
छोटे प्राणी बड़े काम के
गई एक दिन चुनमुन चींटी,
नदी किनारे पानी पीने |
फिसला पैर गिरी पानी में,
डर से छूटे उसे पसीने |
नदी किनारे वहीँ पेड़ पर,
एक कबूतर ने जब देखा |
जान बचे चींटी की कैसे ?,
एक तोड़कर पत्ता फेका |
चींटी ने जब पत्ता देखा,
उस पर चढ़कर जान बचाई |
पत्ता जब लग गया किनारे,
चींटी ने थी राहत पाई |
आकर मिली कबूतर से वह,
बोली भैया हूँ आभारी |
अगर जरुरत पड़ी कभी तो,
कर दूंगी मैं मदद तुम्हारी |
हँसा कबूतर मन ही मन में,
ये नन्हीं क्या मदद करेगी |
जान जरा सी तो है इसकी,
मेरे दुख क्या दूर करेगी |
तभी अचानक एक शिकारी,
ने गुलेल से साध निशाना |
उसी कबूतर के ऊपर ही,
एक बड़ा सा पत्थर ताना |
चींटी ने जब यह देखा तो,
उस व्याध पर गुस्सा फूटा |
काट लिया उसके पैरों पर,
उसका हाय! निशाना चूका |
अब तो हुआ कबूतर भावुक,
बोला तुमने जान बचाई |
तुम हो मेरी प्यारी बहना,
मैं हूँ बहना तेरा भाई |
छोटे प्राणी बड़े काम के,
काम बड़े अक्सर कर जाते |
पता नहीं हम बड़े लोग क्यों,
इन छोटों को समझ न पाते |
गधे का बच्चा
एक समय की बात गुम गया,
एक गधे का बच्चा |
बच्चा क्या था हीरा जैसा,
सुंदर गोरा चिट्टा |
गधा बड़ा ही परेशान था,
कैसे कहाँ तलाशें |
ढूंढे कहाँ सड़क गलियों में,
किसके घर में झांके |
तभी एक घर के भीतर से,
स्वर था पड़ा सुनाई |
अरे गधे के बच्चे तुमको,
बिलकुल शर्म न आई |
समझ गया वह गधा, छुपाया ,
गया यहीं पर बच्चा |
घर के भीतर घुसा धडाधड,
मार द्वार पर धक्का |
एक आदमी अपने बच्चे,
को डांटे जाता था |
उसे गधे का बच्चा कहकर,
उस पर झल्लाता था |
गधा हो गया खुश बोला हम
,तुम दोनों हैं भाई |
हम दोनों हैं बाप गधों के,
बात समझ में आई ?
अब तो घबरा गया आदमी,
यह कैसी लाचारी |
गधे का बच्चा कहना कितना,
पड़ सकता है भारी |
गधे का बच्चा भूले से भी,
बच्चे को ना कहना |
जो बोला अपमान बहुत ही,
उसे पड़ा है सहना |

अभिमानी का सिर नीचा
एक संत के पास एक दिन,
एक आदमी आया |
बोला पानी पर चलने का,
मन्त्र सीख मैं आया |
दौड़ लगाकर पानी पर मैं,
नदी पार जाता हूँ |
भरी बाढ़ में जल पर चलकर,
वापस आ जाता हूँ |
संत खुश हुए बोले बच्चे,
ज्ञान ठीक पाया है |
पर बतलाओ इस पर कितना,
समय किया जाया है |
कहा पुरुष ने बीस वर्ष में,
हुनर सीख मैं पाया |
की वन में एकांत साधना,
तब मंजिल पा पाया |
बोले संत, रूपये दस देकर,
नदी पार जाता हूँ |
इतने ही नाविक को दे फिर ,
वापस आ जाता हूँ |
बीस रूपये के लिए व्यर्थ ही,
इतने वर्ष गंवाए |
समय गंवाकर बोलो इतना,
जग को क्या दे पाए |
बातें सुनकर प्रवर संत की,
पुरुष बहुत शरमाया |
अभिमानी सिर नीचा करके,
घर को वापस आया |
दौड़ लगाकर पानी पर मैं,
नदी पार जाता हूँ |
भरी बाढ़ में जल पर चलकर,
वापस आ जाता हूँ |
संत खुश हुए बोले बच्चे,
ज्ञान ठीक पाया है |
पर बतलाओ इस पर कितना,
समय किया जाया है |
कहा पुरुष ने बीस वर्ष में,
हुनर सीख मैं पाया |
की वन में एकांत साधना,
तब मंजिल पा पाया |
बोले संत, रूपये दस देकर,
नदी पार जाता हूँ |
इतने ही नाविक को दे फिर ,
वापस आ जाता हूँ |
बीस रूपये के लिए व्यर्थ ही,
इतने वर्ष गंवाए |
समय गंवाकर बोलो इतना,
जग को क्या दे पाए |
बातें सुनकर प्रवर संत की,
पुरुष बहुत शरमाया |
अभिमानी सिर नीचा करके,
घर को वापस आया |

प्रभुदयाल श्रीवास्तव
१२ शिवम् सुन्दरम नगर
छिंदवाडा मध्यप्रदेश ४८०००१
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