रेणु सिंह, डा. रशीद गौरी, मंजू शर्मा जांगिड़

पाँच लघुकथा।

डा रेनू सिंह
नोएडा वेस्ट

लघुकथा-१.
काली

दिन भर बूढ़ी अम्मा बाहर ही बैठी रहतीं।सुबह नहा -धोकर छोटी सी लुटिया में जल लेकर निकलती और सूर्य भगवान को जल चढ़ाती। काली उन्हें देखते ही पूंछ हिलाती उनके पास आकर खड़ी हो जाती। अम्मा चाय और बिस्कुट लेकर बाहर ही आकर बैठ जाती। थोड़ी सी चाय और बिस्कुट काली के लिए डाल देती।काली चट-चट कर चाट लेती।
काली ने जब से बच्चे दिये ।अम्मा रोज ही चाय में भीगी रोटी लाकर उसे देती।
काली कमजोर होगई थी। वो बच्चों को छोड़ भोजन की तलाश में कहीं नही जाती ।दिन भर बच्चे उसे चूसते रहते। भूखी काली को बूढ़ी अम्मा का ही सहारा था ।सुबह से बूढ़ी अम्मा घर से नही निकली ।काली बहुत भूखी थी ।भूख से पेट चिपक गया था।
रात हो आयी थी ।सर्द हवाएं चल रही थी।वह बच्चों को समेटे बैठी थी ।उससे अब भूख बर्दाश्त नही हो रही थी।काली उठी और बूढ़ी अम्मा के दरवाजे पर जाकर भौंकना शुरू किया।लेकिन कोई नही निकला।काली ने आगे बढ़ दरवाजे पर पंजे मारे फिर भी कोई नही निकला।आखिर में अम्मा की खिड़की पर मुँह रख काली रोने लगी।
थोड़ी देर बाद धीरे-धीरे दरवाजा खुला कटोरे में रोटी दूध लिए अम्मा कराहती हुई निकली ।
उन्होंने काली को पुचकारा।धीरे -धीरे बुदबुदा रही थी-
“तू भूखी होगी न,क्या करती रे ! मैं तो बहुत बीमार हो गई थी।खा ले जल्दी ,खा ले ।” काली पूंछ हिला रही थी।
” ये महंगे -मंहगे कुत्तों को घुमाने वाले लोग, तुझे कुछ नही देंगे।उन्हें तेरी कोई फिक्र नही।ये नकली लोग हैं।
ये कुत्ते हजारों में खरीद कर लाते हैं ,तू उससे बुरी है क्या ? पर इन्हें कौन समझाये। सभी अपने गली के एक -एक कुत्ते को गोद ले लें तो कोई भी काली भूखी नही रहेगी ,अनुशासित भी।”
पूंछ हिलाती काली समझ रही थी कि बूढ़ी अम्मा उसीकी बात कर रही हैं। वह विह्वल हो कुकुआ कर बूढ़ी अम्मा के पैर चाटने लगी।
कोई तो है जो उसका दर्द समझता है और मोल भी ।

***

लघुकथा-२.
कालापानी

आजी! “अपनी शादी में आप कितने साल की थीं?” पोती के प्रश्न से दादी ने वर्षों पहले खूंटी पर टंगी स्मृतियों की पोटली उतार कर खोल दिया था । वो घूम रही थी सत्तर वर्ष पूर्व के भाव लोक में।
दस बरस की आजी बारह बरस के दद्दा ।’ढेर कुल गहना कपड़ा मिली’ ये रंग -बिरंगे सपने लिये आजी ससुराल आ गईं ।.समझने को कुछ नही बस जिसने जिस काम में लगा दिया वो कर दिया ।करीब हफ्ता दस दिन बीता – ,दुआरे की गइया,बछिया,बत्तख , पट्टू, खरगोश, अम्मा ,बाबा सब याद आये।एक हूक सी उठी और भोकार बा कर रो पड़ी आजी। सभी दौड़े ,लगता है चोटा गई ।लेकिन पूछने पर आजी ने कहा ,”अपने घर जाना है।”
कोई खुलकर हँस पड़ा कोई मुस्करा कर रह गया । परन्तु दयाभाव किसी के चेहरे पर नही।
एक रोज दोपहरिया थी। मदारी की हाँक लगाती बुलन्द आवाज साथ मे डँमरू और घुघरू की धमक व छनक।आजी पगला गई ।दुआरे की तरफ बेतहासा भागी।वहाँ बड़का दादा ,बुढ़उ कक्का कुछ और लोगो को बैठे देख,बचपना डयोढ़ी पर ठहर ,सहम सयाना हो गया।अचानक याद आया भण्डारें(अनाज रखने का बड़ा कमरा) में दाल वाले खोन्हा(मिट्टी का घड़े के आकार का बड़ा सा पात्र) के ऊपर की छोटी सी खिड़की । मदारी की आवाज भी उधर से आ रही थी।बेचैन ,बौराई आजी दौड़ पड़ी ।चट से खिड़की पकड़ खोन्हा पर चढ़ गई। सामने थी बगिया , भीड़ का गोल घेरा और घेरे में भालू की डोरी थामें मदारी । मदारी के आदेश ,डमरू की तान पर भालू नाच रहा था।आजी मगन, मंत्रमुग्ध देख रही थी ।कुछ महिलाएँ आँचल मे बच्चोँ को छुपाये,भालू से नजर झराने लगी। मदारी भालू की डोरी पकड़ गोलाई मे सबसे पैसे माँग रहा था ।आजी स्वप्न लोक में ,कितना समय बीता नहीं मालूम ।तभी अचानक बूढ़ी आजी (सास) ढूँढ़ती आ पहुँची।सामने खिड़की से आजी को लटके देख चीख पड़ी। आजी कूद गयी थी नीचे।लेकिन तब तक आजी के भार से खोन्हा टूट कर धीरे -धीरे बैठने लगा था,दाल बाहर बिखरने लगी थी ।बूढ़ी आजी ने खोन्हा का एक टुकड़ा उठाया और आजी को तीन -चार धपाका लगाया ।आजी जड़ हो गई,फूट -फूट कर रो पड़ी…।
आजी गहरी साँस लेकर कहती- “पहिले बियाह मतलब कालापानी” ।

***

लघुकथा-३
प्रकृति का क्षोभ

बाबा के सामने दंडवत कर बैठ गए थे नंद किशोर ।
बाबा शांत आंखे आधा बंद किए बैठे रहे,उनके मुख पर गहरा विषाद था।
बाबा ने कहा – कहो ?
“बाबा! एक बेटा एक्सीडेंट में चल बसा। दूसरा बेटा गलत राह पर है।दिन रात नशे में धुत।,कुछ कीजिए ।”

बाबा ने संयत स्वर में कहा – “जब दूसरों का कुल वंश नष्ट करोगे ,तो तुम्हारा कैसे बचेगा।ये तो प्रकृति का नियम है।”

“समझा नहीं मै, बाबा !” हाथ जोड़ कर आर्त स्वर में बोले नंद किशोर

“जब से आप मुख्यमंत्री बने है। यहां रोज विस्फोट कर पहाड़ तोड़े जा रहें हैं।जल – कुंडियां सूखती जा रही। जंगल काट दिए गए हैं “- कहते कहते क्रुद्ध हो बाबा कुटिया से बाहर निकल आए थे।

नंदकिशोर हाथ जोड़े अपराधी की तरह बाबा के पीछे थे।
बाबा ने फिर कहा – “अगर अपना और समाज का कल्याण चाहते है तो इसे तुरंत रुकवाइये।वरना प्रकृति जब रौद्र रुप धरेगी,सब कुछ खत्म हो जाएगा। ”
कांप गए थे नंद किशोर।
“आपका आदेश ” कह नंद किशोर ने पी ए को फोन मिला करआ तत्काल काम रुकवाने का आदेश दे दिया।

नंद किशोर, क्षमा मांगते बाबा के चरणों में गिर गए।
बाबा पीड़ा मिश्रित आश्वस्ति लिए बोले – “बना नहीं सकते तो मिटाओ मत।जैसे जैसे ये क्षेत्र पुर्नजीवित होगा, वैसे वैसे ही तुम्हारा पुत्र भी स्वस्थ और सन्मार्गी बन जाएगा।एक हाथ दे ,एक हाथ ले ।”
नंद किशोर एक संकल्प लेकर लौट रहे थे
उस क्षेत्र को पुनः संरक्षित करने का।

***

लघुकथा-४
भेड़िया

फुट ओवर ब्रिज के नीचे भीड़ लगी थी,कलेजा धक से रह गया।पगली मर गई क्या? हाथ में पगली के लिए लाए पराठे लिए निर्मला का मन विचलित हो उठा। तेज कदमों से वो भीड़ की तरफ बढ़ती चली गयी।
रोज ही निर्मला को ब्रिज के नीचे पगली कभी बोतलों,पत्तलों ,कबाड़ों को बीनती, हंसती ,खुद से बतियाती मिल जाती। उससे एक नाता सा बन गया था । निर्मला जब अपना टिफिन पैक करती उसे पगली याद आ जाती । बस, पगली के लिए भी दो पराठे पेपर में लपेट रख लेती और रोज ही उसे थमाती निकल जाती।पगली कभी -कभी उसे देख मुस्कराने लगी थी।
झुग्गियों के बच्चे उसे नोचते,उसके बालों में मिट्टी डालते ।पगली रोती,चीखती,गालियां बकती । इधर पगली के व्यवहार में बदलाव आ रहा था।वो चुपचाप एक कम्बल लपेटे पड़ी बड़बड़ाती रहती ।
इन्हीं सब विचारों से गुत्थमगुत्था निर्मला भीड़ के बीच घुस गयी। पगली सुंदर, स्वस्थ गौर – वर्ण नवजात शिशु को सीने से चिपकाए बैठी, किसी को भी बच्चे को छूने नहीं दे रही थी।दो महिलाएं पगली को सहला रही थीं। शायद उन्होंने ही उसका प्रसव करवाया था । पुलिस मूक खड़ी थी। पगली लगातार बड़बड़ा रही थी -“अभी भेड़िया आयेगा,अभी भेड़िया आयेगा ।”
निर्मला बुदबुदाने लगी,” ओह, रात के अंधेरे में पगली भेड़िए का शिकार होती रही ।”

***

लघुकथा-५.
संकल्प

प्रीती ने रोज की तरह बैसाखी कोने में दीवार से टिका ,मेजों को पकड़ती सीट पर बैठ गई थी।
वायवा चल रहा था। छात्र- छात्राएं जगह -जगह अपनी पारी की प्रतीक्षा में थे।अनु जा चुकी थी।
विराट आज फिर आकर पास की बेंच पर बैठ गया। ठहर कर बोला-” क्या सोचा तुमने?”
“अभी तो वायवा दे लूं ,फिर सोचूंगी”
“वायवा तो हो ही जाएगा”
“तो”
“मेरी बातों का क्या हुआ?”
प्रीती ने जैसे कुछ सुना ही नहीं,शांत बैठी रही।
विराट के चेहरे पर हल्की झुंझलाहट उतर रही थी।
” प्रीती!कुछ तो बताओ ,आखिर परेशानी क्या है?
“क्यूँ, क्या खासियत है ,मुझमें”
“तुम से प्रेम करता हूँ”
“प्रेम”
विराट की बातों को सुन प्रीती थोड़ी देर चुप रही फिर उसने कहा-
“मुझसे प्रेम करते हो या दया आती है ?तरस खाते हो मुझ पर?”
“दया नही प्रीती…यकीन मानो मैं चाहता हूँ तुम्हे”।
“जानते हो विराट ! मैं दया की पात्र नही बनना चाहती। मैं घर के सारे काम करती हूं।बाजार जाती हूँ,सब्जी लाती हूँ ।हर दिन गिरती हूँ ,चोट खाती हूँ।
‘ गिरते हैं सह सवार ही मैदान जंग में’ ” कह वह हंस पड़ी।
“जानता हूं मैं”
“विराट!फिर मेरा भी निर्णय सुन लो”
“कहो भी”
” मैं जब तक कुछ बन न जाऊं, प्रतीक्षा करनी होगी तुम्हें।कर सकोगे ?”-आत्मविश्वास के साथ प्रीती एक सांस में बोल गई।
विराट चुप एकटक प्रीती को देख रहा था।
“विराट ! बुरा मत मानना, इस प्यार का ज्वार कितना उथला है, कितना गहरा क्या पता। तुम्हारे प्रेम की ऊंची उठती लहरें कब थम जाए क्या पता।”
विराट नीचे सिर झुकाए सुन रहा था।
प्रीती को भी विराट के इस प्रेम-निमंत्रण से क्षणिक आसक्ति हुई थी लेकिन उसने अपने को थाम लिया साथ ही संकल्प लिया कि वह सशक्त बन आगे बढ़ेगी ,
किसी की दया का पात्र नहीं।
प्रीती को अपने और विराट के बीच अपना बेजान झूलता पोलियोग्रस्त पैर दिखायी दे रहा था।


पाँच लघुकथा

डा. राशिद गौरी
सोजत सिटी (राजस्थान)

लघुकथा-१
अनकहा
” बेटी, ज़िंदगी कैसे गुज़र रही है…?”
शादी के कुछ महीनों के बाद पीहर आई बेटी से मां ने एक दिन बातों ही बातों में पूछ लिया।
” बस…गुज़र रही है मां…! समझौतों के साथ…।” बेटी ने बड़े ही ठण्डेपन से जवाब दिया।
मां समझ गई। अब उन्हें बेटी से ज्यादा कुछ कहने-सुनने की जरूरत ही नहीं थी। चंद मुखर शब्दों के बाद की खामौशी ने बहुत कुछ अनकहा भी कह दिया था।
सामने, दीवार पर टंगी और चंदन की माला चढ़ी स्वर्गीय पति की तस्वीर देखते ही उनकी आंखें सजल हो गईं।
” ज़िन्दगी इसी का नाम है…।” होंट बुदबुदा कर रह गए।

***

लघुकथा-२
मुक्ति

अख़बार में गत दिवस संपन्न सहायक कर्मचारियों के प्रांतीय अधिवेशन में लिए गए निर्णय संबंधी समाचार पढ़कर अपने चेंबर में बैठे अधिकारी ने घंटी बजाई।
चपरासी खरताराम हाजिर।
‘ तो अब तुम लोग हम अधिकारियों के व्यक्तिगत कार्य नहीं करोगे…? क्यों खरताराम…?’
अधिकारी के सामने सावधान मुद्रा में खड़े चपरासी खरताराम को बात के आशय को समझने में तनिक भी देर नहीं लगी।
कल रात बच्चे द्वारा सुनाई समंदर में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं नामक कहानी अचानक उसके ज़हन में कौंध गई।
मुक्ति का मार्ग पल भर में ध्वस्त हो गया।
दबंग अधिकारी चपरासी की मनोदशा पर बड़े रौब के साथ अलग ही अंदाज में मंद-मंद मुस्कुरा रहा था।

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लघुकथा-३
हिम्मत नहीं है

“सुनिता की मम्मी… सुनों…! अब हमें सुनिता की शादी करवा देनी चाहिए… हम उसे कब तक घर में बिठाए रखेंगे…?” पति ने आज फिर पत्नी से अपनी विधवा बहू सुनिता को लेकर चिंता जाहिर की।
“…… ” कोई जवाब नहीं।
” अगर बेटे की जगह यह बहू गुजर जाती तो आप अपने बेटे की शादी जल्दी से जल्दी करवा देतीं। तो फिर…अभी उम्र ही क्या उसकी…?”
” वो सब ठीक है… हम जानते हैं… हमारी बहू पढ़ी-लिखी है। सुशील है, होशियार है। कल अच्छी नौकरी लग जाएगी। यदि आज हमारा बेटा जिंदा होता तो बुढ़ापे में वही हमारा सहारा बनता ना…! अब बहू सुनिता ही हमारी बहू भी है और बेटा भी और हमारा सहारा भी…।” कहते हुए उनकी आंखों में आंसू झलक आए।
” आप अपनी इस भावुकता में इतनी स्वार्थी भी मत बनो…।”
” मैं स्वार्थी नहीं हूं… पर क्या करूं…? मैं एक मां जो हूं… एक बेटे को मैंने पहले ही खो दिया है। अब दूसरा बेटा भी खो दूं…? इतनी हिम्मत नहीं है मुझमें…।”

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लघुकथा-४
भूख

” अरे यार, आजकल डाइटिंग पर हूं मैं। देखती नहीं है कितनी फ़ैटी हुई जा रही हूं ?”
” हां यार, तू डाइटिंग कर रही है और यहां तो कमबख़्त भूख ही नहीं लगती। क्या करूं…?”
” चलो छोड़ो भी, मेरी भी सुनों, मुझे तो यार कल से ही बदहज़मीं हो गई है। खट्टी डकारें आ रही हैं। कल शाम अन्नू की किटी पार्टी में कुछ ज्यादा ही खा लिया था।”
वह, वहां खड़ा हुआ उन धनी महिलाओं की बातें बड़े गौर से सुन रहा था। ज्यों-ज्यों उनकी बातों का मतलब उसके सुन्न दिमाग में समझ आ रहा था। त्यों-त्यों उसके पेट के ऊपर कैसे हुए हाथ और अधिक कसते चले जा रहे थे।
वह शिद्दत से महसूस करने लगा। उसकी सिकुड़ी हुई सूखी अंतड़ियां भूख के मारे और अधिक तनती जा रही हैं। और अधिक…।
वहीं, पास ही एक आवारा कुत्ता किसी अपने ही जानवर भाई की किसी सूखी हड्डी को बड़े मजे से चबाने की कोशिश कर रहा था।

***

लघुकथा-५
अपना -पराया

“तंग आ गई मैं तो। तुम्हारे पिताजी से। अब पिताजी के लिए कोई नौकरानी रख लो या उन्हें किसी आश्रम में छोड़ आओ। बहुत हो गया। अब मुझसे नहीं होता…।”
बीवी ने पति के सामने अपना कड़ा फरमान जारी कर दिया।
अब तक शांति से सुन रहे पति ने शांत और सहज भाव से अपनी भी तज़बीज पत्नी के सामने रख दी।
” हां… हां… क्यों नहीं…? तुम्हारे पिताजी को भी बुला लेते हैं। वैसे भी वे गांव में अकेले ही रहते हैं। दोनों समधि साथ-साथ आश्रम में खुशी से रह लेंगे… है ना…?”
” क्या कहा…!! मेरे पापा…!!”
एहसास की शिद्दत ने पत्नी के भीतर जमीं सारी ग़र्द को एक ही झटके में साफ कर दिया और वहीं अपनी सोच से लज्जित मन से अपने-पराये का भेद एक ही क्षण में मिट गया।

पाँच लघुकथा


मंजु शर्मा जांगिड़ “मनी”
जोधपुर राजस्थान

लघुकथा-१
किस्मत

चूल्हे में जलती हुई लकड़ी को देख उसके पास खड़ी लकड़ी भीतर ही भीतर कांपने लगी। आग की धधकती लपटें में घिरी लकड़ी की भयावह स्थिति से उसकी अकुलाहट बढ़ने लगी ।

जमना…

अरे जमना…

यह क्या कर रही हो तुम…

तुम्हें कितनी बार कहा मेरी दुकान में पैर‌ नहीं रखोगी । फिर तुम वहां से लकड़ी उठा लायी।

गबरू ने अपनी बेटी को जोर की फट्कार लगाई ।

आग की भेंट चढ़ने से पहले ही गबरू ने उस लकड़ी पुनः घर के अहाते में बनी अपनी फर्नीचर की दुकान में ले जाकर रख दी ।

***

लघुकथा-२
दंश

अरे, रमली मुंह उतरा हुआ कैसे है‌?

क्या आज फिर मर्द ने दारू पीकर मार-पीट की ?

क्या बताऊं मालकिन यह तो अब उसका रोज का ही काम हो गया । बस उसे दारू पीने के लिये रोज रूपये दे दो । घर खर्च व बच्चों की पढ़ाई के लिये कुछ मत मांगो तो वह खुश रहता है ।

अब उसको खुश रखने के लिये मैंने दो बड़े घर और पकड़ लिये मालकिन, आपके यहां से सीधे वो नुक्कड वाला घर फिर उसके पीछे वाला घर ।

मालकिन घर जाते-जाते अंधेरा हो जाता है । घर जाते ही खाना बना कर सबको खिला पीला कर सोने जाती हूं तब तक हड्डियां चकनाचूर हो जाती है ।
पर क्या करूं मालकिन यही एक हल नजर आया ।

मैं एक टक रमली को देखे जा रही थी । और मन ही मन सोच रही थी इस पुरुष प्रधान समाज का दंश महिलाएं कब तक झेलेगी?

***

लघुकथा-3
मगर

राहुल…

राहुल…

अब खेलना बंद करो ।
पढ़ने का समय हो गया है । चलो अंदर आओ ।

रिनी खाना बनाते हुए बाहर आकर राहुल को आवाज़ लगाने लगी ।

फिर रसोई में खाना बनाने लग गई । काफी देर हो गई। जब राहुल घर में नहीं आया तो उसने पुनः आवाज़ लगाई ।

लेकिन राहुल पर कोई असर‌ नहीं।

इतनी आवाज लगाने के बाद भी राहुल घर में नहीं आया । शाम के छ: बज रहे । रिनी का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर था।

वह किचन से दौड़ी-दौड़ी बाहर आई। राहुल को जोर की फट्कार लगाई ।‌

राहुल..

राहुल…

तुम्हें सुनाई नहीं देता । कब से आवाज़ लगा रही हूं। मगर तुम्हारे कान पर जूं तक नहीं रेंगी।

बंद करो खेलना…

चलो अंदर चलो…

एक बार कहने से तुम्हें सुनाई नहीं देता ।

इसमें चिल्लाने की क्या बात है मम्मी, आप मुझे इतना क्यों डांट रही हो‌।

दादी भी तो पापा को कब से अपना चश्मा बनवाने के लिए कह रही है।‌ मगर दादी ने तो…

***

लघुकथा-४
मुक्त

रमा, जल्दी से टिफिन पैक कर दो‌ । मुझे ऑफिस की देरी हो रही है ।

अजय के इतना कहते ही रमा फटाफट खाना बनाने लग गई ‌। आज सारा काम लेट लतीफी से हो रहा है ।‌ सुबह देरी से आंख क्या खुली, इसका खामियाजा अभी तक भुगतना पड़ रहा है ।

सब्जी बनकर तैयार हो गई । धनिया के लिए फ्रिज खोला तो याद आया धनिया तो कल ही खत्म हो गई । इतने में घर के बाहर सब्जी वाले की आवाज सुन वह दौड़ी-दौड़ी सब्जी वाले के पास पहुंची ।

धनिया देते हुए सब्जी वाला बोला, मैडम जी आपको पता है, मिश्रा जी की पोती की शादी हो गई ।

इतने में पास खड़ी मिसेज गुप्ता बोली उच्च कुल की होकर निम्न कुल में विवाह करना उचित नहीं है ।

तभी पास खड़ी चौधराईन बोली अरे, तभी तो किसी को बुलाया नहीं, परिवार के चंद लोगों में ही शादी संपन्न हो गई ।

अरे, हां लोग आते तो धज्जियां उड़ जाती, पास खड़ी अन्य महिला बोली ।‌ फिर सभी खिलखिला कर हंसने लगी।

मैं अवाक् सी रह गई ।

इन लोगों की बातों को अनसुना कर, धनिया लेकर तुरंत घर में आ गई ।

अजय का टिफिन पैक करते हुए सोचने लगी, आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश जाति बंधन से मुक्त नहीं हुआ ।

***

लघुकथा-५

जरूरत

अरे, आज बीस जनवरी है । विवाह की बासठवीं वर्षगांठ । अखबार पढते हुए अचानक नजर तारीख पर गई ।

नीरज पुरानी स्मृतियों में खो गया । एक के बाद एक स्मृति पटल आंखों के आगे घूमने लगा ।‌ विभा को तो शायद ही पता होगा । आज शादी की सालगिरह है‌ ।

चलो आज उसे फिर से इंप्रेस करते हैं, भीतर से आवाज आई । वह अखबार छोड़ बालकनी में बैठ शेविंग करने लगा ‌।

यह क्या लगा रखा है पिताजी, जगह-जगह बाल फैला दिये । यह क्या तरीका है ।

कुछ नहीं बहू शेविंग किये बहुत दिन हो गए, सोचा यहीं कर लूं ।

उसके लिए बाथरूम में वाॅसबेसिन नाम की कोई जगह है, वहां पर नहीं कर सकते । घर में भला साफ़ सफाई कैसे रह जाय ।

अरे! बेटा वाॅसबेसिन पर खड़े रह कर करने की अब हिम्मत नहीं रही । सोचा बाॅलकानी में चेयर टेबल पर बैठ के कर लूं ।

जब खड़े रहने की हिम्मत नहीं तो करने की जरूरत कहां है ?

***

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