पाँच लघुकथा
राममूरत राही, इंदौर

लघुकथा-१
प्रतिप्रश्न
“डॉक्टर साब ! मैंने सुना है कि सुबह खाली पेट दो अखरोट की गिरी खाने से कुछ दिनों में घुटने का दर्द ठीक हो जाता है, क्या ये सच है ?” क्लिनिक पर आये मरीज ने पूछा।
“नहीं ये सच नहीं है, बकवास है। तुम ये दवा लेना, और जो अभी मैंने तुम्हें एक्सरसाइज बतायी है वो करना, और पन्द्रह दिन बाद फिर आना।”
“जी डॉक्टर साब।”
मरीज के जाने के बाद डॉक्टर के पास ही बैठे उनके युवा पुत्र ने, जो उनसे किसी काम से मिलने आया था, उसने पूछा —“पापा ! आप तो अपने घुटने का दर्द दूर करने के लिए रोजाना सुबह अखरोट खाते हैं, जिससे आपको फायदा भी है, फिर उस पेशेंट से आपने झूठ क्यों कहा ?”
“बेटा ! तो क्या मैं सच बोलकर अपने पेट पर लात मार लेता ?”
लघुकथा-२
हँसते आँसू
“कौन हो भाई तुम ?” पार्क में मुखौटा लगाए घूमते हुए उस व्यक्ति से मैंने पूछा।
“दिखता नही क्या ? जोकर…”
“यानी लोगों को हँसाते हो।”
“हाँ, लेकिन…”
“लेकिन क्या ?”
“लेकिन बस, लोगों को ही।” कहते-कहते उसने मुखौटा उतारा तो मुझे एक आँसू भरे चेहरे के दर्शन हुए।
लघुकथा-३
उसके लिए
“मम्मी ! पापा और आप उपवास क्यों करते हैं ?” दस वर्षीय सार्थक ने अपनी मम्मी से पूछा।
“बेटा ! घर की खुशहाली के लिए।”
“मम्मी ! क्या हम दूसरों की खुशहाली के लिए भी उपवास रख सकते हैं ?” सार्थक ने फिर पूछा।
“हाँ बेटा ! लेकिन तुम क्यों पूछ रहे हो ?”
“मम्मी ! कल से मैं भी उपवास रखूंगा।”
“तुम क्यों रखोगे बेटा ! हम हैं ना ?”
“मम्मी ! मैं सच-सच बताऊं, आप मुझे डाँटेंगी तो नहीं ?”
“नहीं बेटा ! भला तुझे क्यों डाँटूंगी ?”
“मम्मी ! हम जहाँ क्रिकेट खेलने जाते हैं ना, वहाँ हमारे साथ एक लड़का भी खेलता है। जो बहुत ही गरीब है। उसके पिता नहीं हैं। वे चार-पांच भाई बहन हैं। उसकी मम्मी मजदूरी करती है। इसलिए मैं उसके लिए उपवास रखना चाहता हूँ, ताकि भगवान उसके घर भी खुशहाली लाएं।”
“बेटा ! तुम अपने उस दोस्त को क्यों नहीं कहते कि वो उपवास रखे ?”
“मम्मी ! वो तो हमेशा ही हफ्ते में दो-दो दिन उपवास रखता है।”
लघुकथा-४
गिरगिट
सुलभा बीस-पच्चीस दिन से कोमा में थी। बहु आशी और बेटा अभय दिन-रात सेवा में लगे थे। एक बार आशी ने खीजकर अभय से कहा– “मैं तो इनकी सेवा करते-करते ऊब गई हूँ। अब भगवान इन्हें उठा ले तो अच्छा है।”
“अरे…ऐसा क्यों बोलती हो।” अभय ने थोड़ा गुस्से से कहा।
“क्यों न बोलूँ…?” आशी ने अकड़ कर कहा।
“अम्मा ! घर की पालनहार हैं। अगर उन्हें कुछ होगया तो…।”
“तो… तो क्या हो जाएगा, आसमान फट जाएगा ?” आशी ने चिढ़ कर कहा।
“आशी ! मुझे प्रायवेट कंपनी में सिर्फ बीस हजार सेलेरी मिलती है, जबकि अम्मा को पेंशन पच्चीस हजार…।”
यह सुनकर आशी आवाक रह गई, और फिर सास की लंबी उम्र के लिए दुआ मांगने लगी।
लघुकथा-५
मासूम प्रश्न
“माँ ! हमारा घर यहाँ पेड़ पर था, इसे किसने काट दिया ?” नन्ही गिलहरी अपनी माँ के साथ खाने की तलाश में गई थी और जब वापस आई तो उसने पेड़ की जगह बचे हुए ठूँठ की ओर इशारा करते हुए चिंतित स्वर में पूछा।
“बेटा! मनुष्यों ने काटा है।” गिलहरी ने ठूँठ के आस-पास परेशान होकर चक्कर लगाते हुए भरे गले से जवाब दिया।
“माँ, आपने एक बार बताया था कि पेड़ शहर के पर्यावरण के लिए बेहतर होते हैं। हवा के तापमान को कम करने में मदद करते हैं, और पथिक को छाया प्रदान करते हैं, फिर भी क्यों काट दिया ? ये तो सिर्फ हमारे लिए ही नहीं, मनुष्यों के लिए भी बहुत उपयोगी था।”
“बेटा, पेड़ काटकर मनुष्यों ने अपने पैरों पर स्वयं कुल्हाड़ी मारी है। इसका प्रभाव हम पर और पक्षियों पर भी पड़ेगा। मनुष्यों ने यहाँ फ़्लाई ओवर ब्रिज बनाने के लिए काटा है।” गिलहरी ने उदास स्वर में जवाब दिया।
“माँ, फ़्लाई ओवर ब्रिज क्यों बना रहे हैं?” बच्चे ने मासूमियत से पूछा।
“बेटा, आने-जाने वालों की सुविधा के लिए, शहर के विकास के लिए।”
“माँ, एक बात पूँछूँ ?”
“पूँछ बेटा।”
“माँ, हमने तो कभी अपनी सुविधा के लिए मनुष्यों का घर नहीं उजाड़ा, तो फिर उन्होंने हमारा घर, जो हमने तिनका-तिनका जोड़कर बनाया था, उसे क्यों उजाड़ दिया?”
“बेटा, ये मनुष्य जाति अपने फायदे और सुख-सुविधा के लिए कुछ भी कर सकती है। उसे हमारी तनिक भी चिंता नहीं होती है।” गिलहरी ने भरे गले से कहा।
“माँ, अब हम कहाँ जाएँगे?”
“बेटा, आस-पास तो अब पेड़ बचे नहीं, चलो कहीं दूसरी जगह चलते हैं।”
इतना कहकर गिलहरी अपने बच्चे को लेकर चल दी।
पाँच लघुकथा

शराफत अली खान
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लघुकथा-१
बदलते वक़्त का आईना
—
एक दिन सवेरे उठकर वह नित्यकर्म से निवृत्त होकर वॉशबेसिन पर हैंडवॉश करने लगा। तभी उसकी नज़र एकाएक वॉशबेसिन के सामने लगे बड़े से आईने पर पड़ी। वह एकबारगी चौक सा पड़ा। सिर और मूंछों के बालों की सफेदी के साथ तांबई रंग जैसा मुरझाया सा चेहरा उसे सामने दिखाई दिया।
उसने चौंक कर पूछा,” कौन हो तुम?” अधेड सा जैसा लगने वाला वह चेहरा हंसा और बोला,” मैं तुम ही तो हूं, तुम्हारा आज, तुम्हारा वर्तमान।
वह झुंझला गया,” क्या बकते हो ?तुम मेरा प्रतिरूप हो ,हरगिज नहीं ।झूठ बोल रहे हो तुम ।वह हकला सा गया। मैं …मैं.. तो एक गोरे रंग का खूबसूरत व्यक्ति हूं ।कॉलेज में लड़कियां मुझे कनखियों से देखा करती थीं। मैंने पहले- पहले कभी अपने आप को खूबसूरत नहीं माना ।मगर एक दिन कॉलेज में एक लड़के से मेरी तू…तू मैं..मैं हो गई। अगले दिन मेरा एक मित्र आया और उसने बताया कि वह लड़का तुम्हारी बहुत बुराई कर रहा था ।मैंने पूछा “क्या बुराई
कर रहा था ?”तब उसने मुझे बताया कि वह कह रहा था कि तुम जितने ऊपर से गोरे हो अंदर से उतने ही दिल से काले हो ।मुझे तब पहली बार यह एहसास हुआ कि मैं गोरी रंगत का नौजवान हूं ।फिर मैंने आईने में अपने आप को देखा था। मैंने पहली बार महसूस किया कि वाकई में मैं बहुत खूबसूरत हूं ।मुझे उसे लड़के की बुराई करना बिल्कुल बुरा नहीं लगा। मुझे लगा मानो उसने मेरी किसी छुपी हुई प्रतिभा को उजागर कर दिया हो ।
आईना उसकी बात ध्यान से सुनता रहा ।फिर बोला ,”यह है समय का चक्र है ,उससे कौन बच पाया है? अब तुम सीनियर सिटीजन बनने की कगार पर खड़े हो,। तुम सच्चाई को स्वीकार क्यों नहीं कर लेते ?”
वह आईने से धहाड़ा,” तुम समझते क्या हो? कल भी समय मेरे साथ था और आज भी मेरे साथ है। मेरे पास आज बंगला है, गाड़ी है, बैंक बैलेंस है ,अभी वह बात पूरी नहीं कर पाया था कि आईना बीच में बोल पड़ा,” और मां कहां है?” ‘मां’ वह जैसे सोते से जागा।
मां कहां है? अरे मां तो 25 साल पहले मुझे इस निष्ठुर संसार में अकेले छोड़कर परलोक चली गई थीं। मैं बहुत रोया था ।मैं सोचता था मां के बगैर मैं जिंदा कैसे रह सकता हूं ?मगर आज 25 वर्ष जाने के बाद …मैं आज भी जीवित हूं ।मुझे खुद आश्चर्य होता है कि मैं अब तक मां के बगैर कैसे जी लिया ?”उसने सामने आईने नहीं की तरफ देखा ।उस अधेड़ की आंखों से
अविरल आंसू बह रहे थे ,जो उसके चेहरे को भिगो रहे थे। इतने में आहट हुई। उसकी पत्नी वॉशबेसिन पर प्रकट हुई। उसने पति को देखा और वह चौंक पड़ी ,”क्या हुआ तुम्हें? रो क्यों रहे हो,?” इतना कहकर उसकी पत्नी ने उसे गले से लगा लिया और बोली ,”मेरे होते हुए तुम्हें किस बात की कमी है, बताओ क्या बात है ?”उसे अकस्मात अपनी मां की याद आ गई। जब भी वह किसी परीक्षा में असफल होकर आता था तो मां उसे इसी तरह बाहों में भर लेती थी और कहती “जब तक मैं जिंदा हूं ,तुझे किस बात की परेशानी है?” और आज उसने रुंधे हुए गले से पत्नी से सारा वृत्तांत कह सुनाया। पत्नी हंसते हुए उसका हाथ पकड़ कर उसे ड्राइंग रूम में ले गई ।करीब 2 घंटे के बाद वह नहा धोकर आईने के सामने था। सर और मूंछों के काले बालों के बीच महंगी फेस क्रीम लगा उसका गोरा रंग चमचम रहा था। उसने आईने की तरफ देखा ।आईना अब मुस्कुरा रहा था।
लघुकथा-२
बदसूरत चाँद
आसिफ कॉलेज जाने के लिए अपनी साइकिल दरवाजे से बाहर निकाल ही रहा था कि उसकी नज़र सामने घर के दरवाजे पर टांगे टाट के परदे के पीछे से झांकते चेहरे पर अनायास पड़ गई।
पुराने झीने टाट के परदे के पीछे चाँद सा खूबसूरत चेहरा देखते ही उसके समूचे शरीर में सिहरन सी दौड़ गई। हद से ज्यादा खूबसूरती भी आदमी को अंदर तक हिला कर रख देती है। इसी मन:स्थिति से आसिफ एकाएक घिर गया। वह चांद- सा चेहरा धीरे से मुस्कुराया। फिर अपनी बड़ी-बड़ी शफ़्फाक और बेदाग़ आंखों से शोख हंँसी बिखेरता हुआ टाट के परदे के पीछे ही छुप गया। आसिफ को लगा मानो खुले साफ आसमान में चौधवीं के चमकते चांद को अक्समात ही काले बादलों ने छुपा लिया ।वह बेमन से कॉलेज चला गया ।कॉलेज में सारा दिन बेचैन रहने के बाद वह जल्द ही घर लौट आया।
उसके मुसलमानी मोहल्ले में ज्यादातर लोग निम्न वर्ग के रहते थे। उसके घर के सामने यूसुफ पठान का घर है ।लेकिन उसके घर में तो उसकी बूढ़ी मां और एक छोटे भाई के अलावा कोई नहीं रहता, फिर उस घर में चांँद कहां से चमक उठा?
आसिफ का परिवार धनाड्य एवं शिक्षित होने के कारण सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था ।युसूफ गल्ले का काम करता था। उसका सारा दिन गल्ला तोलते और ढ़ोते ही निकल जाता। इसलिए आसिफ की युसूफ से कभी-कभार ही दुआ सलाम हो पाती। लेकिन अब आसिफ की युसूफ में दिलचस्पी पैदा होने लगी ।उस शाम पहली बार उसने यूसुफ का बेसब्री से इंतजार किया। घर के नजदीक आते ही आसिफ उससे तपाक से मिला ।उसकी मां की
खैरियत पूछी .फिर आखिर में पूछे बैठा,” युसूफ ,आजकल तुम्हारे घर मेहमान आए हुए हैं?”
” नहीं मेहमान वगैरह तो कोई नहीं आया, हां ,जुम्मन मामू की लड़की ज़ेबा जरूर आजकल घूमन-फिरने आई हुई है। यूसुफ ने लापरवाही से जवाब दिया ।
आसिफ अब उस चाँद का नाम जान चुका था। जे़बा.. बहुत प्यारा नाम है ,जैसा नाम वैसा ही रूप ।अब वह दिन का चैन और रात की नींद खो चुका था। रात में जरा नींद लगती तो वह परी चेहरा सामने आ जाता ।वह उसको रात- रात भर ख्वाब में निहारता रहता ।उसको मोहब्बत भरे ख़त लिखता। अब आसिफ की यूसुफ के घर- परिवार में दिलचस्पी और भी बढ़ती चली गई ।कभी-कभार वह यूसुफ की गैर मौजूदगी में जानबूझकर उसकी मां से मिल आता।इस बहाने वह परी चेहरा मुस्कुराकर उसका स्वागत करता नजर आता ।
एक दिन उसने सोचा। इस तरह इशारों से दिल की बात कहने, लुका-छुपी करने और ख्वाबों में मोहब्बत के ख़त लिखने से कुछ नहीं होने वाला। क्यों ना दिन के उजाले में जागते हुए खत लिखा जाए और उस चांद तक पहुंचाया जाए ताकि उसके दिल का भी हाल मालूम हो सके।
एक दिन भरी दोपहरी में आसिफ दरवाजे पर खड़ा था कि अक्समात अपने दरवाजे के टाट के परदे को थोड़ा हटकर आसिफ को देख मुस्कुराई ।आसिफ का दिल
अन्जानी आशंका से न जाने क्यों जोर-जोर से धड़कने लगा। फिर उसने काफी हिम्मत बटोर कर आगे बढ़कर जेब में से एक पर्चा निकाल कर उसे इशारे से समझाया कि यह प्रेम पत्र है ,इसको पढ़ कर जवाब देना और वह पत्र उसकी ओर बढ़ा कर देना चाहा तभी वह घबराकर पीछे हटी और अंगूठा दिखाकर बड़ी मासूमियत से बोली,” मैं तो अनपढ़ हूं, ख़त कैसे पढ़ूंगी ,उसका जवाब कैसे दूंगी ?”और फिर वह उस पुराने झीने टाट के परदे के पीछे ओझल हो गई ।
आसिफ का बढ़ा हुआ हाथ एकाएक वज़नी सा हो गया। वह मुश्किल तमाम हाथ को पीछे ला पाया। उसे लगा जैसे उसका चाँद बदसूरत हो गया है।्
लघुकथा-३
कड़वाहट
यूनिवर्सिटी में प्रवेश लिए उसे अभी एक महीना ही हुआ था ।मगर वह चाहता था कि उसके सुपरवाइजर महोदय उसका शोध कार्य जल्द से जल्द शुरू करवा दें। ताकि वह 2 साल के अंदर अपनी थीसिस सबमिट कर सके। मगर वह जब भी अपने प्रोफेसर साहब के चेंबर में जाता तो वहां मिस शकील अक्सर बैठी मिलती ।वह सीनियर रिसर्च स्कॉलर थी ।सीनियर छात्रों का कहना था की शकीला पिछले 8 सालों से रिसर्च कर रही थी। मगर अभी तक थीसिस पूरी नहीं कर सकी थीं। वह प्रोफेसर
साहब से शकीला के सामने कुछ न कह कर चुपचाप वापस चला आता और लाइब्रेरी में कुछ ना कुछ पढ़ता रहता ।
एक दिन वह प्रोफेसर साहब के पास गया तो इस बार वह अकेले ही थे ।उसने कहा ,”सर सिनॉफसिस पर कुछ गाइड कर दीजिए .यह सुनते ही प्रोफेसर साहब लापरवाही से बोले ,”अरे भाई ,जल्दी क्या है? हो जाएगा सब ,अभी साल 2 साल आराम से घूमो घामों।
एक दिन वह प्रोफेसर साहब के बुलाने पर उनसे मिलने जा ही रहा था की हिंदी सेमिनार के बाहर ही मिस शकीला उससे टकरा गई ।
“सुनिये, आप ही नये रिसर्च स्कॉलर आए हैं ना डॉक्टर हसन साहब के अंडर में ?”
“जी…जी,वह एकाएक हकला सा गया ।उसने शकीला को उचटती हुई निगाह से देखा। सिर के बीच के बीचो- बीच बालों में सफेदी चमकने लगी थी। जबड़े का आकार औरत की तरह खिंचकर चौड़ा सा होने लगा था। वह स्थानीय विश्वविद्यालय से एम.ए. हिंदी प्रथम श्रेणी में करके आया था और इस नामी गिरामी इस सेंट्रल यूनिवर्सिटी के नाम प्रभाव का हौव्वा उस पर अभी भी हावी था ।हल्के ठंड के मौसम में भी उसके माथे पर पसीना झलक आया।
” यहां पास के पिक्चर हॉल में शाहरुख की नई फिल्म लगी है, क्या ख़्याल है चलें?” शकीला ने मुस्कुराते हुए सवाल दाग़ा।
” जी ,वो… मेरे पास के पैसे खत्म हो चले हैं ।”
“ओह,डॉ.हसन साहब के अंडर में जो भी लड़का आता है ,बेचारा गरीब ही होता है ।खैर, कोई बात नहीं ,15 तारीख तक मेरा एम.मो.आ जाएगा ।तब मैं तुम्हें कुछ पैसे दे दूंगी।”
” नहीं… नहीं ,ऐसी कोई बात नहीं है।हॉस्टल में दोस्त हैं। खर्चा चल ही जाता है ।”उसने सफाई देनी चाही।एडमिशन लेते ही हॉस्टल के लड़कों ने बता दिया था कि शकीला से बच के रहना। वह विगत 8 वर्षों से पीएचडी कर रही है ।नये-नये स्कॉलर्स को फंसाती है ।मगर उसके पास खोने को था ही क्या? बचपन के सहपाठी ने जो इसी यूनिवर्सिटी का पुराना छात्र था ,उसने उसे रिसर्च करने के लिए बुलाया था। उसी के रहमो-करम पर वह हॉस्टल में रह रहा था और हॉस्टल का खाना खा रहा था ।घर से जो थोड़े बहुत पैसे लाया था वह लगभग खत्म हो चले थे ।
उस दिन भी डॉ. साहब के बुलाने पर वह उनके घर गया। डाइनिंग टेबल पर शकीला डॉ. साहब के साथ बैठी लंच ले रही थी। डॉ.साहब के इशारे पर थोड़ी दूर पर रखी कुर्सी पर वह बैठ गया। खाना खाने के बाद डॉ.साहब पास में लगे वॉश बेसिन से हाथ धोकर उसके पास आकर मुस्कुराते हुए बोले,” आजकल श्रीमती जी अपने मायके गई हुई हैं, घर का सारा ध्यान से शकीला ही रख रही हैं।” इतना कहकर डॉ. साहब स्टडी रूम में चले गए ।वह डाइनिंग टेबल पर कुशल ग्रहणी की भांति झूठी प्लेटों को इकट्ठा कर
,डाईनिंग टेबल को साफ करते हुए शकील को अभी देखने में तल्लीन था की तभी डॉ. साहब ने उसकी तन्द्राभंग करते हुए कहा ,”देखो भाई ,यह कुछ लिफाफे हैं जिन्हें अभी स्पीड पोस्ट कर देना और एक खास बात और है ,मेरे एक दोस्त कई साल बाद नाइजीरिया से वापस आए हैं ।उनके दो बच्चे अभी जूनियर क्लासेज में हैं। उन्हें हिंदी नहीं आती है। आप उनकी हिंदी की ट्यूशनश ले लेना ।कुछ तुम्हारा खर्चा भी निकल जाएगा ।”बात खत्म होने के बाद उसने सिर उठा कर देखा। शकील डाइनिंग टेबल पर रखे मिठाई के डिब्बे से मिठाई का एक टुकड़ा उठाकर अपने मुंह में रख रही थी, उसे लगा जैसे उसके मुंह में कड़वाहट भर गई हो।
लघुकथा-४
विवशता
वह बेहद टूट चुका था, बेरोजगारी से ।सारा दिन इधर-उधर भटकने के बाद उसकी भूख आक्रोश में बदल चुकी थी। वह कुछ करने के इरादे से एक अंधेरी वीरान-सी सड़क पर बनी पुलिया पर बैठ गया ।आधी रात के बाद एक आकृति तेज़ी से चलती हुई नजर आई ।वह सचेत हो गया।
उसने उस आकृति को पीछे से दबोच लिया। वह स्त्री थी ।उसने स्त्री के मुंह पर हाथ रखकर उसके कान में धीरे से कहा -“अपनी इज़्ज़त बचाना चाहती हो तो रुपए मेरे हवाले कर दो ।”
“वह तड़पी और तेज़ी से उसका हाथ पीछे हटा बोली “मुझे इज़्ज़त की परवाह नहीं है , हां,रुपये मैं नहीं दे सकती, क्योंकि मैं इज़्ज़त बेचकर ही ये रुपए लाई हूँ…”
लघुकथा-५
“सह अस्तित्व’
किसी के बहकाने पर एक दिन पेड़ ने पत्तों से कहा-“तुम बहुत घमंडी हो गए हो और यह भूल गए हो कि तुम्हारा अस्तित्व मेरी कृपा पर निर्भर है।”
पत्ते कुछ देर खामोश रहे। फिर बोले -“नहीं… ऐसा नहीं है। हमारे बिना आपका अस्तित्व भी अधूरा है। यदि आप असहमत हैं तो हम आपसे अलग हो रहे हैं।
इतना कहकर पत्ते एक-एक करके पेड़ से गिर पड़े। काफी समय गुजर गया। जब पेड़ पर पत्ते नहीं रहे तो उस पेड़ को सूखा जानकर जड़ से काट दिया गया ।
पाँच लघुकथा
विरेंदर ‘वीर’ मेहता
विकास मार्ग, ईस्ट दिल्ली 92.
लघुकथा-१
मंज़िलें और भी हैं
“नहीं आज नहीं।” कहता हुआ वह आगे बढ़ गया। ‘बार’ के बाहर खड़ा गार्ड भी हैरान था, सातों दिन पीने वाला शख्स आज बिना पिए जा रहा था।
वह आगे बढ़ता गया लेकिन उसके मन-मस्तिष्क में बेटी की बात घूम रही थी। “पापा, आज आप ड्रिंक नहीं करेंगें और चर्च में हमारे लिए ‘प्रेयर’ भी करेंगें।”
आख़िर वह उस दोराहे पर आ खड़ा हुआ, जहाँ से एक रास्ता रैन-बसेरे की ओर से जाता था। वहाँ के गंदे-अधनंगे बच्चों के कुछ मांगने के लिए पीछे पड़ जाने की आदत के चलते; वह उधर जाने से कतराता था। दूसरा रास्ता ‘सर्वशक्तिमान’ के दरवाजे पर जाता था जिस ओर जाना उसने महीनों पहले बंद कर दिया था क्योंकि ठीक एक वर्ष पहले उसके ख़ुद के हाथों हुई दुर्घटना में अपने परिवार को खोने का जिम्मेदार भी वह ‘उस सर्वशक्तिमान’ को ही मानता था। ‘क्या करे और क्या न करे’ की स्थिति में वह कुछ देर सोचता रहा और फिर एक ठंडी सांस लेकर बुदबुदाते हुए रैन बसेरे की ओर चल पड़ा। “नहीं बिटिया नहीं! मैं जीवन भर भटकता रहूँगा इन्हीं गलियों में, लेकिन अब ‘उधर’ कभी नहीं जाऊँगा।”. . .
“अरे बाबू, कछु खाने को दे ना।” जिस बात से वह डर रहा था, वही हुआ। रैन बसेरे के ठीक सामने शोर मचाते बच्चों में से कुछ बच्चों के साथ वह बच्ची भी उसकी टाँगों से आ चिपकी।
“अरे चलो, दूर हटो।” सहज प्रतिक्रिया वश उसने बच्चों को दूर धकेल दिया और तेज कदमों से वहाँ से निकल जाना चाहा, लेकिन नीचे गिरे बच्चों में से बच्ची के रोने की आवाज से उसके पाँव अनायास ही थम गए। “कहीं लगी तो नहीं? बोल न, क्या खाएगी बिटिया?” वह ख़ुद भी नहीं जानता था कि आज ऐसा क्यों हुआ, लेकिन कुछ ही क्षणों में ही वह उस बच्ची के साथ और बच्चों को भी ब्रेड लेकर बांट रहा था।
रोने वाली बच्ची अब मुस्करा रही थी और वह उसे एक टक देख रहा था। महीनों के बाद उसने आज ‘नैंसी’ को हँसते देखा था। “नैंसी मेरी प्यारी बेटी!” वह बुदबुदाया।
“क्या देख रहे हो पापा? आज मैं बहुत खुश हूँ, आज आपने मेरी दोनों बातें मान ली।”
“पापा !. . . दोनों बातें।” वह जैसे सोते से जाग गया। “हाँ, मान ही तो ली मैंने दूसरी बात भी। ये ब्रेड खाते बच्चे भी तो नन्हें-नन्हें ‘ईसा’ ही हैं और ये बच्ची मेरी नैंसी।”
सुनो बेटी।” उसने जाती हुई बच्ची को पुकारा। “आज तुमने अपनी ही दुनियाँ में भटकते मुझ मुसाफ़िर को उसकी मंजिल का पता दे दिया है। थैंक्यू नैंसी, थैंक्यू. . . !”
बच्ची कुछ नहीं समझी पर वह मुस्कराता हुआ आगे बढ़ चला था।
लघुकथा-२
अनचाही मेहर
“बाबा। उठो, दवाई का टाइम हो गया।” नर्स की आवाज़ से उसकी आँखें खुली, नींद से बोझिल आँखों में गर्दिश करते निराशा के साए छोड़; वह वापिस अस्पताल के बिस्तर पर लौट आया।
. . . सुबह का उजाला दिन चढ़ने का आभास दे रहा था। वार्ड में अब बिल्कुल सन्नाटा था। बीती रात उसको मिलाकर वार्ड में कुल तीन मरीज़ थे, अब वह अकेला रह गया था। पिछले दस घण्टों में दो बीमारी से अपनी लड़ाई बीच में छोड़कर चले गए। एक, उसकी तरह ही सत्तर पार दमे का मरीज़ था और दूसरा पचपन साल का अधेड़ ‘टी वी’ से हार गया था।
‘बाबा, अब सोना नहीं है, अभी डॉक्टर साहब राउंड पर आ रहे हैं।” नर्स ने बैड-शीट ठीक करते हुए अपना आदेश सुनाया।
सोने की बात पर उसे याद आया कि देर रात ठीक सामने वाले ‘अधेड़’ के आश्रित, डॉक्टर से लगातार अनुरोध कर रहे थे कि डॉक्टर साहब, इन्हें किसी भी तरह बचा लो, यही हमारा एक मात्र सहारा हैं। और उनकी मिली-जुली आशा-निराशा की बातों के बीच ही जाने कब उसकी आँख लग गई थी।
“बाबा, अब कैसा महसूस कर रहे हो?” डॉक्टर उसके टेस्ट रिपोर्ट्स चेक करने के साथ पूछ रहा था।
“ठीक लग रहा है डॉक्टर साहब।”
“हूँ. . . गुड। आज तुम्हें डिस्चार्ज कर रहे हैं बाबा, अपने किसी रिश्तेदार को बुला लो।” कहते हुए डॉक्टर नर्स को जरूरी हिदायत देने लगा था।
“अब तुम बिल्कुल ठीक हो बाबा।” उसकी ओर से कोई प्रतिक्रिया न पाकर नर्स ने अपनापन जताते हुए अपनी बात कही। “परमात्मा का शुक्रिया करो बाबा। ये रब की ही मेहर हुई है जो तुम बच गए।”
“रिश्तेदार. . . ! रब की मेहर. . .!” अस्फुट से शब्द बुदबुदाते हुए उसके चेहरे पर एक मुस्कान आकर चली गई। “पता नहीं बेटी, पर जाने क्यों ऐसा लग रहा है कि रब भी कभी-कभी मेहर करने में ग़लती कर जाता है।” कहते हुए उसकी नजरें सामने वाले ख़ाली बेड की ओर जा टिकी। ज़हन में कहीं अपने बच्चों के चेहरे और ‘वृद्धाश्रम’ की दीवारें आपस में गडमड हो रही थी।
लघुकथा-३
जलसा
बीते साल का आख़िरी ट्रिप था। हर तीसरे महीने मिलकर आउटिंग के लिए जाना, पार्टी करना हमारा नियम बन गया था।
इस बार भी खुल कर एन्जॉय किया।
क़रीब-क़रीब सभी थे, जिंदल साहब, मिस्टर चोपड़ा, मिस्टर एंथोनी, विजय बाबू और खान साहब। कमी रही तो आशीष कुमार की; हर ट्रिप की जान होता है आशी। हर किसी से खुले दिल से मिलना और खुलकर पैसा खर्च करना उसकी ख़ासियत है। लेकिन पिछले दो ट्रिप से नहीं आ रहा था। शायद कहीं उलझा हुआ था?
उस दिन भी फ़ोन करने पर उसने सहज ही मना करते हुए कहा था। “नहीं राज मैं नहीं आ पाऊँगा। तुम आओ न एक बार घर पर, बहुत बातें करनी है दिल की दोस्त।” और मैंने ‘अच्छा मिलता हूँ थोड़ा फ्री हो कर’ कहते हुए बात ख़त्म कर दी थी।
आज ध्यान आया तो फोन मिला दिया। बहुत देर रिंग होने के बाद उधर से एक नारी स्वर उभरा।
“हेलो. . .!
“जी, आशीष जी से बात करनी थी।”
“आप कौन. . .?”
“जी, मैं राज, राज कुमार आशीष का फ्रेंड।”
“वही, कलेक्टिव ट्रिप वाले. . .!”
“जी, जी वही…” मैं थोड़ा उत्साहित हो गया। “वो दरअसल इस बार के ट्रिप पर भी आशी नहीं आया, तो सोचा आज बात ही कर लेता हूँ।”
“राज जी… कैसे कहूँ कि आशीष अब कभी आपके ट्रिप का हिस्सा नहीं बन पाएँगें।” आवाज़ सर्द और दर्द से भरी थी। “दरअसल वो हमें छोड़ कर चले गए हैं।”
“क्या… कब, कैसे. . . आप कौन मैडम?” एक झटके में बहुत कुछ कह गया था मैं।
“जी मैं, मिसेज़ आशीष। बिज़नेस में हुए लंबे नुक़सान को वह बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे, और पिछले हफ़्ते. . .!
“ओह नो, उस दिन आशी मुझे मिलने के लिए कह रहा था, काश कि मैं मिलने आ जाता।
“मिस्टर राज, आप आते या नहीं। लेकिन काश कि आप लोग कलेक्टिव ट्रिप की जगह, सोशल मीडिया छोड़ एक दूसरे के दुःख-दर्द सुनने का कोई ट्रिप बनाते; तो शायद. . . .!”
फ़ोन कट चुका था और मेरे ज़हन में लास्ट ट्रिप के अपनी-अपनी शानो-शौकत बताने के किस्से और ठहाके काँटों की तरह चुभ रहे थे।
लघुकथा-४
अग्नि संकल्प
मुखाग्नि के साथ चिता प्रज्वलित हो गई, कुछ ही देर में चिर निद्रा में सोया ‘आशी’ सदा के लिए अतीत हो जाएगा। आशी भी लगभग अकेला ही था, हम तीनों मित्रों की तरह। कोई अपने नौकर के सहारे तो कोई अपने भाग्य के सहारे। बच्चों ने तो विदेशी ज़मीन पर ऐसा डेरा डाला कि लौटकर आने की बात ही नहीं करते थे। ऐसे में सुबह के अलार्म के साथ ‘मोबाईल-व्हाट्सएप ग्रुप’ पर एक दूसरे की कुशलता जान लेना नियम बन गया था हमारा। लेकिन आज ग्रुप में ‘उसका’ न आना ही हमें आशंकित कर गया था।
. . . . अग्नि की लपटें अब तपिश पैदा करने लगी थी। गिने चुने लोगों के साथ मैं भी कुछ हटकर खड़ा हो गया। नजरें एक टक आकाश की ओर उठती लपटों पर जा लगी। मन कहीं गहरे सोचने लगा था, “उम्र के आख़िरी पड़ाव पर खड़े हम मित्रों में से, आज नहीं तो कल सबने चले जाना है। लेकिन क्या अंतिम क्षण में गंगा जल देने वाला भी कोई होगा हमें? कल रात तक आशी जाने कितने सही-ग़लत काम करके, बनाए अपने आशियाने और भौतिक चीजों के मोह-माया के धागों में उलझा हुआ था। न वह सब कुछ छोड़ पुत्र के पास जाने को तैयार था और न पुत्र विदेश से लौटकर आने को तैयार था। लेकिन अब, अब उसके ‘सब कुछ’ छोड़ जाने के बाद पुत्र आएगा और अपने कर्तव्य निभाकर उसके आशियाने को बेच हमेशा के लिए लौट जायेगा। शायद हमारी भी यही नियति होगी; किसी की कम, किसी की ज़्यादा?”
. . . . चिता की अग्नि पूरी तरह से प्रज्वलित हो चुकी थी। आए हुए सभी लोग दूर बैठकर ‘कपाल क्रिया’ की प्रतीक्षा करने लगे। और उसके बाद सभी फिर उसी दुनिया में लौट जाएंगे जहाँ हर पल लाभ-हानि के तराजू में बटा हुआ है। मन फिर गहरे डूब गया। “… क्या छोड़कर जा रहे हैं हम ? ये भौतिक वस्तुएँ जिन्हें संभालने वाले जीते जी हमारे साथ न हुए तो जाने के बाद उनके मन में, कितने दिन रहेंगें हम? और ये हमारा शरीर, इसके अवयव; जिन्हें यहीं आकर इन संस्कारों की अग्नि में नष्ट हो जाना है। और इन संस्कारों को पूरा करने के लिए कोई अपना होगा भी या नहीं. . . !”
. . . . चिता की अग्नि एकाएक तेजी से प्रज्वलित हो उठी और जाने कैसे, अनायास ही उसकी तपिश मन में कहीं गहरे जा समाई। मस्तिष्क में उठा एक विचार और संकल्प बनकर हृदय में स्थापित हो गया। अग्नि से उठती लपटों में विलीन होते मित्र की अस्थियों के बीच अपनी ‘देह-दान’ की प्रक्रिया को प्रस्तावित करने का एक धुंधला सा संकल्प पत्र, मेरे सामने झिलमिलाने लगा था; जिसे भरने का मेरा निश्चय अग्नि की तपिश की तरह प्रखर होने लगा था।
लघुकथा-५
आ अब लौट चलें।
पापा को चिर निद्रा में सोए तेरह दिन हो गए थे। रीति-रिवाजों के साक्षी बने लोग जा चुके थे और घर में बची थी एक गहरी उदासी। मुझे जाने की तैयारी करते देख छोटा भाई और उदास हो गया। “वापिसी की तैयारी कर रहे हो भैया, कुछ दिन और ठहर जाते?”
“नहीं छोटे अभी रुकना मुश्किल है, लेकिन मैं लौटकर आ रहा हूँ। तुझे अब अकेला नहीं छोडूंगा। और देखना तुम, हम पापा की ज़मीन छुड़ा लेने की इच्छा भी जल्दी ही पूरी कर लेंगें।”
“पर कैसे बड़े भैया, पहले ही इतना कर्ज है और. . .!” उसने अपनी बात अधूरी छोड़ दी थी।
“तू परेशान मत हो छोटे, सब ठीक हो जाएगा। वो कहते हैं न, जब शरीर के किसी हिस्से की बीमारी बढ़ जाए तो जिंदा रहने के लिए उस हिस्से को काट देना चाहिए।”
“मैं समझा नहीं भैया, क्या कहना चाहते हैं आप?”
“भाई, अब आगे खेती के लिए न तो हम कोई ‘केमिकल फ़र्टिलाइज़रस’ प्रयोग करेंगे और न ही खेती के लिए किसी तरह का कोई कर्ज लेंगें?”
“तो भैया, फिर खेती कैसे करेंगे? उसकी सवालिया नजरें मेरी ओर थी।
“देख छोटे, खेती तो तब भी होती थी, जब ये रासायनिक खादें और ज़हरीले कीटनाशक नहीं होते थे। गोबर हमारे लिए खाद का काम करता था और नीम, हल्दी, लहसुन जैसी चीज़ें हमारे लिए कीटनाशक बन जाती थी। लेकिन हम अपनी ही जड़ों से कटकर आधुनिक बनने के नाम पर महँगे साधनों की ओर बढ़ते गए, और अनचाहे ही कर्ज़ों के मायाजाल में फसते गए।
“पर भैया अब ये तरीके कौन अपनाता है? और इन्हें इस्तेमाल करना भी तो मुश्किल है।”
“कुछ मुश्किल नहीं है छोटे, ये जैविक खेती अपने देश में ही नहीं बाहर भी बहुत होने लगी है अब। और पापा चाहते थे न कि मैं गाँव में रहकर कुछ करूँ, तो मैं अब गाँव में रहकर ही जैविक संसाधनों को बनाने के साथ इनके इस्तेमाल के लिए भी गाँव वालों को ‘ट्रेंड’ करूंगा और हम मिलकर अपनी खेती भी जैविक संसाधनों से ही करेंगें।
“लेकिन नौकरी छोड़कर ये सब. . . इतना आसान है क्या भैया?”
“छोटे आसान तो नहीं है, लेकिन मेहनत के रास्ते तो हमेशा मुश्किल होते हैं। और सहज सुलभ मिलने वाले रास्ते तो अक़्सर हमें गहरे गड्ढों की ओर ले जाते हैं; जैसे पापा. . .” कहते कहते मैंने बात अधूरी छोड़ दी।अनचाहे ही नजरों के सामने पापा की खेत में पेड़ से लटकी देह याद कर के हमारी आँखें छलक आईं थी।
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