श्रद्धांजलिः विनोद कुमार शुक्ल

विनम्र श्रद्धांजलिः गत् २४ दिसंबर २०२५ को हिन्दी का एक और चहेता और चमकीला तारा अस्त हो गया। सहज संवेदना और सार्वभौमिक चिंताओं को संजोए आपकी रचनाएँ सोचने को मजबूर करती हैं। ज्ञानपीठ सम्मान विजेता शब्द-शिल्पी को लेखनी परिवार की तरफ से भावभीनी श्रद्धांजलि उन्हीकी कुछ चुनिंदा कविताओं द्वारा,


आँख बंद कर लेने से
अंधे की दृष्टि नहीं पाई जा सकती

जिसके टटोलने की दूरी पर है संपूर्ण
जैसे दृष्टि की दूरी पर।

अँधेरे में बड़े सवेरे एक खग्रास सूर्य उदय होता है
और अँधेरे में एक गहरा अँधेरे में एक गहरा अँधेरा फैल जाता है

चाँदनी अधिक काले धब्बे होंगे
चंद्रमा और तारों के।

टटोलकर ही जाना जा सकता है क्षितिज को
दृष्टि के भ्रम को

कि वह किस आले में रखा है
यदि वह रखा हुआ है।

कौन से अँधेरे सींके में
टँगा हुआ रखा है

कौन से नक्षत्र का अँधेरा।
आँख मूँदकर देखना

अंधे की तरह देखना नहीं है।
पेड़ की छाया में, व्यस्त सड़क के किनारे

तरह-तरह की आवाज़ों के बीच
कुर्सी बुनता हुआ एक अंधा

संसार से सबसे अधिक प्रेम करता है
वह कुछ संसार स्पर्श करता है और

बहुत संसार स्पर्श करना चाहता है।

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था

हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया

मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ

मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था

हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे

साथ चलने को जानते थे।

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे
मैं उनसे मिलने

उनके पास चला जाऊँगा।
एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर

नदी जैसे लोगों से मिलने
नदी किनारे जाऊँगा

कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा
पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब

असंख्य पेड़ खेत
कभी नहीं आएँगे मेरे घर

खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने
गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा।

जो लगातार काम में लगे हैं
मैं फ़ुरसत से नहीं

उनसे एक ज़रूरी काम की तरह
मिलता रहूँगा—

इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह
सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा।

कोई अधूरा पूरा नहीं होता
और एक नया शुरू होकर
नया अधूरा छूट जाता
शुरू से इतने सारे
कि गिने जाने पर भी अधूरे छूट जाते

परंतु इस असमाप्त –
अधूरे से भरे जीवन को
पूरा माना जाए, अधूरा नहीं
कि जीवन को भरपूर जिया गया

इस भरपूर जीवन में
मृत्यु के ठीक पहले भी मैं
एक नई कविता शुरू कर सकता हूं
मृत्यु के बहुत पहले की कविता की तरह
जीवन की अपनी पहली कविता की तरह

किसी नए अधूरे को अंतिम न माना जाए ।

अपने अकेले होने को
एक-एक अकेले के बीच रखने
अपने को हम लोग कहता हूँ।
कविता की अभिव्यक्ति के लिए
व्याकरण का अतिक्रमण करते
एक बिहारी की तरह कहता हूँ
कि हम लोग आता हूँ
इस कथन के साथ के लिए
छत्तीसगढ़ी में- हमन आवत हन।

तुम हम लोग हो
वह भी हम लोग हैं।

अभी तक बारिश नहीं हुई
ओह! घर के सामने का पेड़ कट गया
कहीं यही कारण तो नहीं ।

बगुले झुँड में लौटते हुए
संध्या के आकाश में
बहुत दिनों से नहीं दिखे
एक बगुला भी नहीं दिखा
बचे हुए समीप के तालाब का
थोड़ा सा जल भी सूख गया
यही कारण तो नहीं ।

जुलाई हो गई
पानी अभी तक नहीं गिरा
पिछली जुलाई में
जंगल जितने बचे थे
अब उतने नहीं बचे
यही कारण तो नहीं ।

आदिवासी! पेड़ तुम्हें छोड़कर नहीं गए
और तुम भी जंगल छोड़कर ख़ुद नहीं गए
शहर के फुटपाथों पर अधनंगे बच्चे-परिवार
के साथ जाते दिखे इस साल
कहीं यही कारण तो नहीं है ।

इस साल का भी अंत हो गया
परन्तु परिवार के झुंड में अबकी बार
छोटे-छोटे बच्चे नहीं दिखे
कहीं यह आदिवासियों के अंत होने का
सिलसिला तो नहीं ।


विनोद कुमार शुक्ल
(1937-2025)

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