हिन्दी का महत्व

हिंदी दिवस निकट आ रहा है।सोचा एक संस्मरण पाठकों के साथ साझा करूं जो इस बात का प्रमाण है कि हिंदी की लोकप्रियता कैसे तेज़ गति से बढ़ रही है।
बहुत पहले की बात है।1977 के आसपास की।मैं राजस्थान सरकार से पटियाला विश्वविद्यालय स्थित भारत सरकार के उत्तर क्षेत्रीय भाषा-केंद्र में एक वर्ष के लिए प्रतिनियुक्ति पर था।मुझे याद है तब भुवन वाणी ट्रस्ट,लखनऊ के संस्थापक पद्मश्री स्व0 नंदकुमार अवस्थी जी से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।ट्रस्ट ने जो काम किया है वह सर्वविदित है।लगभग सभी भारतीय भाषाओं की रामायणों का अधिकारी विद्वानों द्वारा अनुवाद करा उन्हें देवनागरी लिपि में प्रकाशित किया है।कश्मीरी रामायण ‘रामावतारचरित’ का काम मैं ने उन्हें करके दिया था।
उस दिन वे मेरे साथ ही रहे और हम पंजाबी यूनिवर्सिटी,पटियाला के कई विद्वानों से भी मिले।रात को खाना साथ-साथ खाया।मित्रों को बता दूं कि अवस्थीजी ने ‘कुरान शरीफ’ का देवनागरी लिप्यंतरण हिंदी अनुवाद के साथ लगभग दस वर्षों के अनवरत परिश्रम के बाद भुवन वाणी ट्रस्ट से प्रकाशित किया है।उनके इस श्रम की खूब प्रशंसा हुई।बातों-ही-बातों में वे मुझ से बोले कि इस कुरान की प्रतियां खूब बिकीं क्योंकि अब मुस्लिम बिरादरी की नई पीढ़ी में अरबी-फारसी कोई नहीं पढ़ता या बहुत कम पढ़ते हैं।कुरान शरीफ को देवनागरी/हिंदी माध्यम से जानने और पढ़ने में उन्हें बहुत सुविधा होती है।अवस्थीजी ने आगे कहा कि मेरे ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित रामायणों की प्रतियां उतनी नहीं बिकीं जितनी कि हिंदी/देवनागरी में छपी कुरान की।इस तथ्य से हिंदी की लोकप्रियता और उपादेयता का अंदाज़ लगाया जा सकता है।
यहाँ पर ध्यान देने वाली बात यह भी है कि ‘टाइम्स नाउ’ के जो अर्नब पहले अंग्रेज़ी में ही बोलते थे,वे भी अब समझ गये कि जनसाधारण से जुड़ने के लिए हिंदी के सिवा और दूसरा कोई कारगर विकल्प नहीं है।’पूछता है भारत’ सम्भवतः हिंदी की वजह से आज घर-घर में गूँज रहा है और धूम मचा रहा है।

DR.S.K.RAINA
(डॉ० शिबन कृष्ण रैणा)
पूर्व सदस्य,हिंदी सलाहकार समिति,विधि एवं न्याय मंत्रालय,भारत सरकार।
पूर्व अध्येता,भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान,राष्ट्रपति निवास,शिमला तथा पूर्व वरिष्ठ अध्येता (हिंदी) संस्कृति मंत्रालय,भारत सरकार।
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