
पाँच लघुकथआ

ज्योत्सना सिंह
ओमेक्स गोमती नगर
लखनऊ
लघुकथा-१
आज़ाद परिंदे
सदर बाज़ार के बीचों-बीच बनी सबसे ऊँची कोठी के द्वार पर खड़ी होकर उसने पुकारा-
“सुन ओ रंगरेज़!”
रंगरेज़ सुन कर भी अनसुना करते हुए अपने पतीले में नारंगी रंग घोलता रहा। माहे ज़श्ने आज़ादी है। उसे बहुत सारे केसरिया दुपट्टे रंगने थे। फिर यह बड़ी कोठी वाले बेवज़ह का रौब दिखाकर अपना काम करवाएँगे। मैं क्यों किसी की बेगार करूँ? लेकिन पुकारने वाली आवाज़ बहुत खनकती हुई थी। दिल तो किया कि एक बार नज़रे उठाकर उस तरफ़ देख लूँ लेकिन उस्ताद की बात जैसे कानों में शोर करने लगी ‘औरत की एक बार भी सुन ली तो समझ ले जमूरे ज़िंदगी भर सुननी पड़ेगी।’ उसने खौलते दूसरे पतीले में हरा रंग डाला और लकड़ी से इतनी ज़ोर से घुमाया कि ऐसा लगा मानो उड़ती हुई भाँप भी हरी हो गई हो। तभी फिर से आवाज़ आई-“ अरे ओ रंगरेज़ा तुझे ही पुकार रही हूँ।बोलता क्यों नहीं? क्या बाबा के लठैत भेजूं तभी सुनेगा?” उसे फिर उस्ताद याद आए। बड़े घर की न दोस्ती अच्छी न ही दुश्मनी अच्छी।’ अब बीच का रास्ता निकालना पड़ेगा। बिना सिर उठाये ही बोला-“कहिए क्या काम है?”
“कपड़े रंगता है तो रंग ही करवाऊँगी।दर्ज़ी का काम तो दे नहीं दूँगी।”
“बताइए कौन सा रंग करना है और हाँ वक़्त लगेगा। पहले से ही कई काम हाथ में ले रखे हैं। उन्हें पूरा करके ही आपका काम करूँगा।”
“अच्छा! बड़ी हिम्मत है रे तेरे में?”
“भला इसमें हिम्मत की क्या बात? सच कह रहा हूँ।”
“और जो मेरे बाबा ने हुक्म भेज दिया तो?”
“ज़वाब तो बहुत करारा दे सकता हूँ पर दूँगा नहीं।” बुदबुदाते हुए उसने सारे संतरी दुपट्टे निकालकर एक तसले में रख दिए। उसके हिलते होंठ देखकर वह खिलखिला उठी और बोली-
“जा देख ली तेरी दम! नहीं कहती बाबा से डर मत पर मेरी तरफ़ तो देख। मेरा रंग तो सुन।”
“रंग बोल दो और दुपट्टा भेज दो।”
“दुपट्टा नहीं है। साड़ी है। आसमानी रंग से रंग दे और ब्लाउज़ के रंग का आँचल रंग दे।”
“भेज दो।” बिना उसकी तरफ़ देखे ही वह फिर बोला।
वह स्त्री थी उसे अपनी इतनी अवहेलना नगवारा गुजरी। दरवाज़े के बाहर आ खड़ी हुई और बोली-
“ये रही साड़ी और ये रहा ब्लाउज़। अब रंग!”
उसका बेबाक रूप उसे पसीने-पसीने कर गया और वह मुस्कुराए जा रही थी। शायद अपनी जीत पर या फिर उसकी उठी हुई आँखों पर। वह एक बार फिर से ख़ुद से बोलने लगा-“आज़ाद परिंदे भी एक हद में ही अच्छे लगते हैं।”
***
लघुकथा-२
चप्पल
सख़्त एड़ियों की फटी दरारों का दर्द दिन भर नंगे पाँव कच्ची रसोई से पक्के कमरें तक चलते हुए उन्हें कभी भी पता न चला था।
रात में दिन भर की थकान उस दर्द का एहसास होने से पहले ही उन्हें नींद की आग़ोश में ले लेती।बाबू जी के पाँव जब भी अम्मा के पाँव से बिस्तर पर एकाकार होते तो बाबू जी को उनके दर्द का एहसास ज़रूर हो जाता।
ऐसा नहीं की बाबू जी ने उनके लिये कभी चप्पल ख़रीदी न हो पर बात उस वक़्त की है जब घर में बच्चे ज़्यादा और चप्पल कम हुआ करती थी।
जब भी अम्मा की चप्पल आती उससे पहले किसी न किसी बच्चे के पाँव के नीचे से तलावा खिसक चुका होता। वह अम्मा के चौके के सामने उतरी चप्पल पहन अपनी अचानक आई उस कमी को पूरा कर लेता और वह फिर नंगे पाँव रह जाती।
इसी तरह के जद्दोजहद में ज़िंदगी चलती रही।
वक़्त ने करवट बदली और जैसे-जैसे बच्चे बढ़ने और बनने लगे चप्पल की जोड़ियाँ भी घर में बढ़ती गई।
पहली बार बहू देखने जाने के वक़्त जब बेटे ने अपनी कमाई से सिल्क की साड़ी और चमड़े की चप्पल लाकर उन्हें दी तब बाबू जी ने उनको उस रूप में देख छेड़ते हुए कह ही दिया था-
“बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम!”
अम्मा भी यूँ लजाई जैसे नई नवेली दुल्हन!
सुख के दिन आए और घर बाहर दोनों के लिये चप्पल की अलग-अलग जोड़ियाँ उनके कमरें में रहने लगी।
बढ़ती उम्र के साथ उनके पैरों ने उनका साथ देना छोड़ दिया।धीरे-धीरे उन्होंने चारपाई पकड़ ली।
उनके पैरों को फिर से हरकत में लाने की पुरज़ोर कोशिश में बाबू जी पैरों की मालिश करते हुए बिस्तर के पास पड़ी उनकी चप्पल को देख बोल उठे-
“वाह!री क़िस्मत जब पाँव थे तब तू न थी और अब तू है तो क़दम ख़ामोश हैं।”
अम्मा ने उनके हाथों को थाम कहा-
“जो तब था वह अब भी है।”
और उनके नयन सजल हो गये।
***
लघुकथा-३
उनके जूते
सही तरह से मुझे याद भी नहीं आता की कब से वह हमारे यहाँ अपनी सेवा दे रहे थे।
हाँ, मैंने उनकी जवानी को बुढ़ापे में तब्दील होते अपने ही घर में देखा था।
बचपन के खेल-कूद क़िस्से-कहानियों से लेकर शहर जा पढ़ाई करने तक वह ‘ऐट योर सर्विस’ बनकर मेरे साथ ही रहे थे। पढ़ाई के लिए शहर जाते वक़्त पिताजी का सख़्त आदेश था-“ नील, क़ादिर तुम्हारे साथ जायेंगे।घर से दूर कोई तो अपना होना चाहिये ख़्याल रखने को।”
मैंने भी पिताजी से कोई प्रतिवाद नहीं किया और क़ादिर चाचा के साथ ख़ुद को साबित करने के लिये शहर आ गया था। वह तब तक मेरे साथ रहे जब तक कि मैं ख़ुद के पैरों पर खड़ा नहीं हो गया।
क़ादिर चाचा को ताउम्र मुझसे बस एक ही शिकायत रही कि मैं अपने जूते कभी सही से नहीं उतारता और लापरवाही से उतारे जूते-चप्पल अक्सर एक पर एक चढ़ जाते और वह अपने हक़ में थोड़ा रोष मिला कर कहते-
“छोटे साहब, आपको कहा तो है मैंने जूते एक पर एक चढ़े हों तो बेवजह का सफ़र करना पड़ता है। ध्यान से उतारा करिये।”
मैं उनकी बात अनसुनी करके अगली बार फिर वही ग़लती दोहरा देता।
शहर आने से पहले वाली रात भी मेरे जूते का वही हाल था और वह द्रवित मन से बोल ही पड़े थे-
“लो देख लो अब बेवजह ही तो घर-बार छूट रहा है।तालीम तो यहाँ रहकर भी ली जा सकती है।”
पहली बार माँ ने भी अपने आँसुओं को छुपाते हुए उनकी बात का समर्थन किया था।
क़ादिर चाचा की बात और मेरे जूतों के बीच न जाने कैसी साँठ-गाँठ थी कि जब भी मुझे कहीं जाना पड़ता तब मेरे जूते उनकी बात को सच कर ही देते थे।
आज सवेरे-सवेरे ही माँ के फ़ोन से पता चला क़ादिर चाचा दुनिया को अलविदा कह गये।
मेरी कई ज़रूरी मीटिंग लगी थी सोचा बाद में हो आऊँगा।
बिस्तर से पाँव नीचे उतारा ही था कि मेरे जूते मेरी आदत के अनुरूप ही मिले और मुझे यूँ लगा मानो क़ादिर चाचा कह रहें हों-
“मेरी रवानगी में शरीक होने आ जाइए छोटे साहब! आख़िर आज भी तो आपके जूते एक पर एक चढ़े हुए ही हैं।”
मैंने तत्काल प्रभाव से अपनी सारी मीटिंग कैंसिल की और जा पहुँचा क़ादिर चाचा के घर।
आज उनके जूते एक पर एक चढ़े हुए थे।
***
लघुकथा-४
सुन रहे हो न तुम?)
समय जैसे थम सा गया है। न दिन न रात न ही साल और महीना। सब तुम्हारे जाने के बाद से रुके हुए से है। मैं यंत्रवत् उठती हूँ।ऑफ़िस जाना है। जीविका चलानी है इसलिए चली जाती हूँ। क्योंकि जीने के लिए खाना खाना है बस इसलिए खा लेती हूँ। बीस साल का साथ कम तो नहीं होता है।फिर तुम्हारे साथ तो वह बीस साल चालीस साल के बराबर थे। तुम्हारी सुबह से लेकर शाम और फिर रात सब मेरे साथ ही होते थे। मेरे बिना तुमने कुछ देखा ही नहीं। याद आता है सब करते-करते कई बार खीझ जाती थी।फिर तुम्हारे चेहरे को देखते ही दिल में प्यार उमड़ पड़ता था। आज के जमाने में लगी लगाई सरकारी नौकरी छोड़ना शायद एक बड़ा सेक्रीफ़ाइस था पर तुमको मेरी दरकार थी और मुझे तुमसे बेइंतहा प्यार! बस फिर सब कुछ होता चला गया। मगर साल भर से घर का यह सूनापन अब सहा नहीं जाता। दूसरे किसी को दुनिया में लाने की सोच कभी नहीं रखी कि कहीं तुम्हारे साथ अनन्याय न हो जाए। भावेश कभी तुम्हारे पिता नहीं बन पाए उन्हें तुम एक लायबेल्टी ही लगते रहे। पहले पहल तुम्हारी आँखों में भी उनके लिए स्नेह रहता था पर जैसे-जैसे वक्त बीता और तुम अपने हिसाब से समझदार हुए तुमको एहसास होने लगा कि तुम्हारे पिता तुमको पसंद नहीं करते। तुम्हारे पंगु पड़े शरीर को कभी उन्होंने उठाने में मेरी सहायता नहीं की। मुंह से हर वक्त निकलती लार से उन्हें चिढ़ थी। वैसे भावेश इतने बुरे नहीं थे। बस मेरे इस एक फैसले ने कि मैं दूसरा बच्चा नहीं जनुगी उन्हें हमसे विमुख कर दिया था और देखो न एक ही घर में रहते हुए उन्होंने अपने बनाए एकांत के साथ हमारे संग उन्नीस साल काट लिए थे। इस बीसवें साल में ही उन्हें भी हारना था। आज दिल भर आया है। जब से पता चला भावेश के बेटा हुआ है। सुना है स्वस्थ और सुंदर है। ईश्वर उसे सेहतमंद रखें। यही दुआ है मेरे दिल की।
उस दिन मैं रोती रही थी जब तुम्हारे शिथिल शरीर से तुम्हारी जान किसी घायल पंक्षी सी निकल कर नील गगन की हो गई थी।
सब कहते है कि तुमको मुक्ति मिल गई है। मुझे नहीं लगता कि तुमको अभी मुक्त होने की ज़रूरत नहीं थी। उसका न्याय तो वही जाने पर माँ का दिल किसी भी अवस्था में अपने सामने अपने बच्चे को जीवन से मुक्त होते नहीं देख सकती।
सुन रहे हो न तुम?
***
लघुकथा-५
विरह ताप
शिशिर अलसाया ही था कि मदन ने अपने पाँव धरा की गोद में धर दिए। धरा भी उमड़ पड़ी बसंती बयार से और जा लगी प्रेमी जन के गले।
प्रेम के सबसे मनोहारी रूप श्याम ने महसूस किया कि उनका बदन तप रहा है। राधिका से मिलन की उत्कंठा ने उनके हृदय को विरह ताप से भर दिया था।
सब परेशान हो उठे। मैया यशोदा गुलाब जल से अपने लल्ला के हाथ-पाँव पखारने लगी। वैद्य राज ने चंदन का लेप लगाया पर ज्वर था कि हर घड़ी तेज़ होता जा रहा था। कोई मामूली ज्वर होता तो उसका इलाज होता पर उन्हें विरह ताप चढ़ा था।
रूठ जो गई थी उनकी प्यारी।
राधा जब भी रुठी कान्हा की एक मुस्कान पर खुद को वार देती और हो जाती राधा-मोहन की। पर आज राधिका का स्वाभिमान उसके सामने आ खड़ा हुआ था। मथुरा में बसे नटवर ने वादा दिया कि वह गोकुल में राधिका के मुख का दर्शन करेंगे। लेकिन आ न सके मिलन को और इस बार वृषभानु दुलारी रूठ गईं।इस बार बंसी की तान पर भी न मानी। यह कठिन वक्त देख लीलाधर ने लीला धरी और जल उठे विरह ताप में।
उन्हें इस हाल में देखकर शोक में डूबने लगे गोकुल के वासी। कान्हा ने अपने नेत्र मूँद लिए दो बूँद गरम आँसुओं की उनके कमल नयन से लुढ़कने ही वाले थे कि प्रेम में उद्विग्न राधिका ने आकर उन्हें अपने कर कमलों में थाम लिया। रूठी प्रेमिका को अपने करीब पाकर कान्हा ने अपने चक्षु खोले राधिका से लोचन मिलते ही उनके तन का ताप निर्मल जल सा हो गया। वह बोल उठे-“राधिके!” राधा रानी ने आज अपना उलाहना दे दिया कन्हैया को-“ हे कान्हा! गोकुल से मथुरा की दूरी तय करना कोई कठिन काम नहीं था किंतु इस बार ये प्रश्न मेरे स्वाभिमान का था।वादा तुम्हारा था मिलने का तो तुम्हें ही आना था।” मंद मुस्कान के साथ राधा के गलबाइयाँ डालते हुए कृष्णा बोले-“प्रेम में कैसा स्वाभिमान प्रिय, तुम और मैं मान-अभिमान और स्वाभिमान से परे हैं।हम एक हैं प्रिय तभी तो हम प्रेम की अभिलाषा नहीं परिभाषा हैं।”
छलिया के सम्मोहन भरे वाक्य सुन मदन और भी मदमस्त होकर झूम उठा।

पाँच लघुकथा

अवन्ति श्रीवास्तव
लखनऊ
लघुकथा-१
इकलौता होने का सुख
नीला जी ने झोला मेज पर रखा तो उधड़ती सिलाई पर नजर गई तभी उनके गले में बाहें डालकर नन्हा मोनु उनकी पीठ पर झुल गया।
“नानी ! आप कब आई?”
उनके चेहरे पर मुस्कान फैल गई मगर मोनू तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था ” नानी आज हमने जोकर देखा ! उसने बहुत सी फनी ट्रिक्स दिखाई।”
” अच्छा! ”
तब तक उनकी बेटी नेहा भी आकर पास बैठ गई “मम्मी कैसी हैं आप?”
“मैं तो ठीक हूं पर तुम मोनू को ननिहाल लाने के बजाए यहां समर कैंप में क्यों भेज रही हो?”
“क्या करूं मम्मी मुझे छुट्टी ही नहीं है अच्छा किया आप जबलपुर से दिल्ली आ गई अब उसे कंपनी मिल जाएगी मैं चाय बना कर लाती हूं।”
चाय के बाद नेहा ने कहा “चलो मां पास ही बाजार से ताज़ी सब्जियां ले आते हैं!”
नीला जी ने मेज पर रखा झोला उठाया व बाजार के लिए निकल पड़ी।
सब्जियों से भरा थैला टांगे दोनों टहलते हुए घर वापस आ रही थी कि नीला जी ने कहा “बेटा अब तुम्हें दूसरे बच्चे के बारे में सोचना चाहिए।”
” मां मेरे लिए तो मोनू ही काफी है मैं दोबारा इन झंझटों में नहीं पड़ना चाहती ।”
“पर बेटा दूसरा बच्चा आएगा तो मोनू को सहारा हो जाएगा, मिल बांटकर रहना, एक दूसरे का ख्याल, शेयरिंग – केयरिंग सब सीख जाएंगा…..
तभी नेहा बीच में ही बोल उठी ” प्लीज मम्मी….. क्या आप नहीं जानती पापा और चाचा के बीच में बंटवारे का केस चल रहा है दोनों परिवारों में न जाने कब से अनबन है। जब भी बुआ हमारे घर आती थी आप कितना परेशान होती थी …..
यहां तक की भैया और मुझमें हमेशा आपके प्यार को पाने की एक होड़ सी रहती है ।
आज भी आपके पास आने या मुझे बुलाने के बजाय भैया -भाभी दोस्तों के साथ ट्रिप पर गए हुए हैं ।
मुझे तो रिश्तो में प्यार अपनापन से ज्यादा अनमना पन व बोझ ही दिखता है….
और इसलिए मैं तो अपने बच्चे को इकलौता होने का सुख दूंगी। उसको ना अपने माता-पिता का प्यार, ना जमीन – जायदाद किसी के साथ बांटनी पड़ेगी।”
तभी जैसे पूरी सिलाई उधड़ गई व झोले में रखी सब्जियां सड़क पर बिखर गई ।
नीला जी बस इतना कह पाई “मैंने झोले की ही तरह रिश्तो की भी सही समय पर उधड़न सिल दी होती तो शायद…….. तुम्हारी ऐसी सोच ना होती।”
***
लघुकथा-२
दीनदयाल जी की डायरी
२२जून २०२५
आज फिर देर हो गई बाहर आने में, बहू -बेटा गाड़ी में बैठ कर चले गए मैं बाॅय भी नहीं कर सका। कल थोड़ा और जल्दी निकलूंगा अपने कमरे से।
२४जून २०२५
बेटे ने आज चमचमाता नया सूट पहना है, बहू ने भी भारी साड़ी पहनी है। कहीं शादी में जा रहे हैं । मुझसे एक बार भी नहीं पूछा साथ चलने के लिए। मैं 2 साल से इस कमरे से बाहर निकला ही नहीं! आज कमली का बनाया हुआ दलिया गले से नीचे नहीं उतर रहा।
३० जून२०२५
पता नहीं आजकल हाथ इतने क्यों कांपते हैं? मेरे अकेलेपन का साथी फोन, हाथ से छूट कर गिर गया। स्क्रीन की दरारें मेरी किस्मत की दरारें जैसी लग रही है। बेटे से कहा तो उसने खुद आई फोन खरीद कर मुझे अपना पुराना फोन पकड़ा दिया, लगा की मैं डस्टबिन हो गया हूं
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लघुकथा-३
सफलता
आज नमिता को प्रमोशन मिला है वह सातवें आसमान पर है। ब्रांच मैनेजर की इस पोस्ट के लिए उसने दो साल कड़ी मेहनत की थी जिसका फल उसे आज मिला। यह बड़ी खबर साथ काम करने वाली अपनी पक्की सहेली प्रिया को बताने के लिए बेताब उसके डेस्क पर पहुंची, पता है प्रिया …..
प्रिया ” हां… हां अभी मेल देखा ….यार बाद में बात करते हैं मैं थोड़ा व्यस्त हूं ।”
इतना ठंडी प्रतिक्रिया की तो नमिता को उम्मीद ही नहीं थी।
उसके बाद से प्रिया को फुर्सत ही नहीं मिली, ना नमिता को बधाई देने की ना पार्टी मांगने के लिए ज़िद करने की …..
नमीता को बड़ा आश्चर्य हुआ यह वही सहेली थी जो हर साल नमिता के आंसु पोंछती थी जब प्रमोशन लिस्ट में उसका नाम नहीं होता था।
यकायक गाना याद आया “सुख के सब साथी दुख में ना कोई”
नमीता ने इसे बदल कर गाया जो वर्तमान के लिए उपयुक्त था
“विफलता के सब साथी, सफलता में ना कोई ”
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लघुकथा-४
चिरयुवा
फोटोग्राफर अजय 35 वर्षीय इला के घर उसकी फोटो लेकर पहुंचा तो माहौल गमगीन था।
इला के भाई ने उसके हाथ से फोटो लेकर एक स्टूल पर रख दिया , धीरे -धीरे लोग उस तस्वीर पर माला चढ़ाने लगे।
अजय याद करने लगा दो दिन पहले इसी इला ने अतुल को ताकीद की थी “सुनो यह आंखों के आसपास जो हल्की रेखाएं हैं उन्हें हटा देना और जो यह धब्बे गाल पर नजर आ रहे हैं…
” अरे मत परेशान हो मैडम मैं सब ठीक कर दूंगा आपकी फोटो बिल्कुल यंग एंड रिफ्रेशिंग ही लगेगी।”
तभी उसने फोन पर इला की बातचीत सुनी,
इला- ” डॉक्टर प्लीज हेल्प यह झुर्रियां और यह धब्बे तो कम होने का नाम ही नहीं ले रहे ” ” नहीं नहीं मैं बुढा नहीं होना चाहती… आप मुझ से जितनी चाहो फीस ले लो पर मुझे हमेशा…फोर एवर यंग… यानी चिरयुवा ही रहना है।”
और आज अजय सुन रहा है कैसे खाली पेट विटामिन सी के इंजेक्शन से हृदय घात हुआ।
अजय ने गौर से इला की फोटो को देखा वह चिरयुवा इस दुनिया को अलविदा कह गई सच बुढ़ापा उसे छु भी न सका।
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लघुकथा-५
झोला और बस्ता
सामने से आते कूड़ा बीनने वाले नीकू के हाथ में झोला था तो विपरीत दिशा से रोहन नया नवेला बस्ता लेकर निकल रहा था । झोले ने बस्ते को देखा और अपनी किस्मत पर दुखी हो गया उसने बस्ते से दुखी स्वर में कहा ” काश! मैं भी बस्ता होता और किसी ऐसे बच्चे के कंधे पर टंग कर बड़े आलीशान विद्यालय की सैर करता ।
बस्ते ने झोले को देखा तो बोला “अरे परेशान ना हो झोले ! तुझे तो पूरा दिन आजाद घूमने का मौका मिलता है मैं तो घर से स्कूल और स्कूल से घर के ही बस चक्कर लगाता हूं।
झोले ने फिर कहा ” तुम्हारे पास तो नई नई पुस्तकें और ढेरों ज्ञान का भंडार है, मेरे झोले में क्या जाता है कूड़ा कचरा!”
एक बार फिर दुखी हो गया
” अरे तुझे नहीं पता यह किताबों का बोझ मेरे कंधों पर कितना भारी हो जाता है तू तो फिर भी हल्का-फुल्का रहता है मैं तो ठूंस ठूंस कर भर दिया जाता हूं सांस लेना भी मुश्किल हो जाता…..”
फिर यह भी तो देख तुझे उठाने वाला नीकू कितना मस्त मौला रहता है रोहन तो मुझ से नफ़रत करता है घर पहुंच कर जमीन पर जोर से पटक देता है ।
एक हवा का झोंका आया झोला झूल गया मगर बस्ता बस जोर से सांस लेने की कोशिश कर सका ।
झोले ने कहा “सुनो बस्ते! मेरा नीकू तुम्हें पाना चाहता है वो रोज़ तुम्हारे सपने देखता है जबकि रोहन पाना तो दूर मुझे छूना भी नहीं चाहता….”
“यह तो सच है हर बच्चा मुझे पाना चाहता है”।
बस्ते की आंखों में अब चमक थी।

पाँच लघुकथा

नलिनी श्रीवास्तव नील
अयोध्या
लघुकथा-१
नया कलेवर…
“सुनो! क्या कर रहे हो? “
“कुछ नहीं, बस इन्तज़ार कर रहा हूँ अपने मालिक का कि कब वह आयें और मुझे प्यार से निहार कर मन में उतार लें। पर तुम इतनी उदास क्यों हो ?”
“बस यूँही।” वह अनमनी सी बोल पड़ी।
“बताओ न?“ उसका साथी पुन: बोला।
“क्या कहूँ? मुझे तो अब घर में कोई आँख उठा कर देखता भी नहीं। सजी हुई, घर के एक कोने में चुपचाप बैठी रहती हूँ। वक़्त-वक़्त की बात है … एक समय था जब मैं इन सबके बेहद क़रीब थी। घर के छोटे बड़े सभी मेरा बहुत मान-ध्यान रखते थे। पर आज … “ रुआँसी हो कर वह बोल पड़ी।
“ओहो! उदास न हो सुन तो … अब तू नए कलेवर में बदल गई है और बहुत संभाल कर रखी गयी है, ये शायद तुझे पता नहीं।
“नहीं तो… क्या सच्ची, ऐसा…! मैं तो समझी थी कि अब मेरा अस्तित्व ही समाप्त हो रहा है।” दुःखी हो उसने कहा।
तब वह हँसकर बोला, “अरे! नहीं रे पगली, तुझे प्यार करने वाले आज भी बहुत हैं और कल भी रहेंगे। अब तो तेरा स्वरूप बहुत विस्तार पा चुका है। एक राज़ की बात बताऊँ?
“क्या?”
“अब तू न पुरानी होगी, न फटेगी और न तुझे दीमक ही लगेगी क्योंकि अब तू इण्टरनेट पर पूरी तरह सुरक्षित है।” हँसते हुए लैपटॉप ने किताब से कहा।”
***
लघुकथा-२
बन्ध्या धरती…
डॉ. की रिपोर्ट सुमी के हाथों में थी, पूरा शरीर थरथरा रहा था। आँसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। राजीव ने थाम न लिया होता तो गिर ही जाती।
मन भटकता हुआ आज से पंद्रह वर्ष पहले के समय में जा अटका। उसका और राजीव का जब विवाह हुआ था। एक छोटा सा परिवार, जिसमें स्नेहमयी सास-ससुर और एक ननद थीं। सभी उसे बहुत प्यार करते थे। जीवन खुशहाल था, शादी के दो साल कब बीत गए पता ही न चला। अब सभी को घर में खेलने वाला एक नन्हा सा खिलौना चाहिए था। सुमी के मन में भी मातृत्व का सुख पाने की चाह जाग रही थी। पर सब कुछ मन का सोचा कहाँ होता है। काफ़ी प्रयास के बाद भी वह माँ न बन सकी। बरस पर बरस बीत रहे थे, जीवन जैसे रूखा और बियाबान हो रहा था, सास का स्नेह अब तानों में बदल गया था। राजीव भी खामोश से रहने लगे। इकलौते बेटे राजीव की वंशवेल आगे कैसे बढ़े, इसी सोच ने सास को चिन्ता में डाल दिया। एक दिन सुगबुगाहट सुनी कि राजीव की दूसरी शादी क्यों न कर दी जाए। सन्न रह गई सुमी… पर राजीव के प्यार और विश्वास ने उसे सम्बल दिया। फिर तो सुमी को, जिसने भी जहाँ भी बताया, अच्छा डॉ… इलाज के लिए राजीव के साथ भागती फिरी।
अचानक उसकी निगाह सड़क के किनारे सूखी कंकरीली ज़मीन पर पड़ी, जहाँ एक नन्हा सा पौधा उगने की ज़िद ठाने बैठा था। जिस पर बरसों से लगे सूखे पाइप से बूँद-बूँद पानी टपक रहा था। सुमी का हाथ धीरे से अपने पेट की ओर गया और नम आँखों से राजीव को देख मुस्कुरा उठी, उसके जीवन की भी तो बन्ध्या धरती पर ईश्वर ने कृपा की बूँदें बरसा दी थीं।
***
लघुकथा-३
पंखों में नई उड़ान…
मीता खिड़की के पास बैठी उस धुँधले आसमान को देख रही थी, जहाँ सूरज डूबने की तैयारी कर रहा था पर बादलों ने उसकी लाली को पूरी तरह से ढक लिया था। खिड़की के पार, सामने के घर में एक जाली लगी थी, एक चिड़िया प्रतिदिन आती और टूटी जाली से बाहर देखती रहती, कभी निकलने की कोशिश भी करती पर पंखों के घायल होने के डर से चुपचाप वापस उड़ जाती। न जाने इस जाली के पार खुले मटमैले बादलों में क्या देखती रहती।
मीता ने देखा चिड़िया कुछ ज़्यादा ही उत्साहित लग रही थी, बदली छँट चुकी थी। थोड़ी सी मशक्कत के बाद चिड़िया टूटी जाली के पार थी। आसमान, अब पहले से अधिक विशाल और खुला लग रहा था… उसके पंख अब पूरी तरह से फैल रहे थे और वह हवा में उड़ी जा रही थी।
मीता, जिसने बच्चों के विदेश जाने और पति के इस दुनिया में न रहने के बाद, बंगले में ख़ुद को क़ैद कर के अपना जीवन नीरस बना लिया था। कभी वह भी एक सामाजिक कार्यकर्ता थी, लेकिन आज… !
मीता ने देखा, उस चिड़िया ने सिर्फ एक जाली नहीं तोड़ी थी, बल्कि अपने डर और संशय की बेड़ियों को भी तोड़ा था। वह चिड़िया उड़ चली थी, कहीं दूर…बहुत दूर अपने पंखों को आज़माने…!
***
लघुकथा-४
अकेलापन…
“अरे! आजकल क्यों उदास रहते हो?“ खिड़की ने मुख्य द्वार के पल्ले से पूछा।
पल्ले ने उदास होकर कहा, “क्या करूँ, अब अकेला हो गया हूँ, तो चौखट में, उसी से सिर मारता रहता हूँ। आह! अब दरवाज़ों के दो पल्ले कहाँ?“
खिड़की बोली, “तो मुझसे बात कर लिया करो।“
पल्ले ने अपनी व्यथा कही, “तुम तो खिड़की के दोनों पल्ले आपस में न जाने कितनी बातें कर लेती हो … और मुझसे तो दूर भी रहती हो तो मेरी बात तुम तक कैसे पहुँचेगी?”
खिड़की बोली, “अच्छा, अब मैं आगे से तुम्हारा भी ध्यान रखूँगी।“
पल्ला बोला, “शुक्रिया प्यारी खिड़की! पर जब हमारे भी दो पल्ले होते थे तो दुःख-सुख आपस में बाँट लिया करते थे। गले मिल लेते थे और एक दूसरे की भावनाओं का एहसास भी कर लेते थे।
“सच कहा तुमने… “ खिड़की ने, पल्ले के दर्द को समझने का प्रयास किया।
पल्ले ने पुन: कहा, “उस साथी के रहते, मुझे कभी भी अकेलापन नहीं लगा। दोनों पल्लों में से एक भी खुला रहता तो किसी के आने की उम्मीद रहती पर अब! एक ही पल्ला… पूरी ही तरह से बन्द हो जाता हूँ या फिर, अब घर के अकेले बुजुर्ग की तरह एक तरफ़ पड़ा रहता हूँ दीवार से टिका हुआ।“
***
लघुकथा-५
तरंगें
“आज बहुत उदास हो? बेटी की याद आ रही है?”
समीर ने अपनी पत्नी श्वेता से पूछा।
“हाँ! सुमी की बहुत याद आ रही है।” मेज़ पर रखी सुमी की बचपन की तस्वीर को प्यार से देखते हुए श्वेता ने कहा।
“देखो, परेशान न हो। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर हर देश से चुने हुए बड़े-बड़े वैज्ञानिक गये हैं।जिसमें हमारी बेटी भी एक है। कितने गर्व की बात है न!”
“वो तो है पर उससे कई दिन से बात नहीं हो पा रही। कैसे कटेगा एक साल उसके बिना।” श्वेता ने नम आँखों से कहा।
“क्या करोगी… कभी-कभी रेडियो फ्रीक्वेंसी न मिल पाने की वजह से बात नहीं हो पाती है।” समीर ने पत्नी को समझाते हुए कहा।
“तो फिर…!”
“परेशान न हो… ‘इसरो’ और ‘नासा’ की टीम हमारे सन्देश ट्रांसमिट करके उन तक पहुँचा देती है।”
श्वेता खुश होती हुई बोली, “सच्ची! आज ही मैं सुमी को ढेर सारी बातें लिखती हूँ चिट्ठी में।”
अचानक श्वेता नींद से घबरा कर उठ बैठी। बेटी सुमी ने चौंक कर पूछा, ”क्या हुआ माँ?“
श्वेता ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा, “कुछ नहीं बेटी तू स्पेस पर जाने की तैयारी कर। तेरे पापा सपने में तुझे आशीर्वाद देने आये थे। आख़िर ये तरंगें हमें दूसरी दुनिया से भी तो जोड़ती हैं!”
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