कविता धरोहरः रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’


केवल तेरे नाते

इन दीपों से जलते झलमल,
मेरे मन के गीत अधूरे।
इन दीपों से जलते मेरे स्वप्न,
हुए जो कभी न पूरे।
केवल एक रात जल कर,
बुझ जाएगी यह दीपक माला।
पर मरते दम तक न बुझेगा,
मुझमें तेरा रूप-उजाला।

तेरी रूप-शिखा में मेरे
अंधकार के क्षण जल जाते।
तेरी सुधि के तारे मेरे
जीवन को आकाश बनाते।
आज बन गया हूँ मैं इन दीपों का
केवल तेरे नाते।
आज बन गया हूँ मैं इन गीतों का
केवल तेरे नाते।

उतना तुम पर विश्वास बढ़ा

बाहर के आँधी पानी से मन का तूफ़ान कहीं बढ़ कर,
बाहर के सब आघातों से, मन का अवसान कहीं बढ़कर,
फिर भी मेरे मरते मन ने, तुम तक उड़ने की गति चाही,
तुमने अपनी लौ से मेरे सपनो की चंचलता दाही,
इस अनदेखी लौ ने मेरी बुझती पूजा में रूप गढ़ा,
जितनी तुमने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास बढ़ा.

प्राणों में उमड़ी थी कितने अनगाये गीतों की हलचल,
जो बह न सके थे वह आँसू भीतर भीतर ही तप्त विकल,
रुकते रुकते ही सीख गये थे सुधि के सुमिरन में बहना,
तुम जान सकोगे क्या न कभी मेरे अर्पित मन का सहना,
तुमने सब दिन असफलता दी मैंने उसमे वरदान पढ़ा,
जितनी तुमने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास बढ़ा.

मैंने चाहा तुम में लय हो साँसों के स्वर सा खो जाना,
मैं प्रतिक्षण तुममें ही बीतूँ हो पूर्ण समर्पण का बाना,
तुमने ना जाने क्या करके मुझको भंवरो में भरमाया,
मैंने अगणित मझधारों मैं तुमको साकार खड़े पाया,
भयकारी लहरों में भी तो तुम तक आने का चाव चढ़ा,
जितनी तुमने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास बढ़ा.

मेरे मन को आधार यही यह सब कुछ तुम ही देते हो,
दुःख मैं तन्मयता देकर सुख की मदिरा हर लेते हो,
मैंने सारे अभिमान तजे लेकिन न तुम्हारा गर्व गया,
संचार तुम्हारी करुणा का मेरे मन में ही नित्य नया,
मैंने इतनी दूरी मैं भी तुम तक आने का स्वप्न गढ़ा,
जितनी तुमने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास बढ़ा.

आभास तुम्हारी महिमा का कर देता है पूजा मुश्किल,
परिपूर्ण तुम्हारी वत्सलता करती मन की निष्ठा मुश्किल,
मैं सब कुछ तुममें हीं देखूँ सब कुछ तुममें ही हो अनुभव,
मेरा यह दुर्बल मन किन्तु कहाँ होने देता यह सुख संभव,
जितनी तन की धरती डूबी उतना मन का आकाश बढ़ा,
जितनी तुमने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास बढ़ा.

तुम्हारे सामने

हर नया प्रतिबिंब ढलता है तुम्हारे सामने
हर नया विश्वास पलता है तुम्हारे सामने
फुसफुसाते इन सभी पागल प्रतीकों से कहो
ये समय की खाद को अब तो लगें पहचानने

ताल देने में न, सिजदों में न है इनका जवाब
राज इनकी लगजिशों का भी तुम्हारे सामने
फूल के सहजात काँटे भी पले मधुवात में
जी न पाते क्यों बहारो! ये तुम्हारे सामने

खून है इनकी रगों में भी टहनियों का उन्हीं
है इन्हें भी तो रचा-पोसा इसी उद्यान ने
जो सुला दे हर हकीकत की सदा को, दर्द को
वे न आने दे किसी का गम तुम्हारे सामने

और हम सदके तुम्हारे पारदर्शी सत्र के
हो रहे कितने सधे अभिनय तुम्हारे सामने
वर्तिकाएँ सब बुझी जातीं इधर नेपथ्य में
दीप मणियों के उधर जलते तुम्हारे सामने

सब सुबह गूँगे जनमते और शामें बेनिगाह
पर उगलते स्वर भरे जलवे तुम्हारे सामने
डाल-टूटी आस्थाओं ने जिन्हें दे दी उड़ान
रह गईं थम कर हवाएँ वे तुम्हारे सामने


तो भूल जाना

भूलने में सुख मिले तो भूल जाना ।

एक सपना-सा समझना ज्यों नदी में बाढ आना
भूलने में सुख मिले तो भूल जाना ।

थीं सुनी तुमने बहुत-सी जो लड़कपन में कहानी
शेष जिनकी सुधि नहीं — मैं था उन्हीं का एक प्राणी !
सोच लेना — था किसी अनजान पँछी का तराना ।

झूमते लय-भार से जिस राग के मिजराब सारे
भूल जाते वे उसे तत्क्षण — गगन ज्यों भग्न तारे
ठीक वैसे तुम मुझे यदि सुख मिले तो भूल जाना ।

भूल जाती गन्ध अपना कुँज जाती दूर जब उड़
भूल जाते प्राण काया छोड़ते ही शून्य में मुड़
हो कभी विह्वल न मेरी याद में भर अश्रु लाना ।

भूल जाता फूल डाली को क्षणों में ही बिछुड़कर
याद मेघों को न करती दामिनी भी आ धरा पर
बढ़ गया जो दीप उसमें अब न तुम बाती सजाना ।

वेदना इससे बड़ी होगी मुझे क्या और सुनकर
तुम विकल हो याद करती हो मुझे चीत्कार-कातर
क्यों उठे, मेरा वही फिर दर्द छाती का पुराना

भूलने में सुख मिले तो भूल जाना ।


दो सजा मुझको

दो सजा मुझको असंयत कामना के ज्वार पर,
बिन बुलाए आ गया मैं फिर तुम्हारे द्वार पर।

दो सजा मुझको-गड़ाऊँ आँख चरणों पर कभी
अनसुनी कर दो मिलन की धड़कनें मेरी सभी,

तुम अनुत्तर बन सदा मेरी पुकारों से बचो
अब न तुम मुझमें नये विश्वास का सपना रचो,

प्राण पर मेरे तुम्हारी ही झलक छाई हुई
चेतना मेरी तुम्ही में डूबी उतरायी हुई,

पंख-अधकतरा पखेरू चंद्रमा से होड ले!
चाहता आकाश का नीला सितारा तोड़ ले!

तुम न मिटने भी मुझे दो अनगहे आधार पर,
बिन बुलाए आ गया मैं फिर तुम्हारे द्वार पर।

दो सजा मुझको तनिक जो आस्था मेरी गले
मर गयी जो ज्योति घुलघुल कर अगर फिर से जले,

दो सजा यदि मैं तुम्हारी छाँह को भी प्यार दूँ
यदि तुम्हारे संगदिल को एक भी झंकार दूँ ,

यदि प्रकम्पित कंठ से कुछ पास आने को कहूँ
मैं तुम्हारी एक भी मुस्कान पाने को कहूं,

दो सजा मुझको तुम्हारा नाम होठों से चुए
हाथ भी मेरा तुम्हारी बादली वेणी छुए,

चढ़ चुका अपनत्व सब मेरा पराई धार पर,
बिन बुलाए आ गया मैं फिर तुम्हारे द्वार पर।

दो सजा मुझको कहूँ तुमसे मुझे बूझो तनिक
वेदना की विपुलता में तुम्हीं मुझे सूझे तनिक,

दो सजा तुमसे तनिक भी शक्ति ले जीवित रहूँ
यदि तुम्हारे आसरे दुख की तरंगों में मैं बहूँ।

आँसुओं में भी कभी माँगू सहारा स्नेह का
स्वप्न भी देखूँ तुम्हारी देव दुर्लभ देह का,

मैं तुम्हें बाँधू तरसती चितवनों में निष्पलक
दो सजा पीता रहूँ मधु स्वर तुम्हारा देर तक,

गीत लिखने को तुम्हारे दर्प की दीवार पर
बिन बुलाए आ गया मैं फिर तुम्हारे द्वार पर।

मूँद दोनों नयन, दम तोड़ दो मेरा अभी
दो मुझे तुम दण्ड, है स्वीकार सिर माथे सभी,

मैं तुम्हारे रूप का उन्माद तन-मन में भरे
मैं तुम्हारी वज्रता का दर्द छाती में धरे,

यदि तुम्हें पीने लगूँ अपनी समूची प्यास भर
दो सजा मुझको-न सहने में रहे कोई कसर,

दो सजा यदि मैं तुम्हारा मन बहुत-सा घेर लूँ
दो सजा कुछ भी तुम्हारी मानता यदि फेर लूँ, पू

पूजता तुमको सुलगता दिल इसी अधिकार पर,
बिन बुलाए आ गया मैं फिर तुम्हारे द्वार पर।

रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’