देवी नागरानी, अरुणा सबरवाल, ऋतु ननन पांडे

पाँच लघुकथा

देवी नागरानी
न्यू जरसी, अमेरिका
dnangrani@gmail.com

लघुकथा-१
न्यायाधीश
हर रोज़ इक नया सितारा रौशन होता है जब-जब भी ज्ञान-अज्ञान में जंग छिड़ती है. आज भी ऐसा ही कुछ हुआ. पिकनिक का माहौल पूरे उरूज़ पर था. यह जानते हुए कि उसमें शहर के जाने-माने लोग शामिल होंगे, हमारी कंपनी के स्टाफ ने हर तरह से बेहतरीन व्यवस्था की थी.
​एक नामी वकील भी अपनी पत्नि सहित जैसे वहाँ पहुँचा तो सभी का ध्यान उसकी पहनी हुई टी-शर्ट की ओर गया जिस पर लिख था….
A good lawyer must know law…
A lawful lawyer must know many judges…
“तो आप बहुत सारे Judges को जानते हैं?” एक साथी ने मुस्कराते हुए कटाक्ष किया
” बहुत तो नहीं, पर उनमें से कुछ को जानता हूँ” वकील साहब ने ठहाका मारते हुए कहा और अपनी पत्नी की ओर देखकर सवाली नज़रों से कहा “तुम तो मुझे जानती हो, तुम्हारा क्या कहना है?”
पत्नि सवाल को नज़र-अंदाज़ न कर पाई और तर्क से बचने के लिए कहा – “उन सब Judges के ऊपर एक Judge और है जो हम सब को जानता है”

***

लघुकथा-२
अहसास

“मैं केटी को ले जा सकती हूँ?”
सधी हुई आवाज़ कानों पर पड़ते ही सर उठाया। देखा सामने सुंदर सी, तीखे नाक नक्श वाली ११-१२ साल की लड़की खड़ी थी.
” आपका नाम ?”
” मैं टीना हूँ, केटी की बहन, उसे लेने आई हूँ।” संक्षिप्त उत्तर के बाद वह चुप रही।
” हर रोज़ तो उसकी नानी उसे लेने आती है…… ।”
” वो तो ठीक है, पर अचानक मेरे पिता का फ़ोन आया कि मुझे केटी को स्कूल से पिकअप करना है।”
” आपकी नानी कहाँ है और वो क्यों नहीं आई।?”
” वो मेरी नहीं, केटी की नानी हैं। आज क्यों नहीं आई मुझे नहीं मालूम।”
जवाब सुन मेरे माथे पर सिलवटें पड़ने लगीं। ये कैसा रिश्ता है ? वो केटी की नानी है पर टीना की नहीं!
” तुम केटी को कहाँ ले जाओगी?”
” इसके मम्मी-पापा के घर।” टीना का छोटा-सा उत्तर पाकर मैं फिर उलझ गई।
” और तुम कहाँ जाओगी?”
” अपने घर” सरलता से उसने मुस्कराकर जवाब दिया।
” तुम वहाँ क्यों नहीं जाओगी?”
” क्योंकि मैं अपनी मम्मी के पास रहती हूँ, और मेरे पापा केटी की मम्मी के साथ।”
ऐसे जवाब सुनकर कौन कहता है भावनाओं को ठेस नहीं लगती ? कौन कहता है रिश्तों की ज़रूरत नहीं पड़ती ? पर जो रिश्ते बेमतलब के हों, उनका न होना ही बेहत्तर है. मैं अपनी सोच की दुनिया में खोई थी, इस बात से बेख़बर कि केटी और टीना अभी तक वहीं मौजूद हैं.
” मैम क्या मैं केटी को ले जा सकती हूँ?” टीना की इस आवाज़ ने मुझे जगा दिया.
” हाँ! रजिस्टर में साइन करके उसे ले जा सकती हो.”
…..और मेरे आँखों के सामने स्वार्थ के सिंहासन पर बैठे आदम और मासूमियत से मुस्कान छीनने वाले अपराधी चेहरे साफ़-साफ़ नज़र आने लगे!

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लघुकथा-३
ममता का क़र्ज़

​अमर अपने माता -पिता का इकलौता बेटा था. जानकी और वासुदेव ने लाड़ प्यार के आँचल में ममता की छाँव तले उसे पालकर बड़ा किया, और उसकी हर आरज़ू को पूरा करने को तत्पर रहते थे । जैसे-जैसे अमर प्राइमरी से मिडिल, फिर मिडिल से हाई स्कूल का फासला तय करता रहा, उसकी ख़ूबियाँ भी माता –पिता का प्यार दुलार पाकर निखरती रही। शक्ल सूरत से तो वह गठीला, सुंदर तो था, पर बुद्धिमान भी बहुत साबित हुआ. ​जब वह कालेज पहुंचा तो माँ-बाप के सामने अमरिका जाकर पढ़ने की इच्छा प्रकट की, और साथ में वह वादे भी करता रहा कि वह पढ़ाई पूरी करते ही वापस आकर पिता के नक़्शे-क़दम पर चलकर, यहीं पर बसेरा डालकर उन दोनों की देखभाल भी करता रहेगा। इस प्रकार माता-पिता की ममता का क़र्ज़ भी उतारता रहेगा. उसकी मीठी बातें और सलीकेदार सोच सुनकर जानकी और वासुदेव बहुत खुश हुए और अपनी तमाम उम्र की जमा पूँजी इस्तेमाल करके उसे बाहर भेज दिया। यूं वक़्त आने पर अमर उनकी आँखों में नए सपने सजाकर उनकी आँखों से दूर चला गया.
पहले अमर जल्दी-जल्दी उन्हें ख़त लिखा करता था, उन्हें अपनी पढ़ाई के बारे में, अपने बारे में, माहौल के बारे में बताता, पर बहुत जल्द ही उन ख़तों की रफ़्तार ढीली पड़ गई और वक़्त ऐसा आया कि वासुदेव के लिखे हुए ख़तों का जवाब आना भी बंद हो गया। यूं दो साल और बीत गए। निराशा आंखें उठाये हर सूनी डगर पर ख़त के इंतज़ार में पथराई आँखों से निहारा करती थी।
और एक दिन डाकिया एक बड़ा सा लिफाफा उन्हें दे गया, जिसमें ख़त के साथ-साथ कुछ फोटो भी थे। जल्दी में वासुदेव ख़त पढ़ने लगा जिसको सुनते-सुनते उसकी पत्नि जानकी वहीं बेहोश हो गई। ये अमर की शादी के फोटो थे जो उसने वहाँ की अंग्रेज़ लड़की के साथ कर ली थी और ख़त में लिखा था – “पिताजी हम दोनों फक़त पांच दिन के लिए आपके पास आ रहे हैं और फिर घूमते हुए वापस लौटेंगे। एक ख़ास बात है अगर हमारे रहने का बंदोबस्त किसी होटल में हो जाये तो बेहतर होगा। पैसों की ज़रा भी चिंता न कीजियेगा।” ​ख़बर पढ़ते ही वासुदेव का बदन गुस्से से थर-थर कांपने लगा, जिसे क़ाबू में रखते हुए वह अपनी पत्नि को होश में लाने की कोशिश करता रहा और वहीं ज़मीन पर बैठकर बच्चों की तरह रोने लगा। उम्मीदें और अरमान सब बिखर गए, उनकी ममता का शीशमहल सामने टूट कर बिखर गया. “जिसको अपने लहू से सींचा, वह अपनाइयत को भूल कर गैर देश को अपना मान बैठा. ऐसा बेटा गैरों से भी बदतर है, प्यार तो छोड़ो, नफ़रत के क़ाबिल भी नहीं है” यही सब कुछ सोचते-सोचते वासुदेव की आँख से आँसू बहाने लगे। ​दूसरे दिन सुबह तार के ज़रिये बेटे को जवाब में लिखा “तुम्हारा ख़त पढ़ा, पढ़कर जो दिल को धक्का लगा है उसी को कम करने के लिए हम पति-पत्नि कल तीर्थों के लिए रवाना हो रहे हैं, कब लौटेंगे पता नहीं। और अब हमें किसी का इंतज़ार भी नहीं। इसलिए यहाँ आने की बजाय उस पराये मुल्क को अपना समझ कर नये रिशतों को निभाने की कोशिश करना। यहाँ अब तुम्हारा कोई अपना नहीं है.”…वासुदेव

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लघुकथा-४
​भिक्षा पात्र
​दरवाज़े पर भिक्षा दते हुए देवेन्द्र नारायण सोच रहे थे, ये सिलसिला कब तक चलेगा ? दरवाज़े पर आए भिक्षुक को खाली हाथ नहीं लौटाना है, यह तो पिताजी के ज़माने से चलता आ रहा है ! और इसी सोच की बेख्याली में, भिक्षा पात्र में न पड़कर नीचे ज़मीन पर गिरी. कुछ रूखे अंदाज़ से बढ़बढ़ाते हुए देवेन्द्र नारायण कह उठे, “भई ज़रा उठा लेना, मैं जल्दी में हूँ” यह कहते हुए वे भीतर चले गए.
बरसों बीत गए और ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव जहाँ ऊँठ जैसी करवट लेकर थमे, वहाँ पासा भी पलटा. सेठ देवेन्द्र नारायण मसाइलों की गर्दिश से गुज़र कर ख़ास से आम हो गए और फिर पेट पर जब फ़ाकों की नौबत आई, तो वही हुआ जो न होना था। इसे नियति कहें या परम विधान ?
​एक दिन वे भिक्षा पात्र लेकर उसी भिक्षू के दरवाज़े की चौखट पर आ खड़े हुए जिसे एक बार उन्होंने अनचाहे मन से भिक्षा दी थी. बाल भिक्षू अब सुंदर गठीला नौजवान हो गया था और कपड़ों से उसके मान-सम्मान की व्याख्यान ज़हीर हो रही थी। उसे देखकर देवेन्द्र नारायण कहीं अतीत की यादों में खो गए.
“मान्यवर आप कृपया अपना पात्र सीधा रखें ताकि मैं आपकी सेवा कर पाऊँ.” नौजवान की विनम्र आवाज़ ने देवेन्द्र नारायण के हृदय में करुणा भर दी और साथ में दीनता भी. नौजवान ने उनके भावों को पहचानते हुए विनम्र भाव कहा – ” मान्यवर हम तो वही हैं, बस स्थान बदल गए है और यह परिवर्तन भी कुदरत का एक नियम है जो हमें स्वीकारना है, इस भिक्षा की तरह! न कुछ हमारा है, न कुछ आपका है। बस कभी कभी लेने वाले हाथ देने वाले बन जाते हैं.”.

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लघुकथा-५
खानदानी पेशा
ग़लतफ़हमी का शिकार था कालीदास. अपने सोच की हीन भावना के तले दबा ख़ुद की नज़रो में बौना बन गया. उसका पेशा दादा-परदादाओं की मिली-जुली विरासत थी- वह कसाई था. ​दसवी पास करके, वह आगे और पढ़कर कुछ बनना चाहता था . गूंगे जानवरों की गर्दन पर वार करके अपने पेट को पालने की नीति उसे समझ नहीं आ रही थी. अलग से छोटी-मोटी नौकरी करके गुज़ारा करता रहा, पर नियति! पिता की मौत के बाद माँ उसी काम पर लग गई, जो पिताजी किया कराते थे और ख़ूब मेहनत से उस काम को अंजाम देती रही. बकरों को बलि की चौखट पर चढ़ाना, उनके अंगों को अलग-अलग दाम पर बेचना, पैसा कमाना और परिवार का पोषण करना. पर माँ जानकी और करती भी क्या ? कालीदास बड़ा बेटा था, पीछे एक और बेटा व बेटी थे. साधन बहुत सीमित थे, और जानकी के पास कोई चारा भी न था . ​कालीदास अपने आप में सिमटने लगा, कुछ करने की चाह उसके मन में फैलने की बजाय संकीर्ण होती रही. आदमी जग से, औरों से तो भाग सकता है पर ख़ुद से नहीं भाग सकता. ममता के सामने उसके सुख का स्वार्थ बौना पड़ गया और आखिर अपने ख़ानदानी काम करने में जुट गया. ​ आज जो संतुष्टि उसे अपने आचरण से, अपने काम से मिलती है, वही उसकी विचार धारा को प्रवाहित करती है “मानव अपनी सोच से बड़ा या छोटा होता है, काम से नहीं “.
देवी नागरानी


पाँच लघुकथा

अरुणा सब्बरवाल
लंदन, यू.के.
U.K. 044 7557944220
Sab_arun@Hotmail.co.uk

लघुकथा-१
मुर्ग़-मुस्सलम

यह बात तब की है,जब मैं लंदन से भारत गयी थी । हमारे पड़ोस वालों ने पीछे के गार्डन में जो हमारे गार्डन के साथ लगता था उसमें छः मुर्ग़ियाँ और एक मुर्ग़ा पाल रखा था ।जिनके वो रोज़ अंडे खाते थे । कभी- कभार एक दो अंडे हमें भी दे जाते थे ।
जो मुर्ग़ा था वह साला मेरे छोटे भाई को कभी चैन की नींद नहीं सोने देता था ।आपको तो मालूम है सुबह -सुबह प्रथम पहर में नींद कितनी मीठी आती है ।वो भी जवानी में ? वो मुर्ग़ा साला सुबह-सुबह बाँग दे कर उसे जगा देता था । मेरा छोटा भाई कयी दिन तक चुप-चाप सब देखता रहा कि इनमें से मुर्ग़ा कौन सा है जो बाँग देता है ।
कुछ दिन के लिए हमारी पड़ोसन मायके गयी थी , सुबह उनके पति दूध लेने गये थे , पति जी को भला क्या पहचान थी, पूरी बाग़- डोर तो पत्नी जी के हाथ में थी ।उस दिन मेरे भाई ने मुर्ग़ा चुराया और कसाई की दुकान से कटवा कर , और साफ़ करवा कर घर ले आया ।फिर गार्डन में स्टोव रख के मुर्ग़ा पकाया , मम्मी को रसोई में मीट बनाना मना था । जब पड़ोसी जी घर लौटे , मेरे भाई से बोले “ दीपक तुम्हारे घर से बहुत सुंदर महक आ रही है “ । “ अंकल जी मुर्ग़-मुसलम्म बनाया है, आप भी आ जायें , मिल कर खाएँगे ।
अंकल जी ने मुर्ग़ा बहुत शौक़ से खाया , और तारिफ़ो के पुल बाँधते रहे “ भई दीपक आपने मुर्ग़ा बहुत स्वादिष्ट बनाया है “। “अंकल जी अपना ही माल समझिए । “

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लघुकथा-२
चूड़ियाँ

मैं और मेरी मित्र पुष्पा पहाड़ी रामलीला देखने गयीं ।क्यूँकि रामलीला में पुष्पा का छोटा भाई भी था तो पुष्पा को देखते ही रामलीला के प्रबंधक जी ने दशरथ जी की तीन रानियों (लड़कों ) को साड़ी पहनाने का काम पुष्पा को सौंप दिया ,वह मना कैसे सकती थी । तीनों को साड़ी पहनाने और मैक – अप के पश्चात् पुष्पा ने देखा उनके हाथ में चूड़ियाँ नहीं थीं ।पुष्पा ने अपनी सबसे बढ़िया लाल चूड़ियाँ अपने हाथ से उतार कर उनके हाथो में डाल दीं ।राम चन्द्र जी के बनवास के दृश्य के पश्चात् जैसे ही दशरथ जी की मृत्यु का दृश्य आया शोक में उन तीनों ने पुष्पा की पसंदीदा लाल चूड़ियाँ तोड़ डालीं ।ये देखते ही पुष्पा की तो जान निकल गयी वह अपने आँसु रोक नहीं पायी ।कयी दिन तक पुष्पा अपनी चूड़ियों का शोक मनाती रही । तीन चार सप्ताह हो चुके थे पुष्पा समझोता कर चुकी थी ।एक दिन अचानक जैसे ही उसने स्कूल जाते वक़्त दरवाज़ा खोला घर के बाहर एक सुंदर डब्बा पड़ा था ।हैरान थी जैसे ही पुष्पा ने डब्बा खोला उसमें बिलकुल वैसी ही लाल चूड़ियाँ देख कर उसकी आँखों की चमक और होंठों पर खिली-खिली मुस्कान ने एक बार फिर अपना स्थान ग्रहण कर लिया ।

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लघुकथा-३
गुल्लो रानी

पतझड का आगमन आरम्भ हो चुका था । वृक्षों से गिरते पत्ते हवा में अपना नृत्य दिखा रहे थे ।पूरी धरा पर लाल ,पीले,नारंगी और भूरे पत्तों का क़ालीन बिछा था ।पेड़ भी नीरवस्त्र खड़े शरमाँ रहे थे ।लंदन में पतझड के समय प्रकृति का नज़ारा ही कुछ ओर होता है ।मैं भी अपने पै.टीओ में कुर्सी डाल कर प्रकृति की लीलाओं का आनंद लेने लगी ।
मेरे उद्यान में एक बड़े-बड़े पत्तों वाला हॉर्स चेस्टनट का पेड़ है ,सर्दियों में बहुत से जीव जंतु उस पेड़ से चेस्टनट एकत्र करने आते है । और छोटे – छोटे कीटाणु उसके बड़े- बड़े पत्तों की छत्र-छाया में ठंड से बचने के लिये छुप जाते हैं ।
अचानक मैंने देखा एक सफ़ेद धरियों वाली गोल-मोल सलेटि गिलहरी बड़ी चौकन्नी सी इधर -उधर देखते फुदकती आ रही थी । एकांत पा कर वह अपने आगे के पैरों में दबोचे चेस्टनट को टुकर -टुकर खाने लगी ।अचानक उसकी नज़र पृथ्वी पर पड़े दो और चेस्टनट पड़े थे । थोड़ी देर सोचने के पश्चात् गुल्लो रानी ने उन दोनो चेस्टनट को समेटा । निरीक्षण करने के पश्चात् फुदक -फुदक कर उसने धरती पर एक नरम सी जगह ढूँढ कर अपने आगे के पंजों से एक गढा खोदा , एक – एक कर के उसमें चेस्टनट उस गड्ढ़े में डाले फिर उसे मिट्टी से ढक दिया ।कुछ देर सोचने के पश्चात् , इधर – उधर देख कर वह निशानी के रूप में दो बड़े – बड़े पत्तों से ढक कर कर चली गयी ।

इतने में तेज़ हवा का झोंका उसकी निशानी को उड़ा कर ले गया । दस मिनट बाद वह अपने साथी के साथ आ कर इधर -उधर पागल सी उस निशानी को ढूँढने लगी ।
काश वह जानती प्रकृति की विषमता …….।

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लघुकथा-४
रेडी…स्टेडी …गो…।

रोज़ सुबह -सुबह राशि के घर में जैसे तूफ़ान आ जाता है चीख़ना चिल्लाना यही सिलसिला चलता है ।ठोस कारण है भी , और नहीं भी । बस राशि की बेटियों के लम्बे बालों की समस्या रुचि दस वर्ष की है और शुच आठ की । रुचि के बाल सुलझाने की चीख़ें या फिर शुचि की बाल धोते-धोते शैम्पू के आँख में चले जाने की गुहारें ।पूछो भला , अगर आधी शीशी शैम्पू की एक ही बार में ख़त्म होगी तो शैम्पू तो आँख में जाएगा ही जाएगा ही ।राशि दोनो को कितनी बार प्यार से समझा चुकी है कि बाल कटवा लो , छोटे बालों में तुम दोनो बहुत सुंदर लगोगी ।दोनो एक दूसरे की ओर देख कर मुस्कुराने लगती है ।टस से मस नहीं होतीं ।
“ रुचि प्लीज़ समझाओ छोटी बहन को , “।कितनी बार गुहार लगायी थी माँ ने ….
ऐसा लगता था ,कि दोनो ने माँ को तंग करने की पक्की ठान रखी थी ।
एक बार राशि के मन में आया भी कि अगर वह रात को सोए – सोए उनके बाल काट दे तो….अगले दिन अवश्य बाल कटबा लेंगी ।फिर सोचने लगी नहीं …यह तो ग़लत होगा ।क्या उद्धाहरण देगी बच्चों को ।नफ़रत करने लगेंगी बेटियाँ ।अपनी इस सोच पर उसे ख़ुद ही शर्मिंदा हो गयी ।
स्कूल के लिये घर से निकलते-निकलते आज थोड़ी देर हो गयी थी , अभी उनकी सहेली रोज़ को भी पिक करना था । ( रुचि तीनो को स्कूल ले कर जाती है,और रोज़ की ममी स्कूल से लाती है ) उपर से न्यू यॉर्क की सड़कों का ट्रैफ़िक… स्कूल पहुँचते -पहुँचते सवा नो बज चुके थे । कार से उतरते ही रूचि हाथ से आधा ढका काग़ज़ माँ के सामने हस्ताक्षर के लिए रखते बोली …..
“ म्म … केन यू साइन दिस कन्सेंट फ़ॉर्म प्लीज़ , दिस इज़ फ़ोर द डोनेशन , “
राशि जल्दी में थी , उसने डोनेशन शब्द सुन कर साइन कर दिए । दोनो एक दूसरे की ओर देख के मुस्कुरा उठीं ।
चार बज चुके थे राशि ने दोनो के लिए उनका मनपसंद चीज़ पॉस्टा बनाया ।जैसे ही राशि ने दरवाज़ा खोला ,उनके सर पर टोपी देख कर देख कर हैरान थी ,बोली
“ यह क्या ? इतनी गर्मी में टोपी ?” राशि ने पूछा
“ शुचि , रुचि को इशारे से बोलीं दीदी …. रेडी…. रेडी ..स्टेडी …गो… “ गो कहते ही दोनो ने टोपियाँ उतारीं , और ज़ोर से हसतीं हँसती बोलीं सर्प्राइज -सर्प्राइज …….।
दोनो के लड़कों जैसे कटे बाल देखकर माँ हैरान थी ।
“ सॉरी म्म, प्लीज़ ग़ुस्सा मत करना , हम दोनों ने अपने बाल ऊन बच्चों के लिये डोनेट किये हैं , जिनके बाल कैन्सर के कारण झड़ गये हैं “।
रुचि स्तब्ध और निशब्द ….ख़ुशी से उसकी गालों पर आँसुओं की लकीर बहने लगी ।

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लघुकथा-५
विश्वास
अवकाश के पश्चात् मैं दो दिन हॉस्पिस धर्मार्थ संस्था लंदन में स्वेच्छा से स्वयं-सेविका का काम करती हूँ । उसे लंदन में saint Luke कहते हैं । यहाँ लोग अपनी अनचाही, इस्तेमाल और नयी वस्तुएँ दान देते हैं । उन्हें ग़रीब लोग थोड़ी क़ीमत में ख़रीद लेते हैं, उस पैसों से हॉस्पिस संस्था चलती है ।
आज वहाँ कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरे विश्वाश को डावाँडोल कर दिया । एक ग्राहक ने चीज़ें चुनते-चुनते एक घंटा लगा दिया । एक घंटे में वह जान गयी थी कि आज स्टाफ़ कम है ,केवल मैं और मैंनेज़र ही थे । उस एक घंटे में उसने मुझ से पच्चास प्रश्न पूछ डाले । फिर पूरा सामान उसने मेरे डेस्क पर रख दिया ।मैंने टिल पर पूरी क़ीमत के हिसाब से स्कैन करना आरम्भ कर दिया ।उसे वह रास न आया ।शोर मचाती बोली “ तुम मैनेजर को बुलाओ “ मैं दुकान को ख़ाली नहीं छोड़ सकती थी ।मैंने sarah मैनेजर को आवाज़ लगायी , उसे सुनाई नहीं दी ।मैंने दरवाज़े की ओर जा कर फिर आवाज़ लगायी ।sarah ने उसका हिसाब किया और वह चली गयी ।
मैंने रसीद देखते ही sarah से पूछा कि “ क्या उसने नया जम्प सूट नहीं लिया “?
“ लिया न “ Sarah ने कहा ।
” पर यहाँ पाँच पाउंड्ज़ का तो कोई कपड़ा एंटर नहीं है ?” मैंने कहा
Sarah ज़ोर से हँसते बोली “ तभी तो सवाल पूछ कर तुम्हारा ध्यान दूसरी ओर कर रही थी ।जब तुम्हारी नज़र उस से ओझल हुई , उसने क़ीमतों के लेबल बदल दिये , पाँच पाउंड्ज़ से पच्चास पैसे लगा दिया ।sarah ने बताया कि जब भीड़ होती है तो चोरी भी होती है ।
मेरा मन बहुत विचलित हुआ । मन में अनेकों प्रशन उठे , कि लोग दान दी हुई चीज़ों की चोरी भी कैसे करते हैं ।कहाँ है मेरा भगवान ? क्यूँ इंसान का और इंसानियत का इतना पतन हो रहा है ? मेरा विश्वाश डगमगाने लगा।
पाँच बजने वाले थे , दुकान बंद होने वाली थी एक ग्राहक आयी और बैग में से एक किताब देते बोली “ माफ़ करना कल मैंने तीन किताबें ख़रीदीं थीं, घर जा ओर देखा तो चार किताबें निकलीं, पैसे मैंने तीन किताबों के ही दिए थे। मैं यह किताब वापस करने आयी हूँ। उसकी बात सुन के मेरा मन गद-गद हो गया ।
मेरा मानवता से उठा विश्वाश फिर से स्थापित हो गया।


पांछ लघुकथा

डॉ ऋतु नंनन पांडे
भारत की बेटी,सूरीनाम की बहूँ व दो से अधिक दशकों से नीदरलैंड की स्थाई निवासी ।
संपर्क- ईमेल:RituS0902@gmail.com
मोबाईल-+31-622252508

लघुकथा-1
आधुनिक गिरमिटिया

कल कारला को एक सामाजिक कार्यक्रम का हिस्सा बनने का अवसर मिला । कारला पेशे से एक वकील थीं पर उसे भारतीय कार्यक्रमों में जाना बहुत अच्छा लगता था । इन कार्यक्रमों के द्वारा वह भारतीय होने का सुखद एहसास करती थी । क्योंकि कार्यक्रम भारतीय था इसलिए कारला ने भारतीय परिधान पहना था। जब वह कार्यक्रम में पहुँची तो वहाँ रामायण की चौपाई का पाठ चल रहा था। कारला भी वही एक कुर्सी पर रामायण लेकर पढ़ने लगी। जब रामायण पाठ समाप्त हो गया तो कार्यक्रम के आयोजकों ने सभी को भंडारे के लिए आमंत्रित किया । भंडारे में कुछ औरतें कारला के पास आई उन्होंने कारला को कहा आपने बहुत सुंदर ढंग से रामायण काम पाठ किया। कारला ने जैसे ही अपनी टूटी फूटी हिंदी में बोलना चाहा तो उनमें से एक महिला ने उससे कहा “ तुम इंडियन नहीं हो” कारला ने कहा “नहीं मैं इंडियन नहीं हूँ मेरे आजा भारत से आए थे मैं भारतीय हूँ ।” उसका यह जबाब सुन कर पहली महिला ने दूसरी महिला को समझाते हुए कहा “ अरे यह इण्डियन नहीं है यह वह लोग हैं जो सौ साल पहले यहाँ गिरमिट पर मज़दूर लाए गए थे ।” दूसरी महिला ने कारला की ओर ऊपर से नीचे देखते हुए कहा “ अच्छा यह यह मज़दूर है जो कॉन्ट्रैक्ट पर यहाँ गए थे । कूली कहते हैं शायद इन्हें । उसके शब्दों से लग रहा था जैसे यह बात सुनकर उसे कारला कोई निम्न वर्ग वाली महिला लगी जिससे बात करने से उसका स्तर कम हो रहा हो ।
कारला ने बिना झिझक उस महिला से पूछा “ आप भारत से यहाँ कैसे आए? “ उस महिला ने बजे ही गर्व के साथ अपनी भृकुटी ऊँची करते हुए कहा। “ मेरे बेटे को यहाँ एक कंपनी में नौकरी मिली है । तीन साल के कॉन्ट्रैक्ट पर इसलिए हम भी उसके साथ यहीं आ गए हैं ।” कारला ने पूछा “ अच्छा आपका बेटा यहाँ तीन साल के कॉन्ट्रैक्ट पर आया है। क्या वह वापिस भारत जाएगा? उस महिला ने कहा यह तो अभी पता नहीं । अगर कॉन्ट्रैक्ट बढ़ गया तो शायद यहीं रह जाएगा ।”
कारला ने बहुत ही शान्त स्वर में कहा” अरे फिर तो आप भी हमारी तरह गिरमिटिया ही कहलाओगे । अंतर सिर्फ इतना रहेगा कि हमारे पूर्वजों को डेढ़ सो साल पहले यहाँ धोखे से काम करने को लाया गया था और आपका बेटा आधुनिक गिरमिटिया बनकर अपनी मर्जी से यहाँ काम करने आया है ।
इससे पहले वह दोनों महिला कारला को कुछ कहती , कारला ने कहा” मुझे लगा था आप भारतीय हो और भारत के लोगों का सम्मान करते हो पर आप इंडिया वाले हो अंग्रेज़ों की तरह लोगों में फर्क करते हो ।दोनों महिलाओं ने एक दूसरे की तरफ़ देखा उन्हें लगा कारला ने जो कहा वही सच है । हम कब से एक-दूसरे में फर्क करने लगें हमें पता ही नहीं चला ॉॉॉॉ।

***

लघुकथा-2

कॉलेज की कैंटीन में सबके बीच हँसती हुई अवनि को देखकर कोई नहीं कह सकता था कि वह टूट चुकी है। हर दिन इंस्टाग्राम पर उसकी मुस्कुराती तस्वीरें आतीं—कॉफी, दोस्तों के साथ सेल्फ़ी, और “#HustleHard #BeHappy” जैसे टैग। पर सच्चाई यह थी कि रात को उसका कमरा मौन से भरा रहता, और उसका दिल धीरे-धीरे किसी अदृश्य बोझ से दबता जा रहा था।
वह पढ़ाई में हमेशा अव्वल रही थी। परिवार की उम्मीदें उस पर टिकी थीं—“तू तो हमें गर्व महसूस करवाएगी, अवनि!” लेकिन कभी किसी ने यह नहीं पूछा कि वह खुद कैसा महसूस करती है।

धीरे-धीरे उसने सब चीज़ों से दूरी बना ली। दोस्तों के बीच भी एक अजीब खालीपन उसे घेर लेता। सबके बीच होते हुए भी वह अकेली महसूस करती। उसके चैट बॉक्स में सैकड़ों “LOL” और “????” थे, पर कोई ऐसा नहीं था जिससे वह सच में अपने मन की बात कह सके।

एक शाम, कॉलेज के गार्डन में बैठी अवनि ने सामने बैठे मनोविज्ञान के प्रोफेसर अरुण सर को देखा। वे अकेले किताब पढ़ रहे थे। शायद बहुत सोचने के बाद, वह उनके पास गई और बोली, “सर, क्या आपसे कुछ बात कर सकती हूँ?”

उसने धीरे-धीरे सब बताया—बेचैनी, नींद न आना, सब कुछ अच्छा होने के बाद भी भीतर का खालीपन। सर ने ध्यान से सुना, कुछ नहीं टोका। फिर बोले,
“अवनि, कभी-कभी हम दूसरों को खुश दिखाने की कोशिश में खुद को भूल जाते हैं। अवसाद कमजोरी नहीं है, यह एक संकेत है—कि अब तुम्हें अपनी देखभाल करनी चाहिए।”

उस दिन पहली बार अवनि रोई—खुलकर, ज़ोर से। जैसे भीतर जमी बरसों की चुप्पी टूट गई हो।

अगले दिन उसने अपने दोस्तों को बताया कि वह थेरेपी लेने जा रही है। पहले सब चौंके, कुछ ने मज़ाक भी किया, पर उसने डरना छोड़ दिया।

धीरे-धीरे, अवनि ने अपने भीतर की रोशनी फिर से ढूँढनी शुरू की। अब उसकी मुस्कान इंस्टाग्राम पर नहीं, उसकी आँखों में लौट आई थी।

कहानी का सच यही है—कई बार सबसे हँसता चेहरा सबसे गहरे सन्नाटे में डूबा होता है।
अवसाद शर्म की बात नहीं, मदद माँगना हिम्मत की बात है।

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लघुकथा-3
अंधी ममता
आजकल नीदरलैंड में न बहुत गर्मी है न ही अधिक ठंड दिन भी अभी लंबे है। लगभग नो बजे सूरज छुपता है । स्कूलों की गर्मी की छुट्टियाँ भी पड़ी हुई हैं तो लोग अक्सर शाम को अपने बच्चों व अपने कुत्तों के साथ कॉलोनी के पार्क में जा कर बैठते हैं । लिंडा भी अपनी आठ साल की बेटी और टैकल प्रजाति के छोटे से कुत्ते के साथ पार्क में बैठी थी आसपास और भी बहुत से लोग अपने बच्चों के साथ बैठे थे । तभी अचानक कहीं से बम जैसी ज़ोर से एक के बाद एक तेज धमाके की आवाज़ आई । बेचारे बच्चे व कुत्ते डर के मारे अपने माँ बाप और मालिकों के पास आ कर दुबक गए । पास बैठे पीटर ने इधर उधर देखा तो कुछ 12-15 साल के लड़के बम जला कर भाग रहे थे । पीटर उन लड़कों की तरफ़ दौड़ा तो वह बचते वहाँ से कुछ दूर भाग कर खड़े हो गये । इतने में पास में बैठी महिला ने देखा उन लड़कों में से उसका बेटा और उसके दोस्त थे। वह पीटर से बोली “अरे किसने इतनी तेज बम जलाया है, मेरी तो जान ही निकल गई। चलों मैं भी चलकर देखती हूँ।” इससे पहले की पीटर उन लड़कों तक पहुँचता वह महिला लड़कों तक पहुँच गई । इतनें में वहाँ बैठे एक और व्यक्ति ने जिसका व्हीलचेयर पर बैठा बच्चा इतने तेज धमाके से इतना बुरी तरह डरा की उसे सम्हाल पाना मुश्किल हो गया था । उस व्यक्ति ने ग़ुस्से में आकर पुलिस को फ़ोन कर दिया। वहाँ खेल रहे बच्चों में से एक बच्चे ने उन शरारती बच्चों का विडियो बनाया लिया। उस महिला ने उन बच्चों से अपनी भाषा में कुछ कहा और फिर पीटर के पास आकर कहा “ मैंने उन बच्चों से पूछा तो उन्होंने बताया की उन्होंने कुछ नहीं किया है वह तो केवल वहाँ खड़े थे ।” पीटर ने कहा नहीं इन्हीं बच्चों ने बम का धमाका किया है । आपको पता है इतनी तेज़ बम के धमाके से किसी को दिल का दौरा भी पड़ सकता है। बच्चों के कान के पर्दे फट सकते है। किसी की जान भी जा सकती है और आसपास के घरों मरे पालतू जानवर जैसे चिड़िया, ख़रगोश, गिनि पिग और छोटे कुत्ते उस्तरे तेज धमाके से मर सकते है। उस महिला ने पीटर की बात को अनसुना कर कहा “ मैने कहा न इन बच्चों ने कुछ नहीं किया है ।” इतनें में पुलिस वहाँ आ गई ।
पुलिस ने वहाँ पड़े बम के टुकड़े देखकर पूछा “ यह किसने किया है?” पार्क के जिस व्यक्ति ने पुलिस को फ़ोन किया था उसने बताया कि वहाँ जो पाँच लड़के खड़े है उन्होंने यह किया है।
किन्तु वह महिला उस व्यक्ति की बात को काटते हुए बोली “ नहीं सर उन बच्चों ने कुछ नहीं किया यह तो बस यहीं खेल रहे थे ।” इतने में जिस बच्ची ने उन का विडियो बनाया था आ कर पुलिस को दिखाया । विडियो में उस महिला का लड़का व उसके दोस्त बम जलाते हुए दिखाई दिए । पुलिस ने उस महिला को वह विडियो दिखाया । वह महिला कुछ न बोल सकी । सभी शरारती लड़के 12 से 15 साल के थे और नीदरलैंड में कम आयु के अपराधियों को जेल नहीं भेजा जाता और न ही कोई कड़ी सजा दी जाती है इसलिए पुलिस ने उन्हें चेतावनी दे कर छोड़ दिया । लिंडा की बच्ची यह सब बहुत ध्यान से देख रही थी उसने अपनी माँ से कहा “ माँ आप कहते हो झूठ बोलना बुरी बात है। जो झूठ लोग बोलते है वह अच्छे नहीं होते पर यह तो एक माँ है और बडी भी है फिर भी झूठ बोल रही है तो क्या यह बुरी माँ है? लिंडा अपनी बेटी की बात सुन सोच रही थी कि उस महिला ने अपने बच्चे को बचाने के लिए माँ की ममता में आ कर झूठ बोला पर क्या यह झूठ उस बच्चे के भविष्य के लिए सही था? क्या वह सही है या जो उसकी आठ साल की बेटी ने कहा वह सही है?

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लघुकथा-4
चीखता मौन
बेचारी निरा भागते भागते और लोगो से अपने लहू लुहान अध नग्न शरीर को बचाने ,दर्द से काँपतीं टांगों को ढकने के लिए सहायता माँगती माँगती लगभग दो किलोमीटर तक गिरती पड़ती चली आ रही थी । संभ्रांत लोगों के इस नगर में उसे कोई एक ऐसा द्वार व्यक्ति या स्त्री नहीं मिली जो उसके शरीर व अंतर्मन के दर्द को समझ एक कपड़े का एक टुकड़ा उसे दे देते या उसे एक घूँट पानी ही पिला देते ।पर हाँ हर व्यक्ति की निगाह उसके शरीर को अजीब सी निगाहों से देख कर अपने मन में अलग-अलग सी धारणा बना मुँह ज़रूर फेर रहे थे। कुछ उसकी लाचारी का मज़ाक़ भी बना रहे थे ।थक हार कर बेचारी बच्ची शहर की एक पतली सी गली में शरण लेने को घुस गई और कुछ दूर चलते ही निढाल हो कर एक दिवार के सहारे बैठ गई ।
उसकी आधी चेतना में उसके कानों में एक स्वर सुनाई दिया। दिवार शायद किसी मंदिर की थी। स्वर कह रहा था इंसान जैसा कर्म करता है वैसा ही फल उसे भोगना पड़ता है। हम अपने बुरे कर्मों के फल यही इस धरती पर ही भोगते हैं । बेचारी दस वर्षीय नीरा यह वाक्य सुन कर उसके अंदर का मौन चीख चीख कर बाहर की दिवारों से पूछ रहा था ,कि मैंने तो कोई बूरा कर्म नहीं किया ,फिर उन चार अंजान लोगों ने मुझे घर से बाहर सुनसान जगह पर ले कर ,मेरे साथ ऐसा घृणित कार्य कर मुझे मेरे किस बुरे कर्म की सजा दी है?

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लघुकथा-५
ज़िम्मेदारी
आज दफ़्तर से लोटने में देर हो गई । सर्दी बढ़ रही हैं, और ,अरे इन बच्चों को देखो इन्हें रात में अकेले घुमने से बिल्कुल डर नहीं लगता। बस से उतरकर घर को जाने वाले रास्ते पर दो छोटे बच्चों तक़रीबन आठ नो साल के रहे होंगे यूँ ठंड में अकेले जाते देखा तो ,मैंने बच्चों से पूछा “ अरे बच्चों रात को कहा ठंड में घुम रहे हो ?” बच्चों ने सहम कर पीछे मुड़कर मुझे देखा । कुछ नहीं बस थोड़ा कबाड़ा बीन रहे हैं।
पर कबाड़ा क्यों बीन रहे हो?
पैसे चाहिए”उनमें से एक बच्चे ने मेरी और नज़रें झुकाते हुए कहा।
पैसे किस लिए?
माँ तीन दिन से काम पर नहीं गई है ।
माँ काम पर नहीं गई,पर तुम्हारे पापा तो होंगे,वह कहाँ है।
वह माँ और हम तीनों भाई बहन को छोड़कर भाग गये,
पर तुमने बताया नहीं,पैसे क्यों चाहिए?
माँ बिमार है । दवाई लानी है ,और खाना भी
छोटा से बच्चे ने अपनी बहन के पीछे छिपते हुए कहा ।
“अरे ये सब इन लोगों के रोज़ के बहाने हैं पैसे माँगने के ,साथ से गुजरते हुए एक आदमी की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी।
अच्छा कहाँ है तुम्हारी माँ? वहाँ पार्क मे
चलो पहले तुम्हारी माँ के पास चलते हैं
पार्क में एक औरत एक छोटे बच्चे के साथ बैंच के पीछे डरी सहमी सी बैठी थी उसका पूरा शरीर घावों से भरा हुआ था ।मैंने पूछा तुम इतनी ठंड में बच्चों को लेकर यहाँ क्यों बैठी हो । तुम्हारा घर नहीं है ?
घर तो था, पर मेरी बीमारी के कारण घर वालों ने मुझे घर से निकाल दिया।मेरे पास कोई दूसरा ठिकाना नहीं है ,इसलिए बच्चों को लेकर दस दिन से यहीं रहती हूँ ।बच्चों की स्कूल फ़ीस नहीं भर सकती ,इसलिए बच्चे स्कूल पढ़ने नहीं जा सकते ।यहाँ दिन में कूड़ा बीनकर मेरी दवाई और अपने खाने का इंतज़ाम कर रहें है।
मैं मन में सोचती ही रह गई , ज़िम्मेदारी बचपन को कितनी जल्दी निगल जाती है।

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