संस्मरणः शकुन्तला प्रसाद, उषा किरण, श्रुतकीर्ति अग्रवाल

बड़की दीदी

नव वधू के रुप में अपने ससुराल प्रवेश के साथ सर्वप्रथम जिन्होंने मुझे अत्यंत प्रभावित किया ,वे बड़की दीदी थीं ।मातृविहीन घर में सात भाई – बहनों में सबसे बड़ी थीं । प्यार – स्नेह तथा अनुशासन से सभी छोटे भाई बहनों को बाँध रखा था ।बाबूजी अपनी वकालत से कम ही समय निकाल पाते थे । MA के बाद अभी शादी की बातचीत चल रही थी और बड़की दीदी (सभी उन्हें इसी नाम से पुकारते थे)ने पूरी गृहस्थी सँभाल ली थी ।
मेरे आने के बाद उन्होंने मुझे हर मोड़ पर सिखाया समझाया और मेरे अल्हड़ कदमों को सही दिशा दी । अपने मायके में आठ भाई- बहनों में मैं सबसे बड़ी थी ।हमेंशा से मेरी साध थी कि मेरी भी कोई दीदी होती ।उन्होंने बखूबी निभाया और मुझे बहुत कुछ सिखाया ।खाना बनाने के गुर , सिलाई – कढ़ाई की बारीकियाँ , रसोई , बहुत सारे लोग- सब की पसंद का ख्याल रखना…इनके अलावे संकट की घड़ी में हिम्मत और धैर्य बनाये रखना ..उनसे मैंने सीखा । हमेशा कहतीं – सच्चाई और ईमानदारी से बढ़कर कुछ नहीं ।अगर अपने कर्म और वचन में आप सच्चे हो तो कभी हार नहीं मानो । उनकी ये बातें बहुत प्रेरक और उत्साह वर्धक होती ।केवल वचन वीर नहीं बल्कि एक कर्मवीर की तरह जो कहतीं या सिखातीं – वह खुद भी वही करतीं ।मैं उनको पाकर अपने को धन्य मानती ।जब भी मैं उलझन में होती उन्हें ही फोन करती और वे समाधान बतातीं ।वे मेरी बातों को समझतीं । कभी भी निराश नहीं किया ।हर पर्व त्योहार पूरे नियम से और खुशी से मनातीं ।उनका उत्साह देखते ही बनता । बच्चों के साथ बच्चा बनकर लूडो खेलतीं , चिड़ियाघर सैर को ले जातीं ,बात बात पर समोसा पार्टी हो जाती , खूब हँसतीं हँसातीं…जीवन को सम्पूर्णता के साथ जीने की कला में वे सिद्धहस्त थीं ।
जीवन के अंतिम कुछ महीने वे बीमार रहीं…पर कभी निराश नहीं देखा । पूरी शिद्दत के साथ उन्होंने अपनी देखभाल की पर विधि का विधान ! एक इन्फेक्शन हुआ और कुछ ही दिनों में अंतिम साँस ले लीं । किसी को विश्वास न हो रहा था । हर संकट को चुटकियों में सुलझाया था पर इस बार वो हार गईं थीं ।
आज भी लगता है वो यहीं कहीं है …हमारे आसपास ।उनकी बातें , स्नेह और फ़िक्र से भरे उनके मार्गदर्शन – सभी कुछ मौक़े पर हमारी मदद करते हैं । लगता है वो यहीं कहीं हैं..बिल्कुल पास , हमारे साथ।
जीवन भर वही मेरी प्रेरणा थीं और रहेंगी ।उन्हें मेरा श्रद्धापूर्ण नमन ।

शकुन्तला प्रसाद, यू.के.

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वो मुलाकात और किताबों का सफर…

यौवनकालीन अतीत और प्रत्यक्ष वर्तमान के बीच लंबा अंतराल होता है , लेकिन यौवनकालीन के चित्रशाला में जो चित्र अंकित रहता है वो हम वार्धक्य की धुंधली आंखों से प्रत्यक्ष देखते हैं।उसी चित्रशाला में से एक चित्र मेरे मानस पटल को बार बार हल्के से थपथपाकर चला जाता था।वो चित्र था मेरी क्लास मेट सुमन प्रसाद ( गुमला कॉलेज,राँची ) की बड़ी बहन शकुन्तला प्रसाद का। पापा के तबादला होने से गुमला छूट गया और पत्राचार के अभाव में सुमन या और भी सहेलियों की कोई जानकारी नहीं मिली, क्योंकि उस समय (1973 – 74)फोन की सुविधा सभी जगह नहीं थी। लेकिन जब कभी शैक्षणिक करियर की बात होती तो बरबस शकुन दी की याद आ जाती।

मैं उस समय गुमला कॉलेज में दाखिला ली थी और वो भूगोल प्रतिष्ठा ( Geography Honours) की परीक्षा दी थी। इसी समय उनका रिजल्ट आया था। पता चला कि वो राँची यूनिवर्सिटी में टॉप की हैं। उन्हें गोल्ड मेडल से नवाजा जाएगा। मैं बहुत प्रभावित हुई और बार – बार अपनी क्लास मेट सुमन ( उनकी छोटी बहन ) से पूछती कि आखिर शकुन दी कैसे पढ़ाई करती हैं। खैर ,पापा का तबादला होने से गुमला छूट गया। समय अपनी रफ्तार से गुजरता गया और मैं भी उम्र का सोपान चढ़ती गयी।वक्त की धूल से बहुत सारी यादें धुंधली होती गयीं लेकिन शकुन दी को नहीं भूल पायी। मैं अब दादी बन गयी थी लेकिन अब भी यदा कदा बेटा – बहू से बातचीत के क्रम में शकुन दी की चर्चा हो ही जाती। कभी – कभी लगता है कि कुछ रिश्ते पूर्व जन्म से ही बंधे होते हैं ,तभी तो एक लंबे अंतराल बाद भी राह चलते उन्हें पहचान गयी।करीब चालीस बर्षों का लंबा अंतराल….। सपने में भी गुमान नहीं था कि कभी उनसे मिल पाउँगी , लेकिन वो कहते हैं न…
“जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू।
सो तेहि मिलहि न कछु संदेहू।।

चालीस साल कम नहीं होता , जीवन की रुप- रेखा पूर्णत: बदल जाती है।इधर करीब दस- बारह साल पहले की बात है। हर गर्मी छुटटी में पटना(NTPC Apartment)आती तो नियमित मॉर्निंग वॉक के लिए निकलती। मॉर्निंग वॉक के समय रोज ठीक वैसा ही चेहरा एक अन्य महिला के साथ सामने से गुजरता। लगता कि शकुन दी ही हैं। चालीस साल का लंबा अंतराल था।मन में संशय , कुछ खुद का संकोची स्वाभाव के कारण उनसे परिचय पूछने का साहस न कर पाती। घर आकर बेटा- बहू से बोलती कि लगता है…. वही हैं। ये लोग बोलते कि आपको पूछना चाहिए लेकिन मेरा संकोच हमेशा मेरे ऊपर हावी रहता । इस तरह गर्मी छुटटी बीत जाती और मैं फिर से सहरसा वापस। इस तरह से हर साल आना- जाना लगा रहता और मॉर्निंग वॉक के समय उनको देखना- सोचना भी।
लेकिन जब 2015 में गर्मी छुटटी में पटना आयी तो एक दिन मॉर्निंग वॉक के समय साहस करके पूछ लिया……
मैं– आप कहाँ से belong करती हैं?
शकुन दी— झारखंड
मैं– गुमला?
शकुन दी– अरे, आपको कैसे मालूम?
मै– मैं आपकी छोटी बहन सुमन की क्लास मेट हूँ।
फिर तो दोनों की खुशी का ठिकाना न रहा। पता चला कि दस मिनट पैदल की दूरी पर उनका अपार्टमेंट है। अब तो रोज मॉर्निंग वॉक के पहले उनका फोन आ जाता कि निकल रही हूँ फिर हमलोग साथ हो जाते।

फिर तो इतनी दोस्ती गहराई कि रोज बातें होने लगीं। जब भी हम मिलते उनकी स्नेह भरी मुस्कुराहट नयी उर्जा से आपादमस्तक मुझे सराबोर कर जाती। फिर बातों का सिलसिला शुरू हो जाता… ढेर सारी बातें… William Wordsworth से लेकर John Milton के Sonnet तक….पंत से लेकर बच्चन तक…. विशेषकर सुधा मूर्ति की किताबों की चर्चा तो अवश्य होती, साथ ही साथ कढ़ाई, बुनाई,रसोई की बातें भी दोनों की बातचीत का हिस्सा होती।पोते पोतियों की शरारत भरी बातें भी हमसे अछूती न रहती।
गज़ब का व्यक्तित्व है उनका… उदारवादिता,परम्परानिष्ठता, शालीनता का अद्भुत मेल। इतनी मुलायम कि बातचीत के दौरान कभी लगा ही नहीं कि वे गोल्ड मेडलिस्ट हैं।सब कुछ मंथर गति से ठीक ठाक चल रहा था लेकिन विधि का विधान…. अचानक भाई साहब (उनके पति, जो एक डॉक्टर थे)का गुजर जाना उनके जीवन को नया मोड़ दे दिया। जीवनसाथी का बिछड़ना किसी भी मोड़ पर बड़ा कष्टदायक होता है। लेकिन वो गरिमामयी व्यक्तित्व की स्वामिनी अपने को संभाल कर अपने तीनों बेटों (जो इंग्लैंड में रहते हैं) के साथ आंनदपूर्वक रह रही हैं।
उनके इंग्लैंड जाने के बाद मैं इस प्रतीक्षा में रहती कि वो किसी बहाने भारत आएं ताकि फिर से हम दोनों की पहाड़ी झरने सी बहती बातों का सिलसिला शुरू हो।लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सिर्फ एक बार ही वो यहाँ आई। फिर कुछ स्वास्थ्य की वजह से अब इंग्लैंड ही उनका स्थायी निवास हो गया। लेकिन सप्ताह में दो- तीन बार तो अवश्य हमारी बातें हो जाती हैं और फोन पर ही दुनिया जहान की बातें होती हैं।

इसी बीच उन्होंने मेरी कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद करने की इच्छा जतायी। ” अंधा क्या चाहे, दो आँखें ” वाली बात मेरे लिए हो गयी। मैंने सहर्ष अनुमति जतायी। फिर तो करीब दो महीने का लंबा सिलसिला चला कविता भेजने और अनुवाद का। फलस्वरूप ” जीवन की लय” कविता- संग्रह अंग्रेजी अनुवाद सहित प्राची पब्लिकेशन के सहयोग से 2023 में प्रकाशित हो गई। किताब प्रकाशित होने की मुझे तो खुशी थी ही लेकिन उनकी खुशी को फोन पर ही महसूस कर बेहद सुकून मिला दिल को।
करीब दो साल बाद (2025) में ” माँ सरस्वती ” की दया से फिर मेरा दूसरा काव्य संग्रह ” जो रह गयी थी अनकही ” प्रकाशित हुआ। इस बार तय हुआ कि इस काव्य संग्रह का भी अंग्रेजी अनुवाद करेंगी लेकिन अलग, जिसमें सिर्फ अंग्रेजी अनुवाद ही रहेगा। फलस्वरूप कुछ महीने बाद उनके द्वारा किया गया ” जो रह गयी थी अनकही ” काव्य संग्रह का अंग्रेजी अनुवाद की पुस्तक भी प्रकाशित हुई। इस काव्य संग्रह का अनुवाद उन्होंने उस समय किया,जब उनका किडनी ट्रांसप्लांट होने वाला था और वो जिंदगी और मौत के बीच अपनी लड़ाई लड़ रही थीं।लेकिन वो कहावत सिद्ध कर दीं……
” जहाँ चाह ,वहाँ राह।”
ईश्वर की कृपा से अब वो स्वस्थ हैं और हमदोनों अब अगली पुस्तक के बारे में राय- विचार कर रहे हैं।

सच, हमें पता नहीं होता कि जीवन में कब और कैसे किससे मिलना हो जाए और वह हमारा दुख- सुख का साथी बन जाए, जिनसे बातें कर दिलोदिमाग को पुरसकून मिले।
उषा किरण, पटना, बिहार
उषा किरण
पटना ( बिहार)

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ऊंगली पकड़कर ले चला

जिंदगी की गलियों में विचरते, यूँ तो हर क्षण ऐसे कुछ लोग, ऐसी कुछ सीखें मिलती रहती हैं जो सारी जिंदगी हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं, सही-गलत रास्तों की पहचान करना सिखाती हैं पर यहाँ गुरु मैं उस इन्सान को कह रही हूँ जिसने अपना कीमती वक्त हमपर निवेश कर, बिना किसी निजी स्वार्थ के, हमारे जीवन की नींव रखने का प्रयास किया हो। बचपन में, जब मेरे बाऊजी ने मुझे अपनी ऊँगली पकड़ा, एक बुजुर्ग पुरुष, ज्वाला प्रसाद जी के घर में ले जाकर उनसे कहा था ‘अब ये आपकी बिटिया है, इसकी पढ़ाई-लिखाई आपकी जिम्मेदारी!’, तब क्या पता था कि यह मेरे पिता की ओर से मुझे मिलने वाला सर्वोत्तम उपहार साबित होगा।

फिर ‘मास्टर जी’ रोज घर पर आने लगे… कि खेल-खेल में, गीत गाते गुनगुनाते मैं वर्णाक्षर सीख गई और अपनी ऊँगलियों के मोड़ों को उल्टा-सीधा गिनती, अंकगणित के कठिन से कठिन सवालों को हल करने लगी। पर पढ़ाते कब थे वह? मैं तो बैठकर कहानियाँ सुनती रहती थी न, उससे हैंडराइटिंग कैसे सुधरी होगी? मेरे घर के लिये तो ‘अंग्रेजी’ सर्वथा विदेशी भाषा थी.. फिर बिना रटे, मात्र व्याकरण और अनुवाद सीख कर, मैं पूरी कक्षा में टाॅप कैसे करने लगी? नन्हीं सी उम्र में अंग्रेजी अखबार पढ़ने का शौक यूं ही तो नहीं लग गया होगा? पाँचवी-छठवीं कक्षा तक पँहुचते-पँहुचते, हिन्दी भाषा की मात्राओं और उच्चारण पर मेरी पकड़ इतनी मजबूत कहाँ से हो गई? शिक्षा की वह शुरुआत कुछ ऐसी रही कि पढ़ाई कभी मुसीबत न बनकर उत्सुकताओं के शमन का माध्यम बन गई थी। इस शुरुआती शिक्षा ने जड़ों को वह मजबूती दी कि जीवन में कभी भी आत्मविश्वास में रंचमात्र भी कमी न महसूस हो। मास्टर जी से पड़ी हुई कोई डांट, किसी तरह की सजा-प्रतारणा याद क्यों नहीं आती मुझे? बल्कि अब याद करती हूं तो आश्चर्य ही होता है कि उस बढ़ती उम्र में, जब लोग जरा चिड़चिड़े से हो जाते हैं, उनके अंदर इतना संयम कहां से आया होगा कि मेरी हजारों शरारतें मुस्कुरा कर टाल गए और एक ही सबक को बार-बार बताते-समझाते कभी मैंने उनको धैर्य खोते नहीं देखा। कभी गुस्सा भी हुए होंगे तो वह भी मीठा ही रहा होगा।

प्यार-दुलार से ओत-प्रोत, बिना तनाव के, खेलते-कूदते हो जाने वाली वह शिक्षण पद्धति क्या समय की आपाधापी में आज कहीं विलुप्त हो चुकी है, मैं सोच रही थी। नर्सरी कक्षाओं से ही होमवर्क का प्रैशर, अति व्यस्त माता पिता में धैर्य की अत्यधिक कमी और ट्यूशन पढ़ाने आए हुए प्रोफेशनल टीचर.. सारा का सारा माहौल मानो उम्र जनित बचपने को सोख, सबको एक सी गला काट प्रतियोगिता की तरफ धकेलता हुआ.. परेशान हूँ कि हर कोई इतनी जल्दी में क्यों है? जो सहज पकता है वही तो मीठा होता है न, तो सारी की सारी दुनिया किस कृत्रिम मिठास के पीछे भागी जा रही है? कहीं बच्चे आत्महत्या पर उतारू हैं तो कहीं माता-पिता ढ़ेर सारी महत्वाकांक्षाओं का बोझ लिए अपनी शांति और सहजता दांव पर लगाने को उद्धत हैं।

समय को बीतना था, बीत ही गया। हतप्रभ तो मैं तब हुई जब एक दिन अपने नन्हे बेटे को बिल्कुल मास्टर जी वाले अंदाज में बैठकर, उसी कुशलता से, ऊँगलियों पर जोड़-भाग करते देखा। उन क्षणों में मैंने महसूस किया, मानों मास्टर जी ने कभी मेरा साथ छोड़ा ही नहीं हो। आश्चर्य की बात थी कि केवल शिक्षा ही नहीं, वह शिक्षण पद्धति भी मेरे अंदर आज तक जीवित है। मास्टर जी, आपने ही तो एक बार बताया था कि जो लोग दुनिया छोड़कर जाते हैं वे आसमान में सितारा बनकर वहाँ से हमें देखते रहते हैं। क्या आप भी देख रहे हैं कि आपके साथ आपका दिल में उतर जाने वाला वह कौशल विलुप्त नहीं हुआ है बल्कि मेरे जैसे कितने ही विद्यार्थी चुपचाप, अंजाने ही, आपकी विरासत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे पहुंचाने का काम कर रहे हैं।

श्रुत कीर्ति अग्रवाल
shrutipatna6@gmail.com

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