सुधा आदेश, संजीव आहूजा, जिज्ञासा सिंह


पाँच लघुकथा

सुधा आदेश
बैंगलुरु

लघुकथा-१
पैकेज
डॉक्टर ने जब नवीन को उनके अभिन्न मित्र दिनेश की मृत्यु की सूचना दी तब वह अस्पताल में उसकी बेटी सीमा के साथ ही था। माँ थीं नहीं, भाई विनायक के अमेरिका में रहने के कारण वही पिछले पंद्रह दिनों से आई.सी.यू. में भर्ती अपने पिता की देखभाल कर रही थी। पिता की मृत्यु की सूचना पाकर वह फफक-फफककर रो पड़ी। उसने उसे समझाते हुए विनायक को सूचना देने के लिए कहा। सीमा की बात सुनकर उसने कहा,
“सीमा, मैं नहीं आ पाऊँगा।”
“भाई, आ जाओ, वह हमारे पिता हैं, कोई अजनबी नहीं। अंतिम समय में भी उनकी निगाहें तुम्हें ही ढूंढ रही थी। हम फ्रीजर बॉक्स में उनकी देह को रखवा देंगे।”
“सीमा,बी प्रेक्टिकल। आज के समय में इतना भावुक होना ठीक नहीं है। वीडियो कॉल के द्वारा तो मैंने उनसे बातें कर ही ली थी। अब जब वह नहीं रहे तब सिर्फ रस्में निभाने के लिए मैं अपना समय और पैसा बर्बाद नहीं करना चाहता…वैसे अब तो अंतिम संस्कार के भी भारत में पैकेज शुरू हो गये हैं। अगर तुम्हें परेशानी हो तो अपने मित्र देवांश को फोन कर दूँ…और हाँ जब अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू हो तो वीडियो कॉल कर देना जिससे मैं उन्हें श्रद्धांजलि दे सकूँ।”
“मुझे किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं है…अंतिम यात्रा के लिए पैकेज का चलन भी शायद आपकी जैसी सन्तानों के कारण ही हुआ होगा…ज़ब आपको पिताजी से प्रेम नहीं, समय नहीं, तो विडिओ कॉल का आग्रह क्यों?” कहते हुए सीमा ने फोन काट दिया।
विनायक का फोन कई बार आया पर उसने नहीं उठाया। नवीन सब समझ गए थे। इसी बेटे के लिए दिनेश ने न जाने कितनी बार अपनी और सीमा की इच्छाओं को सूली पर चढ़ाया था। सिसकती सीमा को ढाढ़स बंधाते हुए, अंतिम क्रिया के लिए पैकेज करवाते हुए वह सोच रहे थे कि काश! रिश्तों का भी कोई पैकेज होता। पैसों की चकाचौंध ने आज इंसानियत का दम तोड़ दिया है।

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लघुकथा-२
आतंक
मैम साहब के घर किटी पार्टी थी। उन्होंने तरह-तरह के व्यंजन बनाये थे। मेहमानों को खाना परोसते हुए शीला सोच रही थी कि आज वह मुनिया को ढंग का खिला पायेगी।
उसकी सोच के अनुरूप मालिकिन ने सभी व्यंजन उसे दिए थे। वह यह सोचती हुई ख़ुशी-ख़ुशी घर जा रही थी कि आज मनपसंद भोजन पाकर उसकी मुनिया ख़ुश हो जायेगी। वह घर पहुँचने ही वाली थी कि उसके हाथ में पकड़ी थैली के व्यंजनों की सुगंध, गली के आवारा कुत्तों की नाक तक पहुँच गई। वे उसकी राह रोक कर खड़े हो गये। उसने उनसे बचकर निकलने की बहुत कोशिश की किन्तु उन्होंने उस पर आक्रमण कर दिया। वह भागी किन्तु उसके हाथ से थैली छूट गई।
खाने की थैली उसके हाथ से छूटते ही भूखे कुत्ते उसे छोड़कर खाने पर टूट पड़े। उन्हें खाना खाते देखकर उसके दिल में एक हूक उठी…इनके आतंक ने आज उसकी मुनिया के मुख से निवाला छीन लिया था।

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लघुकथा-३
सिफारिश

कविता हिन्दी संस्थान की पुरस्कार योजना के अंतर्गत अपना कहानी संग्रह जमा कराने गई।
“मैम, आपको अब तक पुरस्कार नहीं मिला! मुझे तथा मेरी पत्नी को आपकी कहानियाँ बेहद पसंद हैं। सच तो यह है कि आपसे मिलने से पूर्व ही मैं आपकी कहानियों के कारण आपके नाम से पहले से ही परिचित था।” कार्यालय में बैठे व्यक्ति ने प्राप्ति की रसीद उसे देते हुए कहा।
“मुझे सम्मान देने के किये धन्यवाद भाई। शायद मेरी कहानियाँ निर्णायकों के मानदंडों पर खरी न उतर पा रही हों, एक प्रयास और…”
“मैम, ऐसा नहीं हैं। आप एक बार निदेशक महोदय से मिल लीजिये। बिना जानपहचान के आजकल कुछ नहीं होता।” उसने इधर-उधर देखते हुए कहा।
“सिफारिश…क्या कह रहे हो भाई? यह मुझसे नहीं हो पायेगा।” आश्चर्य से कहते हुए उसने पुस्तकें उठाई और चलने को तत्पर हुई।
“लेकिन मैम सम्मान…”
“इन सम्मानों का क्या, इन्हें कौन संभालेगा? मेरे लिए सब सम्मानों से बढ़कर यह सम्मान है कि मेरी रचनायें आप जैसे पाठकों के दिलों में जीवित हैं और रहेंगी।”

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लघुकथा-४
पेशानी पर टंगा प्रश्न
सुरेखा को अनियंत्रित हालत में घर में प्रवेश करते देखकर अरुणा ने चौंक कर पूछा,”क्या हुआ सुरेखा?”
“अब क्या और कैसे बताऊँ?” कहते हुए सुरेखा सिर पर हाथ रखकर सोफे पर बैठ गई।
“संभालो स्वयं को फिर बताओ, हुआ क्या है?”अरुणा ने उसकी हालत देखकर,उसे पानी का गिलास पकड़ाते हुए कहा।
“जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो दोष किसको दूँ?”
“पहेलियां ही बुझाती रहोगी या कुछ बताओगी भी।”
“नमन लिव इन में रह रहा है !”
“क्या…कब से?” इस बार चौंकने की बारी अरुणा की थी।
“पाँच महीने हो गए पर मुझे अभी हफ्ते भर पहले पता चला। न जाने क्या-क्या ख्बाब देखे थे सब मिट्टी में मिला दिये। आज मन बहुत परेशान था अतः तेरे पास चली आई।”
“अच्छा किया…दुःख बाँट लेने से मन हल्का हो जाता है। अगर हम अपनी परेशानियाँ एक दूसरे को नहीं बतायेंगी तो फिर किसे बतायेंगी? जो भी निर्णय करना सोच समझ कर करना। आज की पीढ़ी अपने मन की ही करती है। वे बालिग है, आत्मनिर्भर है।”
“तुम ठीक कह रही हो अरुणा। मैं और अजय तो इस संबंध को स्वीकारने को तैयार हैं पर वे अभी विवाह नहीं करना चाहते। उनका मत है अभी वे पूरी तरह सैटल नहीं हैं।”
“पूरी तरह से सैटिल नहीं हैं!! क्या कह रही हो? नमन चार वर्ष से जॉब कर रहा है। वह लड़की भी तो जॉब कर ही रही होगी फिर क्या परेशानी है?” अरुणा ने आश्चर्य से पूछा।
“यही तो मैंने भी नमन से कहा पर उसने कहा कि हम कुछ और समय लेना चाहते हैं।”
“तुमने उन्हें ऊँच-नीच नहीं समझाई !!”
“सब कह कर देख लिया। नमन कहता है कि हम बच्चे नहीं हैं। अपना भला बुरा समझते हैं।”
“और वह लड़की…क्या नाम है उसका।”
“प्रिया का भी यही मानना है। वह भी अभी पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहती।”
“ओह!क्या तुमने प्रिया के माता-पिता से बात की?”
“बात की थी। वे भी अपनी बेटी की जिद के सामने विवश हैं।”
“सच आज के बच्चों को पालना, उन्हें संस्कार देना टेढ़ी खीर है। तेरा तो बेटा है…तेरी बात सुनकर मुझे अपनी बेटी सुवर्णा की चिंता होने लगी है।”
“माना, मेरा बेटा है पर मैं स्त्री होने के नाते उस बेटी के माता-पिता के दर्द से अनभिज्ञ कैसे रह सकती हूँ जो अपनी बेटी के बिना किसी रिश्ते में बंधे किसी गैर मर्द के साथ रहने का दर्द झेल रहे हैं। इस स्थिति के लिये कहीं न कहीं मैं भी दोषी हूँ जो अपने पुत्र को स्त्री का सम्मान करना नहीं सिखा पाई। बस अब तो एक ही कामना है कि नमन प्रिया को धोखा न दे…अच्छा, अब चलती हूँ।”
अपनी प्रिय सखी सुरेखा के आंसू देखकर अरुणा की पेशानी पर एक प्रश्न टंग आया था…वह सोच रही थी कि हमारी पीढ़ी बच्चों के कदम से कदम मिलाकर चलना चाहती है पर पता नहीं कब, कहाँ चूक हो जाती है जो वे हमें समझ नहीं पाते हैं…यहाँ तक कि शारीरिक सुख की खातिर आज वे सामाजिक और नैतिक मूल्यों की धज्जियाँ उड़ाने से भी नहीं चूक रहे हैं। आखिर कहाँ जा रहे हैं हम?

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लघुकथा-५
जुगाड़

“इस देश का कुछ नहीं होने वाला। इस देश की नस-नस में भ्रष्टाचार व्याप्त है। इसे कोई माई का लाल नहीं मिटा सकता।”एक व्यक्ति ने तेज स्वर में कहा।
स्लीपर क्लास में बैठे कुछ लोगों के बीच विभिन्न विषयों से गुजरता वार्तालाप भ्रष्टाचार पर आ गया था।
“आप सबको एक तराजू में नहीं तौल सकते। आज भी कुछ लोग ईमानदार हैं।” दूसरे व्यक्ति ने उसे चुनौती देते हुए कहा।
“यह सब कहने की बातें हैं… सरकारी दफ्तरों में जब तक आप चढ़ावा नहीं देंगे तब तक आपका काम हो ही नहीं सकता।” पहले व्यक्ति ने प्रतिउत्तर दिया।
“कोई आदमी या कर्मचारी स्वयं भ्रष्ट नहीं होता उसे नजराना देकर आप या हम ही भ्रष्ट बनाते हैं।” दूसरे व्यक्ति ने प्रतिवाद किया था।
टी.टी. के आते ही उनकी बहस रुक गई। टी.टी. ने टिकट चैक करनी प्रारंभ कर दी। सबने अपनी-अपनी टिकट दिखा दीं। टी.टी. ने पहले आदमी की ओर देखा…दोनों में इशारों-इशारों में कुछ बात हुईं। वह टी.टी. के पीछे गया तथा थोड़ी देर पश्चात् आकर बोला…
“अब पाँच -छह घंटे के सफर के लिये टिकट कौन खरीदे!! अब आराम से सफर कर सकता हूँ। उसका भी भला मेरा भी भला।


पाँच लघुकथा

संजीव आहूजा
बारावंकी

लघुकथा-१

सर दर्द की दवा खाते हुए, धर्मपत्नी जी की सब बातें याद आ रही हैं । पता नहीं वो सही है या मैं, रिश्तों की कडुआहट बढ़ी या कम हुई ? पर न मैं विवेक को समझ रहा हूँ, न वो मुझे । या यूं कह लो मैं अपनी कडुआहट के साथ और वो अपनी दलीलों के साथ जी रहे हैं ।
आज सुबह विवेक की बेबुनियाद दलीलों ने चुप रहने न दिया । बहुत कुछ बोल दिया । दिल भर कर तो आज भी न बोल पाया । पुरानी दोस्ती का लिहाज आज भी दिल में था, फिर भी कुछ तो दिल हल्का हो ही गया ।
विवेक के जाते ही धर्मपत्नी जी ने मुझे समझाना प्रारम्भ कर दिया, “क्यों अपने आप को सजा देने वाला काम करते हैं, अब शाम को बताइएगा, ‘आज दिन भर सर में दर्द होता रहा’ । होगा ही, इतना कुछ बोले हैं तो बी पी तो बढ़ेगा ही । आप से कितनी बार कहा है उनसे इस मुत्तलिक कोई बात न किया कीजिए ।”
“बात तो तुम्हारी सही है पर क्या ताउम्र अपने मन की भड़ास, मन में ही रखें रहूं ?” मैंने भी तुरंत जवाब दिया ।
“फायदा क्या होगा, क्या आप सोचते हैं वो आपकी बात समझेंगे ?”
“समझने समझाने से ऊपर निकल चुकी है बात, पर दिल का बोझ कुछ हल्का तो करना होगा ना ।”
“कितना हल्का हुआ ये तो आप ही समझो । मैं तो इतना समझती हूंँ, जिस बात का न कोई हल है, न ही आप दोनों में से कोई हल ढूंढ रहा है, न हल मिलने पर आप दोनों उस पर अमल करोगे, फिर क्या फायदा ? मिट्टी पाओ सब पर, जो जैसा चल रहा है चलने दो । जब-तक निभ रहा है निभने दो ।”

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लघुकथा-२
संस्कार ?
“पापा जी मुझे दही-बताशे खानें है, ये मना कर रहे हैं, गला खराब हो जायेगा ।” मनुहार करते हुए बहू ने अरुण से कहा ।
“बात तो उसकी सही है पर कभी-कभी तो चलता है । तेरी सास को भी बहुत पसंद है, एक नहीं दो पत्ते बनवा ले, एक अपनी सास को भी खिला दे” अरुण नें हंसते हुए स्वीकृति दे दी ।
सामने से आ रहे अपने पुराने मित्र पर नज़र पड़ी । गलबहियां कर, उससे बहू का परिचय करवाया । चरण स्पर्श कर बहू परिवार के पास चली गयी ।
अरुण के मित्र बड़े गौर से बहू को देख रहे थे, थोड़े व्यंगात्मक लहेजे में बोले, “बहुत माडर्न है बहू ! लव मैरिज करी होगी बेटे नें ?” अरुण को कुछ अच्छा न लगा इसलिए तुरंत ही पूछा, “ऐसा क्यूं कहा ?”
वो बोले, “खुले बाल, जीन्स टाप में सास-ससुर के साथ, आज-कल के बच्चों में संस्कार हैं ही कहाँ ? पर तुमने अच्छा एडजस्ट किया है खुद को ।”
“यार इसमें एडजस्ट करने वाली क्या बात है । आंखों में शर्म हो, दिल में प्यार और इज्जत, बस हमारी तो इतनी ही ख्वाहिश रही हमेशा । जो चाहें पहने-ओढ़ें, इज्जत ढकी रहे और खुश रहें ।” अरुण ने सपाट सा जवाब दे, उन्हें इस मामले में और कुछ न बोलने का इशारा भी दे दिया ।
तभी अचानक अरुण की नज़र अपने मित्र के परिवार पर पड़ी । परिवार मतलब पत्नी, बेटा-बहू और बेटी । बहू ने तो क़रीने से साड़ी पहनी हुई थी, सर पर पल्लू सम्हालने में व्यस्त थी । बहू की ही हम उम्र उसकी बेटी, टाइट फिट स्कर्ट और स्लीव लैस टाप पहने थी । प्यारी स्मार्ट लग रही थी । अरुण के चेहरे पर अनायास ही मुस्कुराहट आ गयी ।

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लघुकथा-३
आडम्बर
“मेम साहब, कन्याएं आ गयी हैं ।”
“सबको बाहर आंगन में ही बैठाना, घर के अंदर मत लाना । कह रहे हैं कोरोना फिर से आ रहा है ।”
“अरे मेम साहब, कन्याऐं तो मांँ का रूप होती हैं। आप कन्याओं के पैर पर पहले सैनिटाइजर डाल लीजियेगा फिर कोई परेशानी नहीं होगी ।”
“अरे नहीं, मैं तो न छूती । तुम ही पैर धोना पर पहले सैनिटाइजर डाल लेना कहीं इन्फेक्शन तुम्हें ही लग न जाये ।”
“जी” कहते हुए श्यामा के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई ।
“मेमसाब शुरू की एक-आध पूड़ी आप उतार देती, शुभ कार्य की शुरुआत आप ही करतीं ।”
“अरे कोई नहीं, कहते हैं सोच अच्छी होनी चाहिए और मैं तो तैयार हो चुकी, अब किचन में नहीं आउंगी ।”
“मेम साहब आइये परोस तो आप ही दीजिए । अपने हाथ से परोसने का पुण्य अलग ही होता है ?”
“नहीं-नहीं, तुम ही कर दो, कहा न सोच अच्छी हो तो सब अच्छा ।”
श्यामा धीरे से बड़बड़ाई “न मन में श्रद्धा, न कर्म की इच्छा” तब तक अंदर से मेम साहब की आवाज आई, “देखना बच्चे जायें न, मुझे बच्चों को अभी गिफ्टस् देनें हैं ।”
गिफ्ट देते हुए सेल्फी लेकर, मोबाइल में सबको पोस्ट करने के बाद, किसी से फोन पर बात करने की आवाज श्यामा के कान में पड़ी, “नौ दिन भूखे रहने के बाद आज कन्याओं को बुलाना, पूजना, बनाना, खिलाना, बाबा रे ! ये सब करने के बाद मैं तो बहुत थक गई । अब तो कुछ करने की इच्छा ही नहीं हो रही ।”
श्यामा मुस्कुराते हुए धीमें स्वर में बोली, “हाथी के दांत दिखाने के और खाने के और । रोज़ सुबह बर्तन मैं ही धोती हूँ और रेस्टोरेंट से आयें खाने की पैकिंग भी मैं ही फेंकतीं हूँ ।”

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लघुकथा-४
मरहम

“कडुआहट की तासीर मीठी होती है” वो अपनी बात समाप्त करते हुए बोले । बोले तो वो बहुत कुछ पर हकीकत में मैंने इतना ही सुना ‌। क्योंकि मैं अपने विचारों में इतना खोया हुआ था कि उनकी पूरी बात न सुनी, न समझ ही सका कि किस संदर्भ में ये सब कहा । इंतजार कर रहा था कि वो आगे कुछ बोलें तो मैं सारी बात समझकर जवाब दूं । और शायद वो इंतजार में थे कि जवाब दूं, तो वो आगे कुछ कहें । दोनों ही चुप थे ।
“तुम्हारी चुप्पी, तुम्हारी सहमति की ओर इशारा कर रही है” उन्होंने मेरी तरफ देखते हुए कहा ।
मैंने उनकी पूरी बात सुनी ही न थी तो सहमति कैसी ? दिमाग पर जोर देने पर बस इतना ही याद आया कि वो आनन्द और मेरे रिश्ते में आई दरार की बात कर रहे थे ।
“कडुआहट की तासीर मीठी होती है” मैंने उनका आखिरी वाक्य दोहराया । मैं उसको समझने और उसकी गहराई मापने का प्रयास कर रहा था पर वो समझे कि मैं उनकी बात समझ गया । उठते हुए बोले,”ठीक है मैं आनन्द को बता देता हूॅं तुम सुलह के लिए तैयार हो ।”
मैं अचानक जैसे नींद से जागा और थोड़ा जोर से बोला, “नहीं, मैं अभी भी सोच रहा हूँ । कुछ चोटें इतनी मामूली नहीं होती, जो मात्र मरहम से ही ठीक हो जायें ।” थोड़ा ठहर कर, उनकी आँखों में आँखें डालकर बोला, “आप मध्यस्थता कर रहें हैं ये अच्छा है, पर दबाव न डालें, न मुझ पर, न आनन्द पर । सही समय आयेगा तब ही सब सही होगा । वक्त से बड़ा कोई मरहम होता है क्या ?”

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लघुकथा-५
मन के जीते जीत…
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कैनवास पर अमर ब्रश से आड़ी तिरछी रेखाएं बेमन से मार रहा था । एक जाना माना कलाकार, पर आज मन की बेचैनी उससे सम्हाले नहीं सम्भल रही थी । ब्रश कहाँ, कैसे, क्या कर रहे थे उसे पता नहीं था । बस आँखों की नमीं, दिल की बेचैनी अपना करतब दिखा रही थी ।
कुछ क्षण बाद, मन को नियंत्रित कर जब उसने कैनवास पर नजर दौड़ाई तो उसे विरान, घना, निर्जन, जंगल दिखा । उसमें एक पहाड़ी झरना, जो कि गहराई में गिर रहा था । उसके किनारे चट्टान पर एक व्यक्ति उदास सा बैठा दिखा ।
आज तक उसने कभी अपनी निजी जिंदगी, अपनी कलाकृति में झलकने भी न दी थी पर आज कैनवास पर उसकी जिंदगी की हकीकत झांक रही थी । उसका एकाकीपन, उसके मन का खालीपन ।
मन के जज्बातों को मन में ही दबाकर उठा और कैनवास पर कुछ करनें लगा । जब कैनवास के सामने से वो हटा तब वहां कुछ अलग ही रंग बिखरे हुए थे । एक फूलों से लदा पेड़, उसपर चिड़ियों का बसेरा, शान्त बहता झरना, मनभावन वातावरण लिए सा महसूस हो रहा था । अब उनका मन भी शान्त हो गया था ।
अपनी कृति को निहारते वक्त सिर्फ एक संतुष्ट सी मुस्कान अमर के चेहरे पर थी, चिंता-परेशानी काफुर हो चुकी थी ।


पाँच लघुकथा

जिज्ञासा सिंह
लखनऊ

लघुकथा-१
खड़ी मूँछ
“क्यों भोलू! आज बड़ी सफ़ाई कर रहे हो कोने-कोने में! क्या बात है? कोई आने वाला है क्या? ये सफ़ेद दूधिया टेंट! नई कुर्सियाँ! आलीशान सोफा! ऊपर से लंबा-चौड़ा ऊँचा स्टेज! ज़रूर कोई बहुत ख़ास कार्यक्रम है।”
“नहीं! नहीं! साहब! किसी के आने की वजह से सफ़ाई… हेंहें!”
“अब छोड़ो हेहे! बता भी दो! कौन आ रहा? वैसे इतनी ही साफ़ झाड़ू आम दिनों मे भी लगा देते तो यूँ दाँत न निकालना पड़ता.. हेंऽऽ …।” कॉलोनी के पार्क में टहलते मि. शर्मा सफ़ाई कर्मचारी की नक़ल उतारते हुए बोले,
…इतराते हुए उसने भी जवाब दिया,
“मुझे तो कोई बताता नहीं साहब! हाँ! उड़ी ख़बर सुने हैं कि विधायक जी का सम्मान समारोह है आज यहाँ!”
“अच्छा तभी इस बार हम लोगों से मेंटेनेंस ज्यादा लिया गया है, लेकिन विधायक जी तो पुराने वाले ही, इस बार भी जीते हैं, फिर भी …!”
“जी साहब जी! सो तो है! ये विधायक जी नऽ.. अपनी ही बिरादरी के हैं .. हेंहें ..।”
चपरासी का हाथ अनायास ही मूँछों पर फिर गया।
“कोई फायदा भी हुआ कि बस अपनी ही बिरादरी.. हेंहेंहेंहें लगाए हो”
“फायदा तौ कौनों नहीं हुआ .. बस अपनी ही बिरादरी के होने के नाते हमारी शान ज़रूर बढ़ गई है।”

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लघुकथा-२
समय की चोट (डायरी शैली)
२/७/२००७
आज पहली बार बाबू के लिए मैगी बनाई। मैं बाबू को फ़ोन दिखाती रही और तीन साल का बाबू चपाचप-चपाचप खा गया, पास ही मेरी थाली में परसी सब्ज़ियों संग पकी मूंग दाल की खिचड़ी आश्चर्य से बाबू को देखते हुए सोचती रही कि ये बच्चा भी मुझे छोड़, नयी चीजों को ही ग्रहण करना चाहता है।
७/२/२०१०
रेस्टोरेंट में ख़ाना खाने गए सब अपना-अपना ख़ाना खा रहे थे और बाबू फ़ोन पर गेम खेलने के लिए मचल रहा था। फ़ोन देने पर बाबू तुरंत चाऊमीन खा गया।
५/५/२०१३
आज बाबू की क्लास टीचर ने बुलाया उसकी दो शिकायतें कीं कि वो चपरासी को पैसे देकर उसके फ़ोन पर गेम खेलता है, और अपना टिफ़िन खाने के बजाय बच्चों से चिप्स और भुजिया माँग-माँग खाता है।
४/१/२०१६
लगता है बाबू मुझसे नहीं सँभलेगा, शाम को घर से गया आधी रात को ख़ाना खाकर लौटा, मुझे बताया तक नहीं, मैं इंतज़ार करती रही, जब आया तो उसके जेब में फ़ोन दिखा, थप्पड़ लगाने पर कहने लगा कि दोस्त का है दे आऊँगा। अब देता भी है कि झूठ बोल रहा। फ़ोन का चस्का बाबू का समय खाए जा रहा है।
८/८/२०१९
बाबू की ज़िद पर उसे फ़ोन क्या दिलाया? वो तो ख़ाना-नहाना, स्कूल-ट्यूशन सब फ़ोन के साथ ही कर रहा, परीक्षा सिर पर है, वो पढ़ने के बजाय हर समय फ़ोन पर ही लगा रहता है। फ़ोन दिलाना मेरा सिरदर्द बन गया है।
१९/२/२०२१
अब तो मेरा और बाबू का फ़ोन युद्ध चालू है, वह फ़ोन पर समय बर्बाद करता है, जो मुझसे देखा नहीं जाता। इंस्टाग्राम पे तरह-तरह खाने की रील देख मुझे ह्वाट्सऐप पर शेयर कर, कहता है मैं यही खाऊँगा। पर तुम बना तो पाओगी नहीं माँ! मैं जोमैटो-स्विगी से मँगा लूँगा, मना करने पर झगड़े करता है, जब मैंने फ़ोन रख लेने की धमकी दी तो यहाँ तक बोल दिया कि माँ तुम फ़ोन के पीछे ज़्यादा मत पड़ो नहीं तो फ़ेसबुक लाइव करके लोगों को बोल दूँगा कि तुम टॉर्चर करती हो।
१८/६/२०२३
बाबू बाहर से घर आया, उसके हाथों में खाने के बड़े -बड़े पैकेट थे, जब पापा ने उसे याद दिलाया कि रात के साढ़े बारह बज गए, मम्मी का जन्मदिन था, तुम्हें ये भी याद नहीं। तो उसने जल्दी से मेरी एक फ़ोटो स्टेटस पर लगा दी। लेकिन ये नहीं देखा कि फ़ोन के फ़िल्टर ने मेरे गले में ताज़ें फूलों की माला पहना दी है।

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लघुकथा-३
अतिरेक
“मैंने कहा था न! मत खेलो ठहरे हुए शांत सागर से। तुम्हारे खेल ने तुम्हें तो तुम्हें, मुझे भी रसातल में पहुँचा दिया। तुम्हें क्या? तुम तो अकेली ही डूबी हो। तुम्हारा नाविक भी तैरकर किनारे जा पहुँचा और मैं! मैं तुम्हारे बचपने भरे मज़ाक़ का शिकार हो, अपने साथ, अपने प्यारे नाविक के भी डूबने का कारण बनी।”
लहरों से जूझने के बाद सागर की तलहटी में डूबी नौका ने साथ में डूबी एक नयी-नवेली नौका से कहा। नवेली ने हाज़िरजवाबी की,
“इसमें तुम्हारा क्या दोष? दोष तो उस सागर का है, जिसने अपनी लहरों को हमारे साथ बहने नहीं दिया, नहीं तो हम किनारे लग जाते।”
“इसमें सागर का भी दोष नहीं। वह हमारी अठखेलियाँ तभी तक बर्दाश्त करेगा न! जब तक उसकी लहरें उसका साथ देंगीं, अति तो हर जगह वर्जित है, फिर ये तो सागर है।”
“क्या मतलब?”
“देखो न! आज भी हमें किनारे पहुँचाने के बाद, वह बार-बार संदेश दे ही रहा था कि मैं थक गया हूँ, मेरा ठहरने का समय है, नौकाविहार बंद करो! परंतु हमने उसकी एक न सुनी।
“सच! ये तो मैंने सोचा ही नहीं।”
“सोचना चाहिए था। देखो न! परेशान होकर उसने हमें, हमारे सहारे ही छोड़ दिया, अब ठहरे हुए सागर से खेलेंगे, तो हमें वह पालना थोड़ी झुलाएगा। डूबना तो निश्चित ही है।”

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लघुकथा-४
उधेड़बुन
“कह रहा मैं! बच्चों से कोई चीज़ मना मत किया करो। दो बार तुमने मना नहीं किया कि वे सोच लेंगे कि इन्हें कुछ पसंद ही नहीं। ये बूढ़े हो गए हैं इसलिए इनकी कोई इच्छा ही नहीं है।”
“सच कह रहे यार! मेरे साथ तो ऐसा ही कुछ हो रहा है आजकल। मैंने एक दो बार कुछ खाने से मना कर दिया, अब वह चीज़ क्या? कोई भी चीज़ बाल-बच्चे पूछते ही नहीं … सामने-सामने खाते रहते हैं।”
“वहीऽ! बड़ा अजीब दौर है, अपनी-अपनी पड़ी है सबको। अपने लिए तो आसमान से भी चीजें ले आएँगे और तुम्हारे लिए न बाबा न! सोच ही ख़त्म हो रही, इसीलिए कह रहा, कि तुम अपनी बातें कहकर करवा लिया करो। जब तक कर न दें, शांति से कहते रहो, उलझो नहीं। अब इतने बेशर्म तो नहीं ही हो जाएँगे बच्चे भी, फिर हम कोई उनके सहारे थोड़ी न है, अपने पास तो पेंशन भी है।”
“क्या कहूँ यार? पेंशन आने वाले हफ़्ते सब आस-पास ही रहेंगे लेकिन पेंशन देते ही… वही अनदेखी और बैंक से न निकालो तो मुँह बन जाता है!”
“यही तो, था मेरे साथ भी! मैंने तो एक दिन कह दिया कि आधी निकालूँगा, आधी जमा होगी। मेरे मरने के बाद निकाल लेना।”
“कुछ कहे नहीं सब।”
“क्या कर लेंगे कहकर? जानते हो! अब एक काम और करने लगा हूँ, कुछ खाने का मन है, तो भी बोल देता हूँ, आख़िर अपना भी तो अधिकार है, हमने भी मेहनत करके ही सब बनाया है।”
“कौन समझता है?”
“सब समझेंगे। जैसे को तैसा! थोड़ा समझदार बनो। हहहा! एक दिन तो पोता लॉलीपॉप लिए घूम रहा था, मैंने हाथ फैलाते हुए उससे कहा कि मेरा …! वह हकबकाया और माँ से माँगकर एक मुझे भी दिया, मैंने भी ले लिया और कामवाली के बच्चे को थमा दिया।”
“आइडिया अच्छा है यार! बात तो अब, यही होगी।”

***

लघुकथा-५
घुसपैठ
“ये बेल काटो न सखी! ऊपर तक चढ़ रही है, चढ़ गई तो मुश्किल होगी। उतारे न उतरेगी। और तुम्म! आज इतवार है, आज शनिवार है कहती रह जाओगी। सत्रह बार कह चुकी हूँ, तुम्हारे कान पर जूँ ही नहीं रेंगती।”
“अरे काटी थी यार! फिर चढ़ गई। नज़र बचाके चुपचाप चढ़ जाती है, क्या करूँ? बड़ी हद दर्जे की बेशरम होती हैं ये बेलें।”
“कहा था न कि बेल घुटने बराबर पहुँचते ही ऊपर से कैंची से कतर देनी चाहिए नहीं तो वे छज्जा तक जा लगेंगी और एक दिन खिड़की के रास्ते सरकते-सरकते, तुम्हारे शयनकक्ष में बिस्तर पर अपनी जड़ें जमा लेंगी, उखाड़े नहीं उखड़ेंगीं फिर चाहे तुम फावड़े से उजाड़ो या खुरपी से। उजड़ना नामुमकिन होगा!”
शयनकक्ष में उतरी बेल, बेल नहीं रह जाती, विषबेल बन जाती है, और जब बिस्तर पर विषबेल विराजमान होगी, तब तुम्हारी नींद हराम होना तय है।”

***

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