आलोक कुमार सातपुते, सतीश राठी, घनश्याम मैथिल

पाँच लघुकथा

आलोक कुमार सातपुते
एलआईजी-832 सेक्टर-05
हाऊसिंग बोर्ड कालोनी सड्ढू रायपुर भारत

लघुकथा-१
शोषक

“मुझे तो ऐसा लगता है कि सारे सरकारी स्कूल-कालेजों की फीस प्राइवेट जितनी ही बढ़ा देना चाहिए। इसके अलावा सभी सरकारी अस्पतालों की फीस भी प्राइवेट अस्पतालों जितनी कर देनी चाहिये, तब अक्ल ठिकाने आयेगी इन देशद्रोहियों की।”

‘आप बड़े देशभक्त लग रहे हैं भाई…वैसे आप करते क्या हैं?’

“मैं पिछले पांच सालों से एक सरकारी दफ़्तर में बाबू हूँ।”

‘शायद आप कान्वेंट में शिक्षित हैं?’

“नहीं, मेरी तो सारी शिक्षा सरकारी स्कूल-कॉलेज़ में ही हुई है।”

‘अच्छा! वैसे आप लोग किस कालोनी में रहते हैं?’

“हम लोग तरूण नगर में रहते हैं।”

‘अरे वो तो पूरी तरह अवैध अतिक्रमण वाली स्लम बस्ती है।’

“हाँ, है तो सही। अब क्या बताएं सर, टेक्नॉलजी के चलते सारी सरकारी जानकारियां ऑनलाइन हो गई हैं, सो अब बाबूगिरी में ऊपरी कमाई ज़्यादह नहीं रही, वरना अब तक तो मैं भी अपनी उस स्लम बस्ती को छोड़कर किसी महंगी कालोनी में घर ले चुका होता, या कहीं अच्छी जगह पर जमीन लेकर दो-तीन मंज़िल तान दिया होता।”

‘आपके पिता क्या करते हैं?’

“उन्होंने बड़े ही संघर्षों से हमें पढ़ाया। उनका एक छोटा सा पान का ठेला है।”

‘कहाँ पर है उनका पान का ठेला?’

“वो फोकट पारा के नुक्कड़ पर है।”

‘अरे वही ठेला जो एक सरकारी नाले के ऊपर अतिक्रमण करके रखा गया है?’

“हाँ वही…लेकिन आप क्या बार-बार अतिक्रमण-अतिक्रमण कह रहे हैं। क्या आप इतनी देर तक टटोलने के बाद मुझे मेरी औकात बताना चाह रहे हैं?”

‘अरे नाराज़ क्यों होते हो भाई…मैं तो वर्तमान दौर में आपकी देशभक्ति टटोल रहा था।’

लघुकथा-२
नस्लभेद

(कुत्तों का सामान बिकने वाली दुकान पर)
ग्राहक- तीन महीने के कुत्ते के पिल्ले के गले में बांधने वाला पट्टा दीजियेगा ।
दुकानदार-सिर्फ पट्टा ही चाहिये या पट्टे के साथ कुत्तों को घुमाने वाली चैन भी चाहिए?
ग्राहक- जी दोनों चाहिए।
दुकानदार- लेब्राडोर, बुलडॉग,या फिर पामेरियन, कौन सी नस्ल का है आपका वह कुत्ते का पिल्ला?
ग्राहक- जी नस्ल से पट्टे का क्या संबंध?
दुकानदार- अजी साहब, कुत्तों की नस्ल के हिसाब से डिज़ाईनर पट्टे और चैन मिलती हैं। पाँच सौ रूपये से उपर कीमत की।
ग्राहक- जी, देसी है
दुकानदार-तब तो आप ये साधारण सा पचास रूपल्ली वाला पट्टा ले जाइये। इसमें आप नायलोन की रस्सी से बांधकर भी घुमा सकते हैं अपने उस पिल्ले को।

***

लघुकथा-३
टॉमी

“अच्छे से खा ले बेटा। तू कितना दुबला हो गया है रे। दिन-भर कॉलेज़ में पढ़ता रहता है, थक जाता होगा। पोस्ट ग्रेजुएशन में तो कितनी पढ़ाई बढ़ जाती होगी, मैं यह समझ सकती हूँ।

बेटा तुझे करेला पसंद नहीं है तो मैंने तेरे लिये तेरी पसंद की पनीर की भुर्जी भी बनाई है। साथ ही तेरी पसंद का मटर पुलाव भी बनाया है। मैं तेरे टिफ़िन में सारी पनीर भुर्जी और आठ-दस रोटियां तो डाल ही दूंगी, इसके अलावा अलग से एक टिफ़िन में मैं पूरा पुलाव भी डाल दूंगी। तू अपने दोस्तों के साथ बढ़िया मज़े ले-लेकर खाना।

ले, यह भुर्जी वाली थाली पकड़ और आराम से डायनिंग टेबल में जाकर बैठ जा। मैं एकदम से गरमागरम फुलके बनाकर वहीं लाती जा रही हूँ।

…और आप ये क्या डायनिंग टेबल में अपनी किताबों और अखबारों का पसारा फैलाकर बैठे रहते हैं। जल्दी से इन्हें समेटिये और बेटू के बैठने के लिये जगह बनाइये। अरे यार अभी तक आपने बेटू के जूते पॉलिश भी नहीं किये हैं। अरे जल्दी करिये भई।और हाँ अपने आफिस जाने के पहले बेटू का बिस्तर भी घड़ी कर देना और उसके कपड़ों को प्रेस भी लगा देना।

मैं आपके लिए रात की बची हुई रोटियां गर्म कर देती हूँ। रात का भात भी बहुत सारा बचा है।मैं उसे भी गर्म कर देती हूँ।

अपना टॉमी भी ठीक से खाना नहीं खा रहा है। शायद उसका पेट गड़बड़ है। आप उसको दूध-भात दे देना।

मैं करेले की सब्ज़ी और फुलके अपनी टिफ़िन में डालकर ले जाऊंगी।अगर सब्ज़ी कम पड़े तो आप अचार के साथ खा लीजिएगा। और हां आपकी इतनी बड़ी तोंद निकल आई है। टिफ़िन ले जाने के बारे में तो बिल्कुल भी मत सोचा करें और इस उम्र में अब आपको बाहर का खाने से भी बचना चाहिये।”

‘अरे तुम मेरी इतनी चिन्ता मत किया करो भई। तुम मुझे भावनाओं में बहाकर रुलाओगी क्या पगली। मैं तो रोज की तरह अपना खुद ही देख लूंगा। आफिस जाने से पहले मैं रात की रोटियां और भात भी खुद ही गर्म करके खा लूंगा, जैसे मैं पिछले दस पंद्रह बरसों से करता आ रहा हूँ।’

“आपको तो बस मौका मिलना चाहिये भौंकने का।”

***

लघुकथा-४
उल्टा चाकू

आरिफ़ मोहम्मद तेज़ कदमों से फुटपाथ पर चला जा रहा था।उसके शहर में कल ही एक मॉब-लिंचिंग की घटना हुई थी। उस लिंचिंग का विरोध करने के लिये यूनिवर्सिटी के छात्रों द्वारा सड़क पर जुलूस निकाला जा रहा था।कल हुई लिंचिंग के बारे में याद कर आरिफ़ सिहर उठा था। भीड़ कैसे उस मुसलमान को चोरी के शक में पीट रही थी। उस भीड़ में जिसके मुँह में जो आ रहा था, वह उस मुसलमान से कहने को कह रहा था। घबराहट के मारे आरिफ़ वहां ज़्यादह देर तक नहीं रुका था। शाम को उसे पता चला था कि भीड़ ने उस व्यक्ति को मार डाला है। उस दृश्य को याद कर वह पसीने-पसीने हो उठा।

चलते-चलते अचानक आरिफ़ की नज़र फुटपाथ से नीचे सड़क पर खड़े एक अंधे व्यक्ति पर पड़ी।वह शायद सड़क क्रॉस करना चाह रहा था। आरिफ़ उसके नज़दीक पहुँचा और बोला-सूरदासजी क्या आपको सड़क की दूसरी तरफ जाना है?

अंधे के हामी भरने पर आरिफ़ ने उसका हाथ पकड़ा और उसे सड़क क्रॉस कराने लगा।जुलूस अब तक आगे बढ़ चुका था।

अभी इतना शोरगुल क्यों हो रहा था? अंधे ने उससे पूछा।

कल शहर में एक मॉब लिंचिंग की घटना हो गई। उसी के विरोध में कॉलेज़ के छात्रों का प्रदर्शन जुलूस था। वे नारे लगाते हुए जा रहे थे,इसलिये शोरगुल हो रहा था।

ये मॉब लीचिंग क्या होती है?अंधे ने प्रश्न किया।

किसी आदमी को जब भीड़ घेरकर मार देती है,तो उसे मॉब- लिंचिंग कहते हैं। आरिफ़ ने जवाब दिया।

अरे यह तो बहुत ग़लत बात है। लोगों की भीड़ द्वारा किसी को घेरकर मार डालना तो कायरता वाली बात है। वैसे भीड़ ने किसको मार डाला?

सूरदासजी कोई तनवीर अहमद नाम का आदमी था।आरिफ़ ने जवाब दिया।

तब तो भीड़ ने बहुत सही किया है।ये साले पठान बहुत चढ़े-बढ़े हैं। इनको तो इनके देश पाकिस्तान भेज देना चाहिये।अंधे के मुँह से इतना सुनते ही आरिफ़ भीतर तक दहल गया। उसके हाथ-पैर कांपने लगे। उस अंधे का हाथ अब उसे बेतरह चुभने लगा। उसे लगा कि उसने किसी बेहद तेज़ धार वाले चाकू को मूठ की तरफ़ से न पकड़कर, धार की तरफ़ से पकड़ रखा है। उसे महसूस हुआ कि उस चाकू की धार से उसका हाथ लहुलुहान हो गया है। अब तक दोनों सड़क की दूसरी तरफ़ पहुंच चुके थे। सामने एक गटर का ढक्कन खुला हुआ था।एक क्षण के लिए आरिफ़ को लगा,इस चाकू को गटर में फेंक दिया जाये, पर अचानक ही उसके ईमान ने सरगोशी की- कायर कहीं के। वह एक झटके से उस अंधे से अलग हुआ और बहुत तेज़ी से आगे की तरफ़ बढ़ गया।

***

लघुकथा-५
संस्कारी

संस्कारी
“यार आज सुबह-सुबह मैं जब गोल बाजार जा रहा था तो रास्ते मे देखा कि एक कसाई की दुकान के पास एक बकरा बंधा हुआ है। वो बकरा अपनी गर्दन ऊंची करके इधर-उधर देख रहा था। जब मैं बाज़ार से वापस आया तो बेचारे की गर्दन कटी हुई साइड में पड़ी हुई थी। यार मुझे बड़ा ख़राब लगा।”
‘भाई इसमें कोई कर भी क्या सकता है। बकरे की तो किस्मत ही है कट जाना, इसीलिए तो कहा जाता है कि बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनाएगी।’
“हां यार वो तो है, पर यार जाते वक्त उसको ज़िंदा देखा था, तो मुझे उस पर बड़ा तरस आ रहा था। आख़िर दया और करूणा तो इंसानी संस्कार होते ही हैं। मेरे जैसे पूजा पाठ करने वाले धार्मिक संस्कार वाले इंसान के लिए तो ये नाक़ाबिले बर्दाश्त ही है।”
‘हां यार पर अब क्या करें। बाय द वे आप इतनी सुबह गोल बाजार क्यों जा रहे थे?’
“मैं मटन लेने जा रहा था। गोल बाजार में जो कोने वाला कसाई है न, हम हमेशा उसी के पास से मटन लेते हैं। वह हमें बकरे के पुट्ठे का नरम-नरम गोश्त देता है।

पाँच लघुकथा

सतीश राठी

लघुकथा-१
हादसा
हादसा बहुत बड़ा था। राजनीति चिंतित हो गई थी। सारे मोहरे जिम्मेदारी के दायरे में आ रहे थे। विपक्ष इस मामले को जिस मजबूती के साथ उठा रहा था, उसे देखकर सरकार को तुरंत ही कोई निर्णय लेना था।
अंततः सरकार के एक बुद्धिमान नौकरशाह ने इसका रास्ता खोज ही दिया। उसने कहा,” हुजूर! जांच बिठा दीजिए और सारे संबंधित का तबादला उसकी सुविधा के किसी दूसरे स्थान पर कर दीजिए। यहां पर नया अधिकारी बिठा दीजिए। जनता भी संतुष्ट हो जाएगी। विपक्ष का मुंह भी बंद हो जाएगा। हमारे मोहरे भी हमारे साथ ही बने रहेंगे।”
इस सुंदर उपाय पर सरकार की बांछें खिल गई थी।

***

लघुकथा-२
खुली किताब
वह सदैव अपनी पत्नी से कहता रहता कि , ‘’ जानेमन ! मेरी जिन्दगी तो एक खुली किताब की तरह है …जो चाहे सो पढ़ ले। ’’ इसी खुली किताब के बहाने कभी वह उसे अपने कॉलेज में किए गए फ्लर्ट के किस्से सुनाता , तो कभी उस जमाने की किसी प्रेमिका का चित्र दिखाकर कहता – ‘ ये शीला …उस जमाने में जान छिड़कती थी हम पर….हालाँकि अब तो दो बच्चों की अम्मा बन गई होगी । ‘’
पत्नी सदैव उसकी बातों पर मौन मुस्कुराती रहती । इस मौन मुस्कुराहट को निरखते हुए एक दिन वह पत्नी से प्रश्न कर ही बैठा, ‘यार सुमि ! हम तो हमेशा अपनी जिन्दगी की किताब खोलकर तुम्हारे सामने रख देते हैं, और तुम हो कि बस मौन मुस्कुराती रहती हो। कभी अपनी जिन्दगी की किताब खोलकर हमें भी तो उसके किस्से सुनाओ ।’
मौन मुस्कुराती हुई पत्नी एकाएक गम्भीर हो गई, फिर उससे बोली, ’ मैं तो तुम्हारे जीवन की किताब पढ़ – सुनकर सदैव मुस्कुराती रही हूँ , लेकिन एक बात बताओ …मेरी जिन्दगी की किताब में भी यदि ऐसे ही कुछ पन्ने निकल गए तो क्या तुम भी ऐसे ही मुस्कुरा सकोगे ? ‘

वह सिर झुकाकर निरुत्तर और मौन रह गया।

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लघुकथा-३
जिस्मों का तिलिस्म

वे सारे लोग सिर झुकाकर खड़े थे। उनके कांधे इस कदर झुके हुए थे कि, पीठ पर कूबड़-सी निकली लग रही थी। दूर से उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे सिरकटे जिस्म पंक्तिबद्ध खड़े हैं।
मैं उनके नजदीक गया। मैं चकित था कि ,ये इतनी लम्बी लाईन लगा कर क्यों खड़े हैं?
“क्या मैं इस लम्बी कतार की वजह जान सकता हूं?” नजदीक खड़े एक जिस्म से मैंने प्रश्न किया।
उसने अपना सिर उठाने की एक असफल कोशिश की। लेकिन मैं यह देखकर और चौंक गया कि उसकी नाक के नीचे बोलने के लिए कोई स्थान नहीं है।
तभी उसकी पीठ से तकरीबन चिपके हुए पेट से एक धीमी सी आवाज आई, “हमें पेट भरना है और यह राशन की दुकान है।”
“लेकिन यह दुकान तो बन्द है। कब खुलेगी यह दुकान?” मैंने प्रश्न किया।
“पिछले कई वर्षों से हम ऐसे ही खड़े हैं। इसका मालिक हमें कई बार आश्वासन दे गया कि, दुकान शीघ्र खुलेगी और सबको भरपेट राशन मिलेगा।” आसपास खड़े जिस्मों से खोखली सी आवाजें आईं।
“तो तुम लोग… अपने हाथों से क्यों नहीं खोल लेते हो, यह दुकान?” पूछते हुए मेरा ध्यान उनके हाथों की ओर गया, तो आंखें आश्चर्य से विस्फरित हो गई।
मैंने देखा कि सारे जिस्मों के दोनों हाथ गायब थे।

***

लघुकथा-४
जन्मदिन
“सुनो! अपना गोलू आज एक साल का हो गया है.” गोलू के मुँह में सूखा स्तन ठूँसते हुए सुगना ने अपने चौकीदार पति से कहा.
“तुम्हें कैसे याद रह गया इसका जन्मदिन?” चौकीदार का प्रश्न था.
“उसी दिन तो साहब की अल्सेशियन कुतिया ने यह पिल्ला जना था, जिसका जन्मदिन कोठी में धूमधाम से मनाया जा रहा है.” ठंडी साँस लेते हुए सुगना बोली.

***

लघुकथा-५
स्वाद- बेस्वाद

“इन दिनों सब्जियों मैं स्वाद बिल्कुल भी नहीं आ रहा है ।कुछ खाने की इच्छा ही नहीं हो रही है।”
“अब स्वाद कैसे आएगा ।किसान खेतों में जहर बो रहे हैं।”
“जहर बो रहे हैं। समझ में नहीं आया।”
“देखो समझो इस बात को। पहले छोटी-छोटी लौकी और गिलकी मिलती थी। उसमें स्वाद होता था। अब इंजेक्शन लगाकर उस लौकी को दो दिन में बहुत बड़ा कर दिया जाता है। वजन बढ़ जाता है पर वह जहरीली हो जाती है। फूड प्वाइजनिंग के कितने केस सामने आते हैं।”
“हां यह तो देखने में आ रहा है।”
“दूध पीते हो उसमें भी स्वाद नहीं है। उसमें यूरिया डाला जा रहा है।”
“ऐसा क्यों हो रहा?”
“किसान जो भी उगा रहा है उसमें स्वाद इसलिए समाप्त हो गया है, क्योंकि उसका सत्यता से परिपूर्ण जीवन जीने पर विश्वास समाप्त होता जा रहा है।”
“पर सरकार तो किसान को हर बात में अनुदान देती है। खाद के लिए, फसल के लिए। और तो और अच्छी कीमत पर खरीदने का मूल्य निर्धारण भी करती है।”
“देखो ,समझो!! अब किसान चतुर हो गया है। शुद्धता के प्रति उसके भीतर की आस्था भी मर गई है। सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं…।”
“इस बेस्वाद को स्वाद में कैसे बदला जा सकता है, यह तो समझ में नहीं आ रहा।”
“लालच सबके भीतर बैठा है ।वह समाप्त हो तो शायद स्वाद फिर से आ जाए।

पाँच लघुकथा

घनश्याम मैथिल अमृत
भोपाल, भारत

लघुकथा-१
डर

जैसे ही ‘राम नाम सत्य है’ की आवाज श्मशान घाट के पास,पीपल के पेड़ के नीचे खेल रहे बच्चों के कानों में पड़ी वे उठकर खड़े हो गये और श्मशान की ओर चली आ रही अर्थी की ओर दौड़ पड़े|
बच्चे अर्थी पर फेंके जा रहे फूल मखाने और सिक्कों में से लोगों के बीच घुस-घुसकर पैसे लूटने लगे| तभी वहाँ उपस्थित एक व्यक्ति ने उनमें से एक लड़के से पूछा -‘क्यों तुम्हें श्मशान में भूत का डर नहीं लगता |’
‘ नहीं…, हमें तो सिर्फ भूख से डर लगता है|’ कहकर वह फिर सिक्के उठाने दौड़ पड़ा|

***

लघुकथा-२
धुंआ- धुंआ जिंदगी

‘क्यों तुम लोगों को मालूम नहीं की सरकार ने बढ़ते हुए वायु प्रदूषण के कारण यूँ खुले में लकड़ी -कंडे जलाने का मना किया है |’ आग ताप रहे ठण्ड से ठिठुरते मजदूरों को फटकारते हुए दरोगा ने कहा |
‘ माफ करियो दरोगा जी ओढ़ने -बिछाने के कपड़ों की तंगी है, इसलिए..|’
‘ चुप रहो ओड़ने बिछाने की कमी है तो ज़हरीला धुंआ फैलाकर, लोगों को मारोगे। और सरकारी क़ानून तोड़ोगे |’ दरोगा ने आँखें तरेरते हुए कहा |
‘नहीं सरकार |’
‘तो पानी डालो आग पर, |’
दरोगा जी की कड़क आवाज से कड़कड़ाती ठण्ड में जल रही लकड़ी- कंडों की आग अब ठंडी हो चुकी थी,| लेकिन जिस फैक्ट्री में यह मजदूर काम करते हुए गेट के बाहर खुले आसमान के नीचे आग ताप रहे थे , उसकी चिमनी गरम थी और उससे निकलता काला ज़हरीला धुंआ, शान से इठलाते बलखाते, आहिस्ता -आहिस्ता वातावरण की हवा, क़ानून और आम आदमी का दम घोंट रहा था|

***

लघुकथा-३

जल बिच मीन प्यासी

राजेश को आज अपनी प्रयोगशाला की तरफ से शहर की नदी से अलग- अलग जगहों से पानी के कुछ नमूने इकट्ठे करने का काम मिला |
वह अपने कार्यालय से पानी के सेम्पल लेने सुबह ही निकल पड़ा था, उसने पहले से निर्धारित जगहों से पानी के नमूने इकट्ठा करना शुरू किए, | अपना काम करते -करते उसे दोपहर हो गईं थी सूरज सिर पे चढ़ आया था, अचानक उसे जोर की प्यास महसूस हुई, उसका कंठ सूखने लगा , वह आज अपने पीने के पानी की बोतल घर भूल आया था,उसने शहर के गंदे नालों और कारखानों से निकले प्रदूषित पानी के सहारे लड़खड़ाती दम तोड़ती,आगे बढ़ती नदी के पानी को अपनी सूनी उदास आँखों से देखा,और प्यास से पपड़ाए अपने सूखे ओठों पर जीभ फेरते हुए पानी के नमूने अपनी बोतल में भरने करने लगा |

***

लघुकथा-४
गुणवत्ता प्रमाण पत्र

जैसे ही उसकी नज़र कार चलाते हुए पेट्रोल पम्प के पास सड़क किनारे खड़े वाहन पर पड़ी -‘ वाहन प्रदूषण जांच केंद्र |’ वह रुक गया |
‘भाई कार प्रदूषण की जांच करवानी है |’
‘जी हो जाएगी |’
‘सर्टिफिकेट कब मिलेगा |’
‘अभी हाथों- हाथ |’
‘तो कीजिए जाँच |’
‘जाँच की कोई ज़रूरत नहीं, आपको सर्टिफिकेट से मतलब मिल जायेगा |’
वह आश्चर्य में डूबा कुछ सोच ही रहा था की, वाहन प्रदूषण जाँच केंद्र करने वाले ड्राइवर ने अपनी गाड़ी स्टार्ट कर आगे बड़ाई, उसकी गाड़ी के सायलेंसर से निकलते काले बदबूदार धुंए ने उसे सचमुच प्रदूषण प्रमाण पत्र दे दिया था|

***

लघुकथा-५
बेज़ुबान

‘क्यों साहब यह चलेगी क्या ? उसने अर्थपूर्ण ढंग से एक लड़की की तरफ इशारा करते हुए कहा |
‘ हां, हां चलेगी क्यों नहीं चलेगी ,बिल्कुल चलेगी | वह कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए बोला |
‘तो साहब यह रहा कमरा,वो और आप खींच लो पकड़ कर अंदर वह बेशर्मी के भाव से हंसते हुए बोला |
‘वो तो ठीक है मगर ,कहीं इसने शोर -शराबा किया और चीखी चिल्लाई तो ..!
‘अरे आप भी हद करते हैं कहीं गूंगे बहरे भी चीखते – चिल्लाते हैं|
भवन के प्रवेश द्वारपर लिखा था – ‘ मूक- बघिर कन्या छात्रावास में आपका स्वागत है | ‘

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