तीन कथा-कविताः प्रभुदयाल श्रीवास्तव


छोटे प्राणी बड़े काम के
गई एक दिन चुनमुन चींटी,
नदी किनारे पानी पीने |
फिसला पैर गिरी पानी में,
डर से छूटे उसे पसीने |

नदी किनारे वहीँ पेड़ पर,
एक कबूतर ने जब देखा |
जान बचे चींटी की कैसे ?,
एक तोड़कर पत्ता फेका |

चींटी ने जब पत्ता देखा,
उस पर चढ़कर जान बचाई |
पत्ता जब लग गया किनारे,
चींटी ने थी राहत पाई |

आकर मिली कबूतर से वह,
बोली भैया हूँ आभारी |
अगर जरुरत पड़ी कभी तो,
कर दूंगी मैं मदद तुम्हारी |

हँसा कबूतर मन ही मन में,
ये नन्हीं क्या मदद करेगी |
जान जरा सी तो है इसकी,
मेरे दुख क्या दूर करेगी |

तभी अचानक एक शिकारी,
ने गुलेल से साध निशाना |
उसी कबूतर के ऊपर ही,
एक बड़ा सा पत्थर ताना |

चींटी ने जब यह देखा तो,
उस व्याध पर गुस्सा फूटा |
काट लिया उसके पैरों पर,
उसका हाय! निशाना चूका |

अब तो हुआ कबूतर भावुक,
बोला तुमने जान बचाई |
तुम हो मेरी प्यारी बहना,
मैं हूँ बहना तेरा भाई |

छोटे प्राणी बड़े काम के,
काम बड़े अक्सर कर जाते |
पता नहीं हम बड़े लोग क्यों,
इन छोटों को समझ न पाते |

गधे का बच्चा

एक समय की बात गुम गया,
एक गधे का बच्चा |

बच्चा क्या था हीरा जैसा,
सुंदर गोरा चिट्टा |

गधा बड़ा ही परेशान था,
कैसे कहाँ तलाशें |

ढूंढे कहाँ सड़क गलियों में,
किसके घर में झांके |

तभी एक घर के भीतर से,
स्वर था पड़ा सुनाई |

अरे गधे के बच्चे तुमको,
बिलकुल शर्म न आई |

समझ गया वह गधा, छुपाया ,
गया यहीं पर बच्चा |

घर के भीतर घुसा धडाधड,
मार द्वार पर धक्का |

एक आदमी अपने बच्चे,
को डांटे जाता था |

उसे गधे का बच्चा कहकर,
उस पर झल्लाता था |

गधा हो गया खुश बोला हम
,तुम दोनों हैं भाई |

हम दोनों हैं बाप गधों के,
बात समझ में आई ?

अब तो घबरा गया आदमी,
यह कैसी लाचारी |

गधे का बच्चा कहना कितना,
पड़ सकता है भारी |

गधे का बच्चा भूले से भी,
बच्चे को ना कहना |

जो बोला अपमान बहुत ही,
उसे पड़ा है सहना |


अभिमानी का सिर नीचा

एक संत के पास एक दिन,
एक आदमी आया |
बोला पानी पर चलने का,
मन्त्र सीख मैं आया |

दौड़ लगाकर पानी पर मैं,
नदी पार जाता हूँ |
भरी बाढ़ में जल पर चलकर,
वापस आ जाता हूँ |

संत खुश हुए बोले बच्चे,
ज्ञान ठीक पाया है |
पर बतलाओ इस पर कितना,
समय किया जाया है |

कहा पुरुष ने बीस वर्ष में,
हुनर सीख मैं पाया |
की वन में एकांत साधना,
तब मंजिल पा पाया |

बोले संत, रूपये दस देकर,
नदी पार जाता हूँ |
इतने ही नाविक को दे फिर ,
वापस आ जाता हूँ |

बीस रूपये के लिए व्यर्थ ही,
इतने वर्ष गंवाए |
समय गंवाकर बोलो इतना,
जग को क्या दे पाए |

बातें सुनकर प्रवर संत की,
पुरुष बहुत शरमाया |
अभिमानी सिर नीचा करके,
घर को वापस आया |

दौड़ लगाकर पानी पर मैं,
नदी पार जाता हूँ |
भरी बाढ़ में जल पर चलकर,
वापस आ जाता हूँ |

संत खुश हुए बोले बच्चे,
ज्ञान ठीक पाया है |
पर बतलाओ इस पर कितना,
समय किया जाया है |

कहा पुरुष ने बीस वर्ष में,
हुनर सीख मैं पाया |
की वन में एकांत साधना,
तब मंजिल पा पाया |

बोले संत, रूपये दस देकर,
नदी पार जाता हूँ |
इतने ही नाविक को दे फिर ,
वापस आ जाता हूँ |

बीस रूपये के लिए व्यर्थ ही,
इतने वर्ष गंवाए |
समय गंवाकर बोलो इतना,
जग को क्या दे पाए |

बातें सुनकर प्रवर संत की,
पुरुष बहुत शरमाया |
अभिमानी सिर नीचा करके,
घर को वापस आया |

प्रभुदयाल श्रीवास्तव
१२ शिवम् सुन्दरम नगर
छिंदवाडा मध्यप्रदेश ४८०००१
मो न ९१३१४४२५१२

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