श्रुतिकीर्ति अग्रवाल, शावर भकत भवानी, रूपाली तिवारी


पाँच लघुकथा
श्रुतिकीर्ति अग्रवाल, पटना
shrutipatna6@gmail.com

लघुकथा-१
मुट्ठी भर धूप

विदिशा के घर लौटने की आहट मिलते ही काम वाली बाई रुकिया जल्दी से सुमित्रा के घर से निकल कर उसके फ़्लैट में चली आई। बड़े अच्छे मूड में थी वह! चेहरे पर गहरी मुस्कान, होंठों पर गुनगुनाहट और चाल में हल्की सी थिरकन। थकी माँदी विदिशा को उसकी खुशी देख कर पता नहीं क्यों, थोड़ी जलन सी महसूस हुई।
“आज इतनी देर? मेरे फ्लैट की चाभी तुम्हारे पास है ही, तो मेरे आने के पहले कम से कम सफाई का काम तो पूरा कर ही सकतीं हो?”
“वो सुमित्रा मैडम हैं न ….. पूछिये मत! हर समय नाचती ही रहती हैं। आज तो मेरा ही हाथ पकड़ कर नाचने लगीं। फिर हमको भी बड़ा मज़ा आने लगा… ”
शर्माती सी रुकिया अपने ही मुँह से निकली बात से अचकचा सी गई और सफाई देने लगी…
“आपको तो पता ही है कि उनको डांस करने का बहुत शौक है, हर मौके पर नाचती रहती हैं… गजब का लोच है उनके बदन में!”
विदिशा ने मुँह बिचका दिया। वो इन अनपढ़ औरतों की तरह खाली थोड़े न है! उसको फुर्सत ही कहाँ है कि आस-पड़ोस वालों के बारे में पता करती फिरे! पर कुछ था, जो मन को कचोट रहा था। सिर को पीछे झटकते हुए बोली…
“सब समय-समयकी बात है। कभी हमारा ठहाका भी कालेज भर में प्रसिद्ध था। अब देखो, एक मुस्कुराहट के लिए भी मन तरस जाता है।”
बगल वाले फ्लैट से अभी भी म्यूजिक की तेज आवाज आ रही थी। कितना नाचेगी ये? शादी, पार्टी तो चलो ठीक है, सभी डांस करते हैं आजकल पर ये तो कभी स्कूल के बच्चों को सिखा रही होती है तो कभी काॅलोनी के फंक्शन में नाचती दीखती है! क्या है ये? क्या किसी-किसी को ईश्वर इतना सुख, इतनी फुर्सत दे देते हैं कि वह उन्मत्त होकर नाचता ही फिरे? इधर विदिशा के पास मुस्कान की एक छोटी सी वजह भी नहीं? साढ़े चार बजे सुबह बिस्तर छोड़ देती है। दोनों बच्चों को तैयार कर उनका, पति देव का और अपना टिफ़िन तैयार कर आॅफिस के लिये आठ तीस की बस पकड़ती है। घर के काम, बच्चों की पढ़ाई… इतनी कड़ी मेहनत के बावजूद वह क्या करे यदि उन दोनों की तनख्वाह का बहुत बड़ा हिस्सा इतनी सारी ई.एम.आई. भरने में कट जाए और घर-गृहस्थी के बेहद जरूरी खर्चों में कटौती करने की मजबूरी हरदम बनी रहे? बिजली बिल, स्कूल की फीस, पेट्रोल के दाम, मँहगे होते सब्जियां और अनाज…तिस पर से कपड़े, जूतों और गहनों से सजे आकर्षक बाजार…सबसे पहले इन्सान की मुस्कान छीनते हैं, फिर दिल का सुकून और फिर उसे रोबोट बना कर छोड़ देते हैं।
“ईश्वर किस्मत देता है तभी तो इन्सान नाचे-गाएगा। न बाल न बच्चा, सुना है नौकरी तक नहीं करती। आराम वाली जिंदगी है भाई!”
दिल की जलन आखिर होंठों पर आ ही गई। पर उसकी ये बात रुकिया को पसंद नहीं आई।
“बाँझ थोड़े न है वो! बच्चा है, पर भगवान ने उसके सिर पर हाथ रखने में कंजूसी कर दी है। बीमार पैदा हुआ था, सुनने समझने में दिक्कत होती है। दिमाग थोड़ा कम विकसित है शायद!”
चौंक गई थी विदिशा! इकलौती संतान, और वह भी ऐसी? उसके बच्चों का एक नंबर भी कम हो जाता है तो वह तनाव में आ जाती है कि क्या होगा इनका भविष्य? इतने प्रतियोगिता भरे संसार में अपनी जगह कैसे बनाएँगें ये? पर सुमित्रा क्या सोंचती होगी भला? उसके समक्ष तो भविष्य के नाम पर एक स्याह पर्दा ही पड़ा हुआ है! ऐसी जिंदगी से तो मृत्यु ही भली है शायद।
“बहुत नहीं सोंचती सुमित्रा भाभी। खूब खुश रहती हैं और उनका बेटा भी हमेशा हँसता खिलखिलाता रहता है। बड़ा टीवी गाड़ी नहीं है, सादा खाना बनाती खाती हैं और नाचती गाती हैं। कहतीं हैं, जिसने जनम दिया है, फिक्र भी वही करेगा! कल की चिन्ता में आज को क्यों बिगाडूँ?”
सारे समीकरण अचानक उल्टे-पुल्टे से क्यों हुए जा रहे हैं? परेशान सी विदिशा फटी-फटी आँखों से रुकिया का चेहरा देख रही थी।

***

लघुकथा-२
एक कठिन निर्णय

“मेरा फोन क्यों नहीं उठा रही थी इतने दिनों से, न टेक्स्ट ही देखा.. मैं कॉल कर-कर के पागल हुआ जा रहा हूँ कि तू ठीक तो है न जानूँ! अब क्या मार ही डालने का इरादा कर लिया है?”
उस ओर से आती आवाज में जितनी उत्तेजना थी, उतनी ही ठंढ़ी आवाज में माला ने धीरे से जवाब दिया, “असीम, मुझे अफसोस है कि मैं तुम्हारे साथ शादी नहीं करना चाहती। तुमसे फाइनल ब्रेकअप करने के लिये मैंने ये फोन किया है।”
“पागल हो गई है क्या? ऐसी बातें तो कभी मजाक में भी नहीं बोलनी चाहिए!” असीम चौंक उठा था। फिर जरा सामान्य होकर बोला, “एक बार, मिलने तो आ सकती है न.. बहुत याद आ रही है तेरी।”
“मैं अब तुमसे मिलना नहीं चाहती।” माला ने कहा।
इतना भावविहीन स्वर? कुछ गड़बड़ तो जरूर है.. असीम ने गंभीरता को महसूस किया तो मन में ठगे जाने के अहसास के साथ जरा कड़वाहट सी घुल आई थी। “ऐसा क्या हो गया है? कोई और आ गया लाइफ में, या घर वालों से डर गई?”
“असीम, मैं पिछले तीन दिनों से अपने सीधे-साधे पिता और अमीर पड़ोसी के बीच तुलना कर रही हूँ.. सोच रही हूँ कि मुझे इन दोनों में से किसके जैसा आदमी चुनना चाहिए.. और अंत में, मुझे अपने पिता का पलड़ा ही भारी लग रहा है। मैं उनके जैसा उँचे विचारों वाला जीवनसाथी चाहती हूँ, भले मेरे पास उतने पैसे न हों।” माला ने धीमी, पर स्पष्ट आवाज में कहा।
“मतलब?” असीम की समझ में कुछ नहीं आया। “बहकी-बहकी बातें क्यों कर रही है? तेरा मतलब है कि मेरे पास पैसे हैं, इसलिए मेरे साथ ब्रेकअप कर रही है?” फिर खुद ही बोला, “उस दिन तो शौक से मेरी बड़ी सी गाड़ी में घूम रही थी, मँहगे होटल में आराम से बैठकर डिनर भी कर रही थी.. तब कहाँ था ये आदर्शवाद?”
“मेरे वह पड़ोसी मिस्टर सहगल, वन विभाग के बड़े ऑफिसर हैं पर सभी जानते हैं कि वह बहुत बड़े रिश्वतखोर हैं और उनकी ये सारी शानो-शौकत जंगलों को अवैध रूप से काटकर, पेड़ों की लकड़ियाँ बेचकर आती है।” माला अपनी ही रौ में बोलती जा रही थी।
अमन कुछ समय के लिये जरा चुप सा हो गया। फिर धीरे से बोला, “तुम कहना क्या चाहती हो माला?”
“बस यही कि उस दिन मेरे साथ डिनर लेने के बाद, मैंने तुम्हें छुपकर, उसी होटल में मिस्टर सहगल से मिलते और उनको ब्रीफकेस पकड़ाते हुए देख लिया था असीम! मुझे अब तुम्हारे आसमान छूते फर्नीचर के व्यापार के बारे में सब कुछ समझ में आ गया है। मैं इसका हिस्सा नहीं बनना चाहती, इसलिए हमारा अलग हो जाना ही ठीक रहेगा!” कहकर माला ने फोन काट दिया था।

***

लघुकथा-३
ममता

बहस कम होने के बजाय और गरमाती ही जा रही थी। दोनों के पास एक-दूसरे को काटने के लिये अकाट्य तर्क भी थे और न जाने कब-कब से इकट्ठी की हुई शिकायतें भी! अपनी बुटीक के आगे महत्वाकांक्षी राधा का बाकी सबकुछ भूल जाना जो अमर को पसंद नहीं आता तो राधा को इसमें ईर्ष्या और हीनभावना की बू आती। उसने तो कितनी ही बार वो दो टकिया नौकरी छोड़कर अमर को अपने आसमान छूते व्यापार में आ जाने का निमंत्रण दिया था! पर वह माने तब न? सोचती तो आँखें ही भर आतीं। जिसके डिजाइन किये हुए कपड़ों पर सिर्फ उसका शहर ही नहीं, पूरा देश ही फिदा था, जिसके कपड़ों की छोटी-मोटी प्रदर्शनी भी करोड़ों का व्यापार करने के लिये विख्यात थीं, उसका पति उसके पर काटकर उससे घर-गृहस्थी करवाना चाहता था।
समस्या इसलिए ज्यादा बड़ी हो गई, क्योंकि वह गर्भवती हो गई थी। यह सरासर अमर की गलती थी। जरा सी असावधानी से इतनी बड़ी मुसीबत में पड़ गई है वह! कभी सोचा अमर ने कि सिर्फ उसकी खुशी के लिये राधा ने एबॉर्शन नहीं कराया है और अपने शरीर में होती हर हलचल और परेशानी को झेल रही है? मुंबई के इतने बड़े होटल में लगी प्रदर्शनी में, जहाँ न जाने कितने ही फिल्म स्टार और करोड़पति लोग आएँगें, वह आठ महीनों का फूला हुआ पेट लेकर कपड़े दिखाती हुई कैसी दिखेगी? उसकी मजबूरी को अगर उसका पति ही नहीं समझता तो क्या करे वह?
दर्द को भी वहीं पर उठना था। समय पर जरूरी ट्रीटमेंट तो मिल गया था, पर बच्चा रोया क्यों नहीं? राधा की भागती-दौड़ती जिंदगी ने अचानक करवट लेकर अस्पताल और डॉक्टर्स के गिर्द घूमना शुरू कर दिया। समय सिर्फ बच्चे के शरीर को बढ़ा रहा था, दिमाग को नहीं। कभी रोता, तो रोता ही रहता और कभी बम भी फूट जाए, उधर देखता तक नहीं!
जब तक आशाएं जवान थीं कि एक दिन जरूर सब ठीक हो जाएगा, हर किरण के पीछे भागती रही वह.. पर निराशा थी कि दिन पर दिन गहराती ही जा रही थी। अमर अब कम्प्यूटर खोलते तो ऐसे बच्चों के इलाज के स्थान पर उन संस्थानों को सर्च करने लगे थे जो इनको अपने पास रख लेती हैं। वहाँ ट्रेनिंग लिये हुए लोगों के हाथों इसका रख-रखाव कैसा होगा, खर्च कितना आएगा.. इसपर दिमाग चलने लगा था। उसे सबकुछ धुँआ-धुँआ होता महसूस होता। वैसे गलत क्या है इसमें? वह चाहती ही कब थी इसको? वैसे भी क्यों पाले वह उस बच्चे को जिसका बड़े होकर कुछ होना ही नहीं है? इसके जाते ही जिंदगी फिर लौट आएगी.. वो व्यस्तता, वो बेफिक्री और वह आत्मविश्वास, सबकुछ! अमर दुःखी स्वर में कह रहे थे, “फॉर्म भर दिया है। परसो निकलना है.. इसका सारा सामान पैक कर दो, एक-एक चीज घर से हटा दो, कि कभी इसकी याद तक न आए!”
हाथ-पैर जवाब दिये जा रहे थे.. आँसू रोकना मुश्किल हो चला था.. ये चला जाएगा? राधा सोते हुए आरव के पास बैठ कर उसका सिर सहलाने लगी। हम क्या बच्चे सिर्फ इसलिए पैदा करते हैं कि वे बड़े होकर हमको सहारा देंगें? जो सहारा नहीं दिया तो क्यों पालें हम उनको? सबकुछ बिल्कुल मेकैनिकल? पर इस रिश्ते में जो उबाल मारती भावनाएँ भरी होती हैं उनका क्या? उस संस्था के द्वारा सिर्फ ट्रेनिंग के सहारे की हुई देखभाल कहीं मशीनी तो नहीं हो जाएगी? उसमें ममता कहाँ से आएगी? आखिर तो उसके अपने हाड़मांस से बना हुआ है ये! मारने के लिए भेज रही है क्या? जो अपनी जरूरत तक नहीं बता पाता, यह निरीह कैसे रहेगा वहाँ? पर इसे अपने से अलग न करने की सूरत में, उसके इतने बड़े व्यापार का क्या होगा?
आरव नींद में मुस्कुरा रहा था। इसी प्यारी सी मुस्कान को ही अगर जिंदगी का ध्येय बना लिया जाय तो.. राधा मुग्ध होकर उसे देख रही थी। वह खुद भी तो ट्रेनिंग ले सकती है? बहुत दौड़-भाग कर चुकी, अब थोड़ा स्थिर होकर भी तो व्यापार किया जा सकता है?

***

लघुकथा-४
स्याह रातों की सुबह

काॅफी हाउस के एक टेबल पर वे दोनों आमने-सामने बैठे हुए थे। ध्यान से देखा तो मासूम बच्चे जैसे चेहरे पर ढेर सारी गम्भीरता लिये वह लड़की अमित को पसंद आ गई थी।
“आप क्या बहुत कम बोलतीं हैं?”
बात शुरू करने के लिए उसने पूछा तो एकाएक उधर से एक सुझाव आया…
“आप न, इस शादी से इनकार कर दीजिए!”
चौंक उठा था वह,”क्यों भला?”
“मैं शादी करना ही नहीं चाहती!” लड़की की आवाज़ काँप रही थी।
“आप इतनी नर्वस क्यों हैं? छोड़िये शादी-वादी की बातें! काॅफी अच्छी है न यहाँ की?” अमित ने उसे सामान्य करने के लिए विषयांतर करने का प्रयास किया, “किस क्लास में पढ़ती हैं आप?”
“ट्वेल्व्थ के बाद मेरी पढ़ाई छूट गई है।”
फिर चौंका था वह। बायोडाटा के अनुसार तो इसे बी काॅम सेकेन्ड ईयर में होना चाहिए।
“फिर क्या करती हैं आप सारा दिन?”
“घर में रहती हूँ। घर के काम सीख रही हूँ।”
अमित को लगा, उसका धैर्य जवाब दे रहा है।
“क्या बात कर रही हैं? आप बड़े शहर में रहने वाले, माडर्न परिवार के लोग हैं। आपके पापा इतने बड़े औफिसर हैं!”
वह चुप ही रही तो मन को मथता हुआ एक प्रश्न अमित के होंठों पर आ ही गया, “तो क्या आप किसी और से प्यार करती हैं?”
“हाँ, करती हूँ! बहुत ज्यादा करती हूँ।”
जैसे सब्र का बाँध टूट गया हो, लड़की की उदास आँखें अब आँसुओं से सराबोर थीं।
“किससे?”
लगा, जैसे मूर्ख बनाने के लिए इन लोगों ने उसे इतनी दूर बुला लिया है।
“अपनी दीदी, सुधा से!’
कोई ज्वालामुखी फूट पड़ने को तैयार था उधर!
अमित चुपचाप उमड़ते आँसुओं की उस बरसात को देखता रहा। फिर साँसें नियंत्रित होने पर वही बोली, “मम्मी ने आपको कुछ भी बताने को मना किया है पर बताना जरुरी है। आप से पहले दो लड़के मुझे रिजेक्ट भी कर चुके हैं। आप भी कर दीजिए, पर मैं झूठ बोलकर शादी नहीं करना चाहती।”
इस बार अमित ने प्यार से उसके दोनों हाथ पकड़ लिए।
“मत करना शादी! दोस्ती तो कर सकती हो न! बताओ, तुम इतनी परेशान क्यों हो?”
“आपको बहुत सारी बातों का पता नहीं है। सुधा मेरी सगी बहन है। वो पिछले साल एक लड़के के साथ भाग गई थीं। उसके बाद से हमारे घर में कोई उनका नाम तक नहीं लेता। माँ बीमार रहने लगी है, पापा और दादी मेरी शादी करके मुझे घर से निकाल देना चाहते हैं क्योंकि लोग कहते हैं, मैं भी उन जैसी ही निकलूँगी।”
उसके दर्द की लपटों से अमित का मन पिघल गया।
“लोगों को छोड़ो, तुम क्या चाहती हो मेधा?”
वह कुछ अचकचा सी गई। फिर कुछ सोंचकर बोली, “पैसे कमाने हैं मुझे, बहुत सारे पैसे!”
अपनी हर बात से वह अमित को चौंकने पर मजबूर कर रही थी।
“किसी को नहीं पता, पर मैं रोज़ बात करती हूँ दीदी से! वो अच्छा लड़का नहीं था। उसके दोस्त भी परेशान करते थे तो वह छिपकर भाग निकली पर अब उनकी हालत बहुत खराब है। न रहने की जगह है, न कोई नौकरी ही। मैं घर में किसी को ये बात नहीं बता सकती। पापा को मिल जाए तो वह उनका मर्डर ही कर देंगे। पर विश्वास कीजिये, वह बुरी लड़की नहीं है। बस, उनसे गलती हो गई है। अब मैं क्या करूँ? उन्हें जिंदा रहने के लिए सहारा चाहिए।”
मदद माँगती हुई, आँसुओं से तर बतर वे ईमानदार आँखें… इतनी खूबसूरत थीं कि उन्हें चूम ही लेने को दिल चाह रहा था। मेधा के हाथों पर उसकी पकड़ थोड़ी और मजबूत हो गई थी!
“सब ठीक हो जाएगा, मैं आ गया हूँ न!”

***

लघुकथा-५
अकल्पित

आने को तो वह गाँव आ गये थे, पर मन बिल्कुल झल्लाया हुआ था। अक्सर वो इस बात का लेखा-जोखा करते रहे हैं कि माँ-बाप का विरोध करके, जवानी में, ये पढ़ी-लिखी पत्नी लाने का निर्णय कर के उन्होंने सही किया था या गलत… कि अगर अनपढ़ रही होती तो उनकी हर बात को आज्ञा की तरह मानती, थोड़ा साड़ी-गहना पा के खुश हो जाती न कि इस तरह, अजनबी सी ठंडी आवाज में फोन करके गाँव आने का दबाव बनाती और उनको अपना इतना व्यस्त, यहाँ तक कि दिल्ली जाकर पीएम तक से मिलने का पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम छोड़कर यहाँ आना पड़ता।

घर पँहुचे तो थोड़ा आश्चर्य सा हुआ कि न तो हमेशा की तरह पत्नी अनीता ठसके के साथ सजी-धजी, बाहर आकर स्वागत करती हुई मिलीं, न वहाँ उनके आते ही व्यस्त होकर भाग-दौड़ करने के लिये घर के नौकर-चाकर ही दिखाई दे रहे थे। फिर कमरे में पँहुचे तो लगा जैसे फिज़ा में मरघट सी खामोशी और मुर्दनी छाई हुई हो। अनीता की उड़ी-उड़ी सी रंगत, सूजी आँखें और बिखरे बालों के देख कर वो जरा चिंतातुर से हो उठे।
“क्या बात है, तबियत खराब है? तो हमें काहे बुलाया? आप ही राजधानी आ जातीं, किसी अच्छे डाक्टर से मिला देते!”
एक जोड़ा सूनी-सूनी निगाहें उनके चेहरे पर आकर टिक गई थीं… “टीवी देखे हैं दो दिन से?”
फिर झल्ला गये वो, यही पूछने को विधानसभा के चलते सत्र को छुड़वा के इतनी दूर बुला लिया है? इतना नुक्सान सह कर आना पड़ा है उनको!
“दो दिन से टीवी पर गाँव की जिस चौदह साल की बच्ची के बलात्कार की न्यूज चल रही है, जानते हैं कौन है वो? अपने रमेसर की छोटी बिटिया है।”
अरे, अब याद आया। सचमुच इधर इतने व्यस्त रहे वो कि इसपर ध्यान ही नहीं गया उनका। तब तो ये अच्छा ही हुआ कि इस समय में वो यहाँ आ गये हैं जब पूरा गाँव मीडिया वालों से ठसाठस भरा होगा… इसका तो जबरदस्त फायदा उठाया जा सकता है। इतने-इतने जरूरी कार्यक्रम छोड़ कर गाँव की एक बच्ची के उद्धार के लिये वो यहाँ दौड़े आए हैं… इस एक दौरे से सिर्फ़ उनका ही क्या , उनकी पूरी पार्टी का बहुत सारा कलंक धोया जा सकता है! इसे कहते हैं ‘ब्लेसिंग इन डिसगाइस! ‘…. मन एक्दम से हल्का हो गया और हल्की सी स्मित भी होंठों पर आ सजी। मगर अनिता मानों अपनी ही धुन में हों..
“आपको अंदाज़ है कि ऊ चार लड़के कौन थे?”
उनके जवाब का इन्तजार किये बिना खुद ही बोलने लगीं, “वे लोग आपका मनोहर और उसके दोस्त-यार थे!”
सत्य इतना कटु था कि बोलते हुए अनिता की आँखें बेसाख्ता बरसने लगी थीं।”
“पागल हो गई हो? बच्चा है वो तो! ई सब करने की कोई उमर हुई है अभी?”
वो बहुत जोर से चौंके थे पर अनिता किसी भी तर्क से दुविधाग्रस्त होने को तैयार नहीं थीं।
“काश कि वो बच्चा ही होता! जब से गाँव वापस आया है, अपने आप को सबका मालिक समझ रहा है। खाली नई-नई गाड़ी, आवारागर्दी और दोस्ती-यारी चल रही है। दारू और पिस्तौल बंदूक भी हो पास में, तो हमको क्या पता? उसका मोबाइल खोल के देखे हैं हम एक दिन, खाली नंगई से भरा हुआ है। हमको याद पड़ता है कि रमेसर की बिटिया की फोटो भी थी उसमें! आपकी शह पर कूदता रहता है, हमारी कोई सुनवाई नहीं है, फालतू रिरियाते रहते हैं! और घटना वाले दिन से तो बिल्कुल गायब है, घर में लौटा ही नहीं है।”
इसबार अनिता की बात को काट नहीं सके वह।

ये क्या हो गया! वो भी इतने गलत समय पर? अपोजीशन ने सूँघ भी लिया तो मुसीबत हो जायगी! दिन भर घर में बैठी-बैठी करती क्या रहती हैं ई औरत लोग कि एक बच्चा तक नहीं सँभालता इनसे! पर मुँह से कुछ कह दो तो महाभारत खड़ा कर देंगीं।
“आपलोग को तो हर समय बस हरा-हरा सूझता है न, हमको कैसी कैसी मुसीबत से जूझना पड़ता है, जानता है कोई? लोग जैसे घात लगा के बैठे हुए हैं। एक मौका मिला नहीं कि दो मिनट नहीं लगेगा, सब सुख-आराम खतम होने में! अब देखती रहियेगा, क्या नहीं करना पड़ेगा खबर को बाहर जाने से रोकने के लिये! किसको-किसको मालूम है ये सब? कहीं कोई पुलिस-दरोगा घर पर तो नहीं आया था? किसकी ड्यूटी है आजकल यहाँ?”
“क्या करने वाले हैं आप?”
” देखिये रमेसर कितना बड़ा मुँह खोलता है! लड़की को गाँव से हटाना पड़ेगा!”
“क्यों करियेगा ये सब? कि मनोहर निश्चिंत होकर एक और लड़की को निशाना बनाने निकल पड़े?”
यही है… यही सब वजह है कि उनका मन झल्ला उठता है! ऐसी भी क्या पढ़ाई-लिखाई कि वक्त की नाजुकता तक समझ में न आए?
“तो आप ही बताइये क्या करें? जेल में डलवा दें उसको कि फाँसी पर चढा दें? और हम? रिजाइन करके घर पर बैठ जाएँ?”
अनिता की जलती हुई आँखों के कटोरे खौलते हुए आँसुओं से भर गए थे कि याद आने लगा था उन सात वर्षों का संघर्ष… डाक्टर पीर-ओझा, मंदिर-मस्जिद की दौड़… आसानी से नहीं मिला था ये लड़का… ईश्वर से छीनकर लाई थीं इसे! तो क्या पाल-पोस कर एक दिन फाँसी पर चढा देने के लिये माँगा था इसको?
पर अब मन पर पत्थर रखना जरूरी हो गया था।
” ठीक है, पर वो लड़की? उसका क्या करें? ब्याह करा दें मनोहर से?”
“दिमाग खराब हो गया है? एक तो नीच जात की लड़की, तिसपर से पता नहीं कौन-कौन भोग चुका है उसदिन! घर में लाने लायक है? मनोहर के लायक बची है? कहा न रमेसर को भरपूर पैसा दे देंगें।”
पहले तो चुप रह गई थीं अनीता, पर कुछ था जो खौल रहा था मन में , सो बोलना ही पड़ा…
“हमको पता है, हम आप लोगों को किसी चीज से रोक नहीं पाएँगे। बहुत कमजोर हैं… न कोर्ट-कचहरी की हिम्मत है, न अपने पेट के जाए को जलील होते देखने की! जो मन हो करिये, हम रास्ते में नहीं आएँगे अब! पर खुद तो प्रायश्चित कर सकते हैं न इसका! मनोहर को भगवान के कहर से बचाने के लिये करना ही पड़ेगा… रमेसर से बात कर लिये हैं, ई बिटिया को हम गोद ले रहे हैं। एक छोटा सा मकान भी देखा है। अब बहू कहिये या बेटी, आज से हमारा सब कुछ वही होगी। पढाएँगे-लिखाएँगें, जीने की हिम्मत देगें और रोज उसके साथ हुई ज्यादती की माफी माँगेंगे उससे। बाबूजी वाले पैसे का जो ब्याज आता है, उसी से काम चल जायगा हमारा! नहीं चाहिये हमको वो राजपाट जो हमारे बेटा को फाँसी के तख्ते पर ले जाय!”

दुःख और विरक्ति भरी ठंडी आवाज थी पर चेहरा निर्णय की दीप्ति से चमक रहा था। और मंत्री जी अवाक् से पत्नी का मुँह देखे जा रहे थे।


पाँच लघुकथा

शावर भकत ‘भवानी’
बृंदावन

लघुकथा-१
मन की टीस

गंगा और धरती के वार्तालाप में गंगा ने मायूसी भरे स्वर में कहा, ” मेरा अवतरण तो प्यास बुझाने और मोक्ष का द्वार बनने के लिए हुआ था। लेकिन अब मात्र भूख मिटाने तक सीमित रह गई हूँ।”
धरती ने लंबी साँस लेते हुए कहा, “ह्म्म्म ! सुना है तुम तो कलयुग समापन से पूर्व ही यहाँ से चली जाओगी। लेकिन मैं न जाने कितने युगों तक ढोती रहूँगी।”
गंगा ने पूछा, ” क्या ढोती रहोगी ?”
धरती ने युगों की उदासियों को एकत्रित करते हुए कहा, “जन्मोपरांत की पीड़ा क्योंकि यही मेरी नियति है।”
“हाँ, बात तो तुम्हारी सही है हमदोनों ही जन्मोपरांत की पीड़ा ढो रहे हैं क्योंकि हमदोनों पुरुष नहीं बल्कि प्रकृति के प्रतीक हैं।” गंगा ने संयुक्त मन की टीस स्वर को अपनी लहरों के माध्यम से संप्रेषित करते हुए कहा।

***

लघुकथा-२
झीनी लकीर

“पसंद नहीं करती से क्या मतलब है तुम्हारा, जबकि तुम कहते नहीं थकती कि मुझसे बेइंतहा प्रेम करती हो।” प्रेमी ने कॉफी के कप को प्रेमिका की तरफ़ बढ़ाते हुए झुंझलाहट भरे स्वर में कहा।
यह तो आज भी कह रही हूँ कि प्रेम मैं तुमसे ही करती हूँ ,लेकिन…..
लेकिन क्या ? पसंद के बिना प्रेम कैसे हो सकता है। पसंद भी प्रेम में शामिल है ।तभी तो तुम हमेशा मेरे साथ चलती आई हो,और
और ……
“और क्या,रुक क्यों गए ?” प्रेमिका ने अधूरे वाक्य में प्रेमी की मनोस्थिति को खंगालते हुए पूछा।
“मेरे कहने का मतलब था कि जब मैं निजी ज़िंदगी या ऑफिस कहीं भी सही, मतलब तुम्हारे दृष्टिकोण से सही होता हूँ तो ……।” नज़रें चुराते हुए प्रेमी के लबों ने ख़ामोशी ओढ़ लिया।
बिल्कुल, मैं भी तो यही कहना चाहती हूँ कि
प्रेम मात्र अनुभूति है जिसे मैं सिर्फ़ तुम्हारे लिए अनुभव करती हूँ। तभी तुम्हारे साथ चल रही हूँ। लेकिन पसन्द कहीं न कहीं विचारों से युक्त है जिसे हम जीते हैं और हमारे बाद भी विचार जीवित रहते हैं। जबकि प्रेम में हम होते हैं। तभी तो साथ चलना और साथ होना के मध्य आत्ममंथन की झीनी लकीर विद्यमान रहती है और …..
“ओके चलो, अब कॉफी पिओ ठंडी हो जाएगी और क्या मंगवाऊँ।बेचारे रेस्टोरेंट वाले का नुकसान क्यों करें।” प्रेमी ने पसंद विहीन होकर प्रेममय होते हुए कहा।

***

लघुकतथा-३
बाज़ारवाद

यमदूत ने परिजनों,बंधु- बांधवों को अत्यंत विलाप करते एवं सहकर्मियों को शोकाकुल देखकर भी सद्य मृत व्यक्ति की आत्मा को अपने संग सहज जाने के लिए तत्पर देखकर आश्चर्यचकित स्वर में पूछा ,”तुम अपने मृत शरीर में प्रवेश करने का तनिक भी प्रयास नहीं कर रहे।जबकि साधारण सांसारिक मनुष्य मृत्यु के पश्चात अपने मृत शरीर को मृत स्वीकार नहीं करता और अपने शव में पुनः प्रवेश करने का प्रयास करता है। क्या तुम्हारी इच्छा नहीं कि तुम अभी पुनः जीवित हो पाते ? ”
आत्मा सद्य त्याग किए तन की जीवनपर्यंत की नीरव वेदना को क्षणभर के लिए स्मृतिपटल में स्थापित करके अट्टहास करती हुई बोली, “अगर अभी पुनः इसी तन को धारण करके जीवित हो जाऊँ तो ये शोकाकुल लोग ही जीने नहीं देंगे।”
” ऐसा क्यों ? सभी परिजन एवं मित्रगण पलभर को घबराएंगे,फिर चिकित्सक से आश्वत होकर ईश्वरीय चमत्कार मानकर तुम्हें पुनः जीवित देखकर हर्षित होंगे।” यमदूत ने आत्मविश्वास के साथ कहा।
आत्मा स्वयं को पूर्ववत् प्रस्थान हेतु उद्यत करते हुए बोली, ” महाशय मत भूलिए कि यह सतयुग नहीं कलयुग है और ऐसे में नेपथ्य में भी दृष्टिपात समयानुकूल है।वस्तुत : बिना बाज़ारवाद के सच भी मिथ्या हो जाता है और झूठ बाज़ारवाद के कारण सत्य प्रतीत होने लगता है ।”

***

लघुकथा-४
वर्तमान के पन्ने

“तुम कब आई ?” बेल की आवाज़ सुनकर गेट खोलते ही अनुराग ने चौंकते हुए पूछा।
“परसों ही।” गोपा ने एकटक अनुराग को निहारते हुए कहा।
“अंदर आओ,अभी कुछ दिन रहोगी या ? “अनुराग ने सोफे पर गोपा को बैठने का इशारा करते हुए पूछा।
“नहीं, कल सुबह ही चली जाऊँगी।माँ की तबियत ठीक नहीं थी तो उनसे मिलने चली आई। भाभी ने बताया कि तुम्हारा तबादला यहाँ हो गया है तो न जाने क्यों दिल ने कहा कि जाने से पहले तुमसे मिलके जाऊँ।” गोपा एक साँस में कहती चली गई।
“तुम्हारे ससुराल में सब कैसे हैं, मेरा मतलब तुम्हारे ….?”
“सब अच्छे हैं और वह भी बहुत अच्छे इंसान हैं।” गोपा ने अनुराग के सवाल को बीच में ही काटते हुए जवाब दिया।
“तुम कैसे हो ? भाभी से मालूम हुआ कि तुम्हारी शादी तय हो गई है।मुझे बेहद खुशी हुई सुनकर कि तुम ज़िंदगी में ….।”
“हाँ, मैंने ज़िंदगी में सिर्फ़ बढ़ना ही तो सीखा है।कभी नौकरी में तो कभी….।” गोपा को बीच में ही टोकते हुए अनुराग ने कहा।
“नहीं, अनुराग मेरा मतलब यह नहीं था।मैं तो…गोपा ने झिझकते हुए कहा।”
“जानता हूँ ,गोपा। मुझसे ज़्यादा तुम्हें कौन जानता है।लेकिन मैं स्वयं को भी तो जानता हूँ।तभी तो तीन साल पहले ज़िंदगी में बढ़ने की चाहत ने …..अच्छा छोड़ो ये सब बातें। चाय पिओगी, अभी मंगवाता हूँ।” अनुराग ने अतीत के पन्नों को चाय के कप रूपी पेपर वेट से दबाते हुए कहा।
“पन्ने खुल गए हैं अनुराग, उन्हें पढ़ लेने दो।वैसे भी अतीत ……और ऐसे में निःशब्द अंतर्मन का मुखरित होना आसान होना है और आसान होना जीवित होना है और जीवित होना वर्तमान के पन्नों में……।” गोपा ने स्वयं को भी आसान करते हुए कहा।

***

लघुकथा-५
माई-बाप

“तुम दोनों ही समुदाय के पास लगभग एक ही समान ज्ञान,बुद्धि एवं शिक्षा थी।फिर ऐसा क्या हुआ कि तुम सभी के उपलब्धियों और कृत्यों में जमीन-आसमान का अंतर रह गया।”
लेखा-जोखा देखते हुए गम्भीर स्वर में चित्रगुप्त जी ने एक ही दिन मृत्यु को प्राप्त दो समुदाय के
लोगों से प्रश्न किया।
“प्रभु ,ये सब हमारे परिश्रम का सुफल है।” एक समुदाय ने अपने प्रयासों को बघारते हुए संयुक्त स्वर में कहा।
“अब तुमलोग मौन क्यों हो ? मुँह पर ताला लगा रखा है क्या ?” दूसरे समुदाय से कोई उत्तर न आया देख चित्रगुप्त जी ने तेज़ स्वर में कहा।
“नहीं प्रभु ,ताला तो यहाँ आने से पूर्व तक लगा था। अब तो बंधनमुक्त हैं।” दूसरे समुदाय में जीवनपर्यंत की नीरवता संयुक्त रूप से मुखरित हो उठी।
“तो फिर बोलो।”
“हे प्रभु ! मात्र एक ही अन्तर था।” संयुक्त स्वर पुनः ध्वनित हुआ।
“क्या अन्तर ? ” चित्रगुप्त जी के स्वर में कौतूहलता परिलक्षित हुई।
“हमारे समुदाय में सभी के जैविकीय एक ही माई-बाप थे और दूसरे समुदाय के कई माई-बाप थे।जैसे कि सामाजिक,राजनीतिक,साहित्यिक..वगैरह-वगैरहl”
संयुक्त स्वर पूर्णरूप से उन्मुक्त हुआ l
“दोनों समुदाय के परलोक एवं पुनर्जन्म का निर्णय तथ्यों के अध्ययनपर्यंत कुछ क्षणों के लिए निलंबित किया जाता है।” सृष्टि के प्रथम न्यायाधीश चित्रगुप्त जी ने यमदूत से कहा एवं तत्कालीन आनुवंशिकी के नियम का अध्ययन करने हेतु ध्यानमग्न हो गए।


पाँच लघुकथा

रूपाली तिवारी
कोलकाता
लघुकथा-१
कुंभ रासी
उसके चेहरे पर मार का ताजा नीला निशान था,उसके बदन को देखकर ऐसा लग रहा था कि वह कई बार मार खा चुकी है ।
मैंने उससे पूछा- क्या हुआ आज इतनी देर हो गई ?
वह बोली अरे दीदी आज घर से निकलबेे में ही देर हो गई, उसकी आंखें चुगली कर रही थी,
धीमी आवाज में वह बोली – वो आज अजय के पापा काम पर नाय गए हैं ना , घर पर ही है, उसका चेहरा शर्म से लाल हो रहा था पर मार का निशान उसके पति की पाशविकता का परिचय दे रहा था।
वह अपने आंचल के छोर में अपनी उंगलियों को लपेटते हुए बोली – हां दीदी आज सचमुच बहुतै देर होए गई है अभई तो और भी तीन घर जानो है ।
चलो ठीक है, जल्दी से काम निपटाओ मुझे भी थोड़ा बाजार निकालना है – मैंने कहा
बस दीदी अभई करे देत हई । यह कहकर वह झटपट घर के कामों में लग गई । बर्तन साफ करने और झाड़ू लगाने के बाद उसके हाथ जल्दी-जल्दी फर्श पर पोछा लगाने लगे ।
पोछा लगाते लगाते उसने कहा जानत हौ दीदी आज हमने एक सपना देखो ..
मैंने धुले हुए कपड़ों को तह लगाते हुए उसकी तरफ देखा और पूछ लिया, क्या देखा ?
वह बोली – हमने देखो कि हम एक लोटा मा दूध लईके उसमा भांग डालीके शिवजी पर चढ़ाए रही हूं ।
अरे वाह तूने तो बहुत अच्छा सपना देखा । अब तो शिवरात्रि भी आने वाली है तो चढ़ा देना दूध और भांग शिवाजी पर मैंने मजाकिया लहज़े में कहा।
हां दीदी हम व्रत भी रखेंगे अजय के पापा के लाने । उसने लजाते हुए कहा ।
अचानक तेजी से फर्श पर चलते हुए उसके हाथ रुक गए ऐसा लगा जैसे उसे कुछ याद आ गया हो उसने कहा, दीदी पता है हमाई राशि ना बहुत अच्छी है ।
मैंने हंसते हुए पूछा _ अच्छा कौन सी राशि है तेरी ?
कुंभ रासी है हमाई , लोग कहत हैं यह बहुत अच्छी रासी होत है ,सुखी होत हैं जा रासी के लोग । मेरा मरद भी यही बोलत है । सच्ची में दीदी कुंभ रासी वालन की किस्मत बहुत अच्छी होत है का ? उसने प्रश्नवाचक नजरों से मेरी ओर देखा , वह तो ई भी बोल रहा था कि इस रासी के लोग बहुत आलसी अउर कामचोर होते हैं ।
अच्छा बहुत कुछ जानता है तेरा मरद !! मैंने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा
हां दीदी उ अखबार पढ़त है, पांचवी कच्छा तक पढ़ा है ,बहुत कुछ जानत है उ ।
ठीक ही कहत है उ ,हमहु को भी ना चार घर काम करके जान के बाद बहुत थकान लगत है ,कुछ करै का मन ही नाय करत है ,हर समय आलस लागत है । ताई हमें लागत है सच्ची हमार कुंभ रासी है।
मैं निर्विकार उसके चेहरे की ओर देखती रह गई।

लघुकथा-२
इनबॉक्स

अस्ताचल ” छद्म नाम वाले मनोहर बाबू को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजना बहुत अच्छा लगता था। एक डूबते हुए सूरज की फोटो थी उसकी प्रोफ़ाइल पिक पर
“साँझबाती,असमान की परी,अकेली तान्या, फूलों की बगिया ऐसे ही नाम वालेे प्रोफ़ाइल वालियों को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते थे। जिनकी प्रोफ़ाइल में आसमान की , फूलों की , बादलों की या किसी खूबसूरत पहाड़ की तस्वीर होती थी ।
मनोहर बाबू इन सबको अपनी कल्पना से एक खूबसूरत रूप में ढाल लेते थे और इसी आभासी दुनिया में वो खुश रहते थे तभी तो पत्नी से छुपाकर वो इन सब प्रोफ़ाइल वालियों से ऑनलाइन चैटिंग करते थे और चैटिंग करते करते कल्पनाओं में डूब जाते थे ,खुद को नायक समझने लगते थे और एक अजीब सा रोमांच अनुभव करते थे । मनोहर बाबू के अंदर इतना प्रेम और छुपा हुआ कवि और वो अनमोल शब्दों का भंडार पता नहीं कहां से आ जाता था उनको खुद नहीं समझ में आता था।
ये जो नए सिरे से प्यार को अनुभव करने का आनंद, सांसारिक जीवन की किच किच से इस तरह से थोड़ी देर के लिए मुक्ति मिलना,बड़ा अच्छा लग रहा था उन्हें क्यूंकि घर परिवार की रोजमर्रा की चीज़ों को लेकर पत्नी की खिट खिट ऐसा लगता था जैसे उसके वाक्यों में प्यार का रस सुख चुका हो ।
इन सब प्रोफ़ाइल वालियों से चैटिंग करने से ऐसा लगता था कि बीवी की खिट खिट फिल्टर होकर हट गई हो । कौन क्या बोल रहा है , कैसा व्यवहार कर रहा है इससे अब कोई फर्क नहीं पड़ता था मनोहर बाबू को।
पत्नी के लिए बेकार पति होने से क्या हुआ साँझबाती, आसमान की परी,अकेली तान्या,फूलों की बगिया के लिए तो वो तो वो श्रेष्ठ पुरुष के रूप में खुद को उपलब्धि करते थे ।ये कुछ कम नहीं था उनके लिए ।सारी रात आनंदातिरेक मनोहर बाबू सो नहीं पाते थे।
पत्नी पास लेटी हुई उनकी बेचैनी को समझने की असफल कोशिश करती रही।
आज सुबह साँझबाती ने लिखा “मिस यू”। उफ्फ इतनी खुशी कहां छुपाऊं। आनंद विभोर होकर बाजार से परवल की जगह बैंगन ले आते हैं चार समान में से एक जरूर भूल आते हैं क्योंकि नजरें और दिल तो इनबॉक्स पर ही टिकी रहती हैं उनकी
अब बेचारी पत्नी पड़ गई घोर मुसीबत में । पतिदेव आजकल अन्यमनस्क रहने लगे हैं दिन रात मोबाइल लेकर बेबात मुस्कुराते हैं । हमेशा मोबाइल में आँखें गड़ाए लगातार टाइपिंग करते हैं और पूछने पर कहते हैं कि ऑफिस के वाट्सएप ग्रुप में जरूरी डिस्कशन कर रहा हूं ।”
पर पत्नी का मन आख़िर क्योंकर मानने लगा ,इतना अन्यमनस्क, इतना भुलक्कड़ इतना विचलित भाव तो पतिदेव का पहले कभी नहीं देखा,जवानीं में जो कभी नहीं हुआ कहीं पतिदेव को कहीं वो रोग तो नहीं लग गया !! बूढ़े पर जवानी छा रही है क्या !!अगर उनका मोबाइल छू भी लिया तो झट से हाथ से छीनकर भुनभुनाने लगते हैं। ।
आज सुबह मनोहर बाबू को एक फ्रेंड रिक्वेस्ट आई “रजनीगंधा” । वाह बहुत पसंद थे उन्हें रजनीगंधा,संग – संग एक्सेप्ट किया और मैसेज किया थैंक्स फॉर योर फ्रेंड रिक्वेस्ट और एक छोटा सा लाल दिल चिपका दिया। बस फिर क्या था सिलसिला चल पड़ा बातों का। क्या करते हो ?घर में कौन कौन है ?लांच किया या नहीं? वगैरह वगैरह …
उफ़्फ… इतनी फिक्र तो कोई नहीं करता उनकी ,मनोहर बाबू तो खुशी से विभोर हुए जा रहे थे।आपकी वाइफ कैसी हैं ?बहुत प्यार करते होंगे न उन्हें ? आपकी प्रोफ़ाइल में देखा मैंने।
अरे काहे का प्यार ,सब हाथी के दांत हैं,क्या करूं, दिखावा करना पड़ता है हर वक्त खिच खिच,उसकी तरफ देखने से ही दिल खट्टा हो जाता है । बस ज़िंदगी गुज़ार रहा हूं किसी तरह ,मनोहर बाबू ने जवाब में लिखा ।
कैसे निभा लेते हैं ऐसी खड़ूस औरत से? छोड़ क्यों नहीं देते उसे।आराम से अपनी मन मर्जी से जीवन बिताइए। रजनीगंधा ने मैसेज में लिखा ।
अरे ये क्या बात हुई !! पत्नी इतनी भी बुरी नहीं है ये बात मनोहर बाबू अच्छी तरह जानते थे, पहली बार उन्हें रजनीगंधा की ये बात दिल में कहीं चुभी । अपनी पत्नी को अगर कोई बुरा बोलेगा तो सिर्फ वो और येे अधिकार और किसी को नहीं है, छोड़ दूं पत्नी को !! अरे वाह ,उसको जिसने उसके बुरे समय में भी उसका हर पल साथ दिया , उसके बीमार होने पर सेवा में दिन रात एक कर दिया,नहीं ये बात कहीं से भी उनके गले से नीचे नहीं उतर रही थी।
पता नहीं क्यों मनोहर बाबू ने एक झटके में उठे और मोबाइल को पॉकेट में रख कर ऑफ़िस से बाहर निकल गए ।
दरवाजे पर बेल बजाते ही पत्नी दरवाजा खोल कर अंदर चली गई । मनोहर बाबू किचेन में जाकर साथ लाया हुआ अपनी पत्नी का फेवरेट फ्राइड राइस और चिली पनीर प्लेट में निकल कर डाइनिंग टेबल पर आए और पत्नी को प्यार से बुलाया सीमा इधर आओ देखो तो तुम्हारे लिए क्या लाया हूं।आओ आज साथ खाते हैं ।अरे हां वो फ्रूट एंड नट आइसक्रीम भी लाया हूं पिघल जाएगी जरा फ्रिज में लगा दो न डिनर के बाद खायेंगे।
क्या बात है आज इतना मस्का क्यों ?
अरे कुछ नहीं। बस यूं ही ….मनोहर बाबू नज़रें चुराते हुए हंसने लगे ।
रात को रजनीगंधा का मैसेज आया चलो अच्छा हुआ जो मैंने ये मैसेज किया कम से कम इतने दिनों बाद तुम्हें मेरी पसंद तो याद आ गई।
अवाक मनोहर बाबू एक बार मैसेज और एक बार सीमा के चेहरे की तरह देख रहे थे।
अब मुस्कुराने की बारी सीमा की थी।

***

लघुकथा-३
द्वंद
शारदा के दिल में आज एक अजीब सा द्वंद था l आज की रात पता नहीं क्योंकर बहुत भारी लग रही थी ,ऐसा लग रहा था जैसे उसके दिल पर किसी ने कोई वजनी सा पत्थर रख दिया हो l दिल और दिमाग के बीच द्वंद चल रहा था l
पर यह परंपराएं भी तो ऐसी थी जिन्होंने उसके दिल में अपनी जड़ें काफ़ी गहरे तक जमा ली थी l ना तो वो इन बंधनों को तोड़ पा रही है और ना ही निभा पाने की अब सामर्थ्य बची थी l वो अब तक अपने पति का एक दृढ़ व्यक्तित्व ही देखती आईं है पर आज….
लेकिन भवितव्यता……
आज वो सबसे अपना सबसे पराया हो कर रह गया l खुद शारदा तो क्या ,वह अपने आप को भी नहीं पहचानता l वह कौन है ?उसका अस्तित्व क्या है ?हर बात से अनभिज्ञ हो गया है ? डॉक्टर ने बताया कि वह अल्जाइमर के रोग से ग्रस्त हो गए हैं
अभी परसों की ही तो बात है शारदा को अपने कमरे में देख कर उसे चोर समझ बैठे और लगे बुरी तरह मारने-पीटने l इसी क्रम में खुद को भी चोट लगा बैठे ,जब शारदा उनके हाथों में मरहम- पट्टी करने लगी तो बड़ी मासूमियत से बोले – तुम कौन हो ? डॉक्टर हो, कि नर्स ? शारदा की आंखों से आंसू की दो बूंदें टपक पड़ी l वह अगर कह भी देती कि मैं ना तो डॉक्टर हूं, ना नर्स, मैं तुम्हारी पत्नी हूं तो भी शायद उनकी समझ में नहीं आता l उस दिन तो हद ही हो गई जब बेटी और दामाद घर आए थे l उनको देखते ही वह चिल्लाने लगे- निकालो इन लोगों को मेरे घर से l निकालो अभी के अभी, निकालो l यह लोग मेरा सब कुछ चुरा कर ले जाएंगे lचोर हैं यह ,लुटेरे हैं ,मैं …मैं मार डालूंगा इन सबको और वह डंडा लेकर उनकी तरफ दौड़ पड़े थे l बेटी और दामाद किंकर्तव्यविमूढ़ होकर ठगे से खड़े रह गए l फिर काफी जद्दोजहद के बाद बेटी और दामाद ने शारदा के साथ मिलकर इस परिस्थिति पर काबू पाया l ऐसे ही पता नहीं कितनी अजीबोगरीब परिस्थितियों का सामना शारदा पिछले कुछ वर्षों से करती चली आ रही है l अपने ही सामने अपने पति को कभी मजाक का पात्र बनते हुए ,कभी दर्द से कराहते हुए ,कभी डरते हुए ,कभी आक्रमक होते हुए ,तो कभी बच्चों की तरह बिना बात के रोते हुए और जिद करते हुए साथ ही तिल-तिल कर शारीरिक और मानसिक रूप से अक्षम होते हुए देखती चली आ रही है l
अब तो शारदा भी शारीरिक और मानसिक रूप से थक चुकी है उसकी भी स्थिति कुछ सही नहीं है lआख़िर उसकी भी तो उम्र हो रही है इतना सब कुछ अकेले झेल पाने की क्षमता भी अब धीरे-धीरे कम होती चली जा रही है l
*कल करवा चौथ है*
पति की लंबी आयु के लिए किया जाने वाला यह व्रत वह परंपरागत वर्षों से करती चली आई है , पर इस बार की दुविधा कुछ और ही है प्रतिपल पति का जीवनयुद्ध आंखों के सामने देखने के बाद शारदा व्रत के माध्यम से अपने पति के लिए लंबी आयु मांगे या फिर मुक्ति ??
अंततः अपनी इस द्वंद पर विजय पाकर वह धीरे से उठी और अपने पुराने ट्रंक में से अपने पति द्वारा उसके लिए बनारस से लाई हुई बनारसी साड़ी को निकाल कर अपने कांपते हाथों से सहलाने लगी l
कल यही साड़ी पहनूंगी।

***

लघुकथा-४
चाह
अरे बेटा इतना देसी घी !!! मुझे इतना घी नहीं चाहिए । आज मेरा बेटा मेरे पार्थिव शरीर पर देसी घी मल रहा है, उसके साथ खड़े हुए श्मशान यात्री और रिश्तेदार उससे कह रहे हैं कि ज्यादा करके घी लगाओ , बॉडी को जलने में आसानी होगी और मेरा बेटा मेरे शरीर पर एक बड़े कनस्तर से घी निकाल – निकाल कर घी लगाने की प्रक्रिया में अपनी कृत्रिम श्रद्धा भी मिलाता जा रहा था ।
मैं देख रही सब देख रही थी ,छटपटा भी रही थी फिर भी उसके गालों पर दो थप्पड़ लगाकर यह नहीं कह पा रही थी कि अरे अब तो रुक जा , मेरे निष्प्राण शरीर पर घी लगाकर अब मुझे और शर्मिंदा मत कर बेटा । मैंने तो थोड़ा सा घी सिर्फ रोटी पर चुपड़कर खाने के लिए मांगा था, बदन में चुपड़ने के लिए नहीं ।
जिंदा रहते बेटे से कहा था मैंने कि मुझे थोड़ा देसी घी देगा बेटा । बहुत दिनों से देसी घी रोटी में चुपड़कर‌ खाने का मन कर रहा है ,छूटते ही बहू ने कहा था इस उम्र में इतना जीभ लपलपाना अच्छा नहीं है अम्मा,अगर कुछ उल्टा सीधा हो गया तो हम लोगों को ही भुगतना पड़ेगा और बेटे ने कहा था कि घर चलाने में कितना खर्च होता है कुछ पता भी है अम्मा, तुम अब एक्स्ट्रा खर्च के बारे में मत बोलो तो ,ये फालतू का खर्च मेरे से नहीं होगा ।
मुझे उस दिन तकलीफ नहीं हुई थी ना ही मैं रोई थी समझ गई थी कि बेटे को परिवार चलाने में बहुत तकलीफ होती है और उसके बाद से मैंने कभी भी घी खाने की इच्छा को अपने मन में भी पनपने ही नहीं दिया ।
अंततः आज सूखी रोटी खाते वक्त मेरे गले की सांस नली में फंसकर मेरी सांस रुक गई और सारी जिंदगी के लिए मैंने अपने बेटे के कंधे से एक बोझ कम कर दिया ।
मेरे मन में जरा सा भी दुख नहीं था कि मुझे घी नहीं मिला खाने के लिए । पर आज जब मेरे निष्प्राण शरीर पर मेरा बेटा घी मल रहा है तब मेरा शरीर दहक रहा है क्रोध से । दो-चार चम्मच घी का स्वाद मैंने जीवन में चाहा था मेरे शरीर ने कभी नहीं चाहा घी का लेपन । आज खुद को बहुत हास्यास्पद महसूस कर रही हूं , हां हास्यास्पद । जिंदा रहते वक्त जिसके लिए मात्र एक शीशी घी था लालसा को बढ़ावा देना , एक शीशी घी के लिए जिसको अपने बेटे की परिवार के खर्चों का हिसाब सुनना पड़ता था , आज वहीं अपने शरीर पर इतना घी लगाते देखा तो बड़ा हास्यास्पद लग रहा है ।
मैं चिल्ला कर कहना चाहती हूं अरे रुक जा मेरे शरीर पर और घी मत लगा । मैं ज़रा धीमी आंच पर जलना चाहती हूं …..धीमी आंच पर जलते- जलते अपनी ज़िंदगी के सारे पन्नों को एक बार फिर से खंगालना चाहती हूं । पर मैं बोल नहीं पा रही हूं …उन लोगों ने मेरे शरीर को इलेक्ट्रिक चूल्हे में घुसा दिया और उसके बाद चूल्हे का दरवाजा बंद हो गया उसमें दहकती हुई आग में मेरा संपूर्ण शरीर… मेरा सर्वांग घी की महक से गमक रहा था …मैं जल रही थी , मैं सहन नहीं कर पा रही थी उस घी की महक को , जिस घी की कुछ बूंदें मेरे जिंदा रहते मेरी जीभ को तृप्ति नहीं दे पाई उसी घी ने मेरे शरीर को राख में बदल दिया बस कुछ ही क्षणों में ।

***

लघुकथा-५
श्राद्ध

“दिवंगत का नाम ” ? पंडित जी ने समर से पूछा
“पुन्नू” समर ने सिर उठाकर डबडबाई आंखों से छलकते आंसुओं की बूंद को उंगली की कोर से पोंछते हुए कहा ।
जी !! पंडितजी ने कहा
मेरा मतलब पूनम … पूनम है उसका नाम
मंत्रोच्चार से श्राद्ध कर्म संपन्न होने लगा ।
आज मैंने अपना वचन पूरा किया पुन्नू । सामाजिक मर्यादाओं के कारण तुम्हें अपने घर ब्याह के तो नहीं ला पाया,पर एक क्षण के लिए भी तुमको और तुम्हारी यादों को दिल से हटा नहीं पाया ,वादा किया था जीवन भर साथ निभाने का ,उन वादों से कभी मुंह नहीं फेर पाया । क्या हुआ जो तुम किसी और की पत्नी , किसी की मां और किसी के घर की इज्ज़त बन चुकी थी । तुम जहां भी थी मेरे लिए सिर्फ मेरी ज़िंदगी थी । जैसी कि तुम्हारी इच्छा थी कि मैं तुम्हे अपने नाम गोत्र से जोडूं। तुम्हें अपना बनाऊं,तो आज मैंने तुम्हारी वो इच्छा पूरी की पुन्नू । आज तुम्हें मैंने अपने नाम और गोत्र में शामिल कर लिया।
समर ने डायरी में रखे हुए फ़ोटो पर हाथ फेरते हुए कहा – हां ,वादे के मुताबिक मैंने तुम्हारा श्राद्ध कर लिया ।

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