तभी… पता नहीं कैसे हो गया मैं देख रहा था। मुन्ने के सायास खड़े होते ही कुर्सी उलार हो आगे
की ओर झुकी। एक झटके में मुन्ने को ऊपर उछालती हुई पलटी। मुन्ना उस उछाल के साथ सीधे
भट्ठी पर रखी कढ़ाई के उफनते दूध में जा गिरा। मैं दौड़ा। उबलते दूध में दोनों हाथ डाल उसे
पकड़ना चाहा। वह फिसल गया। मैंने पुनः प्रयास किया, उसका तेलीय शरीर मेरी जकड़ से छूट-
छूट जाता रहा। दूध की चिकनाहट और गर्मी से मेरी उंगलियों की पकड़ सख़्त नहीं हो पा रही
थी। मैंने फिर प्रयत्न किया। दिल-दिमाग़ को मज़बूत कर उसे ज़ोरों से पक्का थाम लिया और ऊपर
उठाकर तुरंत अपने सीने से लगाया…
इसके पश्चात क्या-क्या हुआ होगा, आप सोच सकते हैं। सब दौड़े हुए आये मेरा चीत्कार
सुनकर। डाक्टर को फ़ौरन बुलाया। पत्नी, बड़ा बेटा और बेटी की आँसुओं की धारा रुके न रुकती
थी। मैं कभी उन्हें सांत्वना देता, कभी ख़ुद को सम्भालता। डाक्टर ने चेकअप किया। उनकी
उदास आंखों ने सारा कुछ बयान कर दिया।। सब ख़त्म हो चुका था, मेरी आंखों के सामने…
काश कि मैंने उसे कुर्सी पर न बैठाया होता।… उसके साथ भीतर चला गया होता।… या उसे
अपनी गोद में लेकर हिसाब करता।… या उसे तुरत-फुरत दूध से बाहर निकाल पाता।… मैं
नहीं बचा सका उसे।…
मैंने इतने लोगों को मारा, कुचला, बर्बाद किया और एक जान… एक जान बचा नहीं
सका। मुझे ज़िन्दा रहने का कोई हक़ नहीं है…

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