
यादराम बाबा के बेढब जूते
यादराम बाबा बहुत सीधे-सादे और हँसमुख इंसान थे। उनके चेहरे पर हमेशा हल्की-सी मुस्कान तैरती रहती थी। सन् 1942 के दौर में बाबा स्वाधीनता संग्राम के सेनानी रहे थे। उन्होंने पुलिस की लाठियाँ खाईं, जेल भी गए; लेकिन आज़ादी मिलने के बाद उन्होंने कलम उठा ली। वे एक बड़े राष्ट्रीय समाचार-पत्र समूह के नगर ब्यूरो चीफ बन गये थे और अपने शहर से एक छोटा-सा साप्ताहिक अखबार भी निकालते थे।
यादराम बाबा का मानना था—देश अभी आधा ही आज़ाद हुआ है, पूरी आज़ादी तो सच लिखने और लगातार लिखते रहने से मिलेगी।
इसी बीच एक दिन उनके जीवन में बहुत खास खबर आई।
डाकिए ने एक पत्र थमाते हुए कहा—“बाबा जी! दिल्ली से चिट्ठी आई है। राष्ट्रपति भवन की मुहर लगी है!”
यादराम बाबा ने चश्मा ठीक किया। लिफाफा खोला। पत्र को पढ़ते-पढ़ते उनकी आँखें चमक उठीं।
“अरे वाह!” उन्होंने खुद से कहा, “राष्ट्रपति भवन का निमंत्रण! पत्रकार प्रतिनिधि मंडल के साथ!”
वे इतने खुश हो गए कि सामने वाले मास्टर जी को आवाज लगा दी—“मास्टर जी! सुनिए, राष्ट्रपति जी की ओर से बुलावा आया है!”
उनकी आवाज सुन, मास्टर जी हँसते हुए अपने घर से निकले और बोले—“बधाई हो बाबा! अब तो आपको राष्ट्रपति जी के भी दर्शन होंगे।”
जिस दिन दिल्ली जाना था, उससे पहली रात यादराम बाबा मुहल्ले के लोगों के बीच बैठे देर तक अपने पुराने दिनों को याद करते रहे। अपने शहर में ‘अंग्रेजो, भारत छोड़ो’ आन्दोलन की अगुआई, पुलिस द्वारा लाठी चार्ज, जेल की कोठरी और आजादी मिलने पर तिरंगे का फहरना सब-कुछ याद आने लगा।
सुबह उन्हें बहुत जल्दी तैयार होना था। दिल्ली के लिए राज्य परिवहन निगम की पहली बस सुबह साढ़े पाँच बजे छूटती थी। मतलब यह कि घर से हर हाल में पाँच बजे निकल जाना था। अभी सूरज निकला भी नहीं था कि बाबा अँधेरे में ही उठ बैठे। जल्दी-जल्दी नहाए। कपड़े पहने और जूते पहनकर निकलने लगे।
शारदा अम्मा ने पूछा—“ठीक से देख तो लिया है न? कहीं कुछ भूल तो नहीं रहे?”
बाबा हँसते हुए बोले—“कुछ नहीं भूला भाग्यवती, सब ठीक ही है।”
राज्य परिवहन निगम की बस में बैठकर वे दिल्ली के कश्मीरी गेट वाले अन्तरराज्यीय बस अड्डे पहुँच गये। बस से उतरते ही उन्होंने कलाई घड़ी देखी। सुबह के आठ बज रहे थे।
“अभी काफी समय है,” उन्होंने सोचा, “प्रेस क्लब पहुँचने से पहले जूतों पर पॉलिश करा लूँ।”
बस अड्डे के बाहर, सड़क किनारे एक बूढ़ा मोची बैठा था। सफेद दाढ़ी, सिर पर पुरानी गाँधी टोपी। उसके समीप जाकर बाबा बोले—“भाई, जरा जूतों पर पॉलिश कर देना।”
मोची ने जैसे ही जूतों की ओर देखा, उसकी आँखें फैल गईं। वह ठहाका मारकर हँस पड़ा। बोला, “आप भी कमाल करते हैं बाबूजी!”
बाबा चौंके—“क्या हुआ भाई?”
मोची ने उँगली से दिखाते हुए कहा—“आपने एक जूता काला पहना है और दूसरा लाल। बताइए, किस रंग की पॉलिश करूँ?”
आसपास खड़े एक-दो लोग भी यह देखकर हँसने लगे। एक लड़का बोला—“दादा, ये तो मैचिंग नहीं है!”
एक आदमी ने कहा—“लगता है अपने शहर से नया फैशन ले आये हैं बाबू साहब।”
यादराम बाबा ने जूतों की ओर देखा। पहली बार उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ।
लेकिन उनके चेहरे पर शर्मिंदगी नहीं, मुस्कान आ गई। वे हँसते हुए बोले—“अरे भाई, सुबह जब घर से निकला, अँधेरा था। जूते भी सो रहे होंगे।”
उनकी बात सुन लोग हँस पड़े।
बाबा ने मोची से कहा—“सोचो मत। जिस रंग का जूता है, उसी रंग की पॉलिश कर दो। काले पर काली, लाल पर लाल।”
मोची ने ताली बजाई—“वाह बाबूजी! ऐसी समझदारी आजकल के लोगों में कहाँ!”
उसने पहले एक पैर से जूता निकाला और पॉलिश करते-करते बोला—“आप नाराज नहीं हुए?”
बाबा बोले—“नाराज क्यों होऊँ? गलती मुझसे हुई है या तुमसे?”
पास खड़ा एक लड़का बोला—“ताऊ, आप डर नहीं रहे कि लोग हँसेंगे?”
यादराम बाबा ने प्यार से उस लड़के के सिर पर हाथ रखा—“बेटा, जो खुद पर हँस सकता है, उस पर दुनिया क्या हँसेगी?”
कुछ ही देर में दोनों जूते चमकने लगे—एक काला चमचमाता, दूसरा लाल दमकता हुआ।
बाबा ने मोची को पैसे दिए और बोले—“आज तुमने मुझे दो जूते नहीं, दो सबक चमकाकर दिए हैं।”
मोची चकित रह गया—“कैसे सबक बाबूजी?”
बाबा मुस्कराए—“पहला यह कि—कोई गलती एकाएक सामने आ जाए तो घबराना नहीं; और दूसरा यह कि—सच को छिपाना नहीं।”
वहाँ से ऑटो लेकर वे सीधे प्रेस क्लब पहुँचे। अलग-अलग राज्यों से बहुत-से पत्रकार वहाँ पहुँच चुके थे। जब सभी एकत्र हो गये तो एक पत्रकार का ध्यान बाबा के जूतों की ओर गया। वह दिल्लगी करता हुआ बोला—
“जूते जान-बूझकर दोरंग के पहनकर आए हैं यादराम जी या गलती से!”
बाबा हँसकर बोले—“गलती से क्यों, प्रतीकात्मक पहनकर आया हूँ नटराजन जी। देश भी तो अलग-अलग रंगों, भाषाओं और बोलियों से मिलकर ही सुंदर बना है।”
उनका जवाब सुनकर सभी मुस्कराकर तालियाँ बजा उठे।
उस दिन यादराम बाबा दो अलग रंगों के जूतों के साथ ही राष्ट्रपति भवन पहुँचे; सभी कार्यक्रमों में शामिल हुए। लेकिन कोई शर्मिंदगी मन में नहीं थी। उनका सिर ऊँचा था और मन हल्का।
बलराम अग्रवाल
संपर्क : एफ-1703, आर जी रेजीडेंसी, सेक्टर 120, नोएडा-201301 उप्र
मोबाइल : 8826499115

माँ की सीख
एक था लड़का और एक थी लड़की।
लड़की का नाम था—सीमा और लड़के का नाम था—सुन्दर। दोनों परस्पर सगे भाई-बहन थे।
उनमें सीमा बहुत स्मार्ट यानी पढ़ने-लिखने में तेज-तर्रार थी जबकि भाई काम-काज और पढ़ने-लिखने से जी चुराने वाला था। बहन पढ़ने-लिखने के साथ घर के काम-काज में भी मम्मी का हाथ बटा देती थी। सुन्दर का मन न पढ़ाई-लिखाई में लगता था न काम-काज में। उससे जब भी किसी काम के लिए कहा जाता, उसकी जुबान पर बस एक ही वाक्य रहता—“माँ, मैं खेलने जा रहा हूँ।”
दूसरी ओर, माँ जब भी बेटी से कहती—“सीमा! जाकर तू भी कुछ देर खेल आ बेटी।”
वह कहती, “नहीं माँ! मेरा मन खेलने जाने का नहीं है।” और अपनी किताब खोलकर बैठ जाती।
परिणाम यह रहता कि सीमा क्लास टैस्ट में तो टॉप करती लेकिन शरीर से कमजोर दिखाई देती; और सुन्दर देखने में तो चुस्त-दुरुस्त दिखाई देता लेकिन पढ़ाई में फिसड्डी रहता।
एक दिन माँ ने उन दोनों को अपने पास बैठाया। दोनों के सिर पर प्यार से हाथ फिराया और कहा—“सुनो बच्चो! तुम दोनों में से एक का मन किताब छूने को नहीं करता है और दूसरे का मन खेलने जाने को नहीं करता है। ये दोनों ही आदतें गलत हैं। पढ़ने-लिखने का मतलब है—अपने मस्तिष्क को कसरत कराना और खेलने जाने का मतलब है—अपने शरीर को कसरत कराना। जितना स्वस्थ हमें मस्तिष्क चाहिए, उतना ही स्वस्थ हमें शरीर भी चाहिए। इसलिए सुन्दर को किताब-कॉपी की ओर ध्यान देना शुरू करना होगा और सीमा को सहेलियों के साथ खेलने जाना। ओके?”
“ओके माँ!” दोनों ने एक-साथ कहा।
उसी दिन से दोनों ने खेलने जाने और पढ़ने के लिए बैठने का अपना समय माँ की सहायता से निर्धारित कर लिया।
उस दिन के बाद सीमा का शरीर चुस्त रहने लगा और सुन्दर भी क्लास टैस्ट में अच्छे नम्बर लाने लगा।
आदिका अग्रवाल
कक्षा—3
विद्यालय—श्री चैतन्या टैक्नो स्कूल, निकट गौड़ सिटी सेंटर, ग्रेटर नोएडा-201318 (उप्र)
पता—आदिका अग्रवाल द्वारा डॉ॰ बलराम अग्रवाल, एफ-1703, आर जी रेजीडेंसी, सेक्टर 120, नोएडा-201301 (उप्र)
मोबाइल : 8826499115(बलराम अग्रवाल)