
पाँच लघुकथा

सरिता सुराणा
हैदराबाद, तेलांगना
लघुकथा-१
लघुकथा
प्रारब्ध
“दादाजी, देखिए बड़े दादाजी आए हैं।” मालती ने कहा।
“प्रणाम, बड़े दादाजी।”
“खुश रहो बिटिया।”
“दादाजी! आज़ मेरा हाथ देखिए और बताइए कि मेरी हस्त रेखाएं क्या कहती हैं?”
“बिटिया! अभी आप बहुत छोटी हो, जब बड़ी हो जाओगी, तब आपका हाथ देखेंगे।”
लेकिन 5 वर्षीय मालती ने आज़ ही उसका हाथ देखने की जिद पकड़ ली।
मालती के दादाजी के दोस्त भारद्वाज जी बहुत अच्छे ज्योतिषी थे। उन्होंने मालती के हाथ की लकीरें देखी तो मन ही मन में बहुत चिंतित हो गए। लेकिन प्रत्यक्ष में उन्होंने इतना ही कहा- “बिटिया! आप पढ़-लिखकर अपने दादाजी का नाम रोशन करोगी।”
उसने सचमुच ही बहुत अच्छी पढ़ाई की और अंग्रेजी व हिन्दी दोनों भाषाओं में एम ए किया और राजकीय महाविद्यालय में नौकरी भी की। सभी उसकी बुद्धिमत्ता की बहुत प्रशंसा करते थे।
फिर उसकी शादी हो गई। शादी के बाद ससुराल वालों ने यह कहकर उसकी नौकरी छुड़वा दी कि हमारे खानदान में बहुएं नौकरी नहीं करती। शादी के दो वर्ष पश्चात् ही एक सड़क दुर्घटना में उसके पति की मौत हो गई और उसके ससुराल वालों ने उसे अपशकुनी कहकर प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। आज़ बुखार से तपते बदन में भी कोई उस पर रहम नहीं कर रहा था। उसकी हैसियत एक नौकरानी से भी बदतर थी। तब वह पुरानी बातों को याद करके सोचने लगी कि बड़े दादाजी ने ऐसा क्यों कहा था कि बिटिया, आप पढ़-लिखकर अपने दादाजी का बहुत नाम रोशन करोगी। बचपन में शायद उसका मन रखने के लिए उन्होंने ऐसा कहा होगा। दूसरे ही क्षण उसने सोचा कि अगर वह अपनी नौकरी जारी रखती तो शायद ऐसा कुछ कर पाती लेकिन इन लोगों ने तो उसकी लगी-लगाई सरकारी नौकरी भी छुड़वा दी। एक बार तो उसे लगा कि लोग सही कहते हैं कि ‘प्रारब्ध’ को कोई नहीं टाल सकता परन्तु फिर उसने संकल्प लिया कि अब वह अपना प्रारब्ध खुद लिखेगी।
***
लघुकथा-२
मौनव्रत
हमेशा धर्म-कर्म में व्यस्त रहने वाली शीतल की सास घर के किसी भी काम को हाथ लगाना तो दूर, बस बहू के कामों में मीन-मेख निकालती रहती थी। वे दिन भर में तीन-चार घण्टे मौन व्रत रखती थीं। उस समय या तो वे टीवी देखती रहतीं या फिर फोन में अपनी सहेलियों के साथ चैटिंग करती रहतीं।
यहां तक तो ठीक था लेकिन जब भी उनके व्हाट्स ऐप पर कोई चटपटी ख़बर आती या कोई मजेदार वीडियो तो वे शीतल को इशारों ही इशारों में अपने पास बुलाती और वो सब दिखाती।
इससे शीतल को बार-बार काम बीच में छोड़कर आना पड़ता। अगर कभी वह उनका इशारा नहीं देख पाती या हूं-हां नहीं सुन पाती तो मौन व्रत समाप्त होते ही वे शीतल पर जवालामुखी की तरह फट पड़तीं।
उनकी इस आदत से शीतल बहुत परेशान थी। खासकर जब उनकी किसी सहेली का फोन आता और वो जवाब देती तो वे उसे हमेशा डांटती कि उसे अच्छे तरीके से जवाब देना नहीं आता। रोज-रोज की किच-किच से तंग आकर शीतल ने एक दिन कह ही दिया- ‘मासा! आप ये मौन व्रत करना छोड़ दीजिए, फिर न तो मुझे आपकी सहेलियों के फोन का जवाब देना पड़ेगा और न ही बार-बार अपना काम छोड़कर आपके पास आना पड़ेगा।’
‘तो अब मैं तुम से पूछकर मौन व्रत करुंगी। तुम्हें इतना-सा जवाब देने में ही तकलीफ़ होने लगी।’
‘नहीं मासा! मुझे न तो जवाब देने में और न ही आपके पास आने में कोई तकलीफ़ है, परन्तु मौन व्रत धारण करने का मतलब है अपनी आत्मा में ही रमण करना। जब मन में शान्ति न हो, बार-बार ध्यान भंग होता हो तो ऐसा मौन व्रत करने का क्या फ़ायदा?’
अब मासा के पास इसका कोई जवाब नहीं था, उन्होंने वास्तव में मौन व्रत धारण कर लिया था।
***
लघुकथा-३
‘नशा’
मंत्री जी के फार्म हाउस पर न्यू ईयर पार्टी सेलिब्रेशन चल रहा था। उसमें मंत्री जी के कुछ खास आदमी ही भाग ले रहे थे, क्योंकि इस फार्म हाउस की जानकारी उनकेे परिवार वालों तक को नहीं थी। खाने-पीने से लेकर मनोरंजन के साधनों की सप्लाई का काम भी कुछ अति विश्वसनीय लोगों को सौंपा गया था। पार्टी अपने पूरे शबाब पर थी। खाने-पीने का दौर खत्म हो चुका था, अब मंत्री जी ने अपने सेक्रेटरी को बुलाकर उसके कान में कुछ कहा। उनके हुक्म की फौरन तामील की गई। कुछ जवान लड़कियों को उनकी खिदमत में पेश किया गया। आधे-अधूरे कपड़ों में अपने तन की नुमाइश करती उन लड़कियों में अपनी लड़की को देखकर मंत्री जी का ‘नशा’ हवा हो गया। वे गश खाकर नीचे जमीन पर गिर पड़े।
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लघुकथा-४
वजन
शर्मा जी को रिटायरमेंट के बाद पेंशन ऑफिस के चक्कर लगाते-लगाते छः महीने बीत गए थे लेकिन उनकी फाइल आगे बढ़ने की जगह वहीं पर पड़ी धूल खा रही थी। शुगर और बीपी के मरीज तो वे पहले ही थे, अब हार्ट में भी तकलीफ़ रहने लगी थी। निस्संतान थे इसलिए पति-पत्नी ही दोनों एक-दूसरे का सहारा थे। लेकिन अब धीरे-धीरे जमा पूंजी और हिम्मत दोनों ही जबाब देने लगे थे और जल्दी पेंशन मिलने के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे थे। उन्होंने ज़िन्दगी भर ईमानदारी से काम किया था, कभी किसी से रिश्वत नहीं ली थी लेकिन अब उन्हें लगने लगा था कि बिना रिश्वत दिए उनका काम नहीं होने वाला है और उनके पास इतना पैसा है नहीं कि वे रिश्वत देकर अपना काम करवा सकें।
अचानक उन्हें बचपन में पढ़ा हुआ हरिशंकर परसाई का व्यंग्य ‘भोलाराम का जीव’ याद आया, जिसमें सरकारी कर्मचारी द्वारा फाइल पर वजन रखने की बात कही गई थी और नारद जी ने अपनी वीणा उस पर रख दी थी। उनकी इतनी सामर्थ्य तो थी नहीं कि भारी-भरकम वजन रख सकें, इसलिए सोमवार के दिन जब वे पेंशन ऑफिस गए तो अपनी दवाइयों का डिब्बा साथ लेकर गए। अपनी बारी आते ही उन्होंने बड़े बाबू को सलाम किया। बड़े बाबू ने उसका कोई जबाब नहीं दिया, उल्टा उन्हें फिर कभी आने के लिए कहकर टरकाने लगे। लेकिन आज वे भी ठानकर आए थे तो वहीं बैठ गए। उन्हें वहां बैठा हुआ देखकर बड़े बाबू को और गुस्सा आने लगा। उन्हें बुलाकर फिर दो-चार बातें सुना दी। अब शर्मा जी का धैर्य जवाब दे चुका था, उन्होंने आखिर पूछ ही लिया, ‘आप चाहते क्या हैं?’
बड़े बाबू ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा- ‘वजन’।
शर्मा जी ने तुरन्त अपने साथ लाया हुआ दवाइयों का डिब्बा उनकी टेबल पर रख दिया। बड़े बाबू तमतमाए और बोले-‘ये क्या है?’
‘वजन’
‘ये मेरे किस काम की है?’
‘बहुत काम की है। आप भी छः महीने बाद रिटायर होने वाले हैं तब आपको भी पेंशन के लिए इसी तरह चक्कर लगाने पड़ेंगे। तब आपको इनकी जरूरत अवश्य होगी।’
अब बड़े बाबू का माथा ठनका। उन्हें अपना भविष्य अन्धकारपूर्ण नजर आने लगा, उन्होंने अगले ही क्षण फाइल पर हस्ताक्षर कर दिए।
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लघुकथा-५
कुलच्छिनी
“नंदा ओ नंदा”
“जी आई मांजी”
“जा, जाकर कह दे उस कुलच्छिनी से कि सुबह-सुबह मेरे सामने न आया कर। पूरा दिन खराब हो जाता है।”
“जी मांजी”
नंदा जानती है कि मांजी हमेशा मालती के पीछे पड़ी रहती हैं। अभी 3 महीने पहले ही उसके देवर की एक दुर्घटना में मौत हो गई थी। अभी समय ही कितना हुआ था उसकी शादी को। एक साल ही तो पूरा हुआ था और अचानक यह वज्रपात हो गया। इसके लिए मांजी मालती को ही दोषी मानती और उसे जी भर कर कोसती। नंदा सोचती कि इसमें मालती की क्या ग़लती है लेकिन वह रोज-रोज मांजी से बहस नहीं करना चाहती थी। उससे मालती की यह दशा देखी नहीं जाती थी लेकिन वह चाहकर भी कुछ कर नहीं पाती थी। मांजी के आगे घर में कोई नहीं बोल सकता था।
उसने जाकर मालती को समझाया कि वह सुबह-सुबह मांजी के सामने न आया करे। एक दिन इसी तरह मांजी मालती पर चिल्ला रही थी कि नंदा की बेटी ने सुन लिया। वह अभी-अभी स्कूल से आयी थी। उसने दादी से पूछा -“दादी! आप इतना पूजा-पाठ किसलिए करती हो?”
“घर की सुख-शांति के लिए और किसके लिए?”
“अच्छा दादी, आप कहती हो ना कि ठाकुर जी हम सबके रखवाले हैं। सबकी रक्षा करते हैं और उनकी मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता।”
“हां बिल्कुल, ठाकुर जी की मर्जी के बिना कुछ नहीं होता।”
“तो फिर चाचा की मौत के लिए आप चाची को क्यों कोसती हैं? जब ठाकुर जी की मर्जी के बिना कुछ नहीं होता तो ये भी तो उनकी मर्जी से ही हुआ है ना। अगर ठाकुर जी चाहते तो चाचा को बचा सकते थे। फिर उन्होंने चाचा की रक्षा क्यों नहीं की?”
पोती के सवाल के आगे दादी की बोलती बंद हो गई।

पाँच लघुकथा।

नीना अंदौत्रा पठानिया
अहमदाबाद
लघुकथा-१
इज्ज़त
रमेश बाबू पचहत्तर के थे। मोहल्ले में सब उन्हें “बड़े बुज़ुर्ग” कहकर सलाम ठोकते।
लेकिन हक़ीक़त यह थी कि उनके लिए हर नई चीज़ ‘बदतमीज़ी’ थी और हर सवाल ‘बग़ावत’।
अनुभव के बावजूद उन्होंने कभी धैर्य नहीं सीखा, न ही दूसरों को सुनने की आदत डाली।
सफ़ेद बाल थे, पर सोच अब भी बचकानी जिद पर अटकी हुई थी।
एक दिन पार्क में बच्चों की गेंद उनकी कुर्सी से टकरा गई। रमेश बाबू झल्ला पड़े,
“बिल्कुल तहज़ीब नहीं बची आजकल! बुज़ुर्गों की इज़्ज़त करना सीखा ही नहीं!”
पास खड़ा छोटा कबीर धीरे से बोला,
“इज़्ज़त तो उनकी होती है जो बड़े होते हैं… सिर्फ़ बूढ़े नहीं।”
हमेशा कमियां निकालने वाले रमेश बाबू मासूम कबीर की बात सुनकर पहली बार चुप थे।
लघुकथा-२
खिड़कियाँ
सारा मोहल्ला एकदम शांत था, सिर्फ़ उसके घर की खिड़कियों से आती हल्की हँसी और गप्पों की गूँज सड़कों तक पहुँच रही थी।
राहुल हर दिन उसी सड़क पर गुजरता, और सोचता, “कितनी दीवारें बन जाती हैं इंसानों के बीच, सिर्फ़ सोच और डर की।”
अंदर से आवाज़ आई,
“राहुल, जल्दी आओ, खाना ठंडा होने वाला है।”
वह भीतर गया। माँ ने देखा तो मुस्कुराई,“तेरे जैसे सोचने वाले बचपन से ही अलग रहते हैं।”
राहुल ने सिर झुकाया।
“अलग? हाँ, लेकिन दीवारों से घिरे लोग ही तो हमें अलग कर देते हैं।”
रात में, कमरे की खिड़की से बाहर झाँकते हुए, उसने देखा कि मोहल्ले की वही दीवारें कितनी मजबूत हैं, लेकिन हर दीवार के पीछे एक खिड़की जरूर खुली होती है, जो सिर्फ़ देखने वाले की हिम्मत मांगती है।
राहुल मुस्कुराया।
“दीवारें कितनी भी ऊँची हों, खिड़कियाँ उसी के लिए खुलती हैं जो डर के आगे खड़ा होना जानता है।”
और पहली बार उसने महसूस किया कि असली आज़ादी डर और सोच के बीच की खिड़की में है।
लघुकथा-३
बंधन
पिता हमेशा कहते थे,
“वही घर अब तुम्हारा है। चाहे सुख मिले या दुख, लौटकर मायके मत आना।”
माँ समझाती रहती,“छोटी-मोटी बातें हर दाम्पत्य में होती हैं। सब झगड़ते हैं, पर निभाना ही पड़ता है।”
भाई-भाभी का फ़रमान था,
“अब शादी हो गई है, वही तेरी दुनिया है। जीते जी इस बंधन से छुटना पाप है।”
वह सुनती रही, सहती रही।
हर चोट को “समझौते” की चादर से ढकने की कोशिश की।
पर रात के सन्नाटे में वही चादर उसका दम घोंटने लगी।
वह पूछना चाहती थी कि क्या मेरी खुशी, मेरा अस्तित्व किसी पाप से कम है? पर उसकी आवाज़ हर बार परिजनों के उपदेशों में दब जाती। और फिर एक दिन… उसने खुद को मुक्त कर लिया।
बंधन, जो उसे ज़िंदा निगल रहे थे, उससे वह मौत के सहारे छूट गई।
अब घर में मातम था। माँ रो-रोकर कह रही थी,“मेरी बेटी दुखी थी…।”
***
लघुकथा-४
“वो इंतजार”
सौफिया हमेशा से अलग थी। उसके कदमों में आत्मविश्वास था, और उसकी आँखों में वह गहराई, जो किसी रोज़ की हलचल में खो नहीं सकती। आज भी उसने वही सिल्वर और गोल्डन पोशाक पहनी थी, जो वर्षों से उसकी अलमारी में पड़ी थी। उसकी साड़ी पर हल्की सी चांदी की पोल्का डॉट्स चमक रही थीं, जैसे कुछ यादें उसे सलाम कर रही हों।
वह आज भी इंतज़ार में थी लेकिन यह कोई आम इंतजार नहीं था। यह इंतजार उन लम्हों का था जिनमें शाम कभी नहीं आती। जिनमें उम्र गुज़र जाती है, लेकिन उम्मीदें फीकी नहीं पड़तीं।
हर शुक्रवार, शाम के समय, वह उसी पुराने होटल की लॉबी में आती। लोग कहते, “इतना इंतजार करने की क्या ज़रूरत है?” पर उसे क्या परवाह? वह जानती थी कि असली इंतज़ार में समय को पकड़ पाना असंभव होता है। फिर भी, वह आती और वहीं खड़ी होती, सही जगह, सही रूप में, सही वक़्त के इंतजार में।
आज भी उसने अपनी आँखों के पीछे की दुनिया छिपाई नहीं। उसने बड़े चश्मे से दुनिया को चुनौती दी और लाल होंठों से खुद को परिभाषित किया। उसके हाथ में वही पुराना पोटली बैग था, जिसमें सिर्फ़ यादें और उम्मीदें थीं।
लोग उसे देखते और सोचते कि यह सिर्फ़ शोभा है। पर सच यह था कि सौफिया का इंतजार, उसका साहस, उसका धैर्य, उसे हर रोज़ नया बना देता। उम्र बढ़ चुकी थी, चेहरा बदल गया था पर उसकी आत्मा की वह चमक, वह इंतजार की चमक कभी फीकी नहीं हुई थी।
यह शाम, गुजरी शाम जैसी थी। समय गुजर चुका था पर उसका इंतजार आज भी वैसे का वैसा ही था। जिंदा, जवान जो उसकी काया की तरह बूढ़ा नहीं हुआ था। जिनमें उम्र बीत जाती है और इंतजार फिर भी जिंदा रहता है।
***
लघुकथा-५
उम्र
सुमित्रा साठ की थी।
ज़िंदगी ने उसे इतना घिसा था कि अब वह होने के बहाने ढूंढती इसलिए कभी अकेले में रील बना लेती, तो कभी बिना वजह सजधज कर दर्पण के सामने बैठ जाती।
पड़ोसनें हँसतीं,
“अब इस उम्र में भी शौक पल रहे हैं!
लगता है बुढ़ापे में प्रेमपत्र आने वाले हैं।”
सुमित्रा बस मुस्कुरा देती।
जीवन कड़ी बंदिशों और ज़िम्मेदारियों में बीता था। उम्र बढ़ी तो ज़िम्मेदारियां भी घटती गई और कड़ाई भी धीरे धीरे ख़त्म हो चुकी थी पर मलाल था मन की न कर पाने का। बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो गए थे जो शहर से बाहर रहते थे और पति जिनका स्वर्गवास हुए पांच साल हो गए थे। अकेली जान जीने के बहाने ढूंढती पर जब से उसे रील बनाने की लत लगी थी तबसे उसे अकेलापन कम सालता था। कभी-कभी दुनिया के तंज़ ज़रूर परेशान करते पर फिर हिम्मत करके सामना भी वो ही करती।
आज भी किसी ने कमेंट किया था,”बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम।” वह मायूस हुई फिर कुछ देर बाद उसने लिपस्टिक ठीक की, और आईने से बोली,
“तंज़ कसने वाले भूल जाते हैं कि औरत की उम्र नहीं होती,
बस उसका मन जवान या बूढ़ा होता है।
और मेरा मन अभी जवान है।”
आईने ने भी मानो व्यंग्य में आँख मारी।

पाँच लघुकथा

शील कौशिक
लघुकथा-१
परिपूर्णता
देवांश की शादी को दो साल से ऊपर हो चले थे। तृप्ति को बेचैनी हो रही थी- ‘आखिर ये दोनों चाहते क्या हैं? माना दोनों नौकरी करते हैं और अपनी लाइफ में बहुत व्यस्त हैं, किंतु पीढ़ी को आगे बढ़ना भी तो इनका उत्तरदायित्व है कि नहीं?’ तृप्ति स्वयं से ही सवाल-जवाब कर रही थी।
बहू शिल्पा को इशारे में तृप्ति ने कहा भी था- “अभी तो हममें कुछ हिम्मत है, धीरे-धीरे हम बूढ़े हो रहे हैं… हमें पोता/पोती को गोद खिलाने का मौका कब दे रही हो बहू?”
” मम्मी जी! अभी हम यह जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार नहीं हैं।” सपाट-सा उत्तर सुन कर चुप हो गई थी तृप्ति!
आज वह देवांश का मन टटोलने उसके कमरे में गई। देवांश ने अपनी तरफ से प्रश्न दागते हुए मोबाइल वीडियो का स्विच आन कर दिया, “मम्मीजी, हम दोनों बहन-भाइयों को पैदा कर, पाल-पलोस कर, क्या सुख मिला आपको?”
“यह तू कैसा प्रश्न कर रहा है बेटा? एक औरत को पूर्णता मां बनकर ही मिलती है। नौ महीने बच्चे को कोख में पालने का मीठा अहसास वह ताउम्र नहीं भूल नहीं पाती। फिर तकलीफों और खतरों से जूझने के बाद बच्चे के जन्म पर दर्द भरे माँ के चेहरे पर मुस्कान सजी होती है… और बेटे! तुम्हें दूध पिलाने का अहसास मेरे लिए मानो अमृतपान हो। तब तुम्हारी चमकीली आँखों में झाँकना असीम तृप्ति का अहसास देता था। फिर तुम लोगों के बालपन की भोली मासूम बातें और अठखेलियाँ…मुख से ‘मांँ’ का उच्चारण। इन अवर्चनीय पलों को न तो धन से तौला जा सकता है और न ही किसी अन्य को महसूस कराया जा सकता है। जीवन का सबसे प्यारा और सुखद समय था वह, ” बताते हुए तृप्ति कहीं खो-सी गई। उसकी आंखों में वात्सल्य का स्रोता फूट पड़ा। चेहरे की स्निग्धता बढ़ गई।
देवांश के कंधे हिलाने पर वह जैसे वापस लौट आई।
‘जिस अहसास से माँ आज भी रोमांचित हो जाती हैं… सुखद स्मृतियों से भर जाती हैं, तो उन पलों का तो सहज अनुमान लगा सकता हूंँ।’ देवांश ने मन ही मन सोचा।
वह तुरंत अपनी पत्नी सुगंधा के पास गया और कुछ देर में दोनों ने माँ के पास आकर चरण स्पर्श किये।
” जल्दी ही आपको खुशखबरी मिलेगी माँ!” देवांश ने माँ के गले में बाहों का हार डाल दिया।
***
लघुकथा-२.
‘जूण’
शाम के समय पार्क से उठकर औरतें अपने-अपने ठिकानों पर चल पड़ी। नीता और शीतल पार्क के गेट से बाहर निकल रही थी कि सामने मादा कुकर पर नजर पड़ी। दोनों के मुंह से एक साथ निकला- “हे भगवान! फिर से पेट से है यह तो। अभी कुछ दिन पहले ही तो जने थे पूरे छह पिल्ले… कुछ मर-खप गए। एक -दो को कोई पालने के लिए ले गया। यही दुर्गति होनी थी इनकी। दुम हिलाते नर कुत्तों से हर वक्त घिरी रहती थी। बेचारी की जूण ही ऐसी है, क्या करे?
अभी आगे बढ़ी थी कि उनकी नजर बाई कमला की बाहर निकली आंखें, कमजोर व पीली पड़ी काया पर पड़ी। कमला का फिर पेट बढ़ा हुआ था।
“सुना है अब जो इसका पति है, वह चाहता है कि उसका खुद का भी बच्चा हो। तीन-तीन आदमियों के साथ रहकर भी एक भी पति नहीं। बेचारी के चार बच्चे पहले और दूसरे पति से हैं। दोनों ही उसे छोड़ कर जा चुके हैं और इनके लालन-पालन के बोझ में रात दिन घरों में बर्तन, झाड़ू-पोंछा करके यह मरी जा रही है।”
” एक तो कमजोर हालत ऊपर से फिर यह गर्भावस्था…देख लेना! इस बार इसकी जान पर बन आएगी। इन बेचारी कामवालियों की जूण ही ऐसी है,” कहते हुए सीता अपने घर की और मुड़ गई। वह अपने अंतर्मन को टटोलने लगी। लड़के की चाह में उसके भी तो न चाहते हुए चार बच्चे हो गए। उसके मुख से बेसाख्ता निकला- “नहीं…नहीं… मादा कुकर की नहीं, कमली की नहीं, स्त्री की जूण ही ऐसी है।”
***
लघुकथा-३
ऐसी ही है वह
पार्क में नियमित रूप से आने वाली महिलाएं कुछ देर गपशप करती, उसके बाद भगवान का नाम लेती, पाठ करतीं थीं। आज भी वे जैसे ही चलने वाली थी कि तभी एक बोली कल मंदिर में 4:00 बजे तुलसी विवाह होना है। सब ने तय किया कि कल 4:00 बजे पार्क में बैठने की बजाय हम मंदिर में एक साथ चलेंगे। तुलसी विवाह में दान-दक्षिणा, क्या कुछ देना है, यह भी तय कर लेते हैं। एक बोली घर में कुछ कोरा कपड़ा लत्ता, बर्तन, चांदी जो भी कुछ देना चाहो ले जा सकते हैं। दूसरी बोली मैं तो ₹500 नगद दे दूंगी, कपड़े लत्ते देखकर मुंह चढ़ाते हैं, ये चीजें किसी के काम नहीं आती।
नीता को चुप बैठा देखकर एक बोली, ” तुम भी चलोगी न?”
कुछ देर चुप रह कर उसने ‘ना’ में गर्दन हिला दी।
‘मंदिर के चढ़ावे से तो पंडित का पहले ही खूब पेट भरा है किंतु उसके सामने कामवाली बाई शीला का दीन-हीन चेहरा घूम गया। उसे आज ही पता चला था कि उसका लड़का हॉस्पिटल में डेंगू के उपचार हेतु कई दिनों से दाखिल था।’ वह बोली,
” मैं तो कल हॉस्पिटल शीला के बेटे को देखने और इलाज में रुपए से मदद करने जाऊंगी,” ये कह कर नीता मुस्कुरा दी।
सबकी नजरें परस्पर मिली। एक बोली,
“मैं न कहती थी कि यह सबसे मिलकर चलने वाली है ही नहीं।
***
लघुकथा-४
थोड़ा पास
“क्या है, दादी जब भी मैं आपके पास आती हूँ, मुझे अपने पैरों पर खड़ा कर पिंडलियों को दबाने के लिए कहती हो। इस चक्कर में मैं वीडियोगेम नहीं खेल पाती। सोने से पहले मुझे अपना होमवर्क करना होता है… स्कूल बैग पैक करना होता है।”
“अच्छा चल अब बस कर, जा अपना काम कर ले,” दादी ने मुस्कुरा कर कहा।
कुछ देर बाद मनु अपने पापा के साथ बाज़ार गई। मॉल के एक शौरूम में एक पोस्टर देखकर वह रुकी। पोस्टर में वह बुजुर्ग औरत उसकी दादी जैसी लग रही थी और कोई उनके पैर दबा रहा था, जिसमें दर्द था। यह एक ‘पोर्टेबल लेग मसाजर’ का विज्ञापन था, जो पैर की उंगलियों से लेकर पिंडली की मांसपेशियों तक मालिश करता है।
‘ दादी अक्सर मुझे अपने पैर पर खड़े होने के लिए कहती है। मैं इससे ऊब जाती हूं। क्यों न यह मशीन दादी जी के लिए ले ली जाए, यह सोचकर मनु अपने पापा से बोली,
“पापा, यह मशीन दादीजी के लिए ले लो, वे खुश हो जाएंँगी।”
घर पहुंच कर सबसे पहले मनु ने हैंड बैगैज से उत्सुकतापूर्वक वह मशीन निकाली और अपनी दादी जी को पकड़ाई। वह उसके कार्य के बारे में उन्हें बताती जा रही थी। आशा के विपरीत दादी पहले से अधिक गंभीर व उदास हो गई। वह पोती के कुछ पल के सान्निध्य खोने वाली दूरी को भांप रही थी। दादीजी का ब्लैंक चेहरा देखकर मनु हैरान रह गई।
“क्…क्या हुआ दादी जी? यह पाकर क्या आपको खुशी नहीं हुई?”
झिझकते हुए दादी ने कहा, ” नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, बहुत अच्छी है यह मशीन…”
तब मनु को उसके अपने प्रश्न का उत्तर याद आया, जो कुछ दिन पूर्व दादी ने उसे दिया था।
‘यह बताओ दादी, सचमुच आपके पैर में दर्द हो रहा है या मुझे देखकर आपके पैर में दर्द होने लगता है?’
दो-चार मिनट सोच कर दादी ने कहा था, ” दोनों ही बातें ठीक हैं। इस बहाने मुझे तुम्हारे कोमल हाथों का स्पर्श और कुछ देर का साथ मिल जाता है।”
मनु ने मशीन को दादी के हाथों से वापिस लिया और वापस हैंड बैगेज में रखकर दादी के गले से लिपट गई, “आप चिंता मत कीजिए, मैं यह मशीन वापस कर दूंगी।”
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लघुकथा-५
बदलती प्रश्नावली
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स्वाति अब सातवीं कक्षा में आ गई है। महावारी आने के साथ उसके शरीर में अब बदलाव आने लगे हैं।
स्कूल से लौटने पर मम्मी का पहले की भांति उससे प्रश्न पूछना अब भी जारी है…
“क्या स्कूल के टॉयलेट में गई थी?
कोई शिक्षक तुम्हारा हाथ तो नहीं पकड़ता?
अकेले में तो नहीं बुलाया…
कोई तुम्हारी तरफ घूरता तो नहीं…
किसी से तुम खाने की चीजें तो नहीं लेती हो…
वैन का ड्राइवर तुम्हें छूने का प्रयास तो नहीं करता…”
“ये मम्मी को क्या हुआ है अब? पहले तो कभी ऐसे प्रश्न नहीं पूछती थीं…”
स्वाति की झुंझलाहट बढ़ गई। कभी वो समय था, जब मम्मी रसोई में रोटियाँ बेलते हुए प्यारे, परवाह भरे, मजेदार और मेरे मनपसंद प्रश्न पूछती थीं…
“बेटा, लंच में आज मैंनें बर्गर रखा था, अच्छा लगा न, खाया भी या बांट दिया? म्यूजिक पीरियड में क्या किया? कौन-कौन से गेम खेले? आज आर्ट्स एंड क्राफ्ट के पीरियड में क्या बनाया? होमवर्क पूरा न करने पर किसी ने डांटा तो नहीं?
स्वाति आज तेरे प्यारे दोस्त निशान्त से झगड़ा तो नहीं हुआ?
“क्या मम्मी! आप भी न, कितना ख्याल रखती हो मेरा, कह कर स्कूल से लौटने के बाद कंधे से स्कूल बैग उतारते ही मैं झट से मम्मी के गले लग जाती थी।
और जब कभी मम्मी प्रश्न नहीं पूछती थीं, तो मैं खुद शुरू हो जाती थी, आज मैंने ये किया… वो किया… आज तो मम्मी निशांत को मैंने चपेट मार दी, बड़ा समझता था अपने-आप को…”
यह सब सोचते वह.यूनिफार्म बदलने कमरे में जाने लगी, मम्मी की प्रश्नावली जारी थी, “कोई तुम्हारी अत्यधिक प्रशंसा तो नहीं करता…”
आखिरी प्रश्न पर स्वाति सचेत हो गई…उसकी सांसें अटक गईं,
” भाटी सर…”
कंधे से बैग पटक कर, बिना यूनिफॉर्म बदले वह दौड़ी आई और फिर से मम्मी के गले लग गई।
***