परिचर्चाः बाल साहित्य -बलराम अग्रवाल


बाल साहित्य में देशप्रेम, राष्ट्रीयता तथा भारतीय संस्कृति का भाव
बाल साहित्य बालमन के निर्माण का अत्यन्त प्रभावी माध्यम है। जो संस्कार, भावनाएँ और विचार बालक के मन में प्रारम्भिक अवस्था में अंकुरित होते हैं, वे उसके पूरे जीवन की दिशा तय करते हैं। इस दृष्टि से बाल साहित्य का उद्देश्य बालकों के भीतर नैतिक मूल्यों, मानवीय संवेदनाओं, देशप्रेम, राष्ट्रीयता और भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान का भाव विकसित करना भी है। देशप्रेम और राष्ट्रीयता एक-जैसे शब्द प्रतीत होते हैं; लेकिन इन दोनों में सूक्ष्म अन्तर है। देशप्रेम भावनात्मक जुड़ाव है, जबकि राष्ट्रीयता एक व्यापक सामाजिक और राजनीतिक चेतना है।
भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में बाल साहित्य की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यही वह माध्यम है जिसके द्वारा आने वाली पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों, राष्ट्रीय विरासत और सामाजिक मूल्यों से न केवल परिचित कराया जा सकता है; बल्कि जोड़े भी रखा जा सकता है।
बाल साहित्य का निर्माण करते समय सबसे पहले बालक के मनोविज्ञान को समझना आवश्यक होता है। बालक कल्पनाशील होता है। वह सरल भाषा में कही गयी बात को अधिक सहजता से ग्रहण करता है। यदि देशप्रेम, राष्ट्रीयता और संस्कृति जैसे गम्भीर विषयों को सीधे उपदेश के रूप में प्रस्तुत किया जाए तो वे बालक को आकर्षित नहीं कर सकते। इसके लिए आवश्यक है कि उसमें रचनात्मक साहित्य की विधाओं के माध्यम से रुचि उत्पन्न की जाये। इसलिए बाल साहित्यकार तत्सम्बन्धी विषयों को कहानी, कविता, लोककथा, पशु-पक्षियों के संवाद, ऐतिहासिक प्रसंगों और साहसिक घटनाओं के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार बालक अनायास ही इन मूल्यों को आत्मसात् कर लेता है।
उदाहरण के लिए, अनेक बाल कहानियों में ऐसे पात्र होते हैं जो अपने देश के लिए त्याग करते हैं, अपने समाज की रक्षा करते हैं या अपनी परम्पराओं का सम्मान करते हैं। इन पात्रों के माध्यम से बालक के मन में देश और संस्कृति के प्रति आदर का भाव जागृत होता है।
देशप्रेम का अर्थ केवल देश की प्रशंसा करना नहीं है, बल्कि उसके प्रति जिम्मेदारी और समर्पण का भाव भी है। बाल साहित्य में देशप्रेम का स्वर प्रायः ऐतिहासिक और प्रेरणात्मक प्रसंगों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अनेक प्रसंग बाल साहित्य में अत्यन्त लोकप्रिय रहे हैं। वीरों की गाथाएँ, स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान की कहानियाँ बच्चों को प्रेरित करती हैं। बाल कविताओं में भी देशप्रेम का स्वर स्पष्ट दिखाई देता है। ‘हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के’ या ‘नन्हा-मुन्ना राही हूँ, देश का सिपाही हूँ’ जैसे रोचक और प्रेरक फिल्मी गीत बालकों के मन में राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना जगाते हैं। इन रचनाओं का उद्देश्य बालकों में यह भावना पैदा करना होता है कि वे केवल अपने परिवार के ही सदस्य नहीं, बल्कि देश के भी जिम्मेदार नागरिक हैं।
बाल साहित्य में राष्ट्रीयता का अर्थ यह नहीं कि बच्चों को किसी प्रकार की संकीर्णता सिखाई जाए। बल्कि उन्हें यह समझाया जाता है कि भारत अनेक भाषाओं, धर्मों और संस्कृतियों का देश है और यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। कई बाल कहानियों में अलग-अलग प्रदेशों के बच्चों को मित्र के रूप में दिखाया जाता है, जो मिलकर समस्याओं का समाधान करते हैं। इससे बच्चों को यह संदेश मिलता है कि भिन्नता के बावजूद हम सब एक राष्ट्र के अंग हैं। राष्ट्रीयता का यह समावेशी दृष्टिकोण भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों को भी सुदृढ़ करता है।
भारतीय संस्कृति अत्यन्त समृद्ध और विविधतापूर्ण है। इसमें परम्पराएँ, त्योहार, लोककथाएँ, रीति-रिवाज, नैतिक मूल्य और जीवन-दर्शन शामिल हैं। बाल साहित्य इन सभी तत्वों को सहज और रोचक रूप में प्रस्तुत करता है। भारतीय संस्कृति से जुड़ी कहानियों के अन्तर्गत—त्योहारों पर आधारित कहानियाँ, पंचतंत्र और हितोपदेश की कहानियाँ तथा जातक कथाएँ, लोककथाएँ और दादी-नानी की कहानियाँ तथा प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ी कथाएँ आ सकती हैं। इन रचनाओं के माध्यम से बालक भारतीय जीवन पद्धति से परिचित होता है।
पंचतंत्र की कहानियाँ केवल मनोरंजक नहीं हैं, बल्कि उनमें नीति और व्यवहार का गहरा ज्ञान भी छिपा होता है। इसी प्रकार विभिन्न प्रांतों की लोककथाएँ बच्चों को सामाजिक सहयोग, बुद्धिमत्ता और नैतिकता का पाठ पढ़ाती हैं।
वैश्वीकरण और आधुनिक तकनीक के इस युग में बच्चों का सम्पर्क विश्व की विभिन्न संस्कृतियों से हो रहा है। यह सकारात्मक कदम है, लेकिन इसके साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना भी हमारे लिए आवश्यक है। बाल साहित्य इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब बालक अपने त्योहारों, परम्पराओं, लोकगीतों और ऐतिहासिक कथाओं के बारे में पढ़ता है, तो उसके भीतर अपनी संस्कृति के प्रति गर्व की भावना उत्पन्न होती है। यदि बाल साहित्य में भारतीय संस्कृति का सजीव और संतुलित चित्रण हो, तो बालक आधुनिकता और परम्परा के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है।
हालाँकि बाल साहित्य में देशप्रेम, राष्ट्रीयता और संस्कृति का चित्रण आवश्यक है, लेकिन इसके साथ कुछ सावधानियाँ भी जरूरी हैं। पहली बात यह है कि इन विषयों को अत्यधिक उपदेशात्मक रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। यदि कहानी केवल शिक्षा देने का माध्यम बन जाए तो उसका साहित्यिक आकर्षण कम हो जाता है। दूसरी बात यह है कि राष्ट्रीयता का चित्रण संकीर्ण या आक्रामक नहीं होना चाहिए। बच्चों को यह नहीं सिखाया जाना चाहिए कि उनका देश ही सर्वश्रेष्ठ है और अन्य सभी देश कमतर हैं। बल्कि उन्हें यह समझाया जाना चाहिए कि हर देश और उसकी संस्कृति का अपना महत्व होता है। तीसरी बात यह है कि भारतीय संस्कृति को केवल अतीत के गौरव तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। संस्कृति एक जीवंत प्रक्रिया है, जो समय के साथ विकसित होती रहती है। इसलिए बाल साहित्य में आधुनिक जीवन और वैज्ञानिक दृष्टि का भी समावेश होना चाहिए।


बलराम अग्रवाल
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