कई बार यह देखा गया है कि समाज हमारे स्वतंत्र व्यक्तित्व , हमारी व्यक्तिगत विचारधारा या मान्यता पर गौर ना करते हुए हमारे समुदाय के, हमारे वर्ग के अन्य सदस्यों द्वारा किए जा रहे क्रिया-कलाप के आधार पर हमारा मूल्यांकन करता है|हमें हमारे वर्ग, हमारे समुदाय के कृत्यों की जवाबदारी भी लेना पड़ती है और समुदाय के कुछ लोग यदि कुछ गलत करते हैं तो उसका खामियाजा भी हमें भुगतना पड़ता है |
ऐसा अक्सर होता है|
आप कहेंगे कि नहीं यह उचित नहीं है | ऐसा नहीं हो सकता | तो फिर मैं आपको सलाह दूंगा नगर के संभ्रांत सुशिक्षित कालोनियों में अपने रहने के लिए एक अच्छे से मकान को ढूंढते हुए अशफाक खान से मिलने का | जी हां अशफाक खान अभी अभी ट्रांसफर होकर इस शहर में आए हैं अपने रहने के लिए किसी व्यवस्थित कालोनी में आवास खोजते हुए उन्हें 20 दिन से ज्यादा हो चुके हैं | अपने बॉस के साथ रोजाना शाम को ऑफिस ड्यूटी करने के बाद निकलते हैं | मकान उन्हें मिलते हैं , उन्हें पसंद भी आते हैं | मकान मालिक उनसे आदर के साथ बात भी करते हैं लेकिन जैसे ही किराया चिट्ठी लिखने की बात आती है और अशफाक खान अपना परिचय देने लगते है कि सारी बातें टूटने लगती है ,| बड़ी दिलचस्पी से बड़े आदर से अपना मकान दिखाने वाला वह मकान मालिक अचानक अपने आप को सीमित कर लेता है | कोई कहता है कि मैं अपने बेटे से राय लेने के बाद आपको बताऊंगा | कोई कहता है कि हमने किसी दूसरे को वादा कर रखा है | यह स्पष्ट लगता है कि वह गोलमाल बात कर रहे हैं |
उनकी मर्जी मकान देने की नहीं है| कारण जो भी हो लेकिन अशफाक खान परेशान है|
बॉस मालवीय जी सलाह देते हैं अशफाक खान को कि मस्जिद के पीछे वाले शेखूपूरा मोहल्ले में हमें मकान मिल जाएगा हम वहीं पर चलते हैं | अशफाक खान मालवीय जी के साथ शेखुपुरा मोहल्ले में जाता है | यह मोहल्ला निम्न मध्यमवर्गीय मुस्लिम परिवारों के अस्त-व्यस्त बेतरतीब बने हुए मकानों से , अतिक्रमण से घिरा हुआ कच्ची पक्की सड़कों वाला इलाका था | अशफाक खान ने वहाँ सड़क पर ही कई नंग धड़ंग बच्चों को खेलते हुए एक दूसरे को गालियां देते हुए पाया | उसे वहाँ का वातावरण जरा भी रास नहीं आया उसने मालवीय जी की और कुछ असहज नजरों से देखा | मालवीय जी को मालूम था कि यह मोहल्ला अशफाक खान को पसंद नहीं आएगा लेकिन वे परेशान हो चुके थे| थक चुके थे| अशफाक खान ने कहा बॉस ऐसी जगह मिलती है रहने के लिए तो मैं कोशिश करके अपना ट्रांसफर वापस करा लूंगा | मैं नहीं रह सकता ऐसी जगह |
रात को वापस लॉज में अपने कमरे में आकर पलंग पर आराम करते हुए अशफाक खान दो दिन पहले कि वह घटना सोच रहा था जब उसे मालवीय जी एक अच्छी सी कॉलोनी में ले गए थे | एक मल्टी में एक बढ़िया सा फ्लैट उसे पसंद आया था | मकान मालिक ने उसका वेलकम किया था फ्लैट का निरीक्षण कराया था किराया भी उसकी भुगतान क्षमता के अनुसार ही था | अशफाक खान ने जब मकान मालिक को बताया कि उसे फ्लैट पसंद है वो लेना चाहता है तो मकान मालिक भी बहुत खुश हुआ| जब लिखा पढ़ी के लिए उसने बताया कि वह अशफाक खान रूबी पाइप कंपनी में प्रोडक्शन मैनेजर है | परिवार सहीत रहेगा अशफाक खान ने पाया कि उसी क्षण मकान मालिक के चेहरे की रंगत बदलने लगी वह कुछ असहज सा लगने लगा और कुछ ही क्षणों के बाद उसने कहा ठीक है साहब दो-तीन दिन बाद मेरा बेटा आएगा तब मैं उससे पूछने के बाद ही आपको जवाब दे पाऊंगा | मकान मालिक के जवाब से निराश , पिछले तीन सप्ताह से भटकने के बाद अशफाक खान समझ चुका था कि इस शहर की संभ्रांत कॉलोनी में अच्छे किस्म का मकान मिलने में क्या रुकावट आ रही है ? क्यों उसे एक सामान्य व्यक्ति नहीं समझा जा रहा है? उसे एक वर्ग विशेष का व्यक्ति जानकर हर कोई उसे मकान देने में कतरा रहा है|
यह सारी परिस्थिति देखते हुए अशफाक सोच रहा था की मैंने ऐसा क्या गलत काम किया है जो ये लोग मुझे मकान देने से बच रहे हैं ? मैंने कहीं कोई बम या बारूद नहीं चलाया मैंने कहीं इस्लाम का झंडा भी नहीं फहराया ना ही मैंने समाज में नफरत फैलाने की , दहशत फैलाने की कोई बातें की फिर मुझसे इतनी नफ़रत क्यों ?
अशफाक की इन शिकायतों का जवाब देने वाला तो कोई नहीं था | किसी से पूछना भी तर्क संगत नहीं था लेकिन समझ सब रहे थे | अशफाक भी इस व्यवहार का कारण समझ रहा था | उसे अपने समुदाय के उन कई कई लोगों पर भी बहुत गुस्सा आया जो अक्सर गैर जिम्मेदार बयानबाजी करते रहते हैं , कई आपराधिक और असामाजिक गतिविधियों में लगे रहते हैं | ऐसे कुछ लोगों के कारण पूरे समुदाय की बदनामी होती है , गलत छबी बनती है और सामान्य लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है | लेकिन ऐसे कुछ लोगों के कारण सब को गलत समझना भी तो उचित नहीं है | अन्याय है ये | उसकी मान्यता बिल्कुल स्पष्ट थी कि किसी धर्म विशेष के या किसी विचारधारा विशेष के विरुद्ध नफ़रत भरी बयानबाजी करना और समाज विरोधी कृत्यों में भाग लेना बिलकुल अनुचित है और कभी भी लाभदायक नहीं हो सकता|
आज शुक्रवार का दिन था कल अशफाक खान को ड्यूटी करने के बाद वापस अपने परिवार के पास जाना था| उसने तय किया था कि आज शाम को और मकान खोज लिया जाए और यदि कोई सुविधाजनक ठिकाना ना मिले तो पत्नी और बेटे को यहाँ ना लाकर उसके मायके में छोड़ दिया जाए|
रोजाना की तरह शाम को पाँच बजे आज फिर मालवीय जी के साथ अशफाक खान ने नगर की एक अन्य कॉलोनी का रुख किया जहाँ किन्ही रामबाबू शर्मा का मकान उसे अच्छा लगा| बातों बातों में उसे पता लगा कि रामबाबू भी बहुत दिनों से किराएदार के लिए परेशान थे| मकान खाली होने का उन्हें दुख था| बेटा वहीं किसी विभाग में नौकरी करता था| अशफाक खान को मकान पसंद आया लेकिन तत्काल उसके दिमाग में यह भी आया कि, मैं एक मुस्लिम समुदाय से संबंध रखता हूँ यह जानकर मकान मालिक रामबाबू शायद ही उसे मकान किराए पर दे| उसने बहुत शांत संभ्रांत तरीके से रामबाबू को पहले ही बतला दिया कि मैं एक मुस्लिम हूँ इसलिए आप पहले अपने परिवार से सलाह ले लीजिए इसके बाद मुझे जवाब दीजिएगा|
अशफाक खान को आश्चर्य था कि अपनी मुस्लिम होने की बात रामबाबू को बताने के बावजूद उनके व्यवहार में उसे कोई अंतर नहीं दिखा था| रामबाबू ने बड़े सकारात्मक लहजे में बताया कि मुस्लिम होने से क्या फर्क पड़ता है| बेटा मेरी बात का विरोध नहीं करेगा पर हाँ मैं शाम को उससे पूछ कर आपको कल जवाब दे दूंगा|
मालवीय जी और अशफाक खान जा चुके थे| अपने घर के बाहर कुर्सी पर बैठे पिछले तीन महीने से खाली मकान को देखते हुए रामबाबू बड़ी आशा से सोच रहे थे कि यदि यह किराएदार आ जाता है तो तत्काल किराए की राशि प्राप्त होने लग जायेगी और घरेलू खर्च निकलने में सहायता होगी |
राम बाबू के दिमाग में हिन्दू मुस्लिम वाली बात आई ही नहीं थी| वो उस पुराने जमाने के व्यक्ति थे जब मोहर्रम के जुलूस में हिंदू परिवार भी शामिल होते थे| ताजिए के नीचे से हिंदू महिलाएं अपने बच्चों को लेकर निकलती थी और इसी तरह रामनवमी के जुलूस में या कृष्ण जन्म के डोले के जुलूस में मुस्लिम परिवार के लोग भी लाठी डंडे घुमाते थे| डोले पर नारियल कंकड़ी और अनाज चढाते थे| उनके पुराने मित्रों में रोशन पटेल और काजी जी और असगर मियाँ ख़ास माने जाते थे| लेकिन उन्हें यह भान नहीं था कि अब वह ज़माना बीत चुका है और गंगा जमुना में बहुत पानी बह चुका है| नए जमाने की जहरीली विषाक्त हवा से वो परिचित नहीं थे| इसीलिए उन्होंने बड़े विश्वास से बड़े प्रेम और आदर से अशफाक खान को कहा था कि बिल्कुल साहब यह मकान आपको दे देंगे |
शाम होते होते उनका बेटा नरेश घर आया| रामबाबू शर्मा ने दिलचस्पी से पूरे विस्तार से मकान देखने आने वाले के बारे में बताया और कल उन्हें सहमति का जवाब देने की मंशा प्रकट की| आने वाले किरायेदार का नाम अशफाक खान है, यह सुनते ही नरेश ने दो टूक अपने पिता से पूछा, बापू यदि मकान गंवाना हो, यदि अपने मोहल्ले में दंगे करवाना हो तो उसको हाँ कह देना और ऐसा नहीं चाहते हो तो चुपचाप बैठे रहो जब कोई ढंग का किरायेदार आयेगा तब देखेंगे |
रामबाबू चौंके उन्हें कुछ समझ नहीं आया| उन्होंने नरेश की बात से असहमत होते हुए उसे बताया कि अशफाक खान एक पढ़ा लिखा नोकरी करने वाला सभ्य आदमी लग रहा था| और फिर किसी भी समुदाय के सभी लोग एक जैसे नहीं होते हैं| हर समुदाय में अच्छे भी लोग होते हैं बुरे भी लोग होते हैं| हमें बुरे लोगों से नफरत करना चाहिए लेकिन अच्छे लोगों को तो सम्मान देना चाहिए| मुझे वो इंसान अच्छा लगा इसलिए मैंने उससे वादा किया है कि सोमवार को मैं उन्हें मकान दे दूंगा| तुम ज्यादा चिंता मत करो वैसे भी हम बहुत तंगी में चल रहे हैं| वह अच्छा आदमी है सड़क छाप गुंडे मवाली जैसा नहीं है|
बापू किसी के भी चेहरे को देखकर अंदाजा मत लगाओ कि वह कैसा है और उसके साथी लोग कैसे हैं | तुम्हें पास वाली कॉलोनी का किस्सा नहीं मालूम है क्या?
नहीं तो , क्या हुआ बेटा पास में ?
वहाँ पर जो लाखन सिंह रहता है, चपरासी सिंचाई विभाग का| उसने अपने मकान का आधा हिस्सा तौकीर मियां को किराए पर दिया था आजसे चार-पांच साल पहले और बदले में कुछ पैसा उधार भी ले लिया था अग्रिम| हालत खराब थी लाखनसिंह की| तौकीर मियाँ का कर्ज वो चुका नहीं पाया| ब्याज लगते लगते उधारी की रकम बढ़ती गई| लाखन सिंह मजबूर होने लगा तो किसी ने उसे सुझाव दिया कि आधा मकान वह बेच दे| मजबूर लाखन सिंह ने आधा मकान बेचने के लिए अपने वालों से जुगत लगाईं| तौकीर मियाँ को पता चला तो उन्होंने भी कोई आपत्ति नहीं ली और सहमति दी की यदि कोई यह मकान खरीदेगा तो वे तुरंत मकान खाली कर देंगे| लाखनसिंह को अछा लगा तौकीर मियाँ का यह व्यवहार| लेकिन एक हफ्ते के अन्दर ही ना जाने क्या हुआ की तौकीर मियाँ एक दम बदले बदले से लगे| उन्होंने और उनके साथियों ने चालाकी से किसी और को वह मकान नहीं लेने दिया और खुद ने ही खरीद लिया| कुछ ही दिनों बाद तौकीर मियाँ ने वह मकान नगर की एक मुस्लिम संस्था को दान में दे दिया| हालांकि बाद में पता चला की मकान की कीमत भी उस संस्था वालों ने ही चुकाई थी|
तो बेटा इसमें कुछ गलत हुआ क्या?
आगे सुनो बापू, कुछ दिनों बाद जिला प्रशासन में एक आवेदन दिया गया कि उस कॉलोनी में रहने वाले चार पांच मुस्लिम बुजुर्ग लोग जो नमाज पढ़ने शहर में स्थित मस्जिद तक नहीं जा सकते थे उन्हें उस स्थान पर नमाज पढ़ने की इजाजत दी जाए| जिला प्रशासन ने सहजता से सामाजिक सौहार्द की भावना बताते हुए बुजुर्गों को नमाज पढ़ने की इजाजत दे दी| कॉलोनी में रहने वालों ने कुछ विचित्र जरूर महसूस किया लेकिन उन्होंने विरोध भी नहीं किया और इस बात को एक धार्मिक कृत्य मानते हुए स्वीकार किया|
लेकिन चार छ महीने बाद कालोनी वाले चौके, जब उन्होंने देखा कि उस मकान के बाहर चौक में हरे रंग का एक तंबू तान दिया गया था और वहाँ शहर के कुछ युवा लड़के और बुजुर्ग भी नमाज पढ़ने आने लगे थे| यह आश्चर्य तब और बढ़ता गया जब वहाँ पर दोपहिया वाहनों से और कभी-कभी फोर व्हीलर से अन्य नजदीकी कस्बों से और नजदीकी शहर से नए-नए अनजाने लोग नमाज पढ़ने आने लगे| इस तरह नमाज पढ़ने वालों की संख्या बढ़ती जा रही थी |
रामबाबू आश्चर्य से बेटे द्वारा कही जाने वाली सारी बातें सुन रहे थे| उन्हें इन सब गतिविधियों का जरा भी पता नहीं था| बेटे नरेश ने रामबाबू की आंखों में आंखें डालते हुए कहा बापू आश्चर्य मत करो अब वहाँ नियमित रूप से हर शुक्रवार को नमाज अदा होने लगी थी| तौकीर मियां के घर के सामने एक चोक था जहाँ हर साल गणेश चतुर्थी पर झांकी बनाई जाती थी और नवरात्री पर पूरे नो दिन गरबे होते थे तथा सुन्दर काण्ड का आयोजन भी होता रहता था|
एक बार शुक्रवार को हनुमान जयंती आने के कारण चौक में सुंदरकांड का आयोजन था और उसी दौरान वहाँ आए हुए नमाजियों द्वारा सुंदरकांड के आयोजकों से नमाज में व्यवधान आने के कारण लाउड स्पीकर बंद करने के लिए दबाव डाला गया| दोनों पक्षों में विवाद हुआ झगड़ा होते होते बचा| उस दिन कॉलोनी के हिंदू पक्ष के लोग बहुत बुरी तरह से चौंके, उन्हें भविष्य में आने वाली मुसीबत का भान हुआ|
कुछ ही दिनों बाद नवरात्रि पर्व आ रहा था| हर साल की तरह गरबे की तैयारियां हो रही थी| लेकिन गरबा प्रारंभ होने के पहले ही दिन जिला प्रशासन की तरफ से गरबा समिति को एक नोटिस मिला जिसमें निर्देशित किया गया था कि सामाजिक सौहार्द्र बनाए रखने के लिए सर्वधर्म समभाव के लिए यह उचित होगा कि नवरात्री अवधि के दौरान आने वाले शुक्रवार को गरबे करते हुए किसी भी प्रकार के माईक या वाद्य यंत्र का उपयोग नहीं किया जाए पूर्ण शांति बनाए रखी जाए और अन्य दिनों में भी लाउड स्पीकर का उपयोग सीमित किया जाए ताकि अन्य समुदाय के लोगों की धार्मिक गतिविधियों में कोई व्यवधान ना हो|
यह बहुत बड़ा संकेत था कॉलोनी के हिंदू समुदाय के धार्मिक आयोजनों में निरंतर बढ़ते अवरोधों का| नगर का सारा हिंदू समुदाय इसके विरोध में उठ खड़ा हुआ| समितियां गठित हुई आंदोलन किये जाने लगे प्रशासन को ज्ञापन दिए गए जिसमें बताया गया कि ये धार्मिक आयोजन जो पिछले बीस पच्चीस वर्षों से हो रहे हैं इन्हें किसी भी स्थिति में रोका नहीं जा सकता| पुराने कागज खंगाले गए शासन को स्मरण कराया गया कि इस स्थान पर केवल 4 बुजुर्गों को नमाज पढ़ने की इजाजत दी गई थी उसमें से भी दो बुजुर्ग अब जीवित नहीं रहे और अब कई कई जाने अनजाने लोग यहाँ आ कर हर शुक्रवार को नमाज पढ़ते हैं जिससे कालोनी का वातावरण अशांत हो रहा है भविष्य में कोई अनहोनी भी हो सकती है इसलिए यह सारी गतिविधि बंद की जाए |
हिंदू बहुल कॉलोनी होने से जिला प्रशासन के पुराने आदेश जिसमें केवल 4 बुजुर्गों को नमाज पढ़ने की इजाजत दी गई थी उसे देखते हुए जिला प्रशासन नवरात्रि के गरबे नहीं रुकवा सका| गरबे पूरे 9 दिन हुए लेकिन एक दहशत भरे वातावरण में| प्रतिदिन किसी भी अनहोनी की आशंका में कॉलोनी के हिंदू समाज के कई लोगों ने मकान बेचने वाले लाखन सिंह की सार्वजनिक रूप से भत्सर्ना भी की और इन घटनाओं के लिए उसको जिम्मेदार माना|
रामबाबू सारी घटना सुनकर स्तब्ध थे|
इतना कुछ हो गया था उन्हें नहीं मालूम था| यह तो बड़ा गलत हुआ, लेकिन अब क्या स्थिति है ?
बापू अब क्या स्थिति है सुनोगे आप तो शायद बेहोश हो जाओगे|
क्यों ऐसा क्या हुआ? रामबाबू फिर चौंके|
अभी 15 दिन पहले ही पता चला है कि इस कॉलोनी के कुल जो तीन चार मुस्लिम परिवार थे उन्होंने और नगर के अन्य कई महत्वपूर्ण मुस्लिम सज्जनों ने वक्फ बोर्ड दिल्ली को एक आवेदन भेजा है जिसमें यह निवेदन किया गया है कि वे इस प्रदेश के इस जिले के इस नगर की कॉलोनी में पिछले कई वर्षों से नमाज पढ़ते आए हैं| अब इस स्थान पर एक मस्जिद का निर्माण करना चाहते हैं मकान मालिक उक्त मकान वक्फ बोर्ड को देने के लिए तत्पर है अतः वक्फ बोर्ड उक्त भूमि( मकान एवं उसके आसपास का कुछ भाग) को जिला प्रशासन से अपने अधिकार में लेकर मस्जिद बनाने के लिए हमें उपलब्ध कराए|
इसके जवाब में वक्फ बोर्ड ने भारत सरकार से यह भूमि उपलब्ध कराने का निवेदन किया है और भारत सरकार ने प्रदेश सरकार को इस बाबत उचित कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं| इस पर प्रदेश सरकार ने जिला प्रशासन को मस्जिद निर्माण के लिए उक्त स्थान समुदाय विशेष को आवंटित किए जाने की संभावना तलाशने बाबद लिखा है|
फिर जिला प्रशासन ने क्या किया ? रामबाबू स्तब्ध थे!
जिला प्रशासन ने यह सार्वजनिक घोषणा की है कि उक्त स्थान मुस्लिम समाज को मस्जिद निर्माण के लिए देने में यदि किसी को कोई असहमति या विरोध हो तो एक माह में आपत्ति प्रस्तुत करें अन्यथा यह स्थान उन्हें देने की कार्यवाही की जा सकेगी|
मतलब एक माह में कोई आपत्ति प्रस्तुत नहीं करेगा तो वह जमीन वक्फ बोर्ड को दे दी जाएगी ?
बिल्कुल यही होगा|और फिर वक्फ बोर्ड यह मकान इन लोगों को मस्जिद निर्माण के लिए आंवटित कर देगा?
तब कुछ किया सब लोगों ने? रामबाबू के चहरे पर हवाईयां उड़ने लगी थी|
फिर क्या तत्काल नगर का और आसपास के क्षेत्र का हिंदू समाज संगठित हुआ|
जुलूस निकाला गया और एक विरोध पत्र जिला प्रशासन को दिया गया| अब उसके ऊपर क्या कार्रवाई होती है आने वाला समय बताएगा|
मतलब बेटा यह हुआ कि इन लोगों को मकान किराए से देना भी खतरे की घंटी है| मकान भी जाने का डर है और कॉलोनी में उपद्रव होने की संभावना भी बनती है और जिसके लिए जवाबदार कॉलोनी वाले हमको ही मानेंगे| फिर तो हमें क्या किसी को भी इस बारे में सोचना ही नहीं चाहिए| पर बेटा वो आदमी तो बहुत सज्जन लग रहा था मुझे,और परेशान भी|
हाँ बापू यह बहुत दुखद है| मुझे कहने में जरा भी खुशी नहीं है| कुछ लोगों की ऐसी हरकत के कारणों से ही अशफाक खान जैसे अच्छे सभ्य लोगों को किसी भी अच्छी संभ्रांत कॉलोनी में मकान मिलना मुश्किल हो रहा है| अब आपको ठीक लगे तो आप अपना मकान अशफाक खान को किराए पर दे सकते हैं|
अरे ना रे बेटा मैं कोई पागल हूँ जो अपना मकान अशफाक खान को किराए से देकर इस लफड़े में फसुंगा, बिल्कुल नहीं, कभी भी नहीं| मैं क्या कोई भी अकलमंद आदमी ऐसा बवाल मोल नहीं लेगा| हालांकि अशफाक खान जैसा शरीफ आदमी परेशान होगा उसका और उसके बच्चों का तो भविष्य बिगड़ेगा ही|
सही है बापू पर हम इसमें क्या कर सकते हैं| मैं नहीं कहता कि अशफाक खान गलत आदमी है या दोषी है या उसने कुछ किया है लेकिन ऐसा अक्सर होता है परिवार के दस सदस्य हों और उनमें से कोई एक भी कुछ गलत करता है तो उसके कारण दूसरे सदस्यों को भी परेशान होना पड़ता है| पूरे परिवार को सफाई देना पड़ती है बल्कि नुकसान भी उठाना पड़ता है| अब ऐसे में ये प्रश्न भी उठता है कि उन लोगों ने उस सदस्य की गलत हरकतों को क्यों नहीं रोका? यही बात किसी भी समुदाय पर या समाज पर लागू होती है| यदि हमारे समुदाय का कोई व्यक्ति गलत गैर सामाजिक हरकत कर रहा है| समाज विरोधी या देश विरोधी गतिविधि में लिप्त है, तो यह हमारी जवाबदारी है कि हम उसे रोकें उस पर अंकुश लगाएं और किसी भी अनुचित गतिविधियों के लिए उसकी भत्सर्ना करें तभी दूसरे समुदाय के, समाज के लोगों की हमारे प्रति सही धारणा बनेगी और किसी एक का दोष पूरे समुदाय पर नहीं थोपा जाएगा|
रामबाबू उस रात सो ना सके| बहुत परेशान हुए उनके विचारों में रह-रहकर अशफाक खान का सज्जनता लिए हुए परेशान सा चेहरा और उसका परिवार दिमाग में घूम रहां था उन्हें एक अपराध बोध हो रहा था कल सुबह मकान देने से इन्कार करने को लेकर| लेकिन नरेश के द्वारा बताए हुए संभावित घटनाक्रम की भयावहता भी उन्हें डरा रही थी|
जैसे तैसे रात गुजरने के बाद दूसरे दिन सुबह ही उन्होंने मालवीय जी को फोन लगाया पारिवारिक कारणों का बहाना बनाते हुए अशफाक खान को मकान देने में असमर्थता जता दी और लगे हाथ यह सलाह भी दे डाली कि मालवीय जी आपका मकान भी तो दो मंजिला है और छोटा सा परिवार है आप ही क्यों नहीं उस शरीफ आदमी को अपना मकान किराए से दे देते?
हड़बड़ा गए मालवीय जी|
रामबाबू मैं दे देता अपना मकान खान साहब को लेकिन मेरी समस्या यह है कि मेरी माता जी आर्य समाजी है पूजा पाठ में बहुत विश्वास रखती हैं नियम कायदे में बहुत कठोर है स्वच्छता और शुद्धता के लिए हम सब को डांट देती है उनके पूजा घर से पाँच हाथ दूरी तक भी कोई अशुद्ध बिना स्नान किया हुआ घर का सदस्य नहीं जा सकता | ऐसे में मैं कैसे अशफाक खान को अपना घर किराए से दे सकता हूँ | रामबाबू मन ही मन मुस्कुराए उन्हें अपना निर्णय बिलकुल सही लगा| यद्यपि उनकी सहानुभूति अशफाक खान के साथ थी लेकिन वह क्या करते ? किसी व्यक्ति के हितों को उसकी छबी को अच्छी बनाए रखने के प्रति जब उसका समुदाय ही , उसका समाज ही चिंतित ना हो तो अन्य कोई क्या कर सकता है| वह मालवीय जी को अपना निर्णय बता चुके थे और अब शांत थे कि उन्होंने अपना मकान और कालोनी में अपनी साख को संभावित खतरे से बचा लिया|

महेश शर्मा धारवाले लखनउ
जन्म -१ दिसम्बर १९५४
शिक्षा -विज्ञान स्नातक एवं प्राकृतिक चिकित्सक
रूचि -लेखन पठन पाठन गायन पर्यटन
कार्य परिमाण – लभग ४५ लघुकथाएं 80 कहानियां २०० से अधिक गीत२०० के लगभग गज़लें कवितायेँ लगभग ५० एवं अन्य विधाओं में भी
प्रकाशन – दो कहानी संग्रह १- हरिद्वार के हरी
२ – आखिर कब तक
एक गीत संग्रह- मैं गीत किसी बंजारे का ,,
दो उपन्यास १- एक सफ़र घर आँगन से कोठे तक
२—अँधेरे से उजाले की और
इनके अलावा विभिन्न पत्रिकाओं जैसे हंस , साहित्य अमृत , नया ज्ञानोदय , परिकथा , परिंदे वीणा , ककसाड , कथाबिम्ब , सोच विचार , मुक्तांचल , मधुरांचल , नूतन कहानियां , इन्द्रप्रस्थ भारती और एनी कई पत्रिकाओं में एक सौ पचास से अधिक रचनाएं प्रकाशित
एक कहानी गरम रोटी का श्री राम सभागार दिल्ली में रूबरू नाट्य संस्था द्वारा मंचन मंचन
सम्मान – म प्र . संस्कृति विभाग से साहित्य पुरस्कार , बनारस से सोच्विछार पत्रिका द्वारा ग्राम्य कहानी पुरस्कार , लघुकथा के लिए शब्द निष्ठा पुरस्कार ,श्री गोविन्द हिन्दी सेवा समिती द्वाराहिंदी भाषा रत्न पुरस्कार एवं अन्य कई पुरस्कार
सम्प्रति – सेवा निवृत बेंक अधिकारी, रोटरी क्लब अध्यक्ष रहते हुए सामाजिक योगदान, मंचीय काव्य पाठ, अन्य सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से सेवा कार्य
संपर्क — मो न ९३४०१९८९७६
ई मेल –mahesh .k111555@gmail.com
वर्तमान निवास – द्वारा ड़ा . गौरव शर्मा 301 तीसरा माला टी जी हॉस्टल न्यू फेकल्टी आवास “ खदरा “ इरादत नगर नियर पक्का पुल लखनऊ पिन 226020
–OO–