पूजा अग्निहोत्री, नवीन कुमार, मिथिलेश राकेश


पाँच लघुकथा


पूजा अग्निहोत्री W/O श्री प्रदीप अग्निहोत्री
रूम नंबर- 1236
उर्जानगर ‘C’ ब्लॉक, बिजुरी. अनूपपुर (म. प्र.), – 484440

लघुकथा-१.
डंक

निहारिका और अविका अच्छी सहेलियाँ थी बचपन से कॉलेज तक की दोस्ती थी। निहारिका का भाई अरुणव अविका को बहुत पसन्द करता था। लेकिन शादी करना नही, सिर्फ पाना चाहता था… एक खिलौने की तरह।

निहारिका का रुझान मॉडलिंग की ओर था वहीं अविका निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से थी और नौकरी करके पिताजी की मदद करना चाहती थी।

खैर अरुणव एक प्राइवेट कम्पनी में सॉफ्टवेयर डेवलपर था सो उसी कम्पनी में नौकरी लगवा दी, लेकिन नौकरी लगवाने के एवज में उसने अविका को इस्तेमाल किया, कई बार ……एक बार घर जाते समय उसने अविका को देखा और… उसके गाल में नीला निशान देख कर बेशर्मी से पूछा,
” क्या जवाब दोगी अपने घर पर?”
“कहना पड़ेगा किसी बरसाती कीड़ा ने काट लिया होगा।”
हिकारत से कहकर लम्बे-लम्बे डग भरती वो चली गई।
शाम को उसे पता चला कि निहारिका को मॉडलिंग का कोई कॉन्टेक्ट मिला है और सब बहुत खुश हैं।
डायनिंग टेबल पर अरुणव, निहारिका और पापा के साथ बैठ गया, और माँ खाना लगा रही थी । अचानक माँ का स्वर उसके कानों में पड़ा,
“नीरू, बेटा ये तेरे गाल में क्या हुआ ?”
“अरे हाँ बेटा, ये नील तुझे कैसे पड़ा?” पापा ने भी प्रश्न किया।
निहारिका के आगे के शब्द उसे अपने कानों में पिघला शीशा उड़ेलते हुये जान पड़े ।
“अरे! कुछ नही पापा, शायद किसी बरसाती कीड़े ने काट लिया होगा…..।”

लघुकथा-२.
रोज-रोज नहीं
“माँ ये सोना इतना महँगा क्यों होता है?”
“ये कोई पूछने वाली बात है, कीमती है तो है।”
“पर, माँ वहई तो क्यों है?”
“क्योंकि इसे लोग अधिक पसंद करते हैं।”
“क्यों माँ?”
“क्योंकि, ये रिप्लेस भी हो जाता है।”
“पर रिप्लेस करना ही क्यों?”
“जब सोने की बालियों से ज्यादा जरूरत टॉप्स की हो तो रिप्लेस कर देना चाहिये।”
“माँ मुझे भी रिप्लेस कर दो न, ये रोज रोज नहीं बिका जाता मुझसे, आप लोगों की थ्री पेज पार्टी के लिये।”
***
लघुकथा-३.
मज़हब से परे

दोपहर के खाने का समय हो गया था, पिता रसोई से बाबूजी खाना तैयार है, आ जाइये, सुनने की प्रतीक्षा करते थकने लगे तो रसोई की तरफ चल दिये।
वहाँ का दृश्य देखकर उनके मुँह से चीख निकल गई।
रसोई का दरबाजा अंदर से बंद था और खून की लकीर बहकर बाहर आ रही थी।
जैसे-तैसे दरबाजा तोड़कर बेहोश निधि को बाहर निकाला और अस्पताल पहुँचे।
अस्पताल में डाक्टर ने बताया कि कलाई की नस काटे जाने के कारण खून बहुत बह गया है इसलिये फौरन खून का जल्दी इंतजाम करना होगा।

अब एक तो निधि का ब्लड ग्रुप ओ पोजिटिव और दूसरे लोगों की सोच के कारण अभी तक लगी परिचितों और परिजनों की भीड़ छंटकर सिर्फ तीन चार व्यक्ति रह गये थे, इसलिये खून का इंतजाम हो नहीं पारहा था।

समय के साथ निधि की सांसों के लिये संकट बढ़ता जा रहा था।

निधि के एकदम फोन बंद कर देने से आहत अनस निधि के घर पहुँचा और सारी बात पता लगते ही सीधा अस्पताल पहुँचा और स्थिति पता लगते ही डाक्टर को बताया कि उसका ब्लडग्रुप ओ पोजिटिव है, उसका खून फौरन लिया जाय और मरीज को चढ़ाया जाये।

कोई 40-45 मिनिट बाद निधि के निराश पिता बदहबास से लोटे तो डाक्टर ने कहा- “बाबूजी! आप आराम से बैठ जाइये, खून का इंतजाम हो गया है।”

किसने दिया, मेरी बेटी को खून, किसने बचाई है मेरी बेटी की जान, मुझे बताइये तो?” कहते हुये उन्होने डाक्टर का हाथ पकड़ लिया।

डाक्टर बोला- “आप आराम से बैठिये, अधिक उत्तेजना आपके लिये अच्छी नहीं है।“

हमने खून देना शुरू कर दिया है, दो यूनिट खतम होते होते आपकी बेटी को होश आ जायेगा।

मगर उसे खून…

डाक्टर उन्हे शांत रहने का इशारा किया और मरीज को सम्भालने चले गये।

अचानक उन्हे लगा कि अनस उनके सामने पीठ करके खड़ा है और अपनी पहचान छिपाने की कोशिश कर रहा है।

पलभर में उनके दिमाग में बिजली सी कोंधी और उन्हे समझ में आगया कि खून अनस ने ही दिया है।

थोड़ी देर में उन्होने अपने को संयत किया, फिर उठे और अनस के पीछे से उसके पंहुच कर उसके कंधे पर हाथ रखकर बोले- अनस! बेटा, आज मुझे अहसास होगया कि तुम से अच्छा और विश्वसनीय जीवनसाथी निधि के लिये दूसरा हो ही नहीं सकता।

तुम मेरे पास बैठो और निधि के होश में आते ही तुम्ही उससे मिलने जाना और बता देना कि मैंने अपनी निधि को तुम्हे सौंपने का फैसला कर लिया है, कहते हुये भावावेश में उनकी आंखों से आंसू बहने लगे, तो अनस ने उन्हे सम्भाल कर बड़े एहतियात से बेंच पर बिठाया और बोला- “मैं आपके लिये कुछ पीने को लाता हूँ।“

“नहीं बेटा तुम मेरे पास बैठो, यही मुझे भरपूर सान्तवना के लिये काफी है, कहकर उन्होने अनस का हाथ कसकर पकड़ लिया।“

***

लघुकथा-४.
चाय

सुबह-सुबह डायनिंग टेबल पर कप-प्लेट आपस में बात कर रहे थे।
कप ने कहा, “अपना अस्तित्व मिटाकर दूसरों को खुश करना कोई इससे सीखे।”
“सच कहा तुमने, कितनी तपन झेलती है, ताकि किसी के मुँह का स्वाद बन सके।”
“हाँ जैसे पैदा ही रंग भरने के लिये हुई है।”
“देखो, इसके साथ पाते ही पानी भी रंगीन होकर महक उठता है।”
“साथ ही ऊर्जा और ताजगी देने में भी इसकी कोई बराबरी नहीं कर सकता।”
“हम्म, इंसानो के लिये अस्तित्व मिटाने के बाद खाद बनकर प्रकृति के फूल-पौधों में रंग भरती है।”
“कौन?” चौंक कर प्लेट ने पूछा।
“चाय, और तुमने क्या सोचा?” कप ने प्रतिप्रश्न किया।
“मुझे लगा ‘औरत’, वह भी तो…”

***

लघुकथा-५.
अंतिम दर्शन

आँगन में यशोदा की मृत देह अर्थी पर रखी जा चुकी है। आखिरी गाड़ी का वक्त भी निकल गया लगता है। “लगता है अब गोविन्द नहीं आ पायेगा।“- किसी ने कहा।
“अंतिम यात्रा शुरू करो, अब गोविन्द नहीं आयेगा।”
गोविंद की बीवी पुष्पा ने कहा, “थोड़ा और इंतजार करलो शायद ट्रेन लेट हो।”
तभी पीछे से दस वर्षीय बच्चे ने आवाज लगायी, “काकी, गोविंद काका का फोन है।”
“हल्लो, कहाँ हैं आप, पहुँचे नहीं अभी तक, कब तक आएँगे।” – एक साथ प्रश्नों की झड़ी लगा दी पुष्पा ने।

“बहुरिया, साउंड खोल के बात कर।”

पुष्पा ने स्पीकर खोल दिया, अब गोविंद की आवाज सब सुन रहे थे।

“पुष्पा, अंतिम यात्रा पर विदा करते समय माँ से बोल देना कि अगले जन्म में मेरी देवकी माँ बने यशोदा नहीं, कम से कम अंतिम दर्शन तो कर सकूँगा। यहाँ के ऑफिस में केवल ‘खून के रिश्ते’ को ही रिश्ता मानते हैं। भले सबको पता है कि उन्होंने जिस तरह मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया, मेरी परवरिश की वह शायद मेरी सगी माँ भी नहीं कर सकती थी। उनके स्नेह और प्यार को मैं बोलकर बयाँ नहीं कर सकता बस महसूस कर सकता हूँ। माफी चाहता हूँ माँ, मैं नहीं आ पाऊँगा।”
आगे के शब्द उसकी रोने के साथ हिचकियों में गुम हो गये। अगले ही पल फोन डिस्कनेक्ट हो गया।


पाँच लघुकथा
नवीन कुमार ‘नवेंदु’
बानो, सिमडेगा (झारखण्ड)

लघुकथा-१
छठ
बनवारी बाबू पिछले कई दिनों से पत्नी को समझा रहे हैं –
“शरीर जब साथ नहीं दे रहा है, तो छठ-बरत करने पर क्यों अड़ी हो?”
कौशल्या हँसकर बोली –
“आप चिंता मत कीजिए। ‘छठी मइया’ सब पार लगा देंगी। ‘सूरूज’ बाबा की किरपा से कोनो दिकत नय होई।”
बनवारी के मन में डर समाया हुआ है। दो महीने की बीमारी से अभी भी कौशल्या का शरीर कमजोर है। डॉक्टर ने समय से खाने-पीने को कहा है।
देखते ही देखते दिवाली आ गई। दोनों ने मिलकर घर के कोने-कोने को उजाले से भर दिया। उन्हें इस बात की खुशी थी कि दीपावली के दूसरे-तीसरे दिन पूरे घर में रौनक आ जाएगी।
बहू-बेटे और पोता-पोतियों के आ जाने से बनवारी बाबू के घर में उत्सव का माहौल है। यों तो उनका घर गाँव के एक किनारे पर है, पर टोले भर के लोग आजकल कुछ अधिक ही आने-जाने लगे हैं। कौशल्या के सूखे गात में न जाने कहाँ से शक्ति आ गई है। वह पूरे मन से छठ का नेम-धरम कर ‘परसाद’ बनाने की तैयारी में लगी हुई है।
इधर बनवारी बाबू बच्चों के साथ बच्चे बने हुए हैं। जब किसी काम के लिए कौशल्या उन्हें पुकारती, तो वे बेटे का नाम लेकर कहते –
“फलनवाँ है न।”
कई बार कौशल्या झुंझला उठती, मगर बनवारी बाबू बच्चों में मगन रहते। हार-पार कर कौशल्या अपने बेटे को पुकारती।
देखते-ही-देखते छठ बीत गया। बच्चे वापस जाने वाले हैं शहर।
कौशल्या ने बहू से पूछा –
“फिर कब आओगी?”
बहू बोली – “पता नहीं, कब समय मिले…”
कौशल्या बोली – “समय तो निकालना पड़ता है।”
बहू ने कहा – “हाँ, लेकिन बच्चों की पढ़ाई भी तो…”
“हमने भी अपने बच्चे पढ़ाए हैं।” कौशल्या का स्वर जरा मद्धिम हो गया।
बहू ने दिलासा दिलाया –
“माँ जी! अगले छठ में हम ज़रूर आएँगे।”
पास खड़े बनवारी बाबू सब सुन रहे हैं। अब उन्हें यह समझ में आ गया कि डॉक्टर के मना करने पर भी कौशल्या छठ करना क्यों नहीं छोड़ती।

***

लघुकथा-२
माटी है अनमोल
बालमोहन ने पत्नी से कहा –
“दुखन मिट्टी के पैसे दुगुना माँग रहा है।”
मुन्नी ने रोष प्रकट करते हुए कहा –
“यह क्या धांधली है! एक बार में डबल दाम कौन बढ़ाता है?”
बालमोहन ने समझाया –
“तुम ठीक कह रही हो, मगर हमारे पास और कोई चारा नहीं। दुखन के खेत की मिट्टी से बरतन अच्छे बनते हैं।”
मुन्नी बोली –
“मगर जब हम अपने दीये और बरतन लेकर बाज़ार में जाते हैं, तो लोग इन्हें ‘माटी का बरतन’ कहकर मोल-भाव करने लगते हैं।”
बालमोहन ने गहरी साँस भरते हुए कहा –
“कहने को तो ये दीये और बरतन मिट्टी के बने हैं, मगर मेहनत हमें कितनी करनी पड़ती है, दूसरे क्या जानें? पूरे परिवार को इसके लिए दिन-रात एक करना पड़ता है।”
मुन्नी ने आगे कहा –
“चाक पर इन्हें गढ़ना, करीने से सुखाना, आग में पकाना… ज़रा-सी चूक हुई तो सब किया-धिया गुड़ -गोबर हो जाता है। अपने बच्चों की तरह इनकी हिफ़ाज़त करनी पड़ती है। दूसरों के लिए ये मिट्टी के हैं, मगर हमारे लिए तो ज़िंदगी से भी बढ़कर।”
बालमोहन ने कहा –
“सुना है, बड़े लोगों के घरों में फिर से मिट्टी के हांडियों में खाना पकने लगा है।”
मुन्नी ने उदास स्वर में कहा –
“हाँ, पर जब वही बड़े लोग हमारे पास खरीदने आते हैं तो उन्हें लगता है, हम लूट रहे हैं।”
बालमोहन ने सिर हिलाया –
“सच कहती हो मुन्नी, माटी से जिनके रिश्ते होते हैं, वे माटी की कीमत समझ पाते हैं।”
और वह धूप में सूख रहे दीयों को बड़े प्यार से देखने लगा। भले ही ये मिट्टी से गढ़े गए थे मगर सचमुच – माटी है अनमोल।

***

लघुकथा-३
संता आया संता
विद्यालय में बड़े दिन (क्रिसमस) की छुट्टियाँ शुरू होने वाली थीं। प्रार्थना सभा में प्रधानाध्यापक ने घोषणा की –
“कल हम सब मिलकर ईसा मसीह का जन्म पर्व मनाएँगे।”
यह सुनकर बच्चों की खुशी का ठिकाना न रहा।
पिछले वर्ष की भाँति सभी बच्चे तैयारियों में जुट गए।
राहुल और जोहन ने मिलकर सुंदर क्रिसमस ट्री बनाया।
विवेक और राजदीप ने यीशु के जन्म की झाँकी सजाई।
गीता ने अपने ट्री पर रंग-बिरंगे बल्ब लगाए।
शबनम और सुनीता की चरनी भी बहुत आकर्षक बनी।
बड़े मेज़ पर बड़ा-सा केक रखा गया। निशा मैडम ने सबसे छोटी बच्ची अंकिता को बुलाया। वह चहकते हुए उनके पास पहुँची। बच्चों की नज़रें केक और अंकिता पर टिकी हुई थी। और जैसे ही उसने केक काटा, “हैप्पी बर्थडे” का सुमधुर गीत गूंज उठा।
बच्चों में केक बाँटा गया और सभी स्वाद लेकर खाने लगे।
अचानक लाल कपड़े और लाल टोपी पहने संता क्लॉज़ आ पहुँचे।
सभी बच्चे खुशी से चहक उठे –
“संता! संता! क्या लाए हैं आप?”
संता मुस्कराते हुए अपने थैले से उपहार बाँटने लगे। किसी को चॉकलेट मिली, किसी को खिलौना। सभी बच्चों को कुछ-न-कुछ मिला।
बच्चों के चेहरे पर मुस्कान खिल उठी। हॉल तालियों और हँसी-खुशी से गूंज उठा।
यह दिन बच्चों की स्मृतियों में हमेशा के लिए बस गया।

***

लघुकथा-४
ज्ञान, ईर्ष्या और अभिमान

पूरे गाँव में ज्ञान का बहुत मान-सम्मान था। किसी के सामने कोई समस्या आती थी, लोग दौड़े-दौड़े उसके पास चले जाते और वह खुशी-खुशी रास्ता सुझा भी देता था। शायद ही कोई ऐसा दिन बीतता, जब उसकी देहरी पर पाँच–दस लोग बैठे न मिलते थे। जवार-भर में ज्ञान का खूब नाम होने लगा था। ज्ञान की दुष्टा पड़ोसन उससे खूब जलती थी। उसने अपनी मीठी-मीठी बातों से ज्ञान को अपने वश में करने की भरपूर कोशिश की, मगर असफल रही। ईर्ष्या भी गजब की ज़िद्दी थी। वह किसी के पीछे पड़ जाती थी तो उसका सर्वनाश करके ही दम लेती थी।

ईर्ष्या को ज्ञान की प्रतिष्ठा धूमिल करने का कोई उपाय समझ में नहीं आ रहा था।

संयोग से एक दिन उसका भाई अनादर अपने एक मित्र अभिमान के साथ उसके घर पहुँचा। ईर्ष्या ने अपने मन की बातें उनसे कह सुनाई। अनादर सोच में पड़ गया, मगर उसका मित्र अभिमान कह उठा— “यह तो मेरे लिए चुटकियों का काम है। तुम मुझे ज्ञान से भेंट तो करा दो।”

अब क्या, वह उसे ज्ञान के घर ले गई। वहाँ जाकर अभिमान ने देखा कि ज्ञान लोगों को उनकी समस्याओं का समाधान बता रहा है। ईर्ष्या ने ज्ञान से अभिमान का परिचय करवा दिया। अभिमान ने ज्ञान के सद्कार्यों की खूब प्रशंसा की। उसने अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से धीरे-धीरे ज्ञान को अपने वश में कर लिया।

वक्त ने करवट ली। अब ज्ञान अभिमान के बताए रास्ते पर चलने लगा था। धीरे-धीरे उसके यहाँ सलाह लेने वाले लोग कम आने लगे थे। ज्ञान की देहरी के आजू-बाजू अभिमान के सिवाय अब कोई नहीं दिखाई पड़ता था।

ईर्ष्या की खुशी का ठिकाना न था।

***

लघुकथा-५
उलाहना

वह मेरी ‘धरनी’ है, ताने मारना उसका जन्म-सिद्ध अधिकार है। आमदनी इतनी कम है कि महीने के तीस दिन निकालना बड़े-बड़े ‘मैनेजमेंट गुरू’ के लिए भी टेढ़ी खीर है।

हमारी श्रीमती जी औरों से हटकर हैं, पर कभी-कभार आस-पास की ‘शाहखर्ची’ देखकर कह ही देती हैं—
“शादी के पच्चीस साल बीतने वाले हैं, मेरे सारे-के-सारे अरमान धरे रह गए हैं। मैं जब भी अपनी छोटी-मोटी इच्छा व्यक्त करती हूँ, तो तुम अगले महीने पर टाल देते हो। तुम्हारे ‘अगले’ महीने एक साल के भी होते तो दिल को तसल्ली देती…”

मेरे घरवाली के सच के आगे मुझे बहाना बनाते न बना। पता नहीं अनायास मुँह से निकल गया—
“अगर तुम ऐसी ही परेशान करती रहोगी, तो मैं साधु बन जाऊँगा।”

मेरी पत्नी का चेहरा खिल गया—
“वाह! क्या आइडिया है, विचार बुरा नहीं है। तुम प्रवचन देना, मैं सामने में चूरन की दुकान लगाऊँगी और तुम्हारे नाम की अगरबत्तियाँ बेचा करूँगी। फिर हमें किसी चीज़ की कमी नहीं रहेगी।”

मैंने हँसते हुए कहा—
“ज़रा सोच लो, अगर मैं सचमुच ‘बाबा’ बन गया, तो मुझे कुछ मत कहना…”

पता नहीं मेरे ‘ज़रा सोच लो’ कहने का क्या असर हुआ; वह कह उठी—
“तुम जो हो, उसी में अच्छे।”

“सच।” — मैंने धीरे से कहा।


पाँच लघुकथा

डॉ. मिथिलेश राकेश ‘मिथिला’
बरेली (उ.प्र.)

लघुकथा-१
दरारें

कोई झुकने को तैयार नहीं था। छींटा-कशी बरक़रार थी। घर में एक महीने से ढङ्ग से भोजन नहीं पका था। सभी क्रोध में उबल रहे थे। एक दूसरे पर भड़क रहे थे।
“मम्मी आप सीमा लाँघ रही हैं।” बहू बोली।
“तो तूने कौन सी कोर-कसर छोड़ रखी है।” सास झुँझलाकर कहा।
“मम्मी शान्त रहिये।” बेटा जैसे ही बोला कि अचानक डोरबेल बजी। झाँकने पर देखा कि दामाद जी गेट पर हैं। रीता ने झट से जाकर गेट खोला।
“अरे बेटा ! सुबह-सुबह कैसे आना हुआ ? पहले से कोई ख़बर नहीं दी।”
“ख़बर क्या देना, माँ जी। एक ही शहर में रहने वाले नज़दीकी रिश्तेदारी में भी औपचारिकता ज़रूरी है क्या ?”
“नहीं-नहीं, मेरा वो मतलब नहीं था। यदि आप पहले से बताते, तो मैं अच्छा-सा आपकी पसन्द का कुछ बनाकर रखती।”
“इसकी आवश्यकता नहीं, माँ जी।”
“दरअसल मैं बाहर जा रहा था। ट्रेन दो घण्टे लेट है। घर से थोड़ा पहले निकल आया, सोचा आप लोगों के दर्शन ही करता चलूँ।”
“अच्छा किया, अच्छा किया, मैं पानी लाती हूँ , बेटा।”
घर के अन्य सभी सदस्यों की ख़ामोशी देखकर दामाद जी सन्न थे। आज ऐसा क्या हो गया कि कोई मिलने नहीं आया।
“लो बेटा पानी पी लो। हमारी बेटी सोना और घर के सभी लोग कैसे हैं ?
“सब ठीक हैं आपके घर की तरह।”
“मेरे घर की तरह, मैं कुछ समझी नहीं।”
“आप पहले अपने घर को समझ लीजिए, सब समझ आ जाएगा।”
रीता समझ नहीं पा रही थी कि क्या कहे, क्या पूछे। इसी कश्मकश में किचिन की तरफ़ जाती हुई बोलती चली गई। आप आराम कीजिए, आपके खाने के लिए कुछ लाती हूँ।
नहीं माँ जी, मैं कुछ नहीं खाऊँगा। अब आप हमेशा अपनी बेटी के लिए बनाइए और खिलाइए उसे अपने घर बुला लीजिए। इसी में सबकी बेहतरी है। अब दरारें भरना मुश्किल हैं।”
नहीं बेटा, ऐसा नहीं बोलते। हर चीज़ का हल है, आज नहीं तो कल। मेरी बात सुनो……”
दामाद ने एक नहीं सुनी और जैसे ही बैग उठाकर गेट की तरफ़ बढ़ा, तो देखा कि उसकी माँ और पत्नी सिर झुकाये गेट पर खड़ी थीं। एकाएक माँ और पत्नी उसके गले लग गईं। दर्द धीरे-धीरे पिघलता सा लगा।

***

लघुकथा-२:
दोष किसका ?

मालती रात भर खाँसती-कराहती रही और सुबह हो गई। वृद्धाश्रम की अन्य बुज़ुर्ग महिलाएँ भी मालती के कारण रात भर सो न सकीं।
मालती अपने बहू-बेटे के विषय में सोच-सोचकर रो रही थी और बड़बड़ा रही थी, “मालिक ऐसी औलाद किसी को न दे। जब से बहू आयी है, तब से बेटा बदल गया और आज नौबत यहाँ तक आ गयी।”
थोड़ी देर बाद चर्चा होने लगी कि यहाँ एक बुढ़िया और आ गयी। सभी उस बुढ़िया से मिलने जाने लगीं। मालती भी खाँसते-कराहते वहाँ पहुँची।
जैसे ही मालती बुज़ुर्ग महिला से रूबरू हुई, तो सामने समधन को देखकर पैरों की ज़मीन खिसक गयी और दोनों एक दूसरे से नज़रें चुराने लगीं। आख़िरकार दोनों समझ नहीं पा रही थीं कि अब दोष किसको दिया जाए ?

***

लघुकथा-३
जिये न कौरा….

“अरे पवन कहाँ है ? दादी को बहुत ज़ोरों की भूख लगी है। कुछ खाने को दे जा, बेटा।” पवन मोबाइल में आँखें गड़ाये गुनगुनाये जा रहा था, उसने कुछ नहीं सुना ।
पवन की माँ अपने कमरे से बड़बड़ाई,” बेटे को पढ़ने नहीं देतीं। खाना थोड़ी देर पहले ही तो खाया है। जब देखो भुखायी रहती हैं। हर समय खाना-खाना-खाना….न जाने कब पिण्ड कटेगा।”
कुछ देर बाद पवन के पिता गिरधारी ऑफ़िस से लौटे, तो साथ में सब्ज़ी,फल,मिठाई इत्यादि लेकर आये। पवन की माँ ने झट से गेट खोला और सामान का थैला पकड़ते हुए बोली- “आप हाथ-मुँह धो लीजिए। मैं चाय बनाकर लाती हूँ।”
गिरधारी ने लॉबी से गुज़रते हुए माँ से पूछा- “सब ठीक है माँ ?
“हाँ बेटा, सब ठीक ही है। पूरे दिन के थकेमाँदे आये हो, जाओ चाय पी लो।” कहते हुए माँ पेट पकड़कर लेट गयी।
गिरधारी पत्नी के साथ अपने कमरे में चाय की चुस्कियाँ लेते हुए बोला- “वाह! बहुत अच्छी चाय बनायी है। सब थकान उतर गई और सुनो- कल बाबूजी का श्राद्ध है। मैं सब सामान ले आया हूँ। पण्डित जी कल सुबह ग्यारह बजे तक आ जायेंगे। समय से खाना तैयार कर लेना।”
पत्नी ने सहमति जताते हुए कहा- “चिन्ता मत कीजिए, सब हो जाएगा।” कहते हुए किचिन में चली गई ।
बूढ़ी के पेट में चूहे कूद रहे थे और बूढ़े को याद करके रुआँसी होकर बुदबुदाने लगी- “वाह री दुनिया ! जिये न कौरा मरे पकौड़ा।”

***

लघुकथा-४
अंग्रेज़ बॉय

“मैंने कहा न सर, मैं अंग्रेज़ी नहीं सीख पाऊँगा।” छात्र की आवाज़ में न सीख सकने की कसक थी।
“क्यों नहीं सीख पाओगे, आप ?” लाइब्रेरियन ने पूछा।
“क्योंकि मुझे अंग्रेज़ी समझ नहीं आती सर, इसीलिए अच्छी भी नहीं लगती।”
“ओह! यह बात है।”
“तो आपको क्या अच्छा लगता है, मेरे बच्चे ?”
“घूमना-फिरना और भिन्न-भिन्न स्थानों के विषय में जानना।” बच्चे ने ख़ुश होकर बताया।
“अच्छा, तो आपको पर्यटन स्थल घूमना पसन्द हैं ?
“जी सर।”
“वेरी गुड, तो आप यात्रा सम्बन्धी किताबें अंग्रेज़ी में पढ़ो।”
“अंग्रेज़ी में ??? नहींहींहीं…..यह मुझसे नहीं होगा, सर।”
” क्यों नहीं होगा, बच्चे ?”
“क्योंकि मुझे अंग्रेज़ी अच्छे से समझ नहीं आती।”
“ट्राइ माय डिअर। यदि आपको घूमना अच्छा लगता है और उसके विषय में जानना अच्छा लगता है, तो….सब सम्भव है मेरे बच्चे।”
“हूं हूं हूं……”
अब यह बच्चा प्रायः पर्यटन स्थल से सम्बन्धित एक पुस्तक लाइब्रेरी से लाता, पढ़ने के बाद वापस करके अन्य कोई बुक इश्यु कराकर ले जाता। उसका यह सिलसिला महीनों चला। एक दिन उसने अंग्रेज़ी की चार स्टोरी बुक्स इश्यु कराईं। बुक्स इश्यु करते समय लाइब्रेरियन बच्चे की आँखों की चमक देखता रह गया और उसे गले लगा लिया। पीठ थपथपाते हुए कहा- “वाह, मेरे अंग्रेज़ बॉय।”

***

लघुकथा-५
बेरोज़गार

“और कितने फ़ॉर्म भरेगा, बेटा ?”
“बस यह आख़िरी है, माँ।”
“क्या ?”
“सच माँ, इसके बाद नहीं भरूँगा।”
अच्छा बता, कितनी फ़ीस लगेगी ?”
“दो हज़ार।”
“दो हज़ाररर ?”
फिर एकाएक आशान्वित बेटे की आँखों को पढ़ा और तुरन्त बोली- “तू चिन्ता मत कर, मैं कुछ इन्तज़ाम करती हूँ और कुछ तेरे पापा से…”
“छोड़ो माँ, इस बार नहीं भरता।”
“भरना, बेटा। पापा को दफ़्तर से आने तो दे। कुछ न कुछ प्रबन्ध ऊपर वाला कर ही देगा। तू दिल छोटा मत कर।”
“थैंक यू माँ। आपको पता ही है कि पिछली दो परीक्षाएँ पेपर लीक होने के कारण कैन्सिल हो गई थीं, इसीलिए यह फ़ॉर्म भरना पड़ रहा है। जनरल की सीट्स भी कम ही होती हैं, मैरिट भी हाई जाती है और अपना तो कोई सोर्स भी…”
ग्रेजुएट माँ अच्छे से बेटे की बेचैनी समझ रही थी, साथ ही घर के हालात भी। पति की छोटी-सी नौकरी से घर का किराया, बेटी की पढ़ाई, मेरी दवाई और ऊपर से महँगाई। घर के ख़र्चे पूरे करना मुश्किल…
“माँ ! कहाँ खो गईं आप ?”
“कहीं नहीं, बेटा। तेरे लिए खाना लाती हूँ।” कहकर किचिन की तरफ़ बढ़ी और पीछे-पीछे बेटा भी।
“माँ ! इस बार आपको निराश नहीं करूँगा। यदि सरकारी नौकरी नहीं मिली, तो प्राइवेट ही कहीं कर लूँगा।”
“जो भी करना, जहाँ भी करना, बस ईमानदारी से करना, बेटा।”
“मेरा यक़ीन रखिए, आपका भरोसा कभी नहीं तोड़ूँगा, माँ।”
“हुंहुं…” माँ ने बेरोज़गार बेटे के सिर पर आशीष का हाथ फेरते हुए माथा चूम लिया।

***

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