अहंकार, आक्रोश या फिर अनियंत्रित मबत्वांकाक्षा… क्या है यह हमारी इक्कीसवीं सदी और क्या है इसकी सही ग़लत की परिभाषा? जैसे-जैसे हम प्रगति कर रहे हैं , समस्या जटिलतम होती जा रही है, और समझ निरीह।
भृतहरि ने कभी कहा था,
सत्याsनृता च परुषा प्रियवादिनी च हिंस्रा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या |
नित्यव्यया प्रचुरानित्यधनागमा च वाराड्गनेव नृपनीतिरनेकरुपा ||
अर्थात् कभी सत्य और कभी असत्य, कभी कठोर, कभी मधुर बोलनेवाली कभी घातक कभी दयालु प्रवृत्तिवाली कभी धनलोलुप, कभी उदार, कभी खर्च करनेवाली कभी अत्यधिक संचयवाली, वेश्या के समान अनेक रूपों को धारण करती है राजनीति।
भृतहरि ने राजनीति के लिए कही थी यह बात परन्तु यदि थमकर सोचा जाए तो राजनीति तो मात्र एक विचार धारा… एक प्रणाली है , इसे कार्यान्वित तो मानव और उसका समाज ही करता है; इसके जनक, संचालक, परिवाहक तो हम सभी हैं यानी ताकत की कुर्सी पर मौज उड़ाते नेता और पशुवत उनके अन्याय और घोटालों का बोझ ढोता आम आदमी।
चंद लोग नियम बनाते और तोड़ते हैं, वह भी अपनी सुविधानुसार और बाकी सिर्फ त्राहि-त्राहि करते हैं । आँसू बहाते-बहाते अंधे हो गए हों जैसे या सहते-सहते वैचारिक लकवा मार गया हो, जीवन की बागडोर खुद अपने हाथ में लेने का तो कभी ख्याल ही नहीं आता इन्हें। फिर यह भ्रष्टाचार और लालच आदि के आरोप व प्रत्यारोप क्यों और किसप? कुछ तो जबरन भी लेना जानते हैं लड़कर, लूटकर…बरसों से यही सिलसिला चल रहा है और धूमिल के शब्दों में कहूँ तो गरीबी आज भी इन भृष्ट नेताओं के हाथ बाई की तरह ‘एक साड़ी में बिकने को तैयार’ है ( कम से कम भारत में तो अभी तक ऐसे ही बर्गलाया और फुसलाया जाता रहा है, परन्तु अब और नहीं। बंद आंखों से भेड़-बकरी की तरह अनुसरण करती जनसंख्या की पट्टी खुली भले ही न हो परन्तु सरक अवश्य गई है और उम्मीद की किरण की उष्मा से भर चुकी है आँखें।
पर राजनीति में भी तो महत्वाकांक्षा नए मोड़ ले चुकी है। व्यापारिक लेनदेन के साथ-साथ दादागिरी या जिसकी लाठी उसीकी भैंस वाला दृष्टिकोण है इस सदी का। कोई भी बिल्कुल जंगल राज की तरह ही किसी की भी भैंस हांकने यानी हनला करने को, लूटने को , मनमनानी करने को मुक्त है बशर्ते ताक़तवर हो, आणविक अस्त्र-शस्त्र से लैस हो। और हर राय, हर सोच , हर सहानुभूति से या तो पूरी तरह से रिक्त हो या दूसरों की बात न मानने का वीटो करने का अधिकार हो उसके पास। अँग्रेजों की ही तो कहावत है कि ताक़त भ्रष्ट करती है और पूरी ताक़त पूरी तरह से। और अब इसको परखने का मन बना लिया है विश्व की बड़ी ताकतों ने।
पिछले दोनों महीने विश्व धधका है युद्ध और नफ़रत की इस आँच पर।
बेवजह ही हजारों मरे हैं। बेघर हुए हैं। कई जगह तो खाना नहीं, तो गोली खाओ भी। पर ताक़तवर हों या अपने ही नशे में चूर इतनी गिर चुकी है मानवता कि हर गलती की सजा इस हृदयहीन समय में मौत ही तो रह गई है । समस्या सुलझाने का, सजा देने का बस एक ही तरीका रह गया है -सर में दर्द हो तो सर काट दो, अपना भी और दूसरे का भी।
षडयंत्र, बेरहमी और क्रूरता विकराल रूप लेती जा रही है। जहाँ इनसान का अस्तित्व सामने वाले की आँख में मक्खी-मच्छर से अधिक नहीं। और जैसा कि तुलसी दास ने रामायण में भी कहा- ‘सुभ असुभ सलिल सब बहई, सुरसरि कोई अपुनित न कहई
समरथ कहुं नहिं दोषु गोसाई, रवि, पावक सुरसरि की नाई
पर क्या युद्ध की यह राजनीति मात्र एक व्यापार है…ताक़त तो कहीं धर्म विशेष का प्रचार-प्रसार है? या फिर कुछ और साजिशें भी है नेताओं और शाषकों की इस आतंकी और हिंसक सोच के पीछे !
हमेशा नफे नुकसान की या फिर विस्तारवादी बात भले ही समझ में न आती हो, परन्तु एक बात तो तय है कि हम सभी आज भयभीत और आशंकित हैं, सुरक्षा को लेकर,आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को लेकर… अपनी इस दुनिया को लेकर।
घर से बाहर यात्रा और पर्यटन की तो छोड़ें , बाजार तक जाते हैं तो अक्सर ख्याल आता है कि आज सही-सलामत लौटेंगे भी या नहीं ! कहीं कोई विनाशकारी अनहोनी तो आतंकवाद के रूप में इंतजार नहीं कर रही हमारा! आए दिन ट्रक और कारों से पैदल चलते पर्यटक और खरीददारों को कुचले जाने की खबरों ने अच्छे-अच्छों का मनोबल तोड़ डाला है और सैकड़ों के अपहरण और मौत की खबरें मानो अब सभी ने सुन कर भी अनसुना करना शुरु कर दिया है। क्या करें, आम जो हो चली हैं ये खबरें, फिर किसमें इतनी हिम्मत है जो पराई आग को कुरुदे उसमें कूदे…वैसे भी कितना भी आक्रमक दिखे, आत्म संचय की पट्टी बांधे एक भीरू और स्वार्थी समय में जी रहे हैं हम, जहाँ शौर्य भी बस एक विज्ञापन ही है।
विश्व की आम और शान्तिप्रिय जनता कैसे रोक सकती है खुदको और दुनिया को इस विनाश के अनचाहे और कष्टप्रद चक्रव्यूह और ताण्डव से ? युद्ध का पूर्ण बहिष्कार या निशस्त्रीकरण भी एक विकल्प हो सकता है, परन्तु फिर अमीर और सशक्त देश अपने अस्त्र-शस्त्र किसे बेचेंगे, इन संपन्न देशों की अर्थ-व्यवस्था का क्या होगा ! छोटी-मोटी लड़ाई नहीं, बहुत हिम्मत और साहस का काम है यह। इसके प्रतिपादन के लिए जबर्दस्त संगठन और समझ की जरूरत है…विवेक और सहृदयता से संदेश न सिर्फ घर-घर, अपितु ताकत के गलियारों में भी पहुंचाने की जरूरत है-जैसे रोटी की राजनीति एक निष्कृष्ट और विनाशकारी कदम है, युद्ध की यह लेन-देन वाली राजनीति भी- बताने की जरूरत है सभी को।
किसी राजनेता या सामंतशाही को यह हक नहीं कि वह मासूमों की जान से खेले, देशभक्ति के नामपर, या फिर अपनी क्षणिक झक या शान के रहते युद्ध करे, शोषण और दमन करे। डराए-धमकाए। दूसरों की सीमाओं का अतिक्रमण करे और सैकड़ों निरीह युवाओं को उपलों की तरह युद्ध की आग में झोंक दे। कम-से-कम अब सभ्य और विकसित हमारी इस इक्कीसवीं सदी में तो स्थिति बदलनी ही चाहिएँ! पर बिल्ली के गली में घंटा कौन बांधेगा…वैसे भी अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता । सभी को मिलजुलकर ही शांति-बिगुल बजाना होगा। बेहद शांत और सभ्य तरीके से, सुरीले तरीके से, वरना आंख के बदले आंख का नतीजा तो वाकई में बस एक अंधा युग ही छोड़ेगा हमारे आगे। अंधा युग …वह भी इतनी खूबसूरत धरती पर…कल्पना तक सिहराने वाली है।
“For last year’s words belong to last year’s language And next year’s words await another voice.” ―
T.S. Eliot
अर्थात कल की आवाज अतीत की आवाज है आज को नए समाधान और नए शब्द चाहिएँ।
बात सही है क्योंकि हर युग अपनी नई उलझनें, नई समस्या और नए प्रश्न व उत्तर लेकर आता है। कम-से-कम सोचना और समझना तो पडेगा ही हमें नए मानव के नए स्वभाविक विकारों के बारे में। क्या इतनी उत्तेजना, यह आक्रमक रवैया , अपहरण , युद्ध, व्यभिचार, अस्त्र-शस्त्रों की बेरहम होढ़ , यही पहचान रह जाएगी इस सदी की ?
सोचेंगे तो शायद उलझन सुलझे, कुछ समाधान भी निकलें।…

शैल अग्रवाल
आणविक संकेतः shailagrawal@hotmail.com
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