
मेरे पिता – मेरे आदर्श
तुम जीवनदाता, ज्ञान प्रदाता, तुम्हीं प्रेरणा स्रोत ।
तुम ही तम हरते, उज्वल करते, जीवन बनकर ज्योत ।।
जीवन में आई, जब कठिनाई, थामा तुमने हाथ ।
छूटा संयम रथ, पथरीला पथ, रहे सदा तुम साथ ।।
जब भी मैं हारी, बन दुखियारी, दिया तुम्हीं ने कोत ।
तुम ही तम हरते, उज्वल करते, जीवन बनकर ज्योत ।।
हर कष्ट सहन कर, खर्च वहन कर, सिखलाई हर रीत ।
जीवन अनुशासित, कर परिभाषित, बना दिया अभिनीत ।।
तुमसे ले शिक्षा, पाकर दीक्षा, हुए आज हम द्योत ।
तुम ही तम हरते, उज्वल करते, जीवन बनकर ज्योत ।।
रहना विद्यार्थी, बनो न स्वार्थी, देते हो संस्कार ।
सौ प्रयत्न करते, चुका न सकते, हैं हम पर उपकार ।।
आदर्श प्रवर्तक, तुम संरक्षक, बुद्धि से ओतप्रोत ।
तुम ही तम हरते, उज्वल करते, जीवन बनकर ज्योत ।।
संगीता चौबे पंखुड़ी
कवयित्री, लेखिका, संपादक
संस्थापिक – अंजुमन ए पंखुड़ी अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक मंच, कुवैत

माँ… मेरी प्रेरणा
मेरे अन्तर्मन के सिंहासन में विराजमान,
मेरी लेखनी की प्रेरणा है सदा से माँ,
भावनाओं को करे अहसासों से जागृत,
कई मौकों पर टूट कर बिखरते देखा था,
मन के दर्द से दुखी हो तड़पते देखा था,
भावों का सैलाब लबालब होता था,
उनको याद करते कथाएं रचने लगी मैं,
प्रेम और ममता की छवि थी वो देवी,
अब लिखती हूँ आँसुओं से दास्तान !
अन्तर्मन की पीड़ा लेखनी सोख लेती,
फिर चेहरे को याद कर मुस्कराती,
सहने की शक्ति ईश्वर की दी नेमत थी,
अन्तर्मन की कोठरी में गम छुपाती थी,
सबको खुश रखने को विष भी पीती थी,
दिल की गली से दर्द का जनाजा आता,
कविता औ गजल में समा सुकून देता है,
माँ मन की इच्छा मन में रह गयी मेरी,
कविताओं के दर्द मैं तुमको सुना सकती!
भगवती सक्सेना गौड़
बेंगलुरु, भारत

“ माँ ”
समय के आंकड़े से बड़े है
माँ के लिए
रिश्तों के आंकड़े ।
सूरज के दस्तक देने से पूर्व
माँ बिछौना छोड़ बुहारती है घर
पानी छींट कर करती है
धरती को शीतल
और लगाती है चारो दिशाओं में
अगरबत्तियाँ,
ताकि भोर की किरणें भी
घर की दहलीज पर
कदम रखने से पूर्व
अपने पाँव झाड़ कर आए ।
फूलों को सींचना खग को दाना,
उन्हें स्नेह से सहलाना
माँ के आंचल में बंधा है
प्रेम का पिटारा ।
आचार विचार संस्कार ये
माँ के माथे की बिंदी है।
माँ नाश्ता पानी बनाती है
गाय को रोटी खिलाती है
माँ का मानना हैं कि
ये इस भूमि पर जन्मी
शप्त ऋषियों की धरोहर हैं
इसलिए ये पूजनीय है और
प्रथम भोग उसे ही लगाती है।
माँ ने सीखा नहीं थकना
वो कुएं से भी भर लेती है
डोल भर पानी और पटा देती है
उन वीरान जड़ो पर
जो समय से पहले
सूख रहे है
जीवन की आपा धापी में।
वो पूजा से निवृत हो
ग्रहण करती है
संतोष का कौर
और रिश्तों की हिफाजत
का पीती है जल ।
माँ विधाता की रची सबसे
सर्वोत्तम रचना है
जो सोती पलकों में भी
जागती है अपने परिवार की
सलामती के लिए…!
***
“माँ ”
भले ही रूठ जाए
जग के सारे रंग
पर माँ के प्रेम का
रंग रूठता नहीं।
प्रकृति के रंगो में समाई
माँ प्रेम का आधार है।
धूप-छावँ में निर्मल अहसास है।
ज्योतिषियों के गणित से परे
माँ मेरी गुण की खान है।
अंधेरी रातों का प्रकाश
जुगनुओं सा रोशनआरा है।
माँ मेरी
प्रेम के हर रंग में रंगी
जीवन बगिया की शान है।
पूनम सिंह ’भक्ति ‘
दिल्ली

माँ आपके जैसे
माँ, आपके जैसे ही
बनते जा रहे है धीरे-धीरे,
मुश्किलों में भी राह अपनी
आसा बना रहे है धीरे-धीरे…
कहानियों में ढालकर
सिखाया था जो आपने धीरे-धीरे
जीवन के फ़लसफ़े
अब समझ में आ रहे है धीरे-धीरे
पोई-साग,रिकवच,चेउंवा
अब याद आ रहे है धीरे-धीरे
घरवालों से सुना आपके जैसे पकवान
बना रहे है अब हम धीरे-धीरे
घर-परिवार संग करियर का भी
तालमेल बिठा रहे है धीरे-धीरे
बिन कहे आपकी तरह
ज़िम्मेदारियों उठा रहे है धीरे-धीरे
आपके साये तले मचलता था
बचपना मेरा धीरे-धीरे
कल ही कहा आईने ने
तुम बहुत बड़े दिखने लगे हो अब धीरे-धीरे
पहले से थोड़ा ज़्यादा हक़,
आप पर हम जता रहे है धीरे-धीरे
जो कभी कह नहीं पाये आपसे माँ,
वह सारी बातें अपने बच्चों से बता रहे है धीरे-धीरे….
मौक़ा निकालिए और जाकर कहिए
अपनी माँ के कानों में धीरे-धीरे
आप जी रही हैं तो जी रहे है वरना
हम मर जायेंगे धीरे-धीरे…
***
माँ आपके जैसे
माँ आपके जैसे ही
बनते जा रहे है धीरे-धीरे
अपने-परायों के बीच
नाम आपका, आगे बढ़ा रहे है धीरे-धीरे
अनेक ज़िम्मेदारियाँ
हैं मुझको घेरी हुई
बिना डरे, आपकी तरह
अपना किरदार
निभा रहे है धीरे-धीरे
एक जमाना हुआ
आपकी गोद में, सिर रखे हुए
उदास लम्हों में
आपके जैसे, ख़ुद को
समझा रहे है धीरे-धीरे
ख़ुश रहने और मुस्कुराने के लिए
कभी आपको समझाया करते थे
वही सारी बातें, अब ख़ुद के साथ
दोहरा रहें है अब हम धीरे-धीरे
जो गीत ग़ज़ल सुना नहीं पाए आपको
उन भावों को कविताओं में ढाल
गुनगुना रहे है अब धीरे-धीरे
माँ आपके जैसे ही
बनते जा रहे है धीरे-धीरे
बहुत मजबत बना कर रखा है
पिछले कई सालों से
ख़ुद को मैंने धीरे-धीरे
देखते ही आपकी छवि किसी में
मन मेरा रो पड़ता है धीरे-धीरे
आपके पुण्य-प्रताप से
घर में मंगल हो रहा है धीरे-धीरे
आप हैं, सब सम्हाल लेंगी
यह ब्रह्मांड बता रहा, मुझको धीरे-धीरे
माँ आपके जैसे ही
बनते जा रहे है धीरे-धीरे
शुभ्रा ओझा, शिकागो, यू.एस.ए.

विश्वास
जाने क्या नजर आया
कुछ भी न समझ आया
ढूंढने लगी फिर वह सिरा
पर हाथ कुछ नहीं आया
दिन रात कितनी जगी
नींद भी कोसो दूर भगी
इसी उधेड़बुन में फिर
लगन और बढ़ने लगी
नज़र मुझ पर रहने लगी
जाने क्या कहने लगी
अचकचा सी गई भीतर
वेग सी फिर बहने लगी
धीरे-धीरे हुआ अहसास
मैडम का वह विश्वास
जाने क्या सोच कर के
बढ़ने लगा मुझ में खास
इसीलिए उस दिन कहा
प्राप्तांक क्यों कम रहा
आज के बाद ऐसे नंबर
फिर कभी न आये यहां
मैडम का वह उलाहना
बढ़ी उससे और चाहना
रात-दिन पढ़ने में रही
छूटी नहीं फिर संभावना
कदम फिर रहे बढ़ते
कभी नहीं रहे घटते
सीढ़ी दर सीढ़ी फिर वो
ऊंचाइयां रहे चढ़ते
शिक्षा अर्जन की राहों में
जीवन की इन बाहों में
तालीम का अक्षर अक्षर मैम
समर्पण आपकी पनाहों में
आप का उतना कहना
रगों में खून का दौड़ना
फलसफा बना तब से ही
जीवन में सदा आगे बढ़ना
मंजु शर्मा जांगिड़ “मनी”
जोधपुर राजस्थान
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