

अलाव जल उठे हैं फिर यादों के
बादलों से बरसा फिर पानी है
सूखे पत्ते थे डाल से बिझुड़े
कह रहे अब
अहसासों की नई कहानी हैं
बूंद-बूंद में समाई कितनी
लहरों की बेचैन रवानी है
एक भी आँख ना रहे नम
होंठ ना हों चुप
कहो कुछ तुम भी
साझा करें हम भी कुछ
सितारों ने छिड़क दी नभ पर
देखो घुन फिर वही सुहानी है…
मित्रों,
लेखनी लघुकथा मैरेथन २०२० के बाद अब २०२५ के नवंबर-दिसंबर अंक में दूसरा लघुकथा का उत्सव मनाने का इरादा तो पूरा ही था परन्तु आधा है चंद्रमा और रात आधी की तरह ही घटनाओं के चक्रवात और दुख की दलदल ने संभलने ही नहीं दिया और अंक जो पहली नवंबर को आपके हाथों में आना था आज पहली दिसंबर को दे पा रही हूँ, वह भी दो भागों में। ४०५ लघुकथा और ८१ रचनाकारों की लघुखथा लिए यह अंक दो भागों की श्रृंखला की पहली कड़ी है।
पिछली बार करीब सात सौ लघुकथाओं से सजा अंक था और इसबार अनुमान है कि हज़ार-बारह सौ से अधिक लघुकथाएं मिली हैं। पर उन्हें विशाल आभासी दुनिया से संचित करपाना आकाश के तारे गिनना जैसा ही कठिन काम सिद्ध हो रहा है। सभी लघुकथाकारों से अनुरोध है कि यदि आपने इस महायज्ञ में भाग लिया था और आपको अपनी लघुकथा नहीं दिख रही तो मुझे shailagrawal@hotmail.com या shailagrawala@gmail.com पर अभी भी भेज दें, मेरे टूटे दाहिने हाथ के लिए यह एक बड़ी राहत होगी और हमारे इस सामूहिक अभियान के लिए भी। लेखनी आप सभी की पत्रिका है और आप सभी के लिए है। विश्वास मानिए इस चयन में कोई पक्षपात नहीं है। बस सहूलियत और गुणवत्ता के आधार पर जो रचनाएँ दृष्टिगत हुईं, उन्हें सजो लिया। पहले परिवार में देवर की मृत्यु फिर पति देव का घटना को गहरे मन पर लेना कि एक साधारण दुर्घटना का ऐसा भयानक परिणाम कैसे और अवसाद में ख़ुद भी बीमार हो जाना। अस्पताल से लौटने पर पिता को ख़ुश करने के लिए बेटे द्वारा हम सभी को एक सुव्यवस्थित और आराम देह पर्यटन पर ले जाना और वहाँ पर पहले दिन ही मेरा सीढ़ियों से फिसलकर दाहिना कंधा, कलाई और घुटना सभी कुछ भयंकर रूप से जोखिम कर लेना, दुखों की आंधी जटिल-से-जटिल ही होती चली गई और नतीजन साधारण-से-साधारण काम भी पहाड़ पर चढ़ने जैसे ही हो चुके हैं मेरे लिए पर जिद्दी मन ने न तो आस ही छोड़ी है और ना प्रयास ही। अपनों का सहयोग, समर्थन व धैर्य इस कठिन समय में पुनः पुनः प्रार्थित है। उम्मीद है निराश नहीं करेंगे।
अंक कैसा बन पड़ा है , बताएँ अवश्य। आपका दृष्टिकोण सदा ही प्रेरक व मार्ग दर्शक है लेखनी के लिए।
व्यक्तिगत रूप से क्यों यह दर्द के सागर में नौका खेने की ज़िद?
एक सवाल जो अक्सर ही उठा है मन में।
जबाव ढूंडती हूँ तो बस एक ही मिलता है। मन के हारे की हार है और मन के जीते की जीत…।
हाँ एक सवाल और ज़रूर मन में उठा अंक तैयार करते हुए-लघुकथाओं के प्रति यह आकर्षण क्यों? क्यों इतने सारे कथाकार जुड़ चुके हैं इस विधा से? घटना और अनुभवों का निरंतर का कोलाज ही तो है जिंदगी। खजाना बिखरा पड़ा है इनका चारो तरफ़। और बतकही मानव मन का सबसे पुराना शग़ल। फिर अपने समय का दस्तावेजी संग्रहालय भी तो बन सकती हैं ये आने वाली पीढ़ी के लिए और वर्तमान के लिए यादों से , जीवन से जुड़ने का एक बहाना… जीवन की सखी या पैरासिटामाल होती हैं रचना। आधी तकलीफ़ इनसे जुड़ते ही भूल जाता है इनसान।
पर आज की इस दौड़ती-भागती जिन्दगी में मानो जीना ही भूलते जा रहे हैं हम। वक्त ही नहीं किसी के पास थमने और सोचने के लिए। पढ़ना लिखना तो बहुत दूर की बात है। अपनों के लिए या खुद अपनों के लिए भी नहीं। ऐसी व्यस्त हो चली इस इक्कीसवीं सदी में फास्ट फूड की तरह ही यह कहानियों का लघु रूप तृप्ति दायक भी है और सुविधा जनक भी। सृजन प्यास अवश्य ही बुझाता भी है और जीवित भी रखता है।
एक खास पिपासु पाठक वर्ग की जरूरत तो निश्चित ही पूरी करता है।
कोई अनुभूति सुख की या दुख की जब इतनी तीव्र हो कि संभाले न संभले और विस्तार भी मांगे, तो बतकही न रहकर कहानी बन जाती है और जब वही बात कम शब्दों में भी तीर-सी लक्ष बींध जाए, तो लघुकथा कहलाती है।
ऐसी ही आठ सौ से अधिक रचनाओं और करीब २०० लघुकथाकारों का यह लेखनी लघुकथा उत्सव अंक 2025 बड़े उत्साह व लगन से संजोने का संकल्प है जनवरी के अंक तक। सभी सहयोगी रचनाकारों का सहयोग व उत्साह वाकई में बेहद संक्रामक है और रचनाएँ मानो भावों और विचारों से गुंथी रचनाओं का इंद्रधनुष ही बिखर गया है लेखनी के पन्नों पर। उम्मीद है आपको पढ़ने में भी उतना ही आनंद आएगा जितना कि हमें इन्हें संजोने में।
तो मित्रो प्रस्तुत है बूद-बूंद जुड़ती लघुकथाओं की एक लहर, जुड़िए, डूबिए, बहिए इसके साथ और किनारे पर बैठकर दोबारा, तिबारा भी पढ़िए, जब मन चाहे अपनी पसंदीदा रचनाओं को और जी भरकर आनंद लीजिए इन खूबसूरत शब्द-चित्रों का। साथ-साथ बताना भी न भूलें, यह वर्षांत अंक कैसा लगा आपको? किस रचना ने आपको कितना भिगोया और डुबोया। आपकी प्रतिक्रियाओं का सभी रचनाकारों को बेसब्री से इंतजार रहेगा।
एक बार फिरसे याद दिलाना चाहूंगी कि नवंबर के इस ठंडे और ठिठुरते मौसम में लेखनी का यह लघुकथा अंक अपनी सारी उर्जा और रसना के साथ आपके हाथों में हैं।
सहयोगी रचनाकारों को कोटिश कोटिश आभार के साथ कहना चाहूंगी कि भविष्य में आपकी लेखनी और भी सशक्त हो। विशेष आभार भाई बलराम अग्रवाल जी और शेख शहज़ाद उस्मानी जी का। शुभकामनाएँ आप सभी लेखक समुदाय को कि आपके लिखित शब्दों की चमक कभी फीकी न पड़े। और माँ सरस्वती का वरद् हस्त सदा आप के सिर पर रहे। प्रार्थना है कि हमारा यह आपसी प्यार और भरोसा , संग-साथ ईश्वर लम्बा व सार्थक रखे। यूं ही लिखते- पढ़ते रहें।
क्रिसमस और अन्य त्योहारों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ नमस्ते मित्रों, जनवरी में मिलते हैं एक नए अंक और नई लघुकथाओं के साथ,

शैल अग्रवाल
shailagrawal@hotmail.com
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