बलराम अग्रवाल, शेख शहज़ाद उस्मानी, सुभाष नीरव

पाँच लघुकथा


बलराम अग्रवाल
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लघुकथा-1
मन का बोझ
शकील मेरे सामने खड़ा था। जब भी घर आता हूँ, एक ही शहर का होने के नाते उससे मुलाकात का योग बन ही जाता है। हमारे बीच अतीत में कुछ ऐसा घट चुका है कि वह सामने हो, तो मैं मुस्कुराना भूल जाता हूँ। अनजाने ही मेरा हलक कड़ुआ हो उठता है। उसने मिलाने को हाथ आगे बढ़ाया। मैंने तिरस्कार नहीं किया, हाथ मिलाया। आस्तीन के साँप का तिरस्कार करने की गलती किसी को नहीं करनी चाहिए। मैंने एक बार की थी। उसका खामियाजा मुझे भुगतना पड़ा था। आज तक भुगत रहा हूँ। मैंने महसूस किया कि मुझे देखकर जो व्यंग्यपूर्ण मुस्कान उसके चेहरे पर खिल-खिल आती थी, वह अब मुरझा-सी गयी है। “कैसे हो अमजद?” उसने धीमी, लगभग मरियल-सी आवाज में पूछा। “दुआ है ऊपर वाले की!” मैंने संजीदगी से कहा। “बाल-बच्चे?” “सब अच्छे, फरमाबरदार हैं।” मैंने कहा, “तुम्हारे?” “मेरे भी सब फरमाबरदार है!” इस बार वह खिसियानी-सी हँसी हँसा। उस हँसी को देखकर, उसके मुँह से निकला ‘फरमाबरदार’ झूठ का पुलिंदा लगा मुझे। वैसे भी, फरमाबरदार और फरमाबरदार में फर्क होता है। साँप के बच्चे दरअसल सिर्फ इस अर्थ में फरमाबरदार होते हैं कि वे अपने पूर्वजों की तरह काटने-डँसने में पैदाइशी माहिर होते हैं, अपने-पराये का फर्क नहीं करते। “किस-किस जॉब में हैं?” मैंने पूछा। “बेटियाँ तो सब टीचिंग जॉब में हैं,” उसने कहा, “बेटा एक ही है, एडवोकेट है सुप्रीम कोर्ट में!” “बहुत बढ़िया! अपने बारे में कहो कुछ…” मैंने पूछा। “मैं…!” बताते हुए वह थोड़ा हकलाया; बोला, “कैंसर से जूझ रहा हूँ! कीमो चल रही है…” “ओह!” मेरे गले से अनायास ही निकला, कड़ुआ वाला नहीं, वास्तविक सहानुभूति…इन्सानियत वाला। एकाएक उसकी आँखों से दो आँसू टपक पड़े। कुछ कहना चाहता था शायद, लेकिन शब्द उसके गले से नहीं निकल पाये। उसकी अन्दरूनी तकलीफ को महसूस करके मैंने उसके हाथ अपने हाथों में ले लिये; कहा—“बेशक, मेरे मन में तुम्हारे लिए कड़ुआहट थी शकील; लेकिन यकीन मानो, मैंने हमेशा तुम्हें अपना चचाजाद भाई ही माना। तुम्हें या तुम्हारे बच्चों को कभी बददुआ नहीं दी!” “मुझे यकीन है!” भर्राए गले से उसने कहा, “बददुआएँ तो दरअसल मुझे मेरे सगे भाई की लगी हैं। उस भाई की, जिसकी वजह से मैंने तुम-जैसे शरीफ इन्सान का अहित किया! तुम्हारे साथ गलती का अहसास तो मुझे शुरू से ही था; लेकिन अफसोस में यह तब बदला, जब जायदाद के मामले में उस अहसान फरामोश ने मुझ पर गोली ही चला दी।” इतना कहते-कहते वह हिल-सा गया। मैंने सहारा देकर उसे निकट वाली एक दुकान के चबूतरे पर बैठाया। पास की दुकान से खरीदकर पानी की एक बोतल उसे थमायी; और पूछा, “तबीयत ठीक महसूस न कर रहे हो, तो तुम्हें घर तक छोड़ आऊँ?” “शुक्रिया मेरे भाई, मैं अब ठीक हूँ!” उसने कहा, “तुम्हारे सामने गुनाह कुबूल करके आज बहुत-बड़ा बोझ सीने से उतर गया! ऊपर वाला तुम्हें सुखी रखे।” कहकर वह उठ खड़ा हुआ, “अल्ला हाफिज!” मैंने हाथ का इशारा करके एक रिक्शा को करीब बुलाया। उसमें बैठकर शकील ने उसे अपने मुहल्ले का नाम बताया। तुरन्त ही मैं भी उसके साथ वाली सीट पर बैठ गया। उसने हैरत से मुझे देखा। “तुम्हें अकेले जाने दूँ, मन गवाही नहीं दे रहा शकील!” कहते हुए मैंने उसके हाथ पर हाथ रखा। रिक्शा आगे सरक लिया।

लघुकथा-2
अपनी देहरी आप
कई साल बाद, आज अचानक वह एक मॉल में मिल गई।
बाल छोटे कर लिए थे। होंठों पर हल्की-सी मुस्कान। आँखों में संतुलित दृढ़ता।
उसकी ओर देखते हुए मैं विगत में चला गया।
शायद ही कोई दिन होता था, जब पति उस पर हाथ न उठाता हो। गालियाँ तो घर में सास-ससुर-देवर-ननद, हर कोई साधिकार देता ही था। पड़ोसी होने के नाते उसकी चीखें और उससे भी अधिक उसका मौन मुझे बेचैन करता था। कई बार मन में आता कि ऐन चीख-चिल्लाहट के समय उस घर में घुसूँ और उसके पति की मरम्मत कर दूँ। लेकिन ऐसा करने से उसके चरित्र को ही वे लोग लांछित कर सकते थे। बहुत सोच-विचारकर, मैंने छत पर उससे मिलने का मन बनाया। एक दिन, जब वह कपड़े सुखाने को आई, अपनी छत से दिल की बात उसे सुना दी।
उसके बाद, एक दिन हम पुन: अपनी-अपनी छत पर थे।
“सहानुभूति जताने का शुक्रिया सुधांशु।” कपड़े सुखाते हुए मेरी ओर देखे बिना उसने बोलना शुरू किया, “ससुराल के अत्याचारों के खिलाफ बगावत की बात हर लड़की के मन में उठती है। यह बताने का धन्यवाद कि मैं अगर पति को त्याग दूँ तो आप मुझे अपनाने के लिए खड़े हैं। लेकिन…ससुराल की देहरी लाँघना किसी भी औरत के लिए निजी फैसला नहीं, लंबी जिरह होता है—समाज से, माँ की सिखाई नैतिकता से और खुद अपने आप से भी!”
मैं चुपचाप सुनता रहा। बोलते-बोलते वह मेरी मुंडेर की ओर वाली रस्सी पर कपड़े लटकाती मेरे सामने आ खड़ी हुई। किंचित दबी-सहमी; लेकिन आँखों में आत्म-अभिमान की ऐसी चिंगारी, जिसे कोई भी डर पूरी तरह नहीं मिटा सकता था। ।
“हर कोई कहता है कि मैं ‘दूसरा घर’ ढूँढ लूँ। लेकिन, यह अत्याचार तो उस दूसरे, तीसरे, हर घर में पाँव पसार सकता है। मेरी लड़ाई तो विवाह के नाम पर मेरे आत्म-सम्मान, मेरी आजादी, अपने फैसले खुद लेने के मेरे अधिकार को छीन लेने के खिलाफ है! सिन्दूर धारण करने की इतनी बड़ी कीमत? यह मुझे मंजूर नहीं।”
मैंने देखा—उसकी आँखें अब काँप नहीं रही थीं।
“बेशक आप मुझे अपना लेंगे, लेकिन खुद अपने आप को मैं कैसे अपनाऊँगी? मुझे तो अपने लिए, अपनी शर्तों का घर बनाना है।”
दमन झेल रही उस युवती को उस समय मैंने दया और सहानुभूति की इच्छा से कोसों परे पाया।
“इस घर से मैं जाऊँगी जरूर,” रहस्योद्घाटन-सा करती वह बोली, “लेकिन न पुराने पते पर, न किसी नए पुरुष के आश्रय में।”
मेरे मुँह से डर की चीख की तरह निकला, “तब?”
“उस जगह जाऊँगी, जहाँ अपनी पहचान मैं आप होऊँ।” सधी आवाज में उसने कहा।
“तुम्हारी यह लड़ाई बेहद लंबी और कष्टपूर्ण होगी संजना।” मैंने उसे चेताया, “समाज तुम्हें जीने नहीं देगा। माँ-बाप-भाई हमेशा के लिए आँखें फेर लेंगे। और तो और, महिलाएँ भी तुम्हें बिगड़ैल कहेंगी।”
उसने जवाब नहीं दिया; नीचे उतर गई। और सचमुच, अगले दिन वह चली गई।
“क्या सोचने लगे?” मुझे हत्प्रभ देख उसने पूछा।
“सोच नहीं रहा,” मैंने हँसकर कहा, “बदलाव को आँखों में भर रहा हूँ।”
“आसानी से नहीं आया बदलाव।” उसने बताना शुरू किया, “अपनी एक सहेली की मदद से एक लेडीज हॉस्टल में कमरा रिजर्व करा लिया था। एमबीए थी। बहुत भाग-दौड़ की; फिर डिजिटल मार्केटिंग में हाथ आजमाया। काम जम गया। चार पैसे हाथ में आए तो भला-बुरा कहने वाले रिश्तेदार और सहेलियाँ, सब वापस आ गए।”
मैंने देखा—यह सब बताते हुए वह आत्म-विश्वास से लबालब थी।
“क्या आपको लगता है कि मुझे अब भी किसी देहरी पर चले जाने की जरूरत है?”
मेरी आँखों में अपने प्रति शायद मेरे मन के भावों को पढ़कर उसने उन्मुक्त भाव से पूछा।
“नहीं,” बिना ऊहापोह के मैंने तुरंत जवाब दिया, “अपनी देहरी अब तुम खुद हो संजना।”

माफी माँगने के बावजूद
हमारे बीच प्रेम के सूत्रपात के समय, रेनू मेडिकल की पढ़ाई कर रही थी और मैं अपनी पीएच.डी. के शोधपत्र को अंतिम रूप दे रहा था। मेरा शोध केंद्र और निदेशक का निवास जिस शहर में था, उसी में उसका कॉलेज कैम्पस था।
मेडिकल लाइन की होने पर भी हिन्दी साहित्य में उसकी गहरी रुचि थी। उसी के चलते, अनेक साहित्यिक संगोष्ठियों में वह मिलती रही। उन गोष्ठियों ने हमारी आत्माओं को एक-दूसरे से जोड़ दिया। फिर, गोष्ठियों के अलावा भी हम मिलने लगे। मैं उसे तुलसी, मीरा के पद; महादेवी, मुक्तिबोध, स्वप्निल श्रीवास्तव की कविताएँ और दुष्यंत की गजलें सुनाता। सुनते-सुनते वह मेरे कंधे पर सिर रखकर पढ़ाई के तनाव भूल जाया करती। उस समय वह सिर्फ एक लड़की होती थी, जो थककर मेरे शब्दों में पनाह लेती थी।
लेकिन अब वह डाक्टर थी। देश की एक बहुत-बड़ी हॉस्पिटल चेन में सीनियर सर्जन।
था तो मैं भी डाक्टर ही; लेकिन मेरे गले में स्टेथोस्कोप नहीं, शब्दों की गुनगुनाहट होती थी। कभी कोमल, कभी धारदार; और कभी दोनों एक-साथ। मैं शब्दों की दुनिया में खुद को तलाशता। वह धड़कनों की दुनिया को सँभालती। मैं जिंदगी के अर्थ तलाशता, वह जिंदगियाँ बचाती।
जब वह कहती, “आज एक फूल-सी बच्ची के जीवन को बचाया!” तो मैं उस पर कविता लिखना चाहता; लेकिन लिख नहीं पाता।
जब मैं कहता, “मैंने प्रेम पर एक ललित निबंध पूरा किया!” तो वह मुस्करा भर देती, जैसे कहती हो—मेरी समझ में सिर्फ प्रेम आता है सुधीर, निबंध नहीं।
हमारी मुलाकातें अब तयशुदा समय और जगहों पर होने लगी थीं।
एक शाम, जब हमारा मिलना पहले से तय था, वह नहीं आयी।
कैफे के बंद होने तक मैं वहाँ बैठा रहा। मालिक या मैनेजर को अन्यथा न लगे, इसलिए कॉफी पर कॉफी मँगाता और बिना पिये ही वापस भेजता रहा।
रेनू अगली सुबह मेरे कमरे पर आयी। थकी-थकी। आते ही बैड पर पसर गयी। आँखें बंद।
“सॉरी सुधीर!” पसरे-पसरे ही उसने कहा, “कल शाम एक सीरियस केस आ गया था। तुरन्त ऑपरेशन के लिए ले जाने का निर्णय लेना पड़ा।”
“तो?” मैंने कड़ुआहट के साथ पूछा।
“तुम्हें फोन करने का ख्याल तक नहीं आया। रातभर चला ऑपरेशन।” मेरी कड़ुआहट पर ध्यान न देकर वह बोली, “थैंक गॉड, सफल रहा। एक और फूल मुरझाने से बच गया।”
उसके किसी भी शब्द में कल की रंगीन शाम के खराब हो जाने का दुख या चिन्ता नहीं थी।
“सोया तो रातभर मैं भी नहीं रेनू!” कल शाम के ही तनाव से चालित मेरे पुरुष ने उससे सवाल किया, “तुम प्लीज, अपनी प्राथमिकता मुझे बताओ—मैं या मरीज!”
मेरे सवाल पर उसने एक झटके में आँखें खोल लीं। नींद से बोझिल, सूजी-सूजी-सी आँखें। मैंने उन्हें देखा। तुरंत ही अपने सवाल की असंगतता का आभास हुआ।
“मैंने सोचा था—मुझ थकी-हारी को प्रेम कुछ तसल्ली देगा,” उसने कहना शुरू किया, “इसीलिए ओटी से सीधे यहाँ चली आई। लेकिन अब…मेरा निर्णय मुझे गलत लग रहा है।”
मैं कुछ बोल नहीं सका। उसके आक्रामक तेवर ने मेरे गले को खुश्क कर दिया था। अपनी गलती का अहसास मेरे भीतर सूखे पत्तों-सा खड़खड़ा उठा।
“मेरी प्राथमिकता पर मरीज ही रहेंगे सुधीर, हमेशा।” उसने कहा, “जिंदगी बचाने का सवाल सामने हो तो अनपढ़ औरत भी मरीज को ही चुनेगी, मैं तो डाक्टर हूँ!” कहकर वह उठ खड़ी हुई।
“सॉरी रेनू!” कहते हुए मैं तुरन्त उसकी ओर बढ़ा।
लेकिन उसने सुना नहीं। सुनने की जरूरत नहीं समझी थी शायद। बिना विचलित हुए, बिना काँपे अपनी जगह पर खड़े-खड़े वह भी मेरी ओर घूमी। अपने दोनों हाथों में लेकर मेरा चेहरा चूमा, पलटकर दरवाजा खोला और निकल गई।

लघुकथा-4
दलगत सरिस धरम नहिं भाई
“इंसान के दिल में दया होनी चाहिए,” कुछेक लोगों के बीच वह बुजुर्ग बतिया रहे थे, “दीन-दुखियों के लिए, बेसहारों के लिए। जात-पात, मज़हब-वज़हब से ऊपर उठकर।”
फिर जैसे कि अपने ही एक ताज़ा अनुभव ने उन्हें भीतर से टटोला हो, उन्होंने जोड़ा—
“कल की ही बात है। मैं बाज़ार से गुजर रहा था। सड़क किनारे दो बच्चे खड़े थे—नंग-धड़ंग। पेट रीढ़ की हड्डी से जा चिपका था। पसलियाँ ऐसी कि एक-एक गिन लो। मासूम थे। निरीह। मैं रुक गया। आप जानते हैं, बच्चे तो सुअर के भी अच्छे लगते हैं। जेब से दस-दस के दो नोट निकाले और उनकी हथेली पर रख दिए। क्या नाम था, किस मज़हब के थे—जानने की ज़रूरत ही नहीं समझी।”
दबी हँसी के साथ एक युवा आवाज़ फिसली—“आप आतंकवादी थोड़े ही थे जो धर्म पूछते!”
अपनी दयानतदारी का किस्सा उन्होंने आगे भी सुनाया जरूर होगा, लेकिन बात एकाएक जहाँ की तहाँ अटक गई। हालाँकि वह एक मुहावरे के रूप में कही गई थी और बहाव में बह जानी चाहिए थी, पर नहीं बही।
सियासतदानों ने ‘सुअर के बच्चे’ को लपक लिया।
शहर की दीवारों पर सियासी आवाज़ें जा चिपकीं—“उसने हमें ‘सुअर’ कहा है! छोड़ेंगे नहीं!”
दूसरी तरफ़ से भी जवाबी कार्रवाई, वैसा ही शोर—“उसने ‘हमें’ सुअर कहा है! छोड़ेंगे नहीं!”
देखते ही देखते पूरा शहर हिन्दू-मुसलमान में तब्दील हो गया।
अगले दिन अखबारों की हेडलाइन थी—“दंगे में दर्जनों मरे, पचासों घायल!”
हत्याओं और लूट-खसोट के शोर के बीच किसी ने भीड़ से पूछ लिया—“किस्सा सुनाने वाला हिन्दू था या मुसलमान?”
भीड़ कुछ पल के लिए ठिठक-सी गयी।
फिर उसी में से कोई फुसफुसाया—“हमने जो किया, फरमान के मुताबिक किया। सुअरों का जो हश्र होना चाहिए था, वही किया।”
इसके साथ ही नारा गूँजा—“अल्ला-हु-अकबर!”
“जय श्रीराम!” जवाब में सामने वाले भी चिल्लाए।
शहर अगले दिन के अखबार की नई हेडलाइन तैयार करने में जुट गया था।

लघुकथा-5
गिद्ध-संवाद
वे दोनों एक ऊँचे पेड़ के सबसे ऊपरी ठूँठ पर बैठे थे। कहने को गिद्ध थे, लेकिन परेशान ऐसे जैसे गरीब बाप उन्हें साहूकार के कर्जों तले दबा छोड़कर मर गया हो और साहू्कार उन्हें नोंच-नोंचकर खा रहा हो। “यार, समझ में नहीं आया कि दोनों मुल्कों के बीच की जंग एकाएक रुक क्यों गयी?” एक गिद्ध अफसोस भरे स्वर में बोला। “इसमें समझ में न आने वाली क्या बात है?” दूसरे ने कहा, “इसी देश के पप्पू लोग गला फाड़-फाड़कर बता रहे हैं कि लड़ाई किसके कहने पर रुकी है।” “यार, मेरी परेशानी यह नहीं है कि लड़ाई किसके कहने पर रुकी है!” पहला बोला, “मेरी परेशानी यह है कि लड़ाई रुकी क्यों है?” “देख, आज के जमाने में लड़ाई न होना, होना और होकर रुकना, इसके अलग-अलग कारण हों, जरूरी नहीं है।” दूसरे ने बुजुर्गों वाले अन्दाज में कहा, “सबका मिला-जुला एक ही कारण भी हो सकता है!” “मतलब?” पहले ने हताश अन्दाज में कहा। “जो कारण लड़ाई शुरू होने का रहा हो, वही कारण लड़ाई रुकने का भी हो सकता है!” “यह तो अनबूझ पहेली हो गई!” “हाँ!” दूसरे ने कहा, “युद्ध आजकल अनबूझ पहेली ही हैं!” “मेरा सिर भन्ना रहा है,” पहले ने किंचित तेज आवाज में कहा, “पहेलियाँ न बुझा, साफ-साफ बात कर!” “साफ-साफ यह कि हथियारों का बड़ा उत्पादक दो, तीन, चार… देशों के बीच इस सिरे से उस सिरे तक रस्सियाँ ताने रखता है!” दूसरे ने बताना शुरू किया, “उन रस्सियों को वह इतना तानता है, इतना तानता है कि इस सिरे पर ली गयी साँस उस सिरे पर सुनी जा सके…!” “फिर?” “वह उस तनाव को भुनाता है। तनी हुई उन रस्सियों पर घोड़े दौड़ाता है—मनमर्जी के घोड़े। उधर से इधर, इधर से उधर! धाँय-धाँय…धाँय-धाँय…” “घोड़े दौड़ने पर ‘धाँय-धाँय’ की आवाज कब से आने लगी?” पहला उसकी नादानी पर हँसा। “पिस्तौल की लिबलिबी को भी घोड़ा ही कहते हैं बरखुरदार!” दूसरे ने शान्त-स्वर में सफाई दी और कहा, “तने हुए रस्सों पर जो घोड़े दौड़ाए जाते हैं उनके नाम इन दिनों सुखोई, मिराज, राफेल, तेजस… हैं! वे धाँय-धाँय से कहीं खतरनाक आवाजें निकालते हैं!” “भाई मेरे, ये थ्यौरी बंद कर!” पहला किलसकर चीखा, “भूख से मेरी आँतें ऐंठी जा रही हैं। यह बता कि जंग रुक क्यों गई?” “जंग दरअसल, रुकी नहीं है, भीतर-भीतर सुलग रही है!” दूसरे ने पहले को बहकाने की कोशिश की। इस पर पहला और भी ज्यादा किलस गया। तीखे अंदाज में पूछ बैठा, “तुझे रोस्टेड मांस खाने का चस्का कब से लग गया?” “रोस्टेड मांस?” दूसरे ने चकित स्वर में पूछा। “आदमी भीतर-भीतर सुलगेगा तो रोस्ट ही होगा न!” पहला पूर्व अंदाज में चीखा, “बेमतलब ही रूस-उक्रेन सीमा से उड़कर इधर आ गए! वापस चलें?” “नहीं। पड़ोसी मुल्क जब तक सेना के हाथों में है, निराश होने की जरूरत नहीं। उस पर नजर रख, बस!” दूसरे ने कहा और निश्चिंत हो बायीं पाँख में अपना सिर दबाकर सो गया।

पाँच लघुकथाएँ


शेख़ शहज़ाद उस्मानी
शिवपुरी (मध्यप्रदेश)
9406589589

लघुकथा-1
पगले कहीं के!
“काय रे, तू मानत काय नईयाँ? कल ही पिट चुको है नंगो फ़िरवे काजें तू मतारी-बापू से, ऐं?” कड़ाके की ठण्ड में केवल कच्छा पहने मधुर स्वर में लोकगीत गाते विक्षिप्त मानसिक रोगी युवक ‘भोंपू’ से कल्लन मियाँ बोले। वह न जाने क्या समझा कि उसने माता-पिता सेवा पर आधारित एक दूसरा मशहूर लोकगीत ऐसे मुस्करा कर गाना शुरू कर दिया कि ठिठुरते हुए भी कल्लन मियाँ भी मुस्कुरा उठे।
“कित्तो प्यार करत हेंगे ईके माँ-बाप ई से! पागल सो है, तो का भओ; इकलौतो बिटवा है उनकी दो बिटियन के संग! बड़ी बिटिया मुश्किल से ब्याही, छोटी वाली सोई बड़ी हो रई हेगी!” कल्लन मियाँ भोंपू के लोकगीत में डूबते हुए बुदबुदा भी रहे थे। दरअसल वे उसे अपने बेटों जैसा ही प्यार ही नहीं करते थे; उसकी देखभाल व सेहत के लिए यथासंभव कुछ न कुछ करते भी रहते थे। उसके माँ-बाप को समय-समय पर समझा-बुझाकर उनका हौसला बढ़ाते रहते थे।
“पगला कहत रहें मुहल्ले वाले, तो कहत रहें, लेकिन ई में अक्कल तो बहोत हेगी! हमाये द्वार पे ही आके लोकगीत गात है। लोग भले ईखों भोंपू पुकारें; लेकिन ई की पसंद के लोकगीतन में ई के जज़्बात रहत हैं… पर समझे कौनऊं न!” कल्लन मियाँ यह बुदबुदाते हुए उसके लिये चाय तैयार करने लगे।
“गरम कपड़े ईखों देवे, पहनावे से कोऊ फ़ायदा नईयाँ! फेंक देत है! ऊपर वालो ही ईखों गरम और ज़िंदा रखत है! ग़ज़ब की माया है!” यह बड़बड़ाते हुए वे भोंपू को चाय पिलाने लगे।
“चिच्चा, तुम ने पी लई का?” अपने मुँह से लार टपकाते हुए भोंपू ने ठिठुरते कल्लन मियाँ से कहा।

लघुकथा-2
अपडेटिंग फ़ोबिया एन्ड मेनिया
“पापा, आप अपनी डायरी में ये लिस्ट क्यों बना रहे हैं शराब, ब्रांडी, व्हिस्की, कबाब, बिरयानी, स्नेक्स, नूडल्स और कोल्ड ड्रिंक्स की कम्पनियों की, आप तो इन चीज़ों से दूर रहने को कहा करते हैं न?” पिताजी की टेबल पर अपने दफ़्तर का काम करते समय बेटे ने आश्चर्यचकित हो कर पूछा।
“अपडेट रहना ज़रूरी है न बेटा। मुझे भी तो पता होना चाहिए न कि सोसाइटी के लोग किन-किन प्रोडक्ट्स का सेवन करते हैं … बाज़ार से क्या खरीदते हैं और ऑनलाइन क्या?” पिताजी ने टेलीविजन बंद करते हुए बेटे के पास जाकर कहा, “पड़ोसियों या दोस्तों की महफ़िलों में ये थोड़े न बताऊॅंगा कि मैं सदाचारी आदर्शवादी हूॅं। चुप रह-रहकर ‘घुग्घू’ थोड़े न कहलाऊॅंगा। ‘एडजस्ट’ होने के लिए गपशप में मुझे भी तो ब्रांडों की जानकारी और तारीफ़ें साझा करनी पड़ेंगी न… दोस्ती-यारी बरकरार रखने, बेटू!”

लघुकथा-3
पहाड़ी, प्रहार और पहाड़े

“हैलो! नमस्कार। स्वागत आपका! आप कौन बोल रहे हैं, क्या जान सकती हूॅं?”
“———”
“अच्छा, मेवालाल ‘प्रखर’ जी, बताइयेगा क्या सेवा कर सकती हूँ मैं? मेरा नंबर कहॉं से मिला आपको?”
“———”
“जी, मेरे सोशल मीडिया के स्टेटस से। अच्छा। उसी के माध्यम से मैं उन लोगों से सम्पर्क कर सकी हूँ, जो उत्तरकाशी के धराली गॉंव की ग्लेशियर और बाढ़ त्रासदी से पीड़ित हैं या जिनके अपने पीड़ित हैं।”
“————–”
“अच्छा! तो वह सब आप सोशल मीडिया और समाचारों में पढ़ और सुन चुके हैं। जी, मैं पहाड़ी नागरिक हूँ, पहाड़ी पीड़ितों की सेवा कर सुकून हासिल करती हूॅं। बताइयेगा आप पीड़ितों में हैं या आपके कोई अपने?”
“——————”
“कोई नहीं! फ़िर सम्पर्क किस लिए किया आपने?”
“————–”
“ओके। आप यहां के पुराने पर्यटक रहे हैं, तो बहुत भावुक हो रहे हैं भयंकर बाढ़ हादसे पर। सब यहां की झीलों, पेबल्स, ग्रेबल्स और ग्लेशियर्स की प्राकृतिक और वैज्ञानिक माया है भाईसाहब! मेरी भी संवेदनाएं पीड़ितों और उनके परिवारजन के साथ हैं! आपको किसी के पीड़ित के पास कपड़े, भोजन या ज़रूरत की चीज़ें भिजवाना हो रक्षाबंधन जैसे पवित्र अवसर पर या आप दान करना चाहते हों या किसी पीड़ित परिवार को यहॉं धराली में मेरे सर्वसुविधायुक्त बड़े घर में रहने भेजना हो, तो बताइयेगा। हम उनकी ही सेवा के लिए हैं मेवालाल जी, हर रोज़ चौबीसों घंटे!”
“—————-”
“अच्छा, ऐसा कुछ भी नहीं! फ़िर किस लिए फ़ोन किया? केवल संवेदना और सहानुभूति जताने के लिए? क्या आप कोई नेता या अभिनेता हैं या पत्रकार वग़ैरह?”
“—————–”
“अरे, उनमें से कोई नहीं हैं आप? तो फ़िर त्रासदी की सारी जानकारी, तथ्य, लोगों की आपबीती और मेरे अनुभव क्यों जानना चाहते हैं आप?”
“———————”
“कथानक चाहिए था … लेटेस्ट और यूनीक़? ये कथानक क्या होता है? क्या आप कोई आर्ट-फ़िल्मकार हैं, चित्रकार या लेखक-वेखक?”
“———————”
“हैलो…. हैलो… बोलिए न! आवाज़ नहीं आ रही…. नेटवर्क तो है न! ….. अरे, फ़ोन क्यों काट दिया आपने?”

लघुकथा-4
आने वाला कल
निरंतर शोधों, आविष्कारों और प्रयोगों के साथ-साथ हो रहे क्रान्तिकारी बदलाव का दौर अंततः उस मुकाम पर आ पहुॅंचा, जहाॅं मानव को लगने लगा कि बहुप्रतीक्षित युग परिवर्तन हो ही गया। लेकिन यह क्या कि जल, वायु, अग्नि, पत्थर, पहाड़ और वृक्ष आदि सभी मानव की पूजा करने लगे। मानव से वे भयभीत जो होने लगे थे। लेकिन मानव न तो शैतान बन पाया और न ही भगवान। ईश्वर की सत्ता अब भी थी… लेकिन ऊपरवाला अब ईश्वर नहीं ‘विश्वसेवक’ के नाम से जाना गया। विश्वसेवक की सत्ता रोबोटिक तो थी, लेकिन मानव निर्मित रोबोट वगैरह उसे विश्वसेवक के कठोर नियंत्रण में रहने नहीं देते थे। नियंत्रण में उतार-चढ़ाव आता रहता था क्योंकि सभी रोबोट जैसी यांत्रिक मशीनें कभी मानव से डरतीं थीं, तो कभी मानव उनसे। कभी-कभी तो विश्वसेवक और उसकी सत्ता की हालत भी ऐसी हो जाती थी कि पूछो मत।
दरअसल पिछले युग तक के तमाम देवी-देवता और देवदूत ‘पत्रकार’ बन गये थे अथवा बीमा एजेंटऔर मीडिया ‘फ़रिश्ता’… और भगवान ‘मंत्री’। विश्वसेवक न तो पिछले युगों वाला ‘ईश्वर’ बन सकता था और न ही ‘शैतान’। उसकी सत्ता इस परिवर्तित युग के पत्रकारों, फ़रिश्तों और मंत्रियों की मुरीद थी या ग़ुलाम…यह भी बहस का एक मुद्दा मात्र था। राजनीति और कूटनीति में भी क्रान्तिकारी बदलाव प्रतीत हो रहा था। मानव स्वयं हतप्रभ रह गया था।
मानव ने बहुत कुछ पा लिया था, लेकिन बहुप्रतीक्षित सतयुग कतई नहीं। कहां जाने लगा… “यंत्र-युग जायेगा, सतयुग आयेगा!”

लघुकथा-5
आम चुनाव और समसामायिक वार्तालाप (पॉंच लघु आकार की लघुकथाएं) :
(q) चेतना :
ग़ुलामी ने आज़ादी से कहा, “मतदाता सो रहा है, उदासीन है या पार्टी-प्रत्याशी चयन संबंधी किसी उलझन में है, उसे यूं बार-बार मत चेताओ; हो सकता है वह अपने मुल्क में किसी ख़ास प्रभुत्व या किसी तथाकथित हिंदुत्व या किसी इमरजैंसी के ख़्वाब बुन रहा हो!”
आज़ादी ने उसे जवाब दिया, “नहीं! हमारे मुल्क का मतदाता न तो सो रहा है; न ही उदासीन है और न ही किसी उलझन में है! उसे चेताते रहना ज़रूरी है! हो सकता है कि वह तुष्टीकरण वाली सुविधाओं, योजनाओं, क़ानूनों से आज़ादी का मतलब भूल गया हो या सही उड़ान भरना भूल गया हो या ख़ुद को कठपुतली समझने लगा हो!”
(b) जनता ही तो है वह :
आज़ादी ने लोकतंत्र से कहा, “तुम जनता के, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन रूप में पहचाने जाते हो; लेकिन हो ये रहा है कि व्यापारी-उद्योगपतियों के, उनके ही लिये, उनके ही द्वारा तुम हांके जा रहे हो!”
लोकतंत्र ने उसे जवाब दिया, “नहीं! मैं अब भी उसी रूप में परिभाषित, प्रचलित व स्थापित हूँ! इस सदी में जनता ही व्यापारी है; सौदागर है; उद्योगपति है! कोई लघुत्तम, तो कोई मध्यम और कोई बहुत ही बड़ा विश्वस्तरीय!”
(c) अस्तित्व :
लोकतंत्र ने ग़ुलामी से कहा, “मैं इस मुल्क में शताब्दी की ओर बढ़ रहा हूँ! अब भी मुझे संशय है कि मुल्क की जनता आज़ादी में मेरे साथ अधिक सुखी है या तुम्हारे दिनों में ज़्यादा सुखी थी?”
ग़ुलामी ने उसे सैल्यूट करते हुए जवाब दिया, “आयुष्मान भव; यशस्वी भव! ग़ुलामी के दिनों में कुछ एक ग़ुलाम ही अधिक सुखी थे और आज़ादी के दिनों में तुम्हारे साथ कुछ एक लोग ही ज़्यादा सुखी हैं बस; शेष नहीं! … लेकिन मेरे समय में उन शेष के कारण ही मुल्क ने आज़ादी पाई और अब तुम्हारे समय में इन शेष के कारण ही तुम्हारा अस्तित्व है!”
(d) असंतुष्टि :
आज़ादी ने ग़ुलामी से कहा, “हमारे मुल्क के लोगों को मैं या तो रास नहीं आ रही या वे मुझे सही ढंग से समझ ही नहीं पा रहे हैँ! लोकतंत्र क़ायम है, पर संतुष्ट नहीं! सतत तुष्टिकरण के बावजूद जनता संतुष्ट नहीं!”
ग़ुलामी ने उसे सैल्यूट करते हुए कहा, “आयुष्मान भव; यशस्वी भव! तुम रास तो सब को आ रही हो! लोग तुम्हें समझ भी रहे हैं! कुछ अलोकतांत्रिक असंतुष्टों की वजह से तुम पर और लोकतंत्र पर लोग उंगलियां उठाते हैं; चोटिल करते और करवाते हैं!”
(e) ख़तरा :
आज़ादी ने जनता से कहा, “तुम्हारे द्वारा चलाया जा रहा लोकतंत्र विशाल और परिपक्व होते हुए भी ख़तरे में बताया जा रहा है! जागो और जगाओ! अबकी चुनाव में लोकतंत्र बचाओ!”
जनता ने उसे जवाब दिया, “ख़तरे में न लोकतंत्र है और न ही हम! ख़तरे में तो कुछ नेता हैं और उनके राजनैतिक दल, बस!”

पाँच लघुकथाएँ


सुभाष नीरव

लघुकथा-1
बारिश
आकाश पर पहले एकाएक काले बादल छाये, फिर बूँदे पड़ने लगीं। लड़के ने इधर-उधर नज़रें दौड़ाईं। दूर तक कोई घना-छतनार पेड़ नहीं था। नये बने हाई-वे के दोनों ओर सफेदे के ऊँचे दरख़्त थे और उनके पीछे दूर तक फैले खेत। बाइक के पीछे बैठी लड़की ने चेहरे पर पड़ती रिमझिम बौछारों की मार से बचने के लिए सिर और चेहरा अपनी चुन्नी से ढककर लड़के की पीठ से चिपका दिया। एकाएक लड़के ने बाइक धीमी की। बायीं ओर उसे सड़क से सटी एक छोटी-सी झोंपड़ी नज़र आ गई थी। लड़के ने बाइक उसके सामने जा रोकी और गर्दन घुमाकर लड़की की ओर देखा। जैसे पूछ रहा हो – चलें ? लड़की भयभीत-सी नज़र आई। बिना बोले ही जैसे उसने कहा – नहीं, पता नहीं अन्दर कौन हो ?
एकाएक बारिश तेज़ हो गई। बाइक से उतरकर लड़का लड़की का हाथ पकड़ तेज़ी से झोंपड़ी की ओर दौड़ा। अन्दर नीम अँधेरा था। उन्होंने देखा, एक बूढ़ा झिलंगी-सी चारपाई पर लेटा था। उन्हें देखकर वह हड़बड़ाकर उठ खड़ा हुआ।
“हम कुछ देर… बाहर बारिश है…” लड़का बोला।
”आओ, यहाँ बैठ जाओ। बारिश बन्द हो जाए तो चले जाना।” इतना कहकर वह बाहर निकलने लगा।
”पर तेज़ बारिश में तुम…?” लड़के ने पूछा।
”बाबू, गरमी कई दिनों से हलकान किए थी। आज मौसम की पहली बारिश का मज़ा लेता हूँ। कई दिनों से नहाया नहीं। तुम बेफिक्र होकर बैठो।” कहता हुआ वह बाहर खड़ी बाइक के पास पैरों के बल बैठ गया और तेज़ बारिश में भीगने लगा।
दोनों के लिए झोंपड़ी में झुककर खड़े रहना कठिन हो रहा था। वे चारपाई पर सटकर बैठ गए। दोनों काफ़ी भीग चुके थे। लड़की के बालों से पानी टपक रहा था। रोमांचित हो लड़के ने शरारत की और लड़की को बांहों में जकड़ लिया।
”नहीं, कोई बदमाशी नहीं।” लड़की छिटक कर दूर हटते हुए बोली, ”बूढ़ा बाहर बैठा है।”
”वह इधर नहीं, सड़क के पार देख रहा है।” लड़के ने कहा और लड़की को चूम लिया। लड़की का चेहरा सुर्ख हो उठा।
एकाएक, वह तेजी से झोंपड़ी से बाहर निकली और बांहें फैलाकर पूरे चेहरे पर बारिश की बूदें लपकने लगी। फिर वह झोंपड़ी में से लड़के को भी खींच कर बाहर ले आई।
”वो बूढ़ा देखो कैसे मज़े से बारिश का आनन्द ले रहा है और हम जवान होकर भी बारिश से डर रहे हैं।” वह धीमे से फुसफुसाई और बारिश की बूँदों का आनंद लेने लगी।
लड़की की मस्ती ने लड़के को भी उकसाया। दोनों बारिश में नाचने-झूमने लगे। बूढ़ा उन्हें यूँ भीगते और मस्ती करते देख चमत्कृत था। एकाएक वह अपने बचपन के बारिश के दिनों में पहुँच गया। और उसे पता ही न चला, कब वह उठा और मस्ती करते लड़का-लड़की के संग बरसती बूँदों को चेहरे पर लपकते हुए थिरकने लग पड़ा।

लघुकथा-2
सेंध

चाँदनी रात होने की वजह से गली में नीम उजाला था। दो साल पहले इधर आया था। अब तो गली का पूरा नक्शा ही बदला हुआ था। किसी तरह अखिल का मकान खोज पाया। घंटी बजाई और इंतज़ार करने लगा। कुछ देर बाद अंदर कदमों की आहट हुई और बाहर दरवाजे क़े सिर पर लगा बल्ब ‘भक्क’ से जल उठा। अधखुले दरवाजे क़ी फांक में से एक स्त्री चेहरे ने झांका और पूछा- ”कौन ?”
”भाभी, मैं हूँ रमन।”
”अरे तुम ! रात में इस वक्त ?”
दरवाज़ा पूरा खुला तो मैं अटैची उठाये अंदर घुसा। साथ ही बैठक थी। मैं सोफे में धंस गया। नेहा दरवाज़ा बंद करके पास आई तो मैंने सफ़ाई दी-
”ट्रेन लेट हो गई। शाम सात बजे पहुँचने वाली ट्रेन दस बजे पहुँची। ऑटो करके सीधे इधर ही चला आ रहा हूँ। कल यहाँ दिन में एक ज़रूरी काम है। कल की ही वापसी है, शाम की ट्रेन से।”
नेहा ने पानी का गिलास आगे बढ़ाया। पानी पीकर मैंने पूछा, ”अखिल सो रहा है क्या ?”
”नहीं, वह तो टूर पर हैं, तीन दिन बाद लौटेंगे।”
”अरे! मुझे मालूम होता तो मैं स्टेशन पर ही किसी होटल में…”
”अब बनो मत… हाथ-मुँह धो लो। भूख लगी होगी। सब्जी और दाल रखी है। फुलके सेंक देती हूँ।”
खाना परोसते हुए उसने पूछा, ”कोई लड़की पसंद की या यूँ ही बुढ़ा जाने का इरादा है ?”
मैं मुस्करा भर दिया। भीतर से एक आवाज़ उठी, ‘एक पसंद की थी, वो तो पत्नी की जगह भाभी बन गई…’
”तुम यहीं बैठक में दीवान पर सो जाओ। सुबह बात करेंगे, रात अधिक हो गई है।” कहते हुए नेहा तकिया और चादर रखकर अपने बेडरूम में चली गई।
मैं लेट गया और सोने की कोशिश करने लगा। पर नींद आँखों से गायब थी। काफी देर तक करवटें बदलता रहा। मेरे अंदर कुछ था जो मुझे बेचैन कर रहा था। बेचैनी के आलम में मैं उठा और लॉबी में जाकर खड़ा हो गया। लाइट जलाने की ज़रूरत महसूस नहीं की। खुली खिड़की में से छनकर आता चाँदनी रात का उजाला वहाँ छिटका हुआ था। पुराने दिनों की यादें जेहन में घमासान मचाये थीं। वे दिन जब मैं नेहा के लिए दीवाना था। खूब बातें होती थीं पर मन की बात कह नहीं पाया था। जब तक अपने दिल की बात नेहा को कह पाता, तब तक देर हो चुकी थी। मेरे मित्र अखिल ने बाजी मार ली थी।
बैडरूम का दरवाजा आधा खुला था। टहलते हुए एकाएक मैं बैडरूम के दरवाज़े पर जा खड़ा हुआ। नाइट बल्ब की हल्की नीली रोशनी में अकेली सोई पड़ी नेहा का चेहरा बेहद खूबसूरत लग रहा था। रत्ती भर भी फर्क नहीं आया था नेहा में, शादी के बाद भी। कुछ पल मैं उसे अपलक निहारता रहा। फिर इस डर से कि कहीं मेरी चोरी पकड़ी न जाए, मैं वहाँ से हट गया। गला सूखता महसूस हुआ तो मैंने फ्रिज में से पानी की ठंडी बोतल निकाल ली।
”अरे तुम हो! खटका सुन मुझे लगा कोई…” नेहा सामने खड़ी विस्फारित नज़रों से मेरी ओर देख रही थी।
”कोई कौन ?”
”पति के बिना यहाँ रात में बहुत सर्तक होकर सोना पड़ता है। घर में अकेली औरत हो तो सेंध लगाने में देर नहीं करते चोर…”
‘चोर ?’ दिमाग में कुछ ‘ठक’ से हुआ । नेहा के चेहरे की ओर देखने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। मैंने गटागट पानी की पूरी बोतल हलक से नीचे उतार ली।
”लगता है, बहुत प्यास लगी थी ?”
”हाँ…।” मैंने नज़रें झुकाये हुए कहा और चुपचाप जाकर दीवान पर चादर ओढ़कर सो गया।

लघुकथा-3
जानवर
बीच पर भीड़ निरंतर बढ़ती जा रही थी। सूरज समुद्र में बस डुबकी लगाने ही वाला था। वे दोनों हाथ में हाथ थामे समुद्र किनारे रेत पर टहलने लगे। पानी की लहरें तेजी से आतीं और लड़की के पैरों को चूम लौट जातीं। लड़की को अच्छा लगता। वह लड़के का हाथ खींच पानी की ओर दौड़ती, दायें हाथ से लड़के पर पानी फेंकती और खिलखिलाकर हँसती। लड़का भी प्रत्युत्तर में ऐसा ही करता। उसे लड़की का इस तरह उन्मुक्त होकर हँसना, खिलखिलाना अच्छा लग रहा था। अवसर पाकर वह लड़की को अपनी बांहों में कस लेता और तेजी से उनकी ओर बढ़ती ऊँची लहरों का इंतजार करता। लहरें दोनों को घुटनों तक भिगो कर वापस लौट जातीं। लहरों और उनके बीच एक खेल चल रहा था – छुअन छुआई का।
लड़का खुश था लेकिन भीतर कहीं बेचैन भी था। वह बार बार अस्त होते सूरज की ओर देखता था। अंधेरा धीरे धीरे उजाले को लील रहा था। फिर, दूर क्षितिज में थका-हारा सूर्य समुद्र में डूब गया।
लड़के की बेचैनी कम हो गई। उसे जैसे इसी अंधेरे का इंतज़ार था। लड़का लड़की का हाथ थामे भीड़ को पीछे छोड़ समुद्र के किनारे किनारे चलकर बहुत दूर निकल आया। यहां एकान्त था, सन्नाटा था, किनारे पर काली चट्टानें थीं, जिन पर टकराती लहरों का शोर बीच बीच में उभरता था। वह लड़की को लेकर एक चट्टान पर बैठ गया। सामने विशाल अंधेरे में डूबा काला जल… दूर कहीं कहीं किसी जहाज की बत्तियाँ टिमटिमा रही थीं।
”ये कहाँ ले आए तुम मुझे ?” लड़की ने एकाएक प्रश्न किया।
”भीड़ में तो हम अक्सर मिलते रहते हैं…कभी…”
”पर मुझे डर लगता है। देखो यहाँ कितना अंधेरा है…” लड़की के चेहरे पर सचमुच एक भय तैर रहा था।
”किससे ? अंधेरे से ?”
”अंधेरे से नहीं, जानवर से…”
”जानवर से ? यहाँ कोई जानवर नहीं है।” लड़का लड़की से सटकर बैठता हुआ बोला।
”है…अंधेरे और एकांत का फायदा उठाकर अभी तुम्हारे भीतर से बाहर निकल आएगा।”
लड़का ज़ोर से हँस पड़ा।
”यह जानवर ही तो आदमी को मर्द बनाता है।” कहकर लड़का लड़की की देह से खेलने लगा।
”मैं चलती हूँ…।” लड़की उठ खड़ी हुई।
लड़के ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
”देखो, तुम्हारे अंदर का जानवर बाहर निकल रहा है… मुझे जाने दो।”
सचमुच लड़के के भीतर का जानवर बाहर निकला और लड़की की पूरी देह को झिंझोड़ने- नोचने लगा। लड़की ने अपने अंदर एक ताकत बटोरी और ज़ोर लगाकर उस जानवर को पीछे धकेला। जानवर लड़खड़ा गया। वह तेज़ी से बीच की ओर भागी, जहाँ ट्यूब लाइटों का उजाला छितरा हुआ था।
लड़का दौड़कर लड़की के पास आया, ”सॉरी, प्यार में ये तो होता ही है…।”
”देखो, मैं तुमसे प्यार करती हूँ, तुम्हारे अंदर के जानवर से नहीं।” और वह चुपचाप सड़क की ओर बढ़ गई। बीच पीछे छूट गया, लड़का भी।

लघुकथा-4
दर्द
कई बरसों से मेरा उसका साथ रहा है। पहले जब भी मैं उसके सामने होता था, वह मेरी तारीफ़ किया करता था। जैसे-जैसे उम्र का शिकंजा मुझ पर बढ़ता चला गया, वह मुझसे मानो असंतुष्ट-सा रहने लगा। घर से निकलने से पहले अथवा घर लौटने पर जब मैं उसको ‘हैलो’ कहकर मुखातिब होता तो वह मुझमें मीनमेख निकालना शुरू कर देता। प्रारम्भ में वह जो कमियाँ निकालता था, मैं उन कमियों को दूर करने की कोशिश करता था। कोशिश करने पर कुछ कमियाँ दूर हो जाती थीं, पर ज़्यादातर दूर नहीं होती थीं। अलबत्ता, उन्हें उसके सामने छिपा लेने में मैं कामयाब हो जाता था। इस पर वह थोड़ा मुस्कराता तो था, लेकिन जल्द ही फिर से मुझे मेरे वो-वो दोष दिखाने-बताने लग पड़ता था जिन्हें मैं देखना-सुनना कतई पसंद नहीं करता।
उस दिन मैं बेहद खुश था। मैंने उसके सामने ही मूंछों और कनपटी के बालों को डाई किया। वह सारे समय मुझे घूरता रहा। बन-ठन कर जब मैं घर से बाहर निकलने लगा तो मुझे जैसे कुछ याद आया। मैंने उसे ‘बाय-बाय’ कहते हुए उसकी तरफ एक मुस्कान फेंकी। मेरी मुस्कान का उस पर कोई असर नहीं हुआ। वह मुँह बनाये मुझे घूरता रहा।
शाम को घर लौटा तो उसका सामना करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। मैं लुटा-पिटा घर लौटा था। जिस महिला मित्र से मिलने को मैं सुबह बेसब्रा हुआ पड़ा था और जो मुझे अक्सर ‘हाय हैण्डसम’ या ‘यू आर लुकिंग सो स्मार्ट’ कहा करती थी, उसने मुझे पहलीबार ‘हाय ओल्डमैन’ कहा था और जब मैं शाम को उससे विदा हुआ तो मेरी हालत ऐसी थी मानो गुब्बारे में से हवा निकल गई हो। जेब में पड़ा ए.टी.एम कार्ड कराह रहा था। मेरी जेब मातम मना रही थी।
मैं सोफ़े पर लुंजपुंज-सा होकर बैठ गया। एकाएक कई बरस पहले दिवंगत हुई पत्नी का कहा वाक्य कानों में गूंजने लगा -‘मैं न रहूँगी तो रोओगे, देखना…।’ जिन दोनों बेटों के पालन-पोषण में औरतसुख को मैंने बरसों अपने से दूर रखा था, वे एक दिन मुझे नितांत अकेला छोड़कर विदेश में जा बसे थे और पीछे मुड़कर नहीं देखा था। पीछे रह गया था मैं, मेरा अकेलापन और एक वह। सहसा, मुझे लगा, कोई मुझ पर हँसा था, मेरी खिल्ली-सी उड़ाता हुआ। मैंने घर में इधर-उधर देखा। सामने दीवार से पीठ टिकाये वह बड़ी बेहयाई से मुझ पर हँस रहा था।
एकाएक मेरी मुट्ठियाँ कसने लगीं और दांत भिंच गए। मैं अपना आपा खो बैठा। क्रोध में आकर मैंने मेज़ पर से पेपरवेट उठाया और जोर से उसके मुँह पर दे मारा।
वह किरच-किरच हो गया। अब वहाँ एक नहीं अनेक चेहरे मेरा मुँह चिढ़ा रहे थे। कमाल यह था कि वह क्षत-विक्षत होकर भी बेहया-सा मुस्करा रहा था। उसकी मुस्कराहट मुझे चीरती चली गई। एक दर्द मेरे सीने में उठा और मेरी गर्दन उसके सामने झुक गई। मैंने दोनों हथेलियों में अपना चेहरा छिपा लिया और फफक पड़ा।

लघुकथा-5
गुड़िया
“नाशपिटा कहीं का…हद ही कर दी इसने तो।” डेढ़ वर्षीय पिंकी को गोद में उठाये प्रभा बड़बड़ाती हुई बालकोनी से कमरे में घुसी।
“क्या हो गया? इतना गुस्सा किस बात पर ?” प्रकाश ने पत्नी का तमतमाया चेहरा देख पूछा।
“वो सामने वाले ब्लॉक में कोने का दूसरी मंजिल का मकान है न, उसकी बालकोनी में से एक बूढ़ा खूसट कई दिनों से मुझे घूर रहा है।” प्रभा ने पिंकी को बेड पर लिटाते हुए कहा।
प्रकाश ने बाहर बालकोनी में जाकर देखा, एक सफेद दाढ़ी वाला बूढ़ा अपनी बालकोनी में टहलता हुआ उसे दिखाई दिया।
“लगता है कोई नया परिवार अभी हाल में ही आया है।” प्रकाश अंदर कमरे में जाकर प्रभा से बोला जो पिंकी को थपकियाँ देकर सुलाने का प्रयत्न कर रही थी।
“हाँ, बीसेक दिन ही हुए हैं आए को, पर बालकोनी में सिवाय बूढ़े के किसी और को नहीं देखा मैंने। कभी कुर्सी डालकर बैठा मिलेगा, कभी टहलता। मगर नज़रें इधर हमारी बालकोनी पर ही गड़ाए रखेगा, बूढ़ा खूसट ! अपनी सफेदी का भी ख्याल नहीं।” प्रभा का बड़बड़ाना जारी था।
“इन फ्लैटों में बूढ़े बेचारे भी क्या करें। ऊपर टंगे रहते हैं। बालकोनी में थोड़ा टहल लिया या बैठकर धूप सेंक ली…। तुम नाहक बेचारे पर गुस्सा हो रही हो।” प्रकाश ने हँसते हुए प्रभा को समझाने का प्रयास किया।
“बेचारा?… अकेले या पिंकी को लेकर जब भी बालकोनी में जाती हूँ, इस खूसट की नजरें इधर ही गड़ी मिलती हैं। और …और…” प्रभा कहते कहते रुक गई।
“और क्या ?”
“कल शाम तो इसने हद ही कर दी। ये मोबाइल लेकर खड़ा था। मुझे लगा, इसने चुपके से मेरी फ़ोटो भी ली है।”
“क्या? तुमने कल ही क्यों नहीं बताया?” अब तो प्रकाश को भी बूढ़े की इस हरकत पर गुस्सा हो आया।
“अभी जाता हूँ , लेता हूँ इस ठरकी की क्लास।”
“मैं भी चलती हूँ, बूढ़े की ऐसी अक्ल ठिकाने लगाऊँगी कि याद रखेगा। भूल जाएगा ताकना-झाँकना।”
तभी कामवाली आ गई।
“रामरती, पिंकी का ज़रा ख्याल रखना। हम अभी आए।” कहकर दोनों नीचे उतरे और भन्नाए हुए से बूढ़े के मकान की सीढ़ियाँ चढ़ गए।
बेल बजाने पर दरवाज़ा बूढ़े ने ही खोला। उन्हें देख बूढ़े के चेहरे पर मुस्कान तैर गई।
“आओ आओ…अंदर आ जाओ।”
कमरे में नीम उजाला था। दीवार से लगे एक दीवान पर कोई लेटा था। दीवान की बगल में दो कुर्सियां और दो मोढ़े रखे थे। तभी एक अस्फुट-सा स्त्री स्वर कमरे में उभरा, जिसके शब्द प्रभा और प्रकाश पकड़ नहीं पाए। बूढ़े ने कमरे की लाइट जला दी तो कमरे की हर चीज़ साफ साफ दीखने लगी।
“पूछ रही हैं, कौन आया है। पिछले एक साल से अधरंग है इसे। बिस्तर पर ही रहती है।” कहते हुए बूढ़ा, बुढ़िया के करीब सिरहाने की तरफ बैठ गया। तब तक प्रभा और प्रकाश कुर्सियों पर बैठ चुके थे।
“सुखवंती, गुड़िया के मम्मी-पापा आए हैं।”
बुढ़िया ने लेटे-लेटे गर्दन घुमा कर दोनों की तरफ देखा और “अच्छा अच्छा !” कहा जिसे बूढ़ा ही समझ पाया। बुढ़िया ने फिर कुछ पूछा, शब्दों की जगह मुँह से जैसे फूंक-सी निकली हो।
“पूछ रही है, गुड़िया को नहीं लाए?”
प्रभा और प्रकाश ने एक-दूजे की ओर देखा, पर बोले नहीं।
“कल मैंने आपकी गुड़िया की फ़ोटो मोबाइल पर इसे दिखाई तो बहुत खुश हुई। बोली- ये तो बिल्कुल अपनी परी जैसी है।” बूढ़े ने बताया। फिर बूढ़े ने बगल वाली दीवार की ओर इशारा करते हुए कहा, “ये है हमारी परी…।”
दीवार पर एक जोड़ा डेढ़-दो साल की बच्ची को उठाये मुस्करा रहा था।
“ये आपके बहू-बेटा और पोती …” प्रभा के मुँह से बमुश्किल ये शब्द निकले।
“हाँ-हाँ, ठीक पहचाना।” बूढ़े ने चहक कर कहा, “है न हमारी परी आपकी गुड़िया की तरह!” बूढ़े का चेहरा खिला हुआ था।
“ये आपके साथ नहीं रहते?” प्रकाश ने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा।
इस पर बूढ़े का खिला हुआ चेहरा एकदम से मुरझा गया। उसकी आँखें पनीली हो उठीं, “बेटा… अब ये तीनों वहाँ चले गए जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता…”
कमरे का सन्नाटा बहुत देर तक काँपता रहा।
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