
सवाल यह भी फन तो उठाता ही है मन में कि धैर्य के साथ सोचूँ और समझूं कि इस उम्र में पहुंचकर भी आखिर यह लगाव और समर्पण क्यों शब्दों के प्रति, यह निरंतर का अथक श्रम और चाकरी क्यों ? लेखन और पठन-पाठन से क्या मिलता है मुझे, जबकि और भी सुख-दुख और इंद्र-धनुषी रंग हैं जीवन में जीने को, आनंद लेने को ? विशेषतः तब जब कोई पूछ बैठता है कि ‘ क्यों लिखती हूँ, दृष्टिकोण क्या है–ध्येय क्या है आदि आदि?’
और खुद की पड़ताल करती हमेशा उलझन में पड़ जाती हूँ। जबाव एक वही और वहीं-का-वहीं अटका रहजाता है- ‘सब कुछ नाप तौलकर नफे-नुकसान के लिए ही तो नहीं किया जाता, विशेषतः तब जब कि आदत भूखी आत्मा का पौष्टिक आहार बन चुकी है !’
नही जानती कि रचना का बीज कब और कैसे पड़ा, या फिर जन्म क्यों लेती है कोई भी रचना? जरूरत ही क्या है और इन्हें पढ़ता भी कौन है ? कोई पसंद भी करता है या नहीं? सिवाय इसके कि मेरे लिए जरूरी है सृजनरत रहना। औषधि का काम करती हैं यह प्रक्रिया मेरे लिए! छोड़ना चाहूँ तो भी संभव नहीं, आदत पड़ चुकी है मुझे इसकी । एक साधना, एक शिक्षा और एक बतकही है लेखन मेरे लिए, जो मुझे संतोष , आनंद और उर्जा तीनों ही देता है।
हाँ, इतना अवश्य याद है कि जब आठ वर्ष की आयु में पहली कविता उतरी थी, तो परिस्थिति की पीड़ा और मदद न कर पाने की असमर्थता की वजह से ही जन्मी थी। बीच-बचाव करने की इच्छा इतनी तीव्र थी, मानो पत्थर को तोड़कर सोता फूट पड़े। आज भी तो स्वतः ही होता है जन्म किसी भी रचना का और चुभे कांटे की तरह जबतक खुद से बाहर न कर दूँ , चैन नहीं पड़ता। उस दिन भी जब ढाई साल बड़ा और ढाई साल छोटा भाई आपस में लड़ रहे थे और मैं सहम कर एक किनारे खड़ी उनके मुक्का-लातों से डरी-सहमी बेबस दूर से ही देख रही थी उन्हें …आहत होते हुए, चेहरे और शरीर पर खरोंचें पड़ते हुए, सभी कुछ तो। पर घमासान को रोकने में पूर्णतः असमर्थ ही थी। कविता भोजपुरी में आई थी तब । क्योंकि पास खड़ा ड्राइवर जो हंस रहा था उन्हें यूँ गुत्थम-गुत्था देखकर, भोजपुरी में ही बोला था उस वक्त। और पहली पंक्ति भी उसी ने खुद कही थी-‘होवत जो काश एक कैमरा हमरे पास तो फोटू खींच सबही के हमहूँ दिखा देत कईसन सेर जैसन भिड़नवाला हैं भइया लोग।‘ फिर तो पूरी दस बारह लाइन की कविता खड़े-खड़े ही उतर आई थी वह बचकानी कविता ।
भोजपुरी , बृज और हिन्दी जो , जो जिस भाषा में बोलता था, उसके साथ उसी भाषा में बात करने की आदत-सी पड़ चुकी थी मेरी बचपन से ही । जान गई थी शायद कि आदमी से यदि उसकी ही भाषा में यदि बात की जाए तो बेहतर समझता है और बातचीत भी अधिक आत्मीय होती है। हमारे घर के अंदर बृज भाषा बोली जाती थी और अंदर-बाहर काम करने वाले भोजपुरी या बनारसी बोलते थे और घर के बाहर सभी से पर हम खड़ी बोली में बात करते थे। तीनों ही भाषा समानान्तर चल रही थीं बचपन में और १४-१५ की होते-होते तो अंग्रेजी व संस्कृत भी आ मिलीं इसमें। कविता कहानी और विचारों का अद्भुत भंडार लिए हुए, साथ-साथ उर्दू की शेर-शायरी में भी मन उलझने लगा। अच्छा पढ़ती तो चमत्कृत होती भावों की गहनता पर। शब्दों को समझने और बोलने में कभी कोई कठिनाई नहीं हुई। अगर इक्का दुक्का शब्द नया व अपरिचित रहा भी तो संदर्भों ने तुरंत अर्थ दे दिए। ना ही कभी ऐसा महसूस हुआ कि कोई क्या कहना चाह रहा है इसे समझने में ही कोई विशेष कठिनाई है।
भिन्न बोली और भाषा में शब्दों की पारस्परिक निकटता, बचपन से ही चमत्कृत अवश्य करती थी और दृढ़ करती चली गई उस धारणा को भी कि हम सभी एक ही मनु श्रद्धा या एडम ईव की संतान हैं। बस घरौंदे दूर और अलग-अलग बना लिए थे, शब्दों की ध्वनियाँ थोड़ी इधर-उधर हो गईं या की गईं समूह की निजता रखने के लिए, बात को कुछ अपनों तक ही सीमित रखने के लिए। भावों का आपसी कोड ही तो है भाषा और शायद यही भिन्न -भिन्न बोलियाँ और भाषा का इतिहास भी है!
थोड़ा और बड़े होकर यह शौक और सिलसिला पंजाबी, गुजराती और बंगाली भाषा तक जा पहुँचा। शरद , बंकिम और टैगोर का जादू जो सिर चढ़कर बोलने लगा था और नंदलाल बोस व रामकिंकर बैज से भी मिलवा दिया था मेरे शिक्षक शांतिरंजन बोस ने मुझे ।
अब तो जिस क्षेत्र की सहपाठिन होती , उसके साथ उसी की भाषा में बात करने की कोशिश करती मैं और मन-ही-मन यह भी सोचती रहती कि कितनी हिन्दी जैसी ही हैं सभी भारत की प्रांतीय भाषा। इस सोच और समझ में बड़ी सहायता की संस्र्कृत और अंग्रेजी के शौक ने, नफासत और अदब भरी उर्दू जुबां ने…दुनिया भर के नए पुराने अच्छे साहित्य और विचारों ने। विभिन्न भाषा और बोलियों ने बृहद शब्द कोष दिया मुझे। अनजाने ही ये सभी मेरी सोच का हिस्सा बनते चले गए और मुझे भी किसी शब्द से कोई एतराज नहीं रहा कभी। जो स्वतः आए तत्कालीन भाव की अभिव्यक्ति के लिए वही आज भी सही शब्द है मेरे लिए। बचपन से ही रोचक रहा है यह अपनी बात दूसरों तक पहुंचाने का खेल और अगर शिक्षक व सहपाठिनों की मानूँ तो कर भी पाती हूँ। पागलपन की हद तो यह है कि आज भी लगता है कि मैं मौन तक की भाषा समझती हूँ। आदमी तो आदमी पक्षी और पेड़-पौधे तक मुझसे बात कर सकते हैं या मैं उनसे बात कर सकती हूँ। उनके सुख-दुख को समझती हूँ।
जब किसी रंग में डूबे रहने में अतिशय आनंद आने लगे तो कुछ छींटे तो गिरेंगी ही और उनका रंग भी चढ़ेगा ही आपपर। पर बचपन और किशोरावस्थी के दिनों में निजी भावनाओं को यूँ खुले आम व्यक्त करना अपने स्वभाव और शील के विरुद्ध अवश्य लगता था, अतः बहुत कम लिखा और बहुत संयम के साथ लिखा। प्रायः कल्पना की उड़ान रहती और सृजन सिर्फ सृजन के लिए ही था। फिर भी लोगों को एक सच्चाई दिखी उसमें , भावों की तीव्रता दिखी। जबकि सच कहूँ तो कलम पचास साल की उम्र तक नीलंकंठ ही बनी रही, घोटा और सहा अधिक , उगला कम ।
जानती हूँ बचपन की वह पहली कविता भी किसी विशेष उद्देश्य से नहीं लिखी गई थी बस स्वतःही तो जन्मी थी असह्य क्षोभ और पश्चाताप, जग-हंसाई की पीड़ा से यह। पहली कहानी भी अपने ही परिवार में एक नौकरानी के बच्चे को देखकर, जो भाई का हमउम्र था और उसके साथ अक्सर ही खेलता भी था, उसके साथ हुए एक खेदपूर्ण और दुखद स्मृति पर आधारित थी; भाई की जब नई बाइसिकल आई और वह भाई से पहले खुद ही जा बैठा उस पर तो ताई जी द्वारा उसके गाल पर करारा चांटा मारने पर उसका उदास और वह आंसूभीगा मुंह कई दिन तक बेचैन करता रहा था और तीन चार दिन बाद ग्यारह वर्ष की उम्र में साइकिल कहानी में सारे मनोभाव और आक्रोष लिखकर ही चैन पड़ा था मुझे। पर घर में कोई बड़ा आहत न हो, तो उस उम्र में भी पात्रों के नाम और परिस्थितियाँ सब काल्पनिक कर दी थीं। यानी सच को कल्पना की चासनी में लपेटकर ही परोसा जाता है , तभी सुपाच्य और मर्यादित है, बचपन से यह भी सीख ही लिया था कलम ने। फिर एक अछूत बच्चा जो अपनी मां के साथ आता था और एक कोने में बस चुपचाप सहमा-सहमा खड़ा रहता था जितनी भी देर उसकी मां काम करती थी हमारे घर के अंदर उस पर एक पेंटिंग बनाई थी करीब १२-१३ वर्ष की उम्र में, जिसे प्रोत्स्हान पुरस्कार भी मिला था तब दिल्ली की प्रमुख शंकर आर्ट प्रतियोगिता में। तो करुणा से या अनुभूति की तीव्र प्रतिक्रिया स्वरूप ही जन्मी हैं मेरी अधिकांश रचना…बिल्कुल आह से उपजा होगा गान वाले अंदाज में ही।
कुछ समझने, कुछ सीखने और कुछ बदलने की एक अपरोक्ष चाह रही है कई रचनाओं के पीछे। और कुछ मात्र संस्मरण व यादें भी हैं। विज्ञापन और छपने का न तब ख्याल आता था और ना आज ही । रचना छपीं तो या तो प्रकाशकों ने मांगी या खुद ही ले लीं। बचपन में शिक्षकों ने छपने और प्रकाशित होने के लिए भेज दीं या फिर खुद ही स्कूल की पत्रिका में छापा। बस लिखने का और सदा अच्छा व मन-माफिक पढ़ने का ही जुनून रहा। और यह अच्छा भी नितांत अपनी मर्जी और रुचि के अनुसार ही रहा। दुनियादारी या विद्वता का इससे कोई लेना-देना नहीं रहा कभी इससे, ना ही दूसरों की पसंद का ही कोई दखल ही।…बिलकुल कबिरा मौज फकीर की तरह आदत आज भी उतनी ही खराब है कि जो अच्छा न लगे उसे लाख कोशिशों के बाद भी कभी पूरा पढ़ ही नहीं पाती और जो पूरा पढ़ लिया , उसे भूलना असंभव ।
इसी दीवानगी और ललक के तहत जब जिन्दगी की जिम्मेदारियों ने फुरसत दी तो लेखनी पत्रिका का जन्म हुआ २००७ में और आज तक खुद से भी अधिक इसे ही सींच व संवार रही हूँ।
तो इतना तो निश्चित ही समझ में आ रहा है कि किसी भी रचना की वजह एक अंदर की बेचैनी या कुछ बदलने या बांटने और सुनाने की चाह ही रही है । आज भी जब कोई भाव, कोई परिस्थिति असह्य हो जाए तो स्वतः ही कलम की नोक पर आ बैठती है। और तब जरूरी हो जाता है खुद को उस तनाव से मुक्त करने के लिए सृजन-रत हो जाना और उस भाव या याद से रिक्त होना।
प्रकृति और इसका सौंदर्य , जुझारुपन और इसकी निरंतरता व नियम और संयम भी एक सहज प्रेरणा रही है । एक एकात्म दिखा है हमेशा प्रकृति और मानव के मन में भी और उनके विकास और विनाश में भी। कई रचनाएँ हैं इस तरह के विषयों पर विशेषतः कविता। कोई भी विधा हो , खुद ही लिखवा लेते हैं विचार अपनी कहानी या कविता और मैं एक सम्मोहित माध्यम मात्र हूँ…एक उपकरण उस तत्कालीन मनःस्थिति की अभिव्यक्ति या चित्रण का। तनाव और अनुभूतियों के निरंतर के मंथन के गहन पलों से मुक्ति तो दिलाती ही है ये, अक्सर अवर्चनीय सुख भी देती है। फिर अगर दूसरों को भी पसंद आए तो नशे का दुगना हो जाना भी स्वाभाविक ही है।
शब्दों और रंगो के इस जादू ने बचपन से ही खूब भिगोया, डुबोया और बहाया है। शरद. हार्डी , टैगोर, ह्यूगो, प्रेमचन्द, अमृता प्रीतम से लेकर कबीर और दुष्यंत कुमार, बशीर बद्र, निदा फाजली, तुलसी और पाश , रघुबीर सहाय और मुक्तिबोध व अज्ञेय से लेकर बलबिंदर चीमा…इन अभिन्न मित्रों की सूची आज भी तोदिन-प्रतिदिन लम्बी ही होती जा रही है। बस एक आदत, एक जरूरत, एक मजबूरी, खुद को और आसपास को समझने की अदम्य इच्छा व अथक धुन, यही तो है मेरे सृजन की वजह आज भी । जिन्दगी और इसकी परिधि में, और अक्सर इस वर्तुल से बाहर के इन्सानों से भी प्यार , उनके सुख-दुख साझा करने की, उन्हे समझने की ललक बचपन से ही रही है और जब जब अनुभूति तीव्र हुई है तो इन्ही रचनाओं ने ही सुलझाया और समझाया भी है। पर आज भी नही कह सकती कि यह रचना का बीज कब और कैसे पड़ा मन में, या फिर क्यों और कैसे जन्म लेती है कोई भी रचना…कभी एक उद्वेगी कै की तरह तो कभी एक सुरभित मन्द बयार की तरह धीरे-धीरे मन को सींचती और संभालती हुई भी तो।
जब जो मन को छू जाए, याद रह जाए, वही तो प्रेरणा बनकर अंतर्मन में जा धंसता है। पर गडमड होकर, एक भाव, एक अहसास या फिर एक सीख और याद बनकर। धीरे-धीरे यही तो अनुभव व यादों के रंग बिखेर देते है , जिसे कल्पना की कूंची कभी शब्दों में तो कभी रंगों में उकेर और बिखेर देती है। इस रचनात्मक प्रक्रिया पर किसका प्रभाव सर्वाधिक पड़ा, अकेला एक नाम लेना आज भी उतना ही मुश्किल है पर जितना कि सूरज की रश्मियों से मात्र खुली आँखों द्वारा इंद्रधनुष के सातो रंगों को अलग करने की कोशिश करना।
हाँ कुछ लोगों ने अवश्य सहज ही प्रभावित और प्रोत्साहित किया। यह वही लोग हैं जो मेरे प्रिय और अपने हैं। कई तो आज भी भौतिक रूप में न होकर भी साथ हैं। इनमें पिताजी, कुछ सिक्षक और कुछ मित्र व अपनों ने विशेष भूमिका निभाई इस अनगढ़ मन को गढ़ने और दिशा देने में।…माँ और स्नेही सखियों ने, बच्चों ने संजीवनी की तरह इसे तरल रखा। और कबीर प्रसाद तुलसी जैसे लेखक उंगली पकड़कर साथ ही चले सदा ।
बस एक आदत, एक जरूरत, एक मजबूरी, खुद को और आसपास को समझने की … निरंतर ललायित जिज्ञासु मन सदा तैयार रहा है स्पंज की तरह सब सोखने और मथने को .और फिर सीखा-समझा अभिव्यक्त कर देने को। एक बावरी धुन ही तो है यह सृजन प्रक्रिया …जैसे कि खाना बनाना और उसे सुरुचि और प्यार से परोस देना और फिर सामने वाले को स्वाद लेकर खाते देखकर खुद भी तृप्त हो जाना।
सहज है सृजन शायद नारी के लिए, कोई भी उपकरण दे दें आप इसके हाथ में, सूई , कलम , कूंची से लेकर आटा, दाल, मसाला से लेकर घर या बगीचे का एक कोना या फिर पूरा विश्व-फलक, जहाँ भी संवेदना आलोड़ित होगी…मन को छुएगी घटना, दृष्टि या प्रकृति , स्वतः ही तो जनम ले लेती है एक नई संरचना। कई बार तो एक खबर मात्र इतना विचलित कर सकती है कि प्रतिक्रिया जरूरी हो जाती है। कुछ कहानी हैं जो निजी अनुभव से जन्मी हैं जैसे कनुप्रिया, जिज्जी और आम आदमी वगैरह, तो कुछ मात्र खबरों से ही जन्मी हैं-जैसे कि कहानी चरैवेति, युद्ध में बुद्ध आदि और दोनों ही तरह की रचना बराबर ही सशक्त हैं। बात यह नहीं कि हम क्या लिख रहे हैं बल्कि कितना डूब चुके हैं विषय में। मेरे लिए परकाया प्रवेश है लेखन। फिर एक भावुक और संवेदनशील मन बिखरे को सजाने और सुधारने से कैसे रोक सकता है खुद को कभी, चाहे आप इसे लेखन का नाम दें या कला का और मेरी समझ से तो जिन्दगी को शब्दों में धरोहर की तरह संजोने की निरंतर की क्रिया है लेखन।
अनुभूति तीव्र हुई तो इन्ही रचनाओं ने ही सुलझाया और समझाया भी है और इनकी जन्मदात्री या प्रेरणा कुछ भी हो सकती है- एक चुभती घटना या बात, कोई अद्भुत दृश्य, कोई गुदगुदाती या रुलाते दृश्य, या दुर्व्यवहार और अन्याय, उसकी पीड़ा, एक अच्छी और ससक्त रचना या किताब, कुछ भी। जितना बाहर उतना ही अपने इर्द-गिर्द और अंदर भी तो घूमता रहता हैं बावरा मन। कल्पना की उंगली पकड़े सदा ही, मोहक रंग भरने को , सजाने-संवारने को , कड़वी दवा को मीठा करने को ललायित भी।
जिन्दगी और इसकी परिधि में, और अक्सर ही इस वर्तुल से बाहर भी बसते इन्सानों के प्रति एक आकर्षण एक जिज्ञासा रही है, साथ-साथ एक हमदर्दी भी। उन्हें पढ़ना और जानना, उनके सुख-दुख साझा करना, उन्हे और उनके परिवेश को समझने की इच्छा जब भी तीव्र हुई तो सारी पीड़ा सारी कसक के बावजूद भी कांटों पर खिलते गुलाब-सी रचना आकार ले ही लेती है । शब्द या रंगों का चयन भी वह पल खुद ही करता है । अंतस का हठ योग है सृजन मेरे लिए और रचना उस तीव्र अनुभव की अभिव्यक्ति का एक सरल और सहज निमित्त ।
आलोचक चाहे जैसे भी परखे, पल-पल का साथ निभाती यह सृजन वेदना, मात्र सुन्दर ही नहीं, एक शगल और मनोरंजन ही नही, शिव और सच भी है मेरे लिए । कोई लड़ाई तभी तो लड़ी जाती है, जब कुछ बचाने या और बदलने की चाह हो ? फिर आजकल तो बेहद ही जटिल समय में जी रहे हैं हम । अन्याय और असमानता की भावना दिन-प्रतिदिन तीव्र से तीव्रतर ही होती जा रही है। कभी बीमारी, तो कभी लड़ाई, तो कभी कृतिम बुद्धि के डरावने असुर खुद ही तैयार कर रहा है आज का मानव और उसका दौड़ता-भागता समाज, वह भी मात्र आर्थिक फायदे या दूसरों के ऊपर अपनी महत्ता दर्शाने के लिए या अपने को विशिष्ट सिद्ध करने के लिए ही। और इस प्रक्रिया में प्रकृति ही नहीं जीवन तक को उतना ही जटिल कर डाला है जितनी कि जटिल हो चली है उसकी दिन-प्रतिदिन विकसित होती बुद्धि।
फिर अब तो कृतिम बुद्धि भी है इस प्रक्रिया को और अदिक तेज कर देने को।
कई बार इस समझने और जानने, या इनसे आहत होकर कुछ अजीबोगरीब युद्ध पर, व्यभिचार पर और पैरा नौर्मल आदि अबूझ विषयों पर भी कहानियाँ निकली हैं कलम से। शायद अबूझ को समझने की प्यास भी है सृजन। मन के अंधेरों ने डराया तो भी तो कलम ही संभालती है। अंघ्रेजी में कहावत है कि ओनली चाइल्ड इज ए लोनली चाइल्ढ। और बचपन से ही भीड़ में भी अक्सर खुद को अकेला ही पाती हूँ, जहाँ बस मैं और मेरी अपनी दुनिया है । सौ से अधिक आलेख और उससे दुगनी , तिगनी कविताएँ जमा हो चुकी हैं मन की इस अबूझ को समझने और जानने की जिज्ञासा व जिद्दी कल्ना की उड़ान और भटकन की गवाह बनकर। मृत्यु से संबंधित अनुभवों पर पूरा ग्यारह कहानियों का संकलन ‘सुरताल’ आ चुका है और युद्ध व इसकी जटिलता पर लिखी ग्यारह कहानियाँ –‘नागफनी पर तितलियाँ’ शीघ्र ही आपके हाथ में होंगी, जो वर्तमान आक्रामक वैश्विक परिस्थिति और जटिलता से जन्मी हैं। करीब -करीब ६० कहानियाँ रिश्तों और मानव मन की जटिलता पर भी हैं। रोजमर्रा की जिन्दगी और मनोविज्ञान के इर्दगिर्द घूमती। विचारों का यह आलोड़न कई बार तो पूरा बंधक बनाकर ही श्रम करवाता है। खाना-पीना सब भूल जाती हूँ इस प्रसव वेदना के रहते। कहानी लिखना अच्छा लगता है क्योंकि यहाँ पात्रों के पीछे आसानी से छुपा जा सकता है। सबकुछ छुपा ढका है, व्यक्तिगत होकर मुखर नहीं। जबकि कविता आत्मा का नग्न नृत्य है। सब कुछ जस-का-तस रख देती है। प्यार, गुस्सा, चिन्ता, राग-वैराग , सभीकुछ। छुपने की जगह नहीं कविता में। अपने आलेखों को मंथन या खुद को ही समझने और समझाने का प्रयास कहूंगी। यह मेरी निरंतर की विद्यार्थी मानसिकता के ईधन रहे है। अंदर की आग को जली रखते हैं। लिखने का कोई क्रम या नियम भी नहीं रहा। जीवन की आपाधापी से जब भी समय चुरा सकूँ, तभी लिखने बैठ जाती हूँ। विचारों की आंच पर सदा ही कुछ-न-कुछ उबलता रहता है। पर कोई अनिवार्यता नहीं। इसलिए कुछ रचना अकाल मौत भी पा लेती हैं, विशेषतः तब जब पारिवारिक जिम्मेदारियों और कर्तव्य के आड़े आ जाएँ।
मेरे लिए लेखन जीवन और जीने की निरंतरता है लेखन। मन की यह तीव्रता या अनिवार्यता बाध्य करती है कि बाहरी परिस्थितियों और दबाव के रहते हुए भी अंतर्मन की सुनी जाए, अपने और दूसरों के सुख-दुख साझा किए जाएँ।
पिछले ढाई दशक से बेहद सक्रिय रही हूँ सृजन में, मानो एक दबा सोता फूट पड़ा है । सृजन का यह वेग बिल्कुल वैसा, जैसे कि बीज के अंकुरित होने का पल, या फिर गोश्त में अंदर तक जा धंसे काँटे की चुभन, जो प्रष्फुटित होकर ही चैन लेने देती है। इस तनाव और लगाव से मुक्ति ही शायद प्रमुख वजह है मेरे लेखन की। इसी दबाव के नीचे, सामंजस्य ढूँढती अक्सर कल्पना लोक में भी जा छुपती हूँ। प्रायः अवचेतन से खुद ही जनमती हैं रचना और सृजन की यह गति आगे की ओर ले जा रही है या पीछे को यह फैसला भी पाठकों पर ही छोड़ रखा है मैंने। मेरी कलम तो इस गति की हर गूंज-अनुगूंज को पकड़ने में ही व्यस्त रही है।
कोई क्रम, नियम या अनिवार्यता भी नहीं रही। बस सांसों-सा सहज हो चुका है लिखना-पढ़ना। बचपन में कुछ छुटपुट रचनाएँ रची थीं, जिन्हें खूब पसंद भी किया गया था और सहपाठिनों व शिक्षकों से खूब प्रेत्साहन भी दिया था। जिसने कलम को जीवन भर का एक आत्मविश्वास दिया। पर अचानक पारिवारिक जिम्मेदारियों के नीचे शादी होते ही सब बन्द भी हो गया । लिखना निजी पत्रों तक ही सीमित रह गया। फिर कुछ बेहद निजी विछोह और आघात के बाद, 20-25 वर्ष के लम्बे अंतराल के बाद लेखनी खुद ही हाथ में वापस भी आ गई। और तब दो कविता ‘अतीत के खजाने से’ और ‘बिछुड़ते समय’ स्वतः ही आधी रात में आंसू भीगे कागज पर उतरी थीं। अभूतपूर्व शांति मिली थी, मानो मन के अंदर का पकता फोड़ा फूट गया, दुख और विषाद को बाहर निकलने का मुहाना मिल गया था तब।
आलोचक चाहे जैसे भी परखे , पल-पल साथ निभाती यह सृजन वेदना, मात्र सुन्दर ही नहीं, शगल और मनोरंजन ही नही, शिव और सच भी है मेरे लिए। कोई भी लड़ाई तभी लड़ी जाती है, जब कुछ बचाने या बदलने की चाह और जरूरत हो। लेखन, जीवन और प्रकृति दोनों के संघर्ष का प्रतिबिम्ब भी है और मीठा फल भी, मन के मौसम की बदलती ऋतु है सृजन मेरे लिए।
लगातार लिख रही हूँ। भावों का यह वेग इतना तीव्र है कि चाहूँ तो भी स्थिर या निर्लिप्त नही रह पाती। रचना की यह गति किधर ले जाएगी, असंभव है जान पाना। कलम आगे-आगे और मैं सम्मोहित-सी पूर्णतः कलम के नियंत्रण में ही तो? सृजन के उस चयनित या आवेगी पल की गति की हर गूंज अनुगूंज को पकड़ने में—समझने में ही लगी रहती है कलम। क्यों लिखती हूँ मैं, ईमानदारी से कहूँ तो आज तक नहीं जान पाई, शायद यही स्वभाव है मेरा , जैसे पानी का बहना, फूलों का खुशबू देना या आँच के बहुत पास जाने पर झुलसा भी जाना… मेरे लिए तो बस इतना ही काफी है कि रचना ने जन्म लिया और मुझे पीड़ा या ग्लानि या फिर सुख के अतिरेक से मुक्ति दिलाई, सहज कर दिया।
शौक जो खुद को बहलाने और समझाने के प्रयास में शुरु हुआ था, आज भी स्वान्तः सुखाय ही है। परन्तु जबसे इसमें बांटने और जुडृने की इच्छा भी आ जुड़ी है, परहिताय भी तो ही हो गया है यह। इनसान अकेला टापू तो नहीं? धरती-आकाश की तरह समाज का इनसान पर और इनसान का समाज पर असर पड़ता ही है। हमसे ही तो समाज बनता है। अगर मेरे साथ-साथ मेरे लेखन से पाठकों को भी आनंद मिलता है या फिर अपरोक्ष रूप से ही सही, कुछ सीखते और समझते हैं, तो यह भी मेरी क्षुद्र लेखनी का सौभाग्य ही है जिसके लिए मैं तहेदिल से आभारी हूँ और रहूंगी ईश की, अपने माता-पिता व उन सभी गुरु जनों की… खुद इस जिन्दगी की भी, जिसने विविध अनुभव दिए, सिखाया और समझाया, स्वभावगत एक तीव्र जिज्ञासा और लगन दी। धैर्य के साथ-साथ विचारों को सवाल पूछती, जबाव मांगती विद्रोही असंतुष्टि और सृजनात्मक आत्मदृष्टि भी दी ।…

शैल अग्रवाल
बरमिंघम, यू.के.
संपर्क सूत्रः shailagrawal@hotmail.com
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