
पाँच लघुकथा

प्रगति त्रिपाठी
बैंगलुरु
लघुकथा-१
इंस्टेंट
होश आते ही, अपने आपको अस्पताल की बेड पर लेटे हुए, हाथ में सलाइन की बोतल लगी हुई, पास में पापा और मम्मी को चिंतित देखकर मनोज घबड़ा गया।
“मुझे क्या हो गया था? मैं तो ठीक ही था। रोज की तरह जिम कर रहा था।” आशंकित मनु सवाल पर सवाल करता जा रहा था।
डाॅक्टर साहब ने कहा “घबड़ाने की कोई बात नहीं, अब आप खतरे से बाहर है।” “लेकिन मुझे क्या हुआ था डाॅक्टर साहब? मैं तो बिलकुल फिट हूं। मुझे कोई बीमारी नहीं है।”
“आपको माइनर हार्ट अटैक आया था।”
“क्या??” इतना सुनते ही मनोज भौंचक्का रह गया।
“यह बाॅडी बनाने के लिए जो सप्लीमेंट आप ले रहे थे ये उसी का परिणाम है। सप्लीमेंट्स और प्रोटीन पाउडर का ज्यादा सेवन करने से ब्लड फ्लो प्रभावित होता है। जिसकी वजह से हार्ट स्ट्रोक और अटैक का खतरा काफी ज्यादा बढ़ जाता है।”
“लेकिन वो तो जिम ट्रेनर के कहने पर ही ले रहा था। उन्होंने कहा था ये दवाएं आजमाए हुए हैं, इसका कोई नुकसान नहीं है।”
“आजकल सबको इंस्टेंट सफलता चाहिए। आपको भी, आपके जिम ट्रेनर को भी।” चिंतित स्वर में डाॅक्टर ने कहा।
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लघुकथा-२
आचरण
परिचर्चा के लिए शहर के सम्मानित लोगों को बुलाया गया था। मंच पर परिचर्चा शुरू हुई। दोनों तरफ के अतिथि अपनी बात सही ठहराने के लिए आपस में भिड़ गए। एक अतिथि ने दूसरे पर दोषारोपण किया तो प्रतिकार में दूसरे ने उनकी इज्जत उछालनी शुरू कर दी। धीरे-धीरे लड़ाई अब व्यक्तिगत रूप लेने लगी। बात इतनी बिगड़ गई कि दोनों एक दूसरे को मारने की धमकी तक देने लगे।
मंच की प्रतिष्ठा धूमिल होते हुए देखकर आयोजक दोनों पक्षों को शांत करने की कोशिश करने लगे। इस हंगामे के बीच परिचर्चा का मूल विषय’जीवन में शिष्ट आचरण का महत्व’ कहीं लुप्त हो गया।
***
लघुकथा-३
एफ. आई. आर.
दर्द से कराहती आशा, अपने ज़ख्म सहला रही थी। तभी ऑफिस के उनके सहयोगी मिश्रा जी पहुंचे और घर खुला देखकर आनन-फानन में मैडम के कमरे में पहुंचे तो उनकी स्थिति देखकर अचंभित रह गए।
“आपकी ये हालत किसने की? घर के नौकर-चाकर कहां है?”
मैडम को कुर्सी पर बिठाते हुए पूछा।
“कुछ नहीं… वो मैं गिर गई थी।”
“और नौकर-चाकर?”
“आज वो छुट्टी पर हैं।”
“आपको किसने मारा? झूठ मत बोलिएगा। इतने साल से इस नौकरी में हूं, इतना तो अनुभव है मुझे कि गिरने के ज़ख्म और मारने-पिटने के निशान में फ़र्क होता है।”
“र…रूपेश…मेरे पति।”
“आपका तो उनसे तलाक हो चुका है, फिर आप क्यों सहन कर रही है? आपके एक कम्पलेन से वह आदमी जिंदगी भर जेल में चक्की पीसेगा। लगता है आप भूल चुकी है कि आप इस शहर की एस.पी है।”
मिश्रा जी ने आशा के पद और ताकत को याद दिलाते हुए कहा।
“एस.पी हूं इसलिए तो चुप हूं।”
“मतलब?”
“मिडिया में जब ये बात फैलेगी तो लोगों का मुझ पर से विश्वास उठ जाएगा। वो क्या सोचेंगे, जिनसे वो न्याय की आस लगाए बैठे हैं, वो खुद घरेलू हिंसा की शिकार हैं?”
“ये तो आपने सोच लिया लेकिन आपने ये नहीं सोचा कि आप अपने बच्चों और समाज को कितना गलत संदेश दे रही हैं। कल को पलक बिटिया के साथ ऐसा …
“नहीं…नहीं ऐसा कुछ नहीं होगा पलक के साथ।”
जैसे नींद से जागते हुए कहा।”
“आप अभी कंप्लेन लिखिए।”
मिश्रा जी को पेपर और पेन थमाते हुए बोलीं,
आरोपी – रूपेश महतो
शिकायतकर्ता – एसपी आशा महतो।
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लघुकथा–४
गिरगिट ”
ये क्या? आप उसकी हां में हां क्यों मिला रहे थे?,” माला उतावली होकर बोली। “सब्र करो माला, पहले उसे घर आने दो। हम उसे प्यार से समझाएंगे। अभी कुछ कहा तो लड़की हाथ से निकल जाएगी।,” मनोज ने फोन रखते हुए माला को समझाया। आशा के घर आते ही उससे मीठी-मीठी बातें करके कड़वे घूंट पिलाया जाने लगा। “देख आशा! तू अभी नासमझ है, तुझे दुनिया की समझ नहीं है। एक तो लड़का कुछ करता नहीं है और फिर हमारे जाति का भी नहीं है। सोच, समाज में हमारी कितनी बदनामी होगी। हमारा घर से बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा। ये शादी नहीं होगी।”, माला ने फरमान सुना दिया। “मां, शायद आप भूल गई है कि भैया ने भी लव मैरिज की है और वो भी दूसरे जाति की लड़की से तब आपकी समाज में बदनामी नहीं हुई और मेरे लव मैरिज करने से आपकी समाज में बदनामी कैसे हो जाएंगी?
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लघुकथा-५
बेड़ियां
सुबह-सुबह घर में कोहराम मचा था। दोनों बहुएं, बेटे और तीनों तितलियां दादी के रूद्रावतार से थर-थर कांप रही थी।
“आप कुछ भी कर लीजिए, मैं तो बाहर पढ़ने जाऊंगी।” छोटकी ने चिल्लाते हुए कहा।
घर की बेटियों पर लगाई गई बेड़ियों की चाभी दुलारी दादी के पास थी। कौन कब कहां जाएगी, कितने बजे लौटकर आएगी, एक – एक मिनट का हिसाब रहता था उनके पास।
किसी की मजाल थी कि वो समय से एक मिनट भी देरी से घर पहुंचे। तभी तो वो हिटलर दादी के नाम से मशहूर थी। चारों तितलियां, हां दादी घर की चारों बेटियों को इसी नाम से बुलाती थी। उन्हें सीमा से परे उड़ान भरने की इजाजत नहीं थी।
तीनों दादी से थर -थर कांपती लेकिन छोटकी में ना जाने कैसी निडरता और बेबाकी थी जो उनकी पकड़ से फिसलती जा रही थी। उसे तो हर काम लक्ष्मण रेखा के परे ही करनी थी।
उसका ये विद्रोही रूप देख, दादी अतीत में चली गई।
“मुझे मत ब्याहों अम्मा।” वह अपनी अम्मा के सामने गिड़गिड़ाई थी। लेकिन अम्मा ने उनकी एक न सुनी और गुड़ियों से खेलने की उम्र में गृहस्थी की आग में झोंक दिया। एक – दो बार ससुराल से भागने की कोशिश की तो इतनी पिटाई हुई कि दुलारी ने स्वयं अपने पांव में बेड़ियां बांध ली। दुबारा मायके का मुंह नहीं देखा और स्वयं को भी क्रूर और निर्दई बना लिया।
आज वही ज़िद, विद्रोह उन्हें छोटकी की आंखों में नजर आ रहा था। दुलारी के दिल में वर्षों से भरा हुआ ज्वालामुखी फट गया और उन बेड़ियों को मोम की तरह पिघला कर ठंडा कर गया।
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पाँच लघुकथा 
संतोष सुपेकर
लघुकथा- १
ब्रोकन विंडो थ्योरी
“उन्होंने तुम्हें बहुत डाँटा, बहुत अपमानित किया, तुम्हें कमजोर, डरपोक, असफल कहा था न!” मैंने ‘था’पर जोर देते हुए कहा,”और कल वे इस दुनिया से चले गये! बहुत बुरा किया उन्होंने तुम्हारे साथ लेकिन अब उनको और उस घटना को भूलो, अब तो वे रहे नहीं|”
“लेकिन अंकल! उनका दिया स्ट्रेस स्टील मुझे…” भोला-भाला अंकित अभी भी बहुत तनाव में था,”उन्होंने मुझे इतना हर्ट….”
“बहुत गलत हुआ बेटा पर समय का तकाजा यही है कि जो भी हुआ उसको भूलो और ज़िंदगी में आगे बढ़ो| और हाँ, एक जरूरी बात! इस बारे में अब सोचना बंद कर दो और कभी किसी को यह सब बताना भी मत|”
” इतना अपमान, कैसे भूल जाऊँ अंकल? उन्होंने मेरी जिंदगी की गाड़ी में ऐसी ब्रेक लगा दी… ”
“ब्रेक रिलीज हो जाते हैं बेटा, समय के साथ| अच्छा सुनो, साईक्लोजी में एक ‘ब्रोकन विंडो थ्योरी’ है ! इसमें एक नई गाड़ी को कुछ दिनों के लिए यूं ही सड़क पर छोड़ दिया गया पर उसको किसी ने कुछ नहीं किया….फिर उसकी एक विंडो को हथौड़े से तोड़ कर छोड़ दिया गया फिर क्या था… फिर तो लोग उसके एक एक पुर्जा निकालकर ले गए…जैसे कि लोगों को परमिट मिल गया हो…मैं मानता हूँ कि टूटे हुए इंसानों के साथ भी यही होता है| कभी टूटो भी तो किसी को बताओ मत…कोई टूटा हुआ इंसान दिखता है तो अधिकतर तो लूटने, मजा लेने की मंशा ही रखते हैं| बहुत कम ही होंगे जो संभालने को आगे आयेंगे,समझे!”
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लघुकथा-२
परतें खुलते ही
“अंकल ये आधार कार्ड यहाँ क्यों छोड़े जा रहे हैं?” ऑनलाइन सेंटर के कर्मचारी मुरारी ने उस बुजुर्ग को आवाज दी,”ये गलती कभी मत करिए|”
“ओह थैंक्स!”
“इतनी बड़ी भी गलती नहीं है|” पास बैठा रॉबिन मुस्कुराया,” रोज तो आते हैं यहाँ, पड़ा रहा तो ले जाएँगे फिर!”
“नहीं-नहीं, ये इतनी छोटी बात नहीं| देखो, शायद ऐसी ही कोई भूल हुई होगी इन साहब से !” मुरारी ने अखबार की एक खबर दिखाते हुए कहा,”जिन्होंने साइबर ठगों द्वारा ‘आतंकी फंडिंग’ में नाम जोड़ने की फर्जी धमकी से परेशान होकर आत्महत्या कर ली।”
“क्या हुआ था?”
“भाई, किसी व्यक्ति ने उनके नाम पर …बैंक में फर्जी खाता खोलकर और उसमे बड़ी राशि जमा कर उन्हें आतंकी फंडिंग से जोड़ने की धमकी दी थी। उनका भी आधार कार्ड या उसकी जेरॉक्स शायद किसी के हाथ लग गया होगा…झूठे आरोप और ‘देशद्रोही’ ठहराए जाने की आशंका ने उन्हें मानसिक रूप से बेहद परेशान कर दिया था …”
खबर की परतें खुलते ही एक हाहाकारी सन्नाटा छा गया भीड़ वाली जगह पर |
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लघुकथा-३
खड़े हुए लोग
“एकलव्य को नहीं जानते?” भीड़भरी बस में बैठे गुरु ने अपने शिष्य से कहा, ” थोड़ा इतिहास भी पढ़ा करो। एकलव्य महान गुरुभक्त था, जिसने गुरु द्रोणाचार्य की मूर्ति को अपना गुरु मानकर स्वयं धनुर्विद्या सीखी और मांगने पर अपने गुरु-भक्ति के प्रमाण के रूप में अपने अंगूठे को काटकर गुरु दक्षिणा में दे दिया।”
“हम अगर एकलब होते तो अपने दोनों ही अंगूठे काटकर फेंक देते!” गुरु शिष्य की बातें सुन उनकी सीट के पास खड़ा आदिवासी युवक अचानक बोल पड़ा|
“क्यों भाई?” गुरुजी ने अचकचाकर सिर उठाया और उसे घूरकर देखा|
“अंगूठा लगवाकर ही तो वो साहूकार हमरी सारी जमीन हथिया बैठा है! न होता अंगूठा और न जाती जमीन!!”
और आवाज़ सिसकियों में बदल गयी |
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लघुकथा-४
मिलता-जुलता मामला
“मेरा जूता है जापानी ये पतलून इंग्लिस्तानी…”
“झूठ झूठ सब झूठ …” मगन होकर वह बहुत पुराना फिल्मी गीत गा रहा था तो मैंने टोक दिया,”न उस फिल्मी हीरो का और न तुम्हारा जूता जापानी है| सब झूठ…”
“नहीं यार” उसने भोलेपन से कहा, “सब झूठ नहीं, कुछ-कुछ सच्चाई है – दिल तो हिन्दुस्तानी है ही और सच्चाई से ज्यादा इसमें एक फलसफा भी बहुत इंट्रेस्टिंग है, इसका एक अंतरा सुनो – ‘होंगे राजे राज दुलारे, बिगड़े दिल शहजादे/ हम सिंहासन पर जा बैठे, जब-जब करे इरादे ।’ देखा आपने, कितने कम शब्दों में कविराज जी ने लोकतंत्र की परिभाषा सिखाई है! ”
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लघुकथा-४
विध्वंस का निर्माण
“बेटा, बड़े होकर क्या बनोगे?”
पेड़ के नीचे खड़े व्यक्ति ने अपने सात वर्षीय पुत्र से पूछा।
“मैं और बड़ा होकर मरूंगा।”
बच्चा तो कुछ बोल नही पाया पर वृक्ष बोल पड़ा,”बल्कि काटा जाऊंगा, मारा जाऊंगा और फिर बनूंगा बाज़ार! सोफा, कुर्सी, मेज़, शो केस के रूप में तुम मनुष्यों के लिए सजता हुआ बाज़ार।”
लघुकथा-५
सभ्यताओं, सुनो
“रिवॉल्वर, बन्दूकों का निर्माण रुक भी कहाँ रहा है ?” शादी की बारात में हर्ष फायरिंग में एक नौजवान की अचानक हुई मौत पर दो साहित्यकार मित्र गम्भीर चर्चा में मग्न थे, “पॉइंट 44 मैग्नम, 605 मॉडल, एके-56, एके-47, 75 राउंड ड्रम मैगजीन और भी पता नहीं क्या-क्या। दुनिया में रोज नये-नये हथियार बन रहे हैं।”
फिर एक मित्र ने एकाएक एक नयी बात छेड़ी, “मेरे दिमाग में आता है, हमारी पिछली और वर्तमान पीढ़ियों ने जिस शिद्दत से, जिस लगन से बन्दूकें, रिवॉल्वर, मैगजीन, बुलेट बनाईं उस शिद्दत, उस लगन से उनसे बचाव के उपकरण नहीं बनाये।”
“बनाया तो है, बुलेटप्रूफ जैकेट !” “नहीं-नहीं, वो तो, वो तो बुलेट से आंशिक बचाव है। वो तो गोली चल जाने के बाद का बचाव है। उसमें चेहरा कहाँ सेफ होता है ? फिर वो सर्वसुलभ भी कहाँ है, उसे खरीदना क्या सबके बस में है ? उससे सरल तो हथियार खरीदना हो गया है।”
“अभी भी तुम्हारा मन्तव्य स्पष्ट नहीं हुआ।” दूसरे मित्र ने उलझन भरे स्वर में कहा।
“मेरा मतलब है जैसे मोबाइल फोन के सिग्नल्स रोकने के लिए जैमर, ब्लॉकर होता है, बीमारी की रोकथाम के लिए वैक्सीन होती है ऐसा कुछ, प्रिवेंशन, मसलन कोई गैस, कोई कवच, कोई अदृश्य सा सुरक्षा घेरा, कोई इन्स्ट्रूमेंट बनाने की जरूरत कभी क्यों नहीं समझी गई कि बन्दूक से, रिवॉल्वर से गोली या तो निकले ही नहीं या निकलते ही बेअसर हो जाए, इंसान पर असर ही न कर पाए !”
“खूब सोचा भाई।” दूसरे ने प्रशंसात्मक नजरों से मित्र को देखते हुए वास्तविकता बयान की, “सच तो यह है कि हम दुनिया में कहीं के भी रहने वाले हों, हमारी अन्दरूनी सोच विध्वंसात्मक, नकारात्मक ही रही है। इसलिए इस तरह की सोच कभी विकसित नहीं हो पाई। हम जिन्दगी, जीवन की बात जरूर करते हैं पर हममें से अधिकतर के अन्दर एक हत्यारा छिपा हुआ है वरना मौत के इन हथियारों के साथ-साथ ही इनको बेअसर कर देने वाले कुछ अनोखे उपकरण कबके बन जाते। इस मौके पर मुझे तो कवि जोन्स मैकेस की बात याद आती है – सभ्यताएँ तबाह हो जाती हैं क्योंकि वे अपने राजनेताओं की सुनती हैं, अपने कवियों-साहित्यकारों की नहीं।”
पाँच लघुकथा

सुमिता शर्मा
लघुकथा-१
डिजायनर
पूरे शहर में क्या देश की भी किसी ख़बर में नमक नहीँ बचा था।धरती भर चुकी थी ऐसे डिजायनर बच्चों से जिनके लिए माँ बाप जन्म के पहले से ही एक बड़ी रक़म चुकाते चले आ रहे थे। संस्थान में बड़े बड़े चेम्बर थे वैज्ञानिकों और ज्योतिषियों के जो मोटी रकम वसूलते सिर्फ मुहूर्त बताने और बच्चे में मनपसंद जीन्स डालने के लिए।
किसी की भी रुचि साधारण और सरल सन्तान के लिए नहीँ बची थी और न जीवन मे कोई संवेग बचे थे।
बस सफलता का खुमार और नाकामी का ग़ुबार बाकी बचा था।
ऐसे में गुलज़ार थे तो बस वृद्धाश्रम वो भी ऐसे नाकाम बुजुर्गों से जो अब तन मन धन से खाली थे। रोज़ भगवान के आगे रोते की क्या कमी कर दी हमने।
कभी कभी वहाँ कार्यरत एक संवेदनशील युवक से जो उनके दुःख बाँट लेता था।
एक बुज़ुर्ग ने पूछा कि तुम्हारे सँस्कार बहुत भले हैं इस शहर के नहीँ लगते।
वो मुस्कुरा कर बोला “किसान का बेटा हूँ इसलिए आगे नहीँ बढ़ पाया।”
अब वो सूनी आँखे छलछला उठीं,जिन्हें उनके डिज़ाइनर नौनिहालों ने बुढ़ापा भी डिज़ाइनर ही लौटाया था।
***
लघुकथा-२
पाप
किसी को वाणी से भी कष्ट पहुँचाना पाप है,“ नौ वर्षीय बालिका ज़ोर-ज़ोर से पढ़ रही थी।
पर उसके मन के समुन्दर में उठते प्रश्नों के उत्तर नहीं मिले,जिसके लिये उसे दादी ने गर्भ गीता पढ़ने को कहा था।
पहली बार जब दादी ने उससे नागिन कहा था तो उसने चौंककर अपने हाथ पाँव देखे ,बिल्कुल इन्सानी ही थे।
दोबारा फिर साँपिन..कहा
जब वह मुँह चिढ़ाकर भाग गई तो माँ ने भी मार दिया,तेरे बाप नहीं है,बिना गलती भी गलती मानना सीख ले।
दादी मुझे माफ़ कर दो पर बताओ न नागिन साँपिन क्यों कहती हो
क्योंकि तू अपना बाप खा गई,पिछले जन्म की पापिन है
पर मैंने तो बस रोटी खाई ,बाप को नहीं खाया ,मेरी थाली में कभी बाप थे ही नहीं।
तेरी जबान कैंची की तरह चलती है यह भी पाप है,दादी गुस्से से बोली
मेरे पाप आपको कैसे पता, मुझे कौन बतायेगा,मैंने क्या गलती की
ये ले गर्भ गीता इसी में खोज अपने पाप मेरा सिर मत खा।
पूरी किताब पढ़ डाली पर उसे बाप को खाने वाला पाप मिला ही नहीं
मुन्नी चल गेंहूँ साफ़ करवा और कंकड़ ठीक से चुनियो कम्बख़्त
दादी कम्बख़्त कौन होता है,बालिका ने फिर सवाल किया
“जिसके बाप मर जाते है”,दादी ने उत्तर दिया
“आपके बाप हैं”?
“नहीं ..उन्हें मरे तो तीस बरस हो गये”
“अरे वाह दादी !सेम टू सेम पाप ,
“आप भी कम्बख़्त मैं भी,”
“आप भी नागिन मैं भी”
“आप भी साँपिन मैं भी “बालिका ख़ुशी से ताली पीटकर बोली…
दादी का मुँह सदमे से सफ़ेद पड़ गया,
तब तक पास बैठी हुई माँ का एक झन्नाटेदार थप्पड़ बालिका के गाल पर पड़ा।
बालिका रोते हुए बोली किताब में ” शठे शाठ्यम समाचरेत् ।।” भी लिखा था।
और साथ में फूट फूटकर रोती हुई दादी के कानों में उसके ही कहे नागिन ,साँपिन,कम्बख़्त शब्द दोगुनी गति से गूँज रहे थे…
***
लघुकथा-३
फ़ीनिक्स
प्रेम ने बरसों बाद भी मृत्यु पर विजय सिद्ध की थी,खेत मे बनी समाधि फूलों से लहक रही थी।
जब वो उसे अंतिम बार देखने गयी थी तो उसका वीरू ज़मीन में मुँह के बल पड़ा एक शव मात्र था
मेले से लाया गया,उसका दिया वो छोटा सा लॉकेट ख़ून से सना था ,उंगलियों में पड़ी उसकी सगाई की अँगूठी आसमान में उड़ते गिद्धों को मुँह चिढ़ा रही थी।
दुश्मन दुश्मनी निकाल आगे बढ़ चुका था,अब बस सन्नाटा शेष था और उस जमीन के टुकड़े पर चन्द आँसूं….
ह्रदय का रक्त मिट्टी में बहकर धरती से एकाकार हो चुका था ,उसी जगह उसका मन्नत का गेंदे का कुचला हुआ फूल भी छूट गया था
आँख और आसमान के बरसने से गेंदा उगा और खिला भी …..
पनीली आंखे प्रेम का दमन पर अंकुरण देख रहीं थीं, जँग के लम्हे सदियों से बड़ी ज़िन्दगी पर सदा भारी होते हैं,पर प्रेम तब भी उगता है।
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लघुकथा-४
खजूर
कितनी देर लगेगी हॉस्पिटल पहुँचने में,मिसेज खन्ना बेचैन थीं,उनकी आँखों के सामने बेटे से मिलने का आख़िरी मंज़र घूम गया…
” खूबसूरत पेटिंग्स बनाते हो तुम मम्मी की तरह बनोगे या पापा की तरह,? ”
सत्रहवें जन्मदिन की भव्य पार्टी में कामयाब मातापिता की संतान से सवाल पूछा गया..
मैं ड्राइवर अंकल की तरह बनना चाहूँगा, अकस्मात सबकी नजरें ,आयुष की ओर घूम गयीं…
वो हमेशा अपने बच्चों के साथ मेरी भी हर ज़रूरत पर मेरे पास ही होते हैं,हर कॉल पर डोन्ट डिस्टर्ब का नोटिस नहीं देते”
मिस्टर खन्ना ने खोखली हँसी हँसते हुए कहा ….
“हर चीज़ तुम्हारे पास ग्रैंड रहे इसीलिये तो हम कमा रहे हैं….
आप दोनोँ को टॉप होने का जुनून है, जहाँ कोई और न हो…
शायद तभी मेरे पास अकेलापन भी ग्रैंड है, हमेशा से …बोलते हुए आयुष की आँख नम हो गयीं…
हॉस्पिटल में जिन्दगी ने मौत को मात दे दी थी…
सामने लगी पेन्टिंग के भावों पर नज़र पड़ते ही दोनोँ एक दूसरे से शर्मिन्दा से हो गये..
गीत और रँग कभी कभी मन की जटिलताओं को भी खोलते है…मिस्टर खन्ना के कानों में उनके दिवंगत पिता की आवाज़ गूँजी,
दूर हवा में गाना तैर रहा था,”बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर…
एक क्लिक में कुछ असाइनमेंट कैंसिल कर दिये गये।
भविष्य के सनक की दीमक से वर्तमान अब भयमुक्त था…
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लघुकथा-५
आईना
छोटे मुझे माफ़ कर दो मतलबपरस्त बड़े भाई के स्वर में आवश्यकता से अधिक विनम्रता थी।
“दो वर्णों के संयोजन से बना शब्द माफ़ी किसी मरहम से कम नहीं होता पर ज़ख्म सूख जाये तो मरहम भी बेअसर हो जाता है”
भैया आपको माफ़ी माँगनी है तो मेरी पत्नी से माँगिए
अरे! हर परिवार में तो प्रॉपर्टी वाले झगड़े ,मारपीट होती रहती है,लड़ाई में कोई किसी को घी नहीं परसता।
पर कामकाज में सब को एक होना पड़ता है ,लोग कहेंगे कि इनका परिवार एक नहीं है,रावण दहन पर हमेशा खानदान साथ रहा है स्टेज पर
तब तक छोटे भाई की पत्नी रमा ने अंदर आते हुए कहा,हम आयेंगे पर एक शर्त है
इस बार दहन में रावण की जगह दुर्योधन दुःशासन के पुतले रखवाईये।
देखो ,रावण का पुतला तो सीता हरण के पाप के कारण जलाया जाता है,द्रौपदी चीर हरण उनका पारिवारिक विवाद था”बड़े भाई ने ज्ञान बघारते हुए कहा
पारिवारिक विवाद पर युगों युगों से इतनी चुप्पी किसलिये?,
पुरखों के समय से रीति यही हैं हमारे समाज की
रमा -अच्छा तो फ़िर मंच पर सबके सामने एक बात पूछूँगी “मैं चरित्रहीन हूँ ,आप इस घर में बेटी देंगे या बेटी लेंगे?भैया !,
भैया के सम्बोधन पर विशेष ज़ोर था,
बड़े भाई के कानों में भरी भीड़ के सामने मामूली विवाद में रमा को कहे गए चरित्र सूचक शब्द गूँज उठे।
सामने टीवी पर द्रौपदी चीरहरण का दृश्य चल रहा था, और रमा की आँखों में दुःशासन दहन का युगों से चिर-प्रतीक्षित प्रश्न?
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