शिप्रा मिश्रा, प्रतिमा मणि त्रिपाठी, प्रतिभा जोशी


पाँच लघुकथा
डॉ शिप्रा मिश्रा

लघुकथा-१
पेंशन

“अम्मा! तुम भी ना,कर दी ना देर! तुम्हें तो समझाना बेकार है। एक दिन घंटी नहीं डोलाती तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता। जानती हो न बैंक में कितनी लंबी लाइन लगी रहती है तो भी बैठ गई भोग लाने… ”
माँ तो बस दम साधे निर्विकार भाव से बैंक की सीढ़ियों पर एक हाथ को रेलिंग के सहारे दूसरे हाथ को अपनी छोटी सी लाठी का सहारा देती हुई अपने को ऊपर की ओर ढकेलती हुई किसी तरह चढ़ी जा रही थी।
कई बार ऊपर उम्मीद से बेटे को देखतीं शायद चार कदम पीछे उतर कर उसे पकड़ ले लेकिन वह जानती थी हर बार की तरह आज भी उम्मीद करना बेकार है।
घंटों लाइन में खड़े होने के बाद रुपये मिले। माँ उन रुपयों को जी भर देखने का लोभ संवरण नहीं कर पायीं। संज्ञाशून्य सी न जाने कब तक खडी़ रहतीं कि बेटे की बातों ने जैसे उसे नींद से उठाया ,
“ये बीस रुपये रख लो माँ! बस पकड़ लेना। इधर-उधर मत चली जाना।कथा कहानी बतियाने। कंडक्टर से बोल देना अच्छे से चढ़ा देगा और उतार भी देगा। दस रुपये से ज्यादा भाड़ा मत दे देना, पिछली बार की तरह। दस रुपए के बताशे ले लेना पोते के लिए। तुम तो एकदम से सठिया गई हो!”
माँ समझ गई थी हर बार की तरह आज भी उसके पेंशन से बहू की पाजेब और बच्चों की मिठाइयाँ आएंँगी और वह आज की रात बिना कुछ खाए ही काटेगी। उसके पैर घिसटते हुए बस स्टैंड की ओर बढ़े जा रहे थे।

***

लघुकथा-२.
‘इंटरव्यू’

इंटरव्यू लेने के लिए सामने लगभग सात-आठ लोग बैठे थे। वे आपस में कुछ डिस्कस कर रहे थे। शालीनता ने तो रात-रात भर जग कर पूरी तैयारी की थी। दिन में समय निकालना उसके लिए दूभर है। उस वक्त शालीनता के दिमाग में कई ख़यालात एक साथ गडमड हो रहे थे –
“गैस बंद करना कहीं भूल तो नहीं गई। कान की बालियाँ तो तकिये के नीचे ही भूल आई। हे भगवान! जाने मिलेगी भी या नहीं। माता जी ने तो कोफ्ते बनाने को कहा था। उफ्फ.. तैयारी तो की नहीं। अब आज फिर से डाँट सुननी पड़ेगी।”
प्रश्न से उसका ध्यान भंग हुआ..
“तो आपने हिन्दी में पीएचडी की है। बहुत अच्छा..आपके प्रिय कवि कौन हैं?”
“जी! सूर्यकांत त्रिपाठी निराला..”
“बहुत सुन्दर..उनकी एक रचना सुनाइए।”
शालीनता कुछ देर तक जड़वत बैठी रह गई। क्षण भर पहले ही तो वह कहाँ- कहाँ घूम कर आई थी। कुछ जवाब नहीं सूझा..
“कुछ तो बोलिए!”
“जी क्षमा चाहूँगी.. कुछ याद नहीं आ रहा। अचानक न जाने दिमाग को क्या हो गया? कृपया कोई अन्य प्रश्न पूछ लें।”
“नेक्स्ट…..”
हताश होकर कमरे से बाहर निकलते ही बिजली की तरह पंक्तियाँ कौंध गईं..
“वर दे वीणा वादिनि वर दे..”
उसे तो पूरी कविता याद है। कई बार उसने इसे गाया भी है। फिर..
उसे लगा उसकी वरदायिनी माँ तेल, मसाले, कोफ्ते, झाड़ू, बर्तन, पोंतडे़, मच्छरदानियों के नीचे दबी- कुचली जा रही हैं। न जाने कई मन पत्थरों को हटाने में न जाने कितनी सदियांँ लगेंगी। खैर..यह नौकरी भी हाथ से गई।

***

लघुकथा-३
‘समर कैंप’

विमला साल भर गर्मी की छुट्टियों का इंतजार करती- गर्मी की छुट्टियों में बच्चे आएँगे, घर का कोना-कोना जगमग हो उठेगा। उस एक महीने में जैसे उसका बचपन लौट आता। उसके घुटनों का दर्द ठीक हो जाता। पूरे घर की साफ-सफाई बड़े मनोयोग से करवाती। ग्वाले को पहले ही निर्देश दे दिया जाता – दूध बढ़ाकर देना-“बच्चे आएँगे तो पेड़े बनाऊँगी, राबड़ी बनाऊँगी, खोये की मिठाइयाँ बनाऊँगी।”
लेकिन चार-पांँच दिन हो गए अभी तक कोई आया नहीं। कोई फोन भी नहीं आया। आखिर बच्चे कब तक आएँगे? छुट्टियांँ तो हो गई होंगी! फोन करने पर कोई उठाता भी नहीं..
आज एक सप्ताह के बाद फोन की घंटियांँ बज उठी थीं-
“अरे मुकुल! अभी तक बच्चे आए नहीं! मैं रोज खाना बनाती हूँ सब के लिए।”
“तुम भी न माँ! क्यों बेकार मेहनत करती हो? हम जब आएँगे होटल से मँगा लेंगे।”
“होटल से..! मेरा बनाया खाना अच्छा नहीं लगता!”
” नहीं माँ! वो बात नहीं। मेरी इलेक्शन ड्यूटी लगी है न। बच्चे इस बार समर कैंप गए हैं। इसलिए हम आ नहीं रहे। देखा जाएगा अगले साल। वैसे भी वहाँ का क्लाइमेट बिट्टू को सूट नहीं करता।”
विमला को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था या फिर वह कुछ सुनने को तैयार नहीं थी। पता नहीं..वह अगला साल क्या फिर कभी लौटकर आएगा?

***

लघुकथा-४
‘तस्वीर’

कार्यक्रम लगभग सम्पन्न हो चुका था। मुख्य अतिथि के साथ तस्वीरें लेने वालों की भीड़ मंच की ओर बढ़ने लगी थी। कई-कई तस्वीरें लेने के बाद भी उनका मन नहीं भर रहा था। कभी हल्की मुस्कान लिये, कभी मुस्कुराते हुए, कभी गंभीर मुद्रा में.. पता नहीं और कैसे -कैसे और न जाने कितने..
तभी एक मद्धिम सी, सकुचाई सी आवाज पीछे से आई-
“मैम! क्या हम भी एक फोटो आपके साथ ले सकते हैं?”
प्रो अचला ने पीछे मुड़कर देखा। पीछे खड़े व्यक्ति के चेहरे पर एक अपराध बोध झलक रहा था-
“तुम! तुम कौन हो? पहचाना नहीं..”
“जी मैम! हम माइक सिस्टम सँभालने वाले.. सुबह से स्टेज पर ड्यूटी लगी है।”
उसके चेहरे से स्पष्ट था जैसे उससे कोई भारी गलती हो गई हो। वह संकोच से गड़ा जा रहा था।
“अच्छा! अच्छा! लेकिन तुम साथ में तस्वीर लेकर क्या करोगे?”
“जी मैम! बेटी को दिखाएँगे और कहेंगे वह भी आप जैसी बने।”
उसने सिर झुकाए ही अपनी बात बड़ी उम्मीद से रखी थी।
वह तस्वीर आज भी उसकी जर्जर दीवार पर टंगी हुई है जिसे न जाने कितनी बार टपकती छत और सीलन से बचाने की वह लगातार कोशिश करता रहता है।

***

लघुकथा-५

‘खाली लिफाफे’

“मेरी बहू तो लाखों में एक है। ऐसी बहू किस्मत वालों को मिलती है। जितना सोचा न था उससे अधिक दहेज में लाई है।”
“मैं भी बहुत भाग्यशाली हूँ सखी! मेरी बहू तो मैनेजर है मैनेजर। वह भी एक अच्छी कम्पनी में। लाखों कमाती है महीने में।”
“अपनी तो पूछो मत.. मेरी बहू तो अमरीका जा बसी है। उसके ठाठ-बाट की तो पूछो मत..देखते बनता है। फेसबुक पर तो सारे फोटो डालती रहती हूँ। देखा नहीं तुम लोगों ने!”
इस बार के सावन में लगभग बीसों साल बाद बचपन की सखियांँ जुटी थीं।
“अरे कमल! तू भी तो बता। तूने भी तो बेटे की शादी की है पिछले साल। तेरी बहू कैसी निकली रे! तू तो कुछ बोल नहीं रही। सब ठीक है न?”
सबके एक साथ ठठाकर हँसने पर कमल जैसे नींद से जागी हो..
“मेरी बहू तो अभी अपनी ददिया सास की सेवा में लगी है। बड़ी बावली है रे! कहती है इससे बड़ी जिम्मेदारी और क्या हो सकती है अम्मा! सच पूछो तो उसी के भरोसे अपनी वयोवृद्ध सास को छोड़कर चार दिन के लिए चली आई तुम सबसे मिलने..कहाँ निकल पाती हूँ कहीं।”
कमल की मधुर मुस्कान के सामने सबके ठहाके फीके पड़ने लगे थे। खाली लिफाफे थोड़ी सी हवा से ही फड़फड़ाने लगे थे।


पाँच लघुकथा
प्रतिमा त्रिपाठी
राँची झारखंड

लघुकथा-१
कमरे में उमस महसूस हुई। वह खिड़कियाँ खोलने के उद्देश्य से खिड़की के पास आयी।
नीचे गली से सतरँगी झंडा लिए एक हुजूम चौक की तरफ बढ़ रहा था। अजीबो गरीब कपड़े और अनन्य रंगों से पुते चेहरे।
पहचानना मुश्किल था, कौन स्त्री है, कौन पुरूष। उनका उल्लास देखकर, उसने सोचा , शायद बड़े शहरों में त्यौहार मनाने का कोई नया शगल है या फिर यहाँ का कोई विशेष त्यौहार होगा। उसे इस त्यौहार के बारे में जानने की जिज्ञासा जगी, तो आकर उसने अपने बेटे से पूछा-
“बेटा, आज कोई त्यौहार है?” कहकर जुलूस के बारे में बताने लगी।
“हम्म! ऐसा ही समझ लीजिए….”
“समझ लीजिए से मतलब?”
“आज सुप्रीम कोर्ट द्वारा 377 को अपराध की श्रेणी से मुक्त कर दिया गया है। इसलिए इन लोगों ने खुशियाँ मनाने के लिए यह जुलूस निकाला हैं।”
“तुम इस जुलूस में नहीं जाओगे। खुशी मनाने ?”
दीवार पर लटकी जवान बेटे की तस्वीर पर नजर पड़ते ही आँखों में सैलाब उतर आया।
उसने नजरें चुराते हुए कहा-“जिसके लिए यह खुशी मनाता अब वही मेरे पास नहीं है। काश ! संवेदनाओं की दस्तक समय से पहले समझ लिया रहता।”
माँ के लिए उसकी बाते अबूझ पहेली जैसी थी। वह उसे गले लगाकर बोली-
“खुशियों के लिए कारण नहीं ढूढना चाहिए। कभी कभी खुशियों का आलिंगन मानवता के लिए भी करना चाहिए।”

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लघुकथा-२
बेस्वाद
मायके से लौटने के दौरान पतरातू धाटी का अद्भुत नजारा देख रिद्धी ने अपने पति से थोड़ी देर वहाँ रूकने को कहा , वो मान गए। कुछ देर तक नयनाभिराम दृश्यों को आँखों में समाकर वे ज्यों ही चलने को हुए कि आइसक्रीम का एक ठेला बिल्कुल पास से गुजरा । जिसे देख रिद्धि को खाने की इच्छा हुई । आइसक्रीम वाले को रुकवाकर , वह चहकते हुए आइसक्रीम पसंद करने लगी । ये नहीं, वो …भैया !…नहीं ..,नहीं ये …। इतनी वेराईटी देख, रिद्धी को समझ नहीं आ रहा था कि कौन-सा ले। अंत में उसने आइसक्रीम वाले से ही पूछा, ” भैया ! आप ही बताओ कि सबसे अच्छी कौन-सी आइसक्रीम है?’
आइसक्रीम वाले ने मुस्कुराकर कहा, ” दीदी ! सच्चाई तो यह है कि मैं सिर्फ बेचता हूँ इतनी महंगी आइसक्रीम खाने की औकात मुझमें नहीं!’
अप्रत्याशित जवाब सुन रिद्धी का उत्साह फीका पड़ गया। अब बिना कुछ कहे उसने एक आइसक्रीम खरीदी और गाड़ी में बैठ गई। पल में ही उसकी चहक खामोशी में बदल गई थी।
अब वो आइसक्रीम खा तो रही थी पर उसे वह बेस्वाद लग रही थी।

लघुकथा-३
इंद्रधनुष

“विवाह की छठी वर्षगाँठ की हार्दिक शुभकामनाएँ…”
वह विस्फारित आँखों से लिपि की वाल पर शुभकामनाओं का अंबार देख स्तब्ध थी। छठी वर्षगाँठ?
उसे तो आज तक यही मालूम था कि लिपि और राहुल लिव-इन पार्टनर हैं।और यही बात सभी जानते थे।
फिर यह विवाह कब हुआ?
पहली, दूसरी नहीं… सीधे छठी वर्षगाँठ?
वह उलझन में थी। समझ नहीं आ रहा था। उसके इतने क़रीब रहने के बावजूद वह इससे कैसे अनभिज्ञ रह गई?
उसे और कुछ नहीं सूझा, तो लिपि की पुरानी दोस्त रीमा को फोन मिलाया।
रीमा की आवाज़ भी कुछ चकित-सी थी-
“क्या बात कर रही हो? मुझे भी आज ही पता चला। मैं खुद असमंजस में हूँ।इसलिए नहीं कि वे शादीशुदा हैं या लिव-इन में-बल्कि इसलिए कि आज की इस वर्षगाँठ पार्टी में वे सभी संभ्रांत लोग मौजूद हैं, जो खुद को समाज का नैतिक प्रतिनिधि मानते हैं। और आज वही लोग इस झूठ के जश्न में, जैसे किसी उत्सव के चीयरलीडर बने खड़े हैं! मुझे तो हैरानी है। क्यों नहीं चौंके ये लोग? क्यों नहीं उठी कोई आवाज़? क्या इसलिए कि झूठ अब ‘सम्मानजनक रूप’ में सामने आया है?”
मिनी की आवाज तल्ख हो उठी-
“शायद झूठ को प्रतिष्ठित करना इनकी विवशता है, ताकि उनके चेहरों से काल्पनिक संस्कृति, संस्कार और नैतिकता के मुखौटे उतर न जाएँ।”
रीमा थोड़ी झुंझलाई-
“तुम कहना क्या चाहती हो, मिनी?”
मिनी शांत स्वर में बोली-
“बस इतना कि… झूठ को इस तरह रचो कि वह इंद्रधनुष की तरह प्रतीत हो… सुंदर, आकर्षक, लेकिन सिर्फ़ छायाभ्रम। उसके वलय में उलझकर सत्य खुद अपनी मौत मर जाए।”
रीमा अवाक रह गई-“तो क्या ये… झूठ की प्राण-प्रतिष्ठा का उत्सव है?”

***

लघुकथा-४
आन्दोलनजीवि

“क्या बात है मनोहर जी, सुबह-सुबह मेरी याद कैसे आ गई?”
“कमाने का एक बढ़िया अवसर मिला है। सोचा आपसे भी पूछ लूँ।”
“यह तो फोन पर भी हो सकता था।”
“मैडम, ऐसे मसले पर मिलकर बात करना ज़्यादा मुनासिब है।” उसने धीमे स्वर में कहा।
“तो फिर खुलकर बताइए।”
“इस बार सीधा पार्टी से आदेश आया है।” कहते हुए उसकी नज़रें चारों ओर टोह ले रही थीं।
“निःसंकोच बोलिए, यहाँ कोई नहीं सुन रहा।”
“मैडम, दीवारों के भी कान होते हैं। वैसे भी सुरक्षा एजेंसियाँ पूरी तरह चौकस हैं।”
“हम्म… तो मसौदा क्या है?” उसने धीमी आवाज़ में पूछा।
“वही, पिछली बार की तरह आंदोलन को सफल बनाना।”
“पर उस बार मामला जनता से जुड़ा था। इस बार तो व्यक्तिगत है। मुझे शक है कि असरदार होगा।”
“यही तो हमारा काम है। व्यक्तिगत मुद्दे को जनमुद्दा बना देना। आप बस अपनी टीम के साथ मंच पर दिख जाइए, बाकी मीडिया संभाल लेगी।” कहते हुए उसने एक एग्रीमेंट पेपर आगे बढ़ाया।
“जोखिम बड़ा है, और भुगतान राशि इतनी मामूली। कोई ठोस गारंटी तो होनी चाहिए। जैसे भूखंड, व्यापार में हिस्सेदारी या मेडिकल इंसोरेंस।”
“ठीक है, इस पर पार्टी से बात करूंँगा।” उसने कुछ सोचते हुए कहा।
“और… कौन-कौन शिरकत करेगा? बुद्धिजीवी, मानवाधिकार कार्यकर्ता, छात्र नेता, पत्रकार, सेलिब्रिटी?”
“सबसे बातचीत चल रही है, पर अभी तक पक्की नहीं हो पाई।”
“क्यों, क्या अड़चन है?”
“सबकी अपनी-अपनी माँग है। किसी को सरकारी पद चाहिए, किसी को अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार। कोई आयोग का अध्यक्ष बनने का सपना पाल रहा है तो कोई चुनावी टिकट चाहता है।”
“वाह! आंदोलन कम इच्छापूर्ति केंद्र ज़्यादा लग रहा है। सबकी मांगें पूरी करना तो नामुमकिन है।”
“इसीलिए चाहता हूँ कि आप अपनी टीम के साथ आगे आएँ। पार्टी के अलावा बड़े-बड़े लोग भी फंडिंग कर रहे हैं। हमें नकद फायदा देखना है। प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा का बोनस तो मिलेगा ही। समाज में सीधी पैठ बनाना भी तो ज़रूरी है।”
“हम्म, बात तो आपकी ठीक है। लेकिन….?”
“लेकिन क्या मैडम?” उसने अधीरता से पूछा।
“मौसम का मिजाज देख रहे हैं। रोज़ कोई नई बीमारी फैल रही है। ऊपर से सत्ता पक्ष की नजर कब वक्र हो जाए, कहना मुश्किल। धरना स्थल पर हालात बेकाबू हो सकते हैं। लाठीचार्ज, गोलियाँ… और जब सबकुछ उल्टा पड़ेगा तो फजीहत हमारी होगी। फंड देने वाले मौकापरस्त नेता तो भूमिगत हो जाएंगे या आपस में सौदा करके किनारा कर लेंगे।”
वह कुछ देर चुप रहा, फिर फोन लेकर किनारे चला गया। जब लौटा तो उसके चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान थी।
“मैडम, आपकी सारी शर्तें मान ली गई हैं।”
“इतनी आसानी से?”
“हाँ… हम सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं, मैडम। जीविका का सवाल है। आखिर सबको तो अपनी-अपनी दुकान चलानी है।”

***

लघुकथा-५
सरप्राइज
कई दिनों की बीमारी के बाद शिप्रा को आज तबियत में तनिक सुधार महसूस हुआ। बेडसाइड टेबल पर रखे नीतीश की तस्वीर पर नजर पड़ते ही वह उठकर बैठ गयी। बुदबुदाती हुई खुद से कहने लगी, “कितनी धूल जम गयी है, जाने कबसे साफ सफाई नहीं हुई, तुमसे बात भी तो नहीं हुई है। तुम्हें तो सब मालूम है। तुम्हारे जाने के बाद कुछ ठीक नहीं है। आजकल तबियत भी कहाँ ठीक रहती। और नम आँखों से उस तसवीर को देखने लगी। मानो, पूछ रही हो, क्या यही तुम्हारा वादा है?
तुमने कहा था, ” जीवन भर तुम्हारे साथ रहूँगा। हर सुख में, हर दुःख में , जीवन की हर धूप में तुम्हारी छांव बनूँगा।”
उसे लगा जैसे वह तस्वीर में ही मुस्कुराया। तस्वीर में साफ साफ नजर आया। हवा के बहाने से,एक लट कपोलों को चुम गयी।
तस्वीर से झाँकती आँखें बोल उठीं, “गया कहाँ हूँ?
मैं तो तुममें घुल गया हूँ, तुम्हारी साँसों में,एहसास करो मुझको, अपने भीतर ही पाओगी। सदा से ही तुम मेरी आत्मिक शक्ति रही हो। और मैं तुम्हारी आत्मा का अंश हूँ।तुमसे विलग होकर कहाँ जाऊँगा। उसी अंश रूप में, तुम्हारे भीतर विद्वमान हूँ। तुम्हारे ही पास हूँ, तुममें।”
तभी उसने महसूस किया। उदर में कुछ अजीब सी हलचल हुई। जैसे कोई अँगड़ाई लेकर करवट बदलता है। ऐसा ही कुछ एहसास हुआ।
भींगी आँखों से उलाहना देते हुए, वह उसकी तस्वीर को आँचल से साफ करते हुए मन ही मन कही, ” सरप्राइज देने की तुम्हारी आदत भी तो नहीं गयी। जाते-जाते भी मुझे दे गए सबसे अनमोल उपहार।”

पाँच लघुकथा
प्रतिभा जोशी
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लघुकथा-१
चौराहा
रीमा रोज की तरह शाम सात बजे बड़े शहर की कुख्यात गली के इस सबसे व्यस्त चौराहे पर खड़ी होकर अपने ग्राहक की प्रतीक्षा करने लगी। वह एक कॉल गर्ल है और उसकी तरह रोज यहाँ और भी औरतें शरीर को रोजगार बनाये खड़ी होकर अपने ग्राहक का इंतजार करती हैं। अपने व्यवसाय के प्रति ईमानदारी होने से वे सभी यहाँ आनेवाले ग्राहक को उसकी पसंद की ही प्राथमिकता देती हैं, पर जहाँ बड़ी सी कार लिए कोई रईस आ जाये तो सारी जान-पहचान एक ओर रह जाती और फिर शुरू हो जाता है घमासान युद्ध जो कि बोली से शुरू हो हाथापाई तक पहुँच जाता है। चौराहा बन जाता है लोगों के लिए मुफ्त की प्रदर्शनी और झगड़ा निपटाने आई पुलिस का न्यायालय। और सभी जानते हैं कि इसका खामियाजा इन सब को ही चुकाना पड़ता है अपना यह दिन खोटा कर।
जेठ की उबलती शाम में रीमा पसीने से तरबतर हो रहे चेहरे को रुमाल से पोंछ हाथ में लिए मोबाइल को खोलकर कैमरे से चेहरा देखती है कि मेक अप कहीं सुंदरता की जगह बदसूरती का हवाला न देने लग जाये। इसी बीच एक बड़ी सी कार वहाँ आकर रुकी।
उसे देखते ही रीमा बोली, “अरे, आप तो अच्छे लोगों में आते हैं।”
“तुम मुझे पहचानती हो?”
“हाँ, आप की कार रोज यहीं से तो जाती है।”
“यह मेरे ऑफिस का रास्ता है इसलिए। मुझे लगा सिर्फ मैं ही तुम्हें जानता हूँ, पर तुम्हें भी सब पता है कि कौन आता जाता है इस राह।”
“हाँ, इसीलिए तो कहा कि आज आपने शायद राह में गलत जगह कार रोक दी।”
“अब?”, कार में बैठा नवयुवक हँस दिया।
“यहाँ सिग्नल्स नहीं हैँ तो कार की जिम्मेदारी आपकी होगी।”
“वाह, चलो तुम्हें कहीं आगे छोड़ दूँ।”, बंद स्टायरिंग पर हाथ रख वह रीमा को देखने लगा।
“देखो, मैं तो आगे पहुँच जाऊँगी पर आप जरूर पीछे रह जायेंगे।”, रीमा आगे बढ़ कार के नजदीक आई।
“चलो, आज दोस्त बनकर चलो।”, युवक सीट से खिसक कार की दूसरी तरह आ खिड़की के काँच को नीचा करने लगा।
“नहीं, एक दोस्त यहाँ पहुँचा गया और अब इससे ज्यादा नीचे गिरने की चाह नहीं है। आप अच्छे घर से हैं। चले जाइये यहां से आगे।”, वह मुड़कर वहीं कोने की तरह बढ़ने लगी।
“सुनो, साथ नहीं चलोगी?”
“नहीं, जाइये यहाँ से और जा कर कहना आपकी दुनिया में कि तवायफें हम अपनी मर्जी से नहीं बनतीं। अपने घर की ईमानदारी के लिए रास्ता बदल लो वरना फिर इल्जाम हम पर ही लगेगा। ”, और वह सामने से आ रही अपनी तरह की अन्य दो महिलाओं को एक हाथ से मना का इशारा करते हुए दूसरे हाथ से कार को आगे बढ़ने का इशारा करने लगी।

***

लघुकथा-२
हाईवे
“ओह शानू, कितना खून बह गया तेरा।”, और मालती अपना दर्द भूल खून से भरी साड़ी के आंचल से शानू के पास आ उसके सिर से बह रहे खून जो पोंछने लगी।
“तुम्हें कितनी बार कहा कि समय से तैयार हो जाया करों।”, हाईवे पर खड़ा किशोर मालती और दोनों बच्चों के शरीर पर बहता खून देख अपना दर्द भूल बौखला उठा।
“अरे पापा, यह नीरू दीदी की वजह हुआ है सब। नीरू दीदी को आगे से कभी ले जाना हो तो चार दिन पहले ही कह दिया करो।”, शानू मुंह बिगाड़ते हुए नीरू को देखने लगा जो इस हाईवे पर बस के भयावह एक्सीडेंट की वजह से शरीर के दर्द से ज्यादा अपने चेहरे पर लगीं चोटों से गाफिल हो रही थी।
“लो, वे लोग भी आ रहें हैं यहाँ। अब तो भीड़ देख कोई गाड़ी नहीं रोकेगा और लेट हो गए तो डॉक्टर ढंग से मेरा ट्रीटमेंट भी नहीं कर पायेंगे। मम्मी, मेरे चेहरे पर निशान न रह जाएं ?”, नीरू की इस चिंता पर तो शानू अपने दर्द में भी मुस्कुरा दिया।
“मदद करना ही धर्म है।” और किशोर दूर से आ रही बस को देख हाथ हिलाते हुए उसे रुकने का इशारा करने लगा।
बस तेजी से आई और उसी रफ्तार से आगे बढ़ गई।
सभी खून से लथपथ यात्री नजदीक आ गए और संग खड़े हो वाहनों को रुकने का इशारा करने लगें लेकिन किसी ने भी अपनी गाड़ी नहीं रोकी।
“पापा अभी रुको, अब मैं आपको बताता हूं गाड़ी कैसे रोकनी है।”, शानू मालती से हाथ छुड़ा सामने से आ रही गाड़ी की तरफ लपका और अपने दोनों हाथ फैला उसके सामने ही खड़ा हो गया।
यह गाड़ी भी फर्राटे से आई औऱ चली गई और मालती की पुनः जोरों की चीख से गूंजा हाईवे इस बार फिर बोल उठा ‘मैं हाईवे…”

***

लघुकथा-३
महासमर

“मुकेश, तेरी माँ की साड़ी पहन कर यह द्रोपदी बड़ी ही प्रभावशाली लग रही है।” चीरहरण पर आधारित नाटक ‘महासमर’ के लिए द्रोपदी का वेश धारण कर आते विकास को देख थियेटर निर्देशक राकेश की हँस दिया।
“सर, यह मेरी माँ की सबसे महँगी साड़ी है। बड़ी मिन्नतों से द्रोपदी के नाम पर मिली है”, मुकेश ने अपनी माँ की साड़ी को निहारा।
“अब जल्दी करो, शाम पाँच बजे से तो शो शुरू हो जायेगा।”
थियेटर में फाइनल रिहर्सल के लिए मंच पर राजसभा का दृश्य बनाया गया था। बहुत सी कुर्सियों पर राजसी वेशभूषा पहने कलाकार बैठे हुए थे।
“छोड़ दे दु:शासन! दुष्ट, मैं कुरुवंश की पुत्रवधू भी तो हूँ।”, मुकेश विकास के नकली केश पकड़ उसे पर्दे से पीछे से खींच मंच पर ले आया।
“दुशासन, निर्वस्त्र कर दो इस अभिमानी द्रोपदी को, यह वही है जिसने आतिथ्य की गरिमा भंग कर इंद्रप्रस्थ में मेरा अपमान किया था।”, मूँछों पर ताव देते हुए दुर्योधन ने अट्टहास किया।
मुकेश आगे बढ़ विकास की साड़ी पकड़ खींचने ही जा रहा था कि रुक गया।
“मुझसे नहीं होगा…”
“इडियट, शाम को भी ऐसा करेगा तो नाम डूब जायेगा मेरे थियेटर का।”
“नहीं, यह नहीं होगा मुझसे। इस साड़ी में मेरी मम्मी की यादें बसी हैं।”
“विकास, खोल साड़ी और फेंक इस के मुँह पर। अब इस नौकरी से तेरी छुट्टी।” राकेश गुर्राया।
विकास पहनी हुई साड़ी उतारने लगा तो मुकेश ने अपने हाथ जोड़ दिए।
“चिंता मत कर, ड्रेसिंग रूम में अभी कपड़े बदल कर लाता हूँ आंटी की साड़ी। तेरी मम्मी तो अपन दोनों को ही महासमर के इस चीरहरण से पहले ही जिता गई।”
विकास के कदम ड्रेसिंग रूम की तरफ बढ़ गए।

***

लघुकथा-४
इंतजार
रेवतीजी, आपने जीवन परिवार के लिए दे दिया, अब तो रिटायरमेंट ले ही लीजिए।”, ऑफिस में नई आई कर्मचारी निशा अविवाहित रेवतीजी का अपने परिवार के प्रति समर्पण समझते हुए बोली।
“अब तो घर पर इंजतार भी नहीं होता… खैर छोड़ो। आज तो राखियाँ भी खरीदनी हैं लौटते समय…”, और रेवतीजी ने चेहरा फाइलों में झुका लिया।
“अरे, ऑनलाइन खरीद लिया करो।”
“ओह, मुझे समय भी तो काटना होता है..”
पाँच बजते ही बादलों ने अपनी नौकरी शुरू कीं और जोरों की बारिश शुरू हो गई। यहाँ समय से ऑफिस के कर्मचारियों को भी छुट्टी मिल गईं।
रेवती बारिश की परवाह किये बिना भीगते हुए घर की राह निकली क्योंकि उसे तो जीवन के हर मौसम संग लड़ने की आदत पड़ गई थी।
“रेवती, बारिश बहुत है। चलो, मैं तुम्हें बस स्टॉप तक छोड़ दूँ?”, तेज चाल लिये रेवती के पीछे आये सहकर्मी दामोदर जी ने अपना छाता खुद से सरका उसके सिर की ओर सरका उसकी ओर करने लगे।
“रहने दीजिए दामोदर जी, अब भीगने की आदत सी हो गई है।”, और छाते से निकल बारिश में भीगती हुई रेवती तेज तेज चलने लगी।
“कल भी तो पीछे ही खड़ा था और आज भी, अब तो तुम्हारी सभी जिम्मेदारियाँ भी तो पूरी हो गईं तब भी….”, दामोदरजी छाता लिए आगे बढ़े ही थे कि रेवती ने फिर एक बार पीछे मुड़कर देखा और आज फिर तेजी से आगे बढ़ गई।

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लघुकथा-५
बारिश
आज सुबह से ही मूसलाधार बारिश हो रही है। मीरा कभी स्कूल के लिए तैयार हुए बेटे को देख रही है और दूसरी ही ओर हाथ में टिफिन लिए दैनिक मजदूरी पर जाने के लिए खड़े पति को। आज यह तीसरा दिन हो जायेगा जब सुबह से हुई बारिश की वजह से न बेटा स्कूल जा सका न पति दैनिक मजदूरी के लिए। हाँ, इन सब में उसके काम को बारिश गीला नहीं कर पाई क्योंकि बंगलों में काम करने जाने पर बारिश से भीगा नहीं पाती।
इन बंगलों ने उसे अपनी ईमानदारी पर मजबूती भी दे दी कि इसी भरोसे उसने अपने बेटे को अंग्रेजी माध्यम की स्कूल में भरती करवाया। उसे पढ़ाई में तकलीफ न हो इसलिए ट्यूशन भी लगा रखा है। इस मरी बारिश ने बेचारे की ट्यूशन में भी छुट्टी करवा दी पर भला हो मैडमजी का जब उनके घर वो काम करने जाती है तो वे उसके लिए उस दिन की पढ़ाई के नोट्स दे देती हैं वरना आठवीं की पढ़ाई में कमी रह जायेगी तो दसवीं बोर्ड पर इसका असर जरूर होगा ही।
मीरा की नजर दीवार पर टँगी घड़ी पर पड़े इससे पहले मोबाइल बज उठा और वह रसोई की पट्टी पोंछते हुए रुक साड़ी के पल्लू से गीला हाथ पोंछते हुए उसे उठाने दौड़ी।
“मीरा, हाथ सुखाकर फोन उठाना, वरना फिर खराब हो जायेगा।”, बारिश के रुकने के इंतजार करते हुए पति की गुस्से भरी आवाज उसके कानों में पड़ी।
“ये मरा हर बार ठीक हो जाता है।”, और पल्लू को कमर में खोंस उसने मैडमजी का फोन उठाया।
“हेलो मीरा, आज थोड़ा लेट आ सकती हो?”, मैडमजी की जगह साहब धीरे से बुदबुदाये।
मीरा ने झट से फोन काट दिया।
“क्या हुआ, माँ?”
“कुछ नहीं बेटा, स्कूल में ही नहीं जीवन में भी परीक्षाएं होती हैं।”, और वह उन दोनों को वहीं छोड़ आज तो काम पर समय से पहले ही निकल आँगन में गीले पड़े छाते को खोल बाहर गली की ओर चल दी।

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