कठफोड़ा

चार-चार बेटियों के बाद बड़े मान और मन्नत के बाद आया था बेटा रघुनंदन सिंह के घर। लम्बी चौड़ी जमीन जायदाद और नौकर चाकरों की फौज थी सेवा सश्रुषा को, धन-दौलत और ऐशो-आराम किसी भी चीज की तो कमी नहीं थी वहां। बेटा एक मांगता तो चार देते पिता, पर उसे कुछ जचता ही नहीं, ना तो पिता और ना ही उनका लाड़-प्यार का यह अतिरेक। दालान में बिछे तखत पर रखे गुड़ के थाल की तरह ही मक्खियाँ ही भिनभिनाती दिखतीं, हमेशा। विशेषतः वह सिर पर बंधा देहाती पग्गड़ और कंधे पर रखा गमछा तो दिनरात ही खटकता रहता अंग्रेजी स्कूल में पढ़ रहे बेटे की आँखों में। इतना शर्मिंदा रहता अतुल अपने परिवार के देहाती रहन-सहन और वेशभूषा से कि स्कूल में उनका उससे मिलने आना तक खलने लगा था उसे। कई बार मना कर चुका था वहाँ आने को, खासकरके उसके बाद तो बेहद तेज स्वर में जब एक सहपाठी ने पिता को उसका नौकर ही समझ लिया था।
पर यह अपनों से दूर जिन्दगी जीने की और हर चीज बेहतर से बेहतर की ललक और आदत भी तो पिता ने ही डाली थी । बेटे के मुंह से बात निकलती नहीं, उसके पहले ही पूरी भी कर देते । चौबीसो घंटे उसका मुँह देखकर ही जीते थे ठाकुर साहब। एक जिद पर ही अपना आरा शहर का महलों जैसा घर और जमीदारों वाला रहन-सहन छोड़कर मुंबई के कबूतर खाने, यानी कि चार कमरों के फ्लैट में रहने आ बसे थे , ताकि बिना माँ के नन्हे की आगे की पढ़ाई ठीक से चल सके और बेटा भी साथ व पास ही रहे उनके । बिना बेटे के गांव में अकेले-अकेले मन भी तो नहीं लगता था उनका , और बेटे के मानसिक विकास को रोकता गांव किसी काम का भी तो नहीं था अब उनके लिए।
उसकी मृत माँ को तो वापस ला नहीं सकते थे वह पर इतना तो कर ही सकते थे बेटे के लिए। पर उनकी मुश्किल तो तब और भी बढ़ गई, जब हमेशा ही , ‘ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ, जरा हटकर जरा बचकर यह बौम्बे मेरी जान ‘ गानेवाला बेटा मुंबई से भी युवा होते ही ऊब गया और जल्द ही और भारत की फिल्मफेयर नहीं , लंदन की हलो मैगजीन पढ़ने लगा और उसमें छपे लोगों की तस्बीरें और जीवन-शैली ही लुभाने लगी उसे। अभी तक कितनी भी मुंबई उसकी जान रही हो, अब लंदन या न्यूयौर्क में ही जाकर रहना था उसे। कई बार बताया उसने यह पिता को, वहीं जाकर रहेगा , जहाँ दुनिया भर के रईसों ने घर खरीद रखे हैं। आखिर उसके पिता के पास भी तो पैसों की कोई कमी नहीं?
बेटे को मना तो नही कर सकते थे पर रोकने का एक ही तरीका था अब चिंतित पिता के पास। एक असंभव-सा लक्ष दे दिया जाए बेटे को।
बोले, ‘ ना-ना ये रुपए देखने में भले ही ढेरों लगते हों, पौंड और डौलर के आगे कोई मोल नहीं इनका। ना ही इन्हें वहाँ तक पहुंचाने का कोई आसान तरीका ही है। हाँ, यदि तुम डॉक्टर या इन्बजीनियर बन जाओ, तो न सिर्फ इंगलैंड या अमेरिका जाकर रह सकते हो, अपना जैसा चाहो, वैसा घर भी खरीद सकते हो।‘
पिता की आँखों में ऐशो-आराम में डूबे बेटे के लिए लक्ष भले ही असंभव रहा हो पर बेटे को तो गांव से ही कठफोड़वा को देखने की आदत पड़ चुकी थी, जो अपनी पैनी चोंच से दिनरात ठक-ठक करके मोटे-से-मोटे तने को भी बेंध देता था।
सपनों की चमक और चकाचौंध कुछ ऐसी थी कि दिनरात मेहनत करके निर्धारित समय में ही अतुल ने भी पिता का लक्ष भेद दिया और लंदन के एक अस्पताल से नियुक्ति पत्र भी मिल गया उसे।
पिता के पास भी अब कोई और राह नहीं थी, सिवाय बेटे का मन रखने के । जिस बेटे को बड़ी-से-बड़ी बात के लिए भी मना नहीं किया, उस वक्त कैसे कर पाते? मांगता तो जान तक हाजिर थी उनकी, फिर यह तो बहुत छोटी-सी बात थी। फिर बचपन से एक यही तो गुरुमंत्र दिया था बेटे को, कि सफलता का एक ही रहस्य, लक्ष साधो और लक्ष बींधो।
बहू और पोते का सहारा बने, जबकि उन्हें खुद सहारे की जरूरत थी अब तो। और भीगी आँखों से इजाजत दे ही दी थी आंख के तारे को खुद से दूर जाने की।
फूल -माला से लदा जब जहाज में बैठा अतुल, तो धरती पर पैर ही नहीं पड़ रहे थे उसके। वाकई में आसमान में ही तो उड़ रहा था वह अब।
नए देश की धरती पर पैर रखते ही एक जाल था चारो तरफ इमारतों का, कारों का, खबरों का और विचारों का भी। इफरात ही इफरात थी हर चीज की… पैसों की, खाने-पीने की, सुख-सुविधा की। सुनहरे दिन थे वह उसके। इंद्रलोक शायद इसे ही कहते हैं, अक्सर ही सोचने लग जाता , ‘अब बस पत्नी आ जाए एकबार फिर इस स्वर्ग जैसी जगह में कोई कमी नहीं रह जाएगी । किसी भी बात या चीज की भी? और पिता? नहीं वह नहीं, अनपढ़ के साथ जग-हसाई तो नहीं ही करवानी उसे इंगलैंड में? न कपड़ों का शऊर और ना ही चार लोगों के बीच उठने बैठने का ही! चार-चार बहनें हैं न, वो देखभाल करेंगीं पिता की पारी पारी से।’
पिता से ही सुना था उसने कि करुणा की बेटी दया होती है फिर यहाँ प्यार की नफरत कैसे ? समझ में नहीं आता कुछ भी उसके। क्योंकि सुख के निर्झर के नीचे बैठते ही आँखें भी तो स्वतः ही बन्द हो जाती है अक्सर और इसके रंग-बिरंगे वितान भटका लेते हैं। आदमी बहक जाता है। भागने लगता है , खुद से , अपनों परछांइयों से, अपनों से ही।
रघुनंदन सिंह के लाडले बेटे अतुल के साथ भी तो यही हो रहा था। प्यार की कद्र नहीं थी उसकी आँखों में और हर सुख-सुविधा की गोद में बैठा वह अपनों का मोल नहीं समझ पाया था।
पर जितना आसान वह सोचता था, उतना होता नहीं नई धरती पर सपनों के महल खड़े करना ! एक कुशल डॉक्टर होकर भी नहीं। क्योंकि वक्त की तो एक अपनी ही और अलग ही चाल होती है, जो किसी के बस में नहीं। कठफोड़ा अतुल के बस में भी नहीं।
कुछ ही दिनों में फिरसे उदासी और असुरक्षा ने घेरना शुरु कर दिया उसे।
ठंडी रातों में बर्फ-सा ठंडा बिस्तर खलने लगा और गरम देह की जरूरत महसूस होने लगी । और तब एक नहीं दो-दो ढूंढ लीं उसने। ढूंढ लीं या फंसा ली या यूँ भी कहा जा सकता है कि खुद ही फंस गया वह।
जूली और जूलिया दोनों ही उसके वार्ड में सिस्टर थीं। दिन-रात का साथ रहने लगा दोनों के ही साथ। पारी भी बांध दी उसने दोनों की। एक सोम मंगल बुध को तो दूसरी बृहस्पति शुक्र और शनि को। दोनों को ही पता था कि एक खतरनाक खेल खेल रहा था वह उनके साथ पर दोनों को ही ऐतराज नहीं था।
खूबसूरत और सफल डॉक्टर अगर जीवन-साथी की तरह मिल जाए तो इससे अच्छी और क्या बात हो सकती है? भारतीय न सिर्फ निभाना जानते हैं, निभाते भी हैं। एकबार शादी हो जाए तो आसानी से नहीं टूटने देते। यही सब सोचते-सोचते हंस-हंसकर शामिल रहीं दोनों उसके इस खेल में । लालच के दाने भी बराबर के ही फिंके दोनों ही तरफ से। कभी वह उन्हें मंहगे होटलों में खाना खिलाने ले जाता तो कभी वे दोनों उसे मंहगी -मंहगी यात्राओं पर। आखिर हो भी क्यों नहीं, दोनों ही रईसजादियाँ थीं, और उनके पास भी पैसों की कोई कमी नहीं थी। नर्स की नौकरी तो शौकिया कर ऱही थीं और अच्छे खाते-पीते घर से होकर भी वह यहाँ अकेला इसलिए पड़ा था क्योंकि उसे भारत नहीं, लंदन की चकाचौंध लुभाती थी।
तीनों ने ही हर बिखरे दाने को जी भरकर चुगा। साथ ही अतुल ने यह भी ध्यान रखा कि सात समंदर पार बनाया नीड़ भी ना उजड़े, जहाँ पत्नी और पांच साल का बेटा इन्तजार कर रहे थे और जिनसे वह नौकरी मिलते ही बुला लेने का वादा करके ही उड़ा था भारत से।
जाने किसे समझाने को हर इतवार की शाम को वह अपने रजिस्ट्रार के घर जाता और उसकी पत्नी के अद्भुत संगीत संकलन से अपनी और पत्नी की पसंद के या फिर उस दिन के भावों के उपयुक्त रिकौर्ड उठाता और लम्बी-लम्बी औडियो चिठ्ठी रिकौर्ड करता पत्नी और बेटे के लिए। धीरे-धीरे वह खुलने भी लगा था विभा भाभी से। आरा की ही तो थीं वह भी और उसी की तरह पांच साल मुंबई में रही भी थीं और उसी की तरह सभी आधुनिक तौर-तरीकों से परिचित और सज्जित भी थीं।
जूली जूलिया और पत्नी बीना तीनों के ही बारे में सब कुछ बता चुका था वह उन्हें। पढ़ी-लिखी और खुले विचारों की आधुनिक महिला थीं । उसकी परेशानी और मजबूरी दोनों को ही समझती थीं। फिर भी कभी-कभी हैरत और एक लाचारी और शर्मिंदगी का भाव भी धूप-छांव की तरह तैर ही जाता था उनके सौम्य चेहरे पर और तब वह एक अपराधी की तरह चुपचाप उठकर वापस अपने अकेले कमरे में लौट आता था।
और कुछ बस में भी तो नहीं था उसके …’वक्त करेगा फैसला कि सही क्या है और गलत क्या है?’ यही सोचता-मथता और थोड़ा बहुत समझाता भी खुद को। अभी तो बस उसे इस उदासी और अकेलेपन से बाहर निकालना था। खुद को बीमार होने से बचाना था।
नरक का यह पासपोर्ट, यह स्वर्ग का लालच, यह सोने का फंदा चाहे जो नाम दे लो इसे, खुद ही तो डाला था उसने अपने गले में और अब वह तोड़ेगा भी खुद ही।…
पर ऐसे ही पांच साल निकल गए, उसी ढर्रे पर चलते-चलते। न तो वह बदला और ना ही उसकी जिन्दगी ही।
और तब अचानक ही एक दिन सुबह-सुबह ही दरवाजे की घंटी बजी, तो आश्चर्य का ढिकाना न रहा। पिता और पत्नी बेटे के साथ दरवाजे पर खड़े थे , वह भी तब जब जूलिया कमरे के अंदर उसके बिस्तर में ही सो रही थी।
आदर्श बाप के आदर्श बेटे के लिए धरती नहीं फट रही थी कि वह उसमें समा जाए, समझ में नहीं आ रहा था कि क्या सफाई देगा वह अपने पिता को, पत्नी को, और खुद इस जूलिया को भी? फिर बेटा भी तो अब दस साल का हो चुका था क्या सोचेगा उसके बारे में?
पर किसी ने कुछ नहीं पूछा , कोई ताक-झांक नहीं की कमरे के अंदर। आँधी जैसे अचानक आई थी वैसे ही चुपचाप गुजर भी गई, कोई विध्वंस किए बगैर ही। मिनटों में ही बेटा ‘पापा’ कहकर लिपट गया उससे और पैर छूते ही पापा ने भी गले लगा लिया उसे। देरतक प्यार से उसके बाल और माथा सहलाते रहे। वह भी तो अब आंखें बन्द किए उनके कंधे पर सिर रखे खड़ा रहा था चुपचाप, जाने कितनी देर तक खडा रहा था बिना हिले डुले पिता के आगोश में। अवर्चनीय सुख का पल था वह।
तभी जूलिया आई और चाभी उसके हाथों पर रखते हुए बोली, ‘ फ्लैट की सफाई कर दी है मैंने सर, अब मैं चलती हूँ।‘
फिरंगिनी जिसे वह बेवकूफ और मात्र एक शरीर समझता था , कितनी समझदार निकली और एक बेहद असमंजस भरी परिस्थिति में किस सफाई के साथ उबार लिया था उसे।
पल में ही परिवार की आँखों में गिरने से बचा लिया और किसी को भनक तक नहीं लगने दी थी कि क्या रिश्ता रहा था उनके बीच। मन कृतज्ञता से भरा जा रहा था अतुल का। भरी आँखों से वह निष्पलक देखता रहा उसे खुद से दूर जाते हुए….तबतक, जब तक उसकी कार आँखों से ओझल न हो गई।
किसने कहा कि देवदूत नहीं रहते धरती पर?
उसके बन्द होठों से ये अस्फुट शब्द अभी निकले ही थे कि बेटा लपककर गोदी में चढ़ गया और बोला, -‘हाँ पापा। हमारे दादाजी सच में देवदूत ही तो हैं। अबकी मेरे जन्मदिन पर वादा किया था दादा जी ने कि मेरा दसवाँ जन्मदिन हम सब मिलकर एक साथ मनाएंगे। और देखो हमें ले भी आए आपके पास। अभी मेरी दो महीने की छुट्टी भी तो है स्कूल से।‘
‘नहीं, तुम अब यहीं पढ़ने जाओगे और हम चारो यहीं पर साथ-साथ ही रहेंगे।‘
मानो प्यासे और भटकते को दरिया दिख गया था या फिर अचानक ही कमरा रौशनी से भर गया था , इतनी चमक थी अब वहां उपस्थित हर चेहरे पर ।
‘पर अंग्रेज मुझे भी यहाँ पर रहने देंगे, वीसा मिल जाएगा? ‘
पापा की अगली चिंता पर अब उनके होठों पर थी। वह कुछ जबाव दे तक पाए इसके पहले ही अपने बहते आँसुओं को पोंछते हुए एक गहरी और दर्दभरी सच्चाई के साथ माँ और पिता की तरफ देखते हुए नन्हा उससे बोला।…
‘और मेरी किताबें , मेरे दोस्त, मेरे खिलौने, उन सबका क्या होगा पापा?’
कान तक खिंची हंसी के साथ उसके बेटे ने भी तब पलट-पलटकर उससे पूछा था।
पर अपनी सारी मनमानी भूलकर अब तो एक बाप का ही दिल तेजी से धड़क रहा था अतुल के सीने में, जो कुछ भी कर सकता था अपने बेटे के लिए, अपने परिवार और पिता के लिए।
‘परेशान नहीं हो। वही देवदूत सब कुछ नए दिला देगा तुम्हें यहाँ पर भी।‘
पिता की तरफ देखते हुए छलकती आँखों से तब जबाव दिया था उसने अपने कौतूहल से भरे बेटे को तुरंत ही।
‘ बस एक बात मत भूलना कभी, जिन्दगी सिर्फ मनमानी ही नहीं, जिम्मेदारी भी है । जिमेमेदारी सही और मधुर रहने की, रिश्तों को सही और मधुर रखने की। मरीचिकाओं से बाहर आने और साथ-साथ दूसरों को निकालने की भी। मन के घोड़ों को भटकने मत देना कभी। और यह जो जिन्दगी की किताब है न, यही असली गीता कुरान है हमारी। रोज पढ़ना इसे और हर पन्ना पढ़ना। बारबार दोहराते रहना। धूल मत चढ़ने देना इस पर।‘
अतुल बस लगातार बोले ही जा रहा था, पता नहीं खुद से या फिर बेटे से या अपने पापा से? कितनी उसकी बातें बेटे अनमोल को समझ में आईं या नहीं , पर वह पल वाकई में अनमोल था पूरे परिवार के लिए। बेटा भी तो तुरंत ही ‘ जी पापा।‘ कहकर वापस उसकी गोदी में जा चढ़ा था और उसे लगातार बेहद प्यार से देखे जा रहा था ।
रघुनंदन सिंह भी अब अपने बेटे और पोते को यूँ तन्मय होकर बोलते-बतियाते देखकर बारबार आंसू पोंछ रहे थे, मन-ही-मन प्रार्थना कर रहे थे कि उनके परिवार की खुशियों को किसी की नजर ना लगने देना भगवान। जबकि बीना तुरंत ही अपनी घर-गृहस्थी संभालने चली गई थी उन तीनों को वहीं बात करता छोड़कर । अपने नए घर को व्यवस्थित और आरामदेह करने लगी थी । जब ससुर जी और बेटे का बिस्तर ठीक करके अपने शयनकक्ष में पहुँची बीना , तो बासी भभके ने मन बेचैन कर दिया उसका ।
उठकर खिड़की खोल दी तब सारीं उसने।
ताजी हवा के झोके के साथ एक लयबद्ध थाप थी अब कमरे के बाहर, मानो उसकी अगवानी में मंगल गीत की एक मोहक शुरुआत….चिहुककर इधर-उधर देखा तो गहन पत्तियों में छुपे कठफोड़वा को ढूंढने में ज्यादा वक्त नहीं लगा । बाबरा सामने खड़े चिनार की मोटी डाल पर बैठा यहां भी जाने कबसे और किस आस में लगातार ही ठक-ठक किए जा रहा था ।
अचानक उसकी विस्मित आंखों के आगे ही चिडिया का चेहरा पति और ससुर के चेहरे से ही नहीं, खुद उसके अपने और बेटे अनमोल के चेहरे से भी मिलता जुलता दिखने लगा उसे। और तब घबराकर खिड़की वापस बन्द कर दी उसने तरॅत ही। कितना भी वह मानें या न माने, पूरी दुनिया ही तो कठफोडवा ही है पर, अपनी ही लगन में अंधी? इसी जात-बिरादरी की और दिखे या न दिखे , इतनी ही जिद्दी भी….धुन की पूरी पक्की और पूरी तरह से खुद में ही रची-रमी भी।…

शैल अग्रवाल
संपर्क सूत्रः shailagrawal@hotmail.com
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