
तप्त धरा की देह से,बारिश का अभिसार।
खुश होकर वो कर रही, नित हरियर श्रृंगार।

कहाँ ग्रीष्म की वो तपन, स्वेदभरा वह दौर।
अब सावन में मन मगन, नाच रहे हैं मोर।।

गीत मगन हो गा रहे, धरती के भगवान।
पावस आते खुश हुआ, सबसे अधिक किसान।।

माँ धरती की पीर को, जलद हर रहे आज।
रिमझिम-रिमझिम बरस कर, छेड़ रहे ज्यों साज।।

बादल धरती से कहे, संचित कर लो नीर।
ग्रीष्मकाल में क्यों रहे, जलाभाव की पीर।।

बारिश के जल से किया, जिसने भी स्नान।
देह चमक कर हो गई, सचमुच स्वर्ण समान।।

बारिश से हर्षित हुए, सब रीते खलिहान।
खेत मगन होने लगे, फसलें हुईं जवान।।

शिवजी को भाये बहुत, अद्भुत श्रावण मास।
कथा बाँचती प्रकृति, होता है अहसास।।

बूँदें अमृतसम लगें, धरती पर उपकार।
धरा-गगन में बस रहे, ऐसा प्यार दुलार।।

बारिश भीषण देखकर, झुग्गी है भयग्रस्त।
छप्पर टपके तो हुआ, जीवन उसका त्रस्त।।

बूँद-बूँद संचित करें, यह तो है उपहार।
करे प्रकृति हर कदम, हम सब पर उपकार।।

जल जीवन का अंग है, जल से ही संसार।
जल न हो तो जिंदगी, हो जाये बेकार।।

गिरीश पंकज
(गिरीशचंद्र उपाध्याय)
व्यंग्यश्री, 2018, हिंदी भवन, नई दिल्ली
संपादक, सद्भावना दर्पण
(भारतीय एवं विश्व साहित्य के अनुवाद की त्रैमासिकी)
सेक़्टर -3, एचआईजी – 2/ 2 ,
दीनदयाल उपाध्याय नगर, रायपुर- 492010
मोबाइल : 94252 12720
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13 उपन्यास, 30 व्यंग्य-संग्रह, 4 कहानी-संग्रह, 7 ग़ज़ल-संग्रह सहित 110 पुस्तकें
22 खण्डों में गिरीश पंकज रचनावली प्रकाशित
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पूर्व सदस्य, हिंदी सलाहकार समिति, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत
पूर्व सदस्य, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली (2008-2012)
प्रांतीय अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ राष्ट्रभाषा प्रचार समिति
महा सचिव , हरिजन सेवक संघ, रायपुर
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