उपमा शर्मा, सविता मिश्रा , बंदना स्वाभिमानी



पाँच लघुकथा
डॉ.उपमा शर्मा
बी -1/248
यमुना विहार, दिल्ली
110053
mo.8826270597

लघुकथा-1
मशीनीकरण

“सैम मेरी स्टडी के अनुसार आपाधापी की इस उलझन भरी जिंदगी में गम, खुशी, प्रेम जैसी संवेदनायें मानव तरक्की में अवरोध का कारण हैं । ”

“मैंने भी रिसर्च के बाद यही पाया एलिसा कि मशीनों के इस अति आधुनिक युग में यह संवेदनायें ही हमारी तरक्की रोकने का कारण बन रही हैं।”

“वैसे हमने और हमारे साथियों ने काफी हद तक मानव दिमाग़ की प्रोग्रामिंग कर यह सब रोक लिया है। रिजल्ट भी अच्छे मिले हैं। ”

“यह सही भी है एलिसा।बंधन मुक्त होने से आज मानव बहुत खुश है। मैं पुरानी सदी के कुछ डाटा सर्च कर रहा था। यह देखो कुछ फोटोग्राफ्स सेव किए हैं तुम्हें दिखाने को। ”

“सैम बड़ी अनोखी पिक्चर्स ढूँढ कर लाये हो।इसमें लड़कियों ने ये क्या कपड़े पहने हैं!और यह हाथ-पैरों में भारी-भरकम सा मेटल का क्या पहन रखा है?”

“एलिसा यह पिक्चर देखो!कितने लोग एक साथ बैठे हैं?यह क्या कर रहे हैं?कहीं खुश दिख रहे हैं तो कहीं रो रहे हैं।”

” सैम यह पिक्चर देखो!सब इतने छोटे बेबी को क्यों घेरे खड़े हैं ?यह क्या गोल सा यंत्र है?यह सब इकट्ठे हँस रहे हैं?कोई पर्व सा लग रहा है।यह तस्वीर तो देखो!कितना रंग लगा है चेहरे पर। हर पिक्चर में संवेदनायें भरी पड़ी हैं।”

“एलिसा रिसर्च के वक्त मैंने पढ़ा था तब विवाह और परिवार जैसी संस्था होती थी। लोग एक दूसरे की देखभाल करते थे।एक दूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़े होते थे। यह लोग एक दूसरे के लिए जीते थे। कितना अजीब लग रहा है न।”

” सैम!कैसे कोई किसी के बंधन में इतना रह सकता है।कमाल है जो काम रोबोट कर सकते थे। यह लोग उन कामों में एनर्जी वेस्ट करते थे। तभी कुछ कर नहीं पाये।”

“शायद नहीं कन्फर्म एलिसा। ये संवेदनायें तरक्की में रोड़ा होती हैं।”

“ओह सैम कितना अच्छा है कि हमने यह संवेदनायें निकालने में सफलता प्राप्त कर ली।आज हम लोग कितने अच्छे तरीके से रहते हैं। न कोई जिमेदारी, न कोई जबाबदेही।तुम कभी आओ, कभी जाओ। मैं कभी आऊँ, कभी जाऊँ।ये रोना-धोना, किसी के लिए सोचना, किसी एक का हो जाना।परिवार, बंधन, जकड़न। ऑल फुलिशनेस। ”

“एलिसा बातों में इतना वक्त बरबाद कर दिया।इन लोगों पर रिसर्च करते-करते तुम कहीं उस सदी में न पहुँच जाना।

“सैम यह बताओ उस मानव का क्या हुआ जिसे कल हॉस्पिटलाइज किया था।ऐना बोल रही थी सारी प्रोग्रामिंग सैट होने के बाद भी वो कुछ अजीब व्यवहार कर रहा है। “उसके दिमाग़ की स्टडी तुम्हीं कर रहे हो? ”

“हाँ ! आओ उसकी रिकॉर्डिंग देखते हैं। देखें कहाँ गड़बड़ी हुई है।मैंने प्रोग्रामिंग तो ठीक सैट की थी। ”

“सब कुछ तो सही है।आराम से बैड पर लेटा हुआ है। रोबोट उसकी अटमोस्ट केयर कर रहे हैं।”

“हाँ देखो रोबोट ईशा पूरी शिद्दत से सेवा कर रही है। वक्त पर मेडीसिन, खाने -पीने के कैप्सूल।फिर प्रॉब्लम कहाँ है ? तबियत में सुधार क्यों नहीं हो रहा?

“रिकॉर्डिंग रिमाइंड करो एलिसा।सब तो टाइम पर कर रही है ईशा।इवन टाइमिंग के अकॉर्डिंग बातें भी। फिर प्रॉब्लम कहाँ है?”

“यह देखो।उसके चेहरे पर बेजारी।अरे यह आँखों में क्या दिख रहा है?”

“सैम देखो !वो आवाज लगा ईशा को रोक रहा है।शायद सिर दबाने का इशारा किया।ईशा के यंत्रवत हाथ शुरू हो गये हैं।वो ईशा को कुछ कह रहा है लेकिन प्रोग्रामिंग की सैटिंग के अनुसार ईशा बार-बार बस यही रेस्पॉन्स कर रही है सब वक्त से दिया है। ”

“अरे अचानक यह फूट-फूट कर रोने क्यों लगा एलिसा ?”

“ओह सैम!इतने प्रयास के बाद भी रोबोट बनते इंसान में अभी तक मानव संवेदनायें बाकी हैं।”

***

लघुकथा-2
साल दर साल

सन 1962

मैं स्कूल से आ कुछ देर पढ़ रोज़ शाम को बाबूजी के साथ खेत पर जाती हूँ। पृथ्वी सरसों के पीले फूलों का ताज पहन नई दुल्हन सी इतरा रही है।

1965

बाग से कच्चे आम खाते हुए हम सहेलियों की टोली नहर किनारे आ गई है। हम सब पानी से भरे कलसे सिर पर रख घर की तरफ चल दी हैं। कुछ सहेलियों ने गाय की रस्सी थाम रखी है। मेरी कॉपी-किताबें बस्ते में हैं। स्कूल के बाद सहेलियों संग घूमना कितना आनन्द देता है। घर पर आ बस्ता आले में रख मैं माँ से लिपट जाती हूँ।

माँ ने कटोरदान से रोटी निकाल चटनी के साथ हम भाई-बहनों को दे दी है लड़ते-झगड़ते हम रोटी खा रहे हैं। माँ के हाथों के अचार की खुशबू से पूरा घर गमक गया है।

1984

कितने सालों के बाद आज तुझे छुआ है मेरी डायरी। मेरी गोद में मेरा बेटा है। मैं ज्यादा न पढ़ सकी लेकिन अपने बेटे को शहर पढ़ने जरूर भेजूँगी। उसके पापा का भी यही सपना है।

फिर कुछ पन्ने छूटे पड़े थे।

2005

कब से इस दिन की प्रतीक्षा में थी। अब मेरा बेटा पढ़-लिख कर बाबू हो गया है। लेकिन अब उसका गाँव में दम घुटता है। यहाँ का गँवईपन उसे अच्छा नहीं लगता। मेरी सादा मिजाज बहू भी बेटे के सामने चुप-चुप रहती है।

2007

बेटा बहू को भी ले शहर चला गया है । उसका कहना है गाँव की जमीन पर खेत काट फैक्ट्री लगानी है। यह होगा वो तब ही वापस आयेगा। मैं और उसके पापा मायूसी से उसकी वापसी की राह तक रहे हैं।

2009

आखिर बेटे की जिद जीत गई। हमारी गाँव की जमीन पर फैक्ट्री लग गई है। और लोगों ने भी खेत काटकर बड़ी-बड़ी इमारते और फैक्ट्री बना ली हैं। बेटा बहुत खुश है। गाँव का विकास हो रहा है।

2011

गाँव की नदी-नहर का पानी फैक्ट्री से निकलने वाले पानी के उसमें गिरने से पूरी तरह प्रदूषित हो चुका है। कच्ची सब्जी और फलों में भी पानी में घुला यह जहर घुल चुका है। यहाँ की हवा में भी अब कैमीकल्स की घुटन है।लोग कैंसर से मर रहे हैं।

2013

धुँए और कैमीकल्स का साम्राज्य लगातार बढ़ रहा है। गाँव की हवा जहरीली हो रही है।

2018

मैं घर के दलान पर बैठी हूँ। मेरा दम बुरी तरह घुट रहा है। मैं दमे की मरीज़ हूँ। साँस उखड़ रही है। जाने कब भगवान का बुलावा आ जाये। यह क्या बेटा -बहू और मेरा पोता भी खाँस रहे हैं। यह फैक्ट्री से निकलता काला धुँए का गुबार हमें निगल रहा है। पूरा गाँव बंद मर्तबान बन गया है। हम मछली के जैसे तड़प रहे हैं। एक-दूसरे को बचाना चाहते हैं पर असहाय हैं। अब शायद तुझे न छू पाऊँ प्यारी डायरी।

कुछ घंटे बाद

मेरी आँखें बंद हो रही हैं।लेकिन तुझे छूने का मोह नहीं छूट रहा मेरी डायरी..मैं बहू और बच्चों को गाँव से बाहर जाने को कह रही हूँ। बेटा असहाय हो मेरी ओर देख रहा है। हर तरफ काले धुँए का गुबार है।

मेरा पेन हाथ से गिरने को हो रहा है … .

विकास अकेला नहीं आया है। अपने साथ तबाही लाया है.. आगे के अक्षर छूट गए हैं।

***

लघुकथा-3
छाता

बहुत तेज़ बारिश हो रही थी। तूफ़ान बस आने ही वाला था।

नीरा बालकनी में खड़ी थी। सामने की दुकान की छत के नीचे वही खड़ा था—जो कभी नीरा की दुनिया के हर कोने में साँस लेता था।

छाता आज भी था उसके पास, लेकिन जगह-जगह से फटा हुआ। बारिश उसके कंधों से फिसल रही थी, बाल भीगकर माथे से चिपक गए थे।

नीरा उन दिनों में लौट गई, जब हर बार वो अपने छाते में उसे जगह देती थी। मुश्किलों की बारिश हो या जीवन की तपती धूप—नीरा ने हमेशा उसे छांव दी।

वो हँसता, इतराता, खुद को दुनिया का सबसे समझदार इंसान समझता।और जब नीरा इस बारिश में भीग परेशान हो जाती, वो कहता,
“तुम ज़रूरत से ज़्यादा सोचती हो… इसीलिए परेशान हो जाती हो।”

वक़्त के साथ नीरा का छाता पुराना होता गया। बोझ से झुकने लगा था।
एक दिन नीरा ने छाता बंद कर के दिया—बिना कोई शोर किए।न इल्ज़ाम, न शिकवा।सिर्फ़ आईने में देख बोली,
“अब किसी के लिए ख़ुद को नज़रअंदाज़ नहीं करूँगी।”
आज, फिर वो सामने था। उसने नीरा की ओर देखा।
वो रेलिंग पर खड़ी थी, हाथ में चाय का प्याला थामे।
ये पहली बारिश थी जिसमें नीरा भीगी नहीं बल्कि, खुद को भीगने से बचा लिया था।

पाँच लघुकथा

सविता मिश्रा ‘अक्षजा’
आगरा (प्रयागराज)
2012.savita.mishra@gmail.com

लघुकथा-१
वर्दी वाले

बाहर साइकिल खड़ा करता हुआ सोनू बोला, “पापा, आज तो मेरी रेहड़ी पर पुलिस ही पुलिस आयी थी।”
सुनकर पिता का चेहरा मलिन हो उठा। जेब में हाथ कुछ टटोलने लगा था।
“तू रेहड़ी लगाया कहाँ था कि ग्राहक न आये? जानता है न कि कितनी दिक्कत सह के मैं और तेरे पिता मिलकर दीये बनाते हैं।” माँ के चेहरे की तकलीफ शब्दों में बह गई।
“अम्मा चौराहे पर ही तो बैठा था। ग्राहक तो पास से खूब सारे गुजर रहे थे।”
“थोड़ा दूर बैठता। चार दिन भर पेट भोजन मिल जाता, अब वो भी नसीब नहीं होगा।”
“क्यों डांट रही है, पहली बार रेहड़ी लगाई थी, इसे ज्यादा जानकारी थोड़ी ही थी।”
“दीपक गए तो गए, पचास रुपये की डलिया भी गवां आया। अच्छा चल, रोटी बनाती हूँ, खा ले। फिर देखूँगी क्या करना है। लगता है दिवाली पर भी सूखी रोटी ही खानी पड़ेगी।”
“अम्मा, ये लो। इस बार दीपावली पर हम भी पूड़ी और पनीर की सब्जी खाएंगे।” पास आकर सारे रुपये माँ के आँचल में डाल दिया।
“इतना रुपया!”
“जो दरोगा साहब चौराहे पर बैठे थे, वह मुझसे मेरे बारे में अपनी ड्यूटी से खाली होते ही पूछने लगते थे।”
“अच्छा..!”
“उन्होंने कड़ककर पूछा था कि ‘पढ़ता-लिखता भी है..!’ तो मैंने उन्हें बताया कि कैसे मेरी पढ़ाई छूट गयी। पापा का अपाहिज होना, तेरी बीमारी के बारे में भी| घर का सारा हाल भी मैंने उनसे कह डाला।”
“अच्छा..! तो क्या कहा?”
“कुछ नहीं, डंडा फटकारते हुए अपने काम में लग गये थे।”
“बेचा किसे, ये तो बता?” पिता ने कराहते हुए पूछा।
“थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि ढ़ेर सारे पुलिसवाले मेरी ओर आ रहे हैं। मैं डर गया था अम्मा! पापा ने जो कहा था वो सब आँखों के सामने नाचने लगा था। मेरी नजर उन दरोगा अंकल को खोजने लगी थी, जैसे मेरी रेहड़ी बच जाए।”
“फिर, क्या सारे तोड़ दिया उन लोगों ने। उस दरोगा ने अपने लोगों की करतूत पर पर्दा डालने के लिए इतने रुपये तुझे पकड़ाये?”
“अरे ना अम्मा! इतने भी खराब नहीं होते हैं वर्दी वाले। सभी ने अच्छी कीमत देकर दर्जन-दो दर्जन दीपक खरीदें। वे दरोगा अंकल भी मुस्कुराते हुए उन सबके पीछे खड़े थे, दुगनी कीमत देकर बचे हुए दीपकों को उन्होंने ले लिया।”

***

लघुकथा-२
सुचालक

“आज मेरे मैसेज का तुमने कोई जवाब नहीं दिया।”
“सिर में दर्द हो रहा था यार।”
“क्यों! क्या हुआ?”
“अरे जानती ही हो, फेसबुक पर कहीं पार्टी विरोधी और समर्थकों की लम्बी हांक, तो कहीं जातिवाद का जहर|”
“अरे तो कौन कहता है कि फेसबुक की सारी पोस्ट पढ़ो!”
“सारी कौन पढ़ रहा| लेकिन फ्रेंडलिस्ट वालों की पोस्ट-कमेन्ट तो दिख ही जाती हैं| कमेन्ट ऐसे कि बुझ चुकी राख में भी आग पैदा कर दें|
“हटाओ अपनी फ्रेंड-लिस्ट से ऐसे सिर-दर्दो को, क्यों झेले पड़ी हो?”

“अरे यार! जातिवाद का जहर बोते देखकर क्रोध में दिल तो मेरा भी यही कहता है| उनकी प्रोफाइल खोलती भी हूँ, लेकिन अनफ्रेंड पर गया मेरा अँगूठा उस समय रुक जाता है, जब उनके द्वारा कहा गया दीदी/जिज्जी का सम्मानजनक संबोधन याद हो आता है|”

“भावनाओं में बहकर तुम उनके नकारात्मक विचारों को बढ़ावा दे रही हो, फिर से सोच लो!”

“नहीं यार, तू समझती क्यों नहीं है! ये दीदी/जिज्जी मेरे लिए सिर्फ शब्द नहीं है, बल्कि अपनेपन की मिठास है| मैं उन्हें अन्फ्रेंड करके इस रिश्ते को कसैला नहीं करना चाहती हूँ|”
“चाहे अपनी बात को शिष्टता से रखने पर भी वो तुम्हें अनफ्रेंड कर दें! पीठ पीछे तुम्हारी इस परम्परावादी सोच की चाहे हँसी ही क्यों न उड़ाएं! क्यों?” क्रोध की लकीरें दोनों के माथे पर उभर आई थीं|

“तू जानती है न कि स्त्रियाँ रिश्तों की सुचालक होती हैं| वे रिश्तों को तब तक जीना चाहती हैं, जब तक पानी सिर के ऊपर से न बहने लगे|” अब दोनों के चेहरे पर गर्वीली मुस्कान कानों तक खिंच गयी थी|

***

लघुकथा-३
ओहदा

तू मुझसे आठ साल छोटा था, मैं तुझे कितनी बार मारा-डांटा करता था| यहाँ तक कि जब तू कोई गलती करता था, तो सजा स्वरूप मैं तुझसे बोलना बंद कर देता था| फिर भी तू माफी माँगता हुआ मुझसे हर पल चिपका रहता था| आज मेरी एक छोटी-सी बात का तू इतना बुरा मान गया छोटे कि परिवार सहित चल दिया|”
मैं तुझे स्टेशन तक मनाने गया पर तू नहीं माना, तेरे दिल में परिवार का ओहदा मुझसे अधिक हो गया रे छोटे|
थोड़ा सांस लेते हुए रुके फिर बोले, “अरे! तेरी पोती, क्या मेरी पोती नहीं थी| मैंने उससे जो कुछ कहा, वो उसकी भलाई के लिए ही तो कहा था न|

मैंने शादी नहीं की| सारा प्यार-दुलार तुम पर, बच्चों पर, फिर तेरे नाती-पोतो में ही तो बांटा था न| तो क्या मुझे इतना भी हक नहीं था रे छोटे !” छाती सहलाने लगे| जैसे प्राण बस निकलने ही वाले थे, उसे थोड़ी देर को सहेज रहे हो|

जा छोटे! जहाँ भी रह सुखी रह| तुझे मुझसे बिछड़ने का दुःख भले न हो, पर मैं अपने आँसुओं का क्या करूँ? जो रुकते ही नहीं हैं|
एक न एक दिन तू इन आँसुओं की कीमत को समझेगा! पर तब तक…| हो सके तो मेरे अर्थी को कन्धा देने अवश्य आना छोटे…मेरे ऋण से तू मुक्त हो जायेगा|

मोबाइल पर वीडियो देखकर वर्मा जी फफक पड़े| सुबकते हुए कहने लगे, “भइया आप सही थे! गलती मेरी ही थी| मैं बहू के बहकावे में आ गया था| आपकी बात पर कान देता, तो आपकी पोती को लिव-इन-रिलेशनशिप के दर्द से बचा पाता| भइया उसके बहके कदम घर को वापस तब आए, जब उसके पाँव में छाले हो आये| परिवार सहित मैं आ रहा हूँ भइया! फिर से नीम की छाँव में|”

***

लघुकथा-४
कानून का ताला

“तेरी इतनी अच्छी लघुकथाओं को न लाइक मिलते हैं और न ही वाहवाही भरे कमेंट! फिर भी तू खुश रहता है?” क ने ख की पीठ पर धौल देते हुए कहा।
ख बोला, “हाँ, जितनी कम आमद, उतनी ही कम टेंशन!”
क ने कहा, “मेरी लघुकथा को सौ से कम लोग पसन्द करें तो मुझे उलझन होने लगती है। मैं बाकायदा इसका कारण खोजता हूँ और रचना को सुधारता हूँ।”
“कैसे सुधारते हो, बंधु? क्या विचार मंथन करके…?” ख ने पूछा।
क आत्मप्रशंसा में बोला, “अरे नहीं! कौन दिमाग खपायेगा ! बस बहुत ज्यादा पसंद किए गए पोस्ट के घटनाक्रम में से दो चार पंक्तियों को उड़ाकर, खुद की कथा में डाल देता हूँ । अब इतना हुनर तो है ही मुझमें।”
“बस इसी डर से तो मैं नहीं चाहता कि मेरा लिखा प्रचारित हो। लाइक फिर भी ठीक है, लेकिन जब ज्यादा शेयर होने लगता है तो मैं डरने लगता हूँ चोरों से।” ख ने शंका जाहिर की।
“तूने मुझे चोर कहा!” क ने ख को घूरकर देखा।
ख बोला, “नहीं! नहीं ! यार। मेरी ऐसी मज़ाल..! मैंने तो चोर-चोर मसौरे भाइयों को चोर कहा! जानता ही है तू कि फेसबुक पर उल्टा चोर कोतवाल को भी डाँट सकता है|”
क थोड़ी देर उसकी तरफ देखता हुआ सोचता रहा, फिर बोला, “तब ठीक है।”
“अक्ल होती तो तू कॉपी छाप लेखक थोड़ी होता..!” सिर नीचे करके मन ही मन बुदबुदाया ख! फिर उससे कहा, “यार, नकल में कितनी भी अकल लगाई जाए लेकिन नकल तो नकल ही है न?”
क आत्मविश्वास से बोला, “अरे, जब तक कोई कानून का दरवाज़ा नहीं खटखटाता है तब तक ये सब चलता रहेगा। और अकल गयी तेल लेने, हमारी प्रसिद्धि तो हो ही रही है। भाई, तेरे पास अकल है लेकिन चार लोग भी तुझे नहीं जानते हैं। फिर इस अकल का क्या फायदा?”
“ये तो अकल की बात की तूने! यही अकल कुछ लिखने में लगाया कर। आखिर बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी!” ख ने मुस्कराकर कहा।
फिर कनखियों से उसे देखता हुआ मन ही मन बुदबुदाया, “आज तेरी नकल की पोस्ट पर रेड पड़ ही गयी है। कुछ ही देर में फेसबुक के सिपाही असल-नकल के सारे सबूतों के स्क्रीन शॉट ले लेंगे। फिर क्षण भर में तेरे सिर से प्रसिद्धि का भूत उतर जायेगा।”
क बोला, “कहाँ खो गया यार! अकल को मार गोली, चल पिक्चर देखने चले।”
“कौन सी?”
“बा बा ब्लैक शीप”
“नहीं यार! रेड.. !” ख ने व्यंग्यात्मक मुस्कान फेंकते हुए कहा।

***

लघुकथा-५
कुनैन

“वह टैग और मैसेज करते रहते थे!”
“तो! कोई गुनाह तो नहीं है ये?”
“नहीं, कोई गुनाह नहीं है।”
“रोज ही सुप्रभात/शुभ रात्रि कहना गुनाह है क्या?”
“बिल्कुल नहीं! आप भी ऐसा करते हो?”
“हाँ, कई बार।”
“अमेजान या फिर प्रतियोगिता वाली लिंक्स को कई-कई बार मैसेज करते हो?”
“कई बार तो नहीं, मगर कभी-कभी| आखिर मित्रता लिस्ट में विराजमान हैं, तो ये सब तो करना ही पड़ेगा।”
“अच्छा..! अपनी तस्वीर, अपनी पोस्ट लाइक करने की रिक्वेस्ट भी करते हो?”
“हुआ क्या? आज बहुत सवाल हो रहे हैं।”
“कुछ नहीं बस ऐसे ही|”
“बताओ तो?”
“जब से फ्रेंड-लिस्ट में जुड़े थे, तब से वह मैसेज पर मैसेज भेज रहे थे, कभी लाइक और कमेन्ट, तो कभी शेयर करने का दबाव डालते रहे थे| सच पूछो तो उन्होंने इरिटेट कर दिया था, तो मैंने आज..!”
“हटा दिया, ब्लॉक भी कर दिया होगा..! तुम महिलाओं की यह बहुत बुरी आदत है।”
“नहीं, ऐसा कुछ नहीं किया मैंने।”
“फिर..?”
“बस मैंने भी दस-पाँच लघुकथाएँ, एक दो कहानी, अपने ब्लॉग और एक दो यू ट्यूब की लिंक्स और पेज लाइक करने की रिक्वेस्ट उनके मैसेज बॉक्स में डाल दिया।”
“हयँ.! फिर क्या कहा उसने?”
“कुछ नहीं, ब्लॉक कर गए, जाने क्यों…!”


पाँच लघुकथा

बंदना स्वाभिमानी

लघुकथा-१
जीवन के कितने रंग

आज ऑफिस से थोड़ा जल्दी फ्री हो गई थी। मेट्रो से घर तक के रास्ते में एक हरा भरा बाग पड़ता है। वैसे तो रोज वहां से गुजरती हूँ पर पता नहीं आज क्यों पैर अचानक पार्क की तरफ मुड़ गये वहां ठंडी ठंडी हवा चल रही थी, थकी तो मैं थी ही बैठने के बाद उठने का मन नहीं किया और मैं वहीँ घास पर आराम से बैठ गई। पार्क में हर उम्र के लोगों की हल्की कोलाहल से गुंजायमान हो रहा था।थोड़ी देर बाद एक लड़की ने मुझसे डरते डरते बोला आपका फोन यूज़ कर लूँ क्या? मैंने बोला हाँ फिर उसका नो. डायल करके उसे दे दिया वो टहलते हुए बात करने लगी मोबाइल चोरी के न्यूज़ को ध्यान में रखते हुए मैं भी उसके पास मंडरा रही थी उसी दौड़ान पता चला कि वो अपने किसी दोस्त का इंतज़ार कर रही थी जो इस शहर में किसी काम से आया था और लड़की उसे खुद को ले जाने की जिद कर रही थी। थोड़ी देर बाद उसने मुझे थैंक्यू बोलते हुए फोन लौटाया तो आँखों में आंसू साफ नजर आ रहे थे। मैंने उसे जैसे ही बोला कुछ प्रॉब्लम है क्या? तो वो फफ़क़ पड़ी और बताया कि उसके दोस्त ने उसे अभी ऐसे ले जाने से मना कर दिया है और वो घर जाने से घबरा रही थी। मैंने सोचा शायद वो घर छोड़कर आ गई थी पर तभी उसका 4साल का भतीजा खेलता हुआ गिर गया और उसे थोड़ी चोट लग गई लड़की भाग कर गई और उसे चुप कराते हुए बड़बड़ाने लगी

ये मैंने क्या कर दिया सारी मेरी गलती है….. वगैरह और बहुत घबरा रही थी। मैंने उसे शांत कराते हुए बोला घबराओ मत बहुत छोटी चोट है और इसमें आपकी कोइ गलती नहीं है। तो वो बोली आप नहीं जानती मेरी भावी मुझे फिर मारेंगी। इसीलिए मैं घर छोड़ना चाहती हूँ, मैं जानती हूँ कि मेरा दोस्त मेरे साथ बूरा भी कर सकता है पर अभी भी तो मेरे साथ बुरा ही होता है। और इसलिए सोचती हूँ शायद वो अच्छा ही हो…मेरे माता पिता रहते तो न मेरी ऐसी हालत होती और न मैं ऐसा सोचती भी। आप सोच राह होंगी मैं बहुत बुरी हूँ पर मेरे भी कुछ सपने थे कि मैं पढ़ू लिखू समय पर अच्छे से मेरी शादी हो… पर मम्मी पापा के एक्सीडेंट के बाद सब ख़तम… वो तो भतीजे को पार्क में घुमाने की ड्यूटी मेरी है इसलिए यहाँ आकर कभी किसी से बात भी कर लेती हूँ नहीं तो मैं अपने ही घर में इज्जत के नाम पर ऐसी कैदी बनी हूँ जिसके साथ मारपीट तो आम बात हो गई है और वो फिर से रोने लगी मेरे मुँह से शब्द गायब हो गये थे सोच रही थी इतनी छोटी उम्र में इसने जीवन के कितने रंग देख लिए है… मेरी समझ में कुछ नहीं आया कि उसे क्या समझाऊं… और वो अपने आंसू पोछ कर मुस्कुराते हुए बोली किसी को बताना मत आंटी…मेरे मुँह से निकला काश मैं आपके लिए कुछ कर पाती और उसे अपना नो उसे देते हुए बोला अपना ख्याल रखना और कोइ प्रॉब्लम हो तो बताना… उसने कागज मुठ्ठी में दबाया और भतीजे को उठाकर मुस्कुराती हुई चली गई… और मैं उसे पीछे से जाते हुए देखती रह गई… आँखों से कुछ मोती जमीन पर गिरे जो शायद मेरी बेबसी के थे।

***

लघुकथा-२
तस्बीर

पिछले कुछ दिनों से समीर का स्वभाव बदलने लगा था। बात बात पर वो बिना वजह ज्योति को डांटने लगा था। देर से घर आना, कभी कभी नशा करना ये तो शादी के कुछ साल बाद ही शुरू हो गया था पर कुछ दिनों से वो ज्योति को मारने भी लगा था। इन सब के बावजूद ज्योति को समीर की ज्यादा गलती नजर नहीं आती थी या यूँ कहें हर बार खुद को ब्लेम करती थी शायद समीर के अभी के अत्याचार पर उसका पहले का प्यार भारी पड़ रहा था। या फिर उसके पास दूसरा कोइ ऑप्शन नहीं था। क्योंकि उसने अपने परिवार के खिलाफ जाकर समीर से शादी की थी क्योंकि अगर वो शादी नहीं करती तो उस वक़्त शायद समीर अपनी जान दे देता। पर वो सारे पल बेमानी लगने लगे हैँ….. हालांकि अपने परिवार के लिए भी उसका प्यार झूठा नहीं था पर वो समीर को खोने की हिम्मत भी नहीं कर पाई थी और यही वजह था कि आज भी वो अपने जीवन के लिए निर्णय नहीं ले पाती। पर आज शाम से ही उसका मन बहुत उदास था रह रह कर उसे अपने परिवार की याद आ रही थी। जाने क्यों सोचते सोचते उसके कदम दीवार पे टंगी माँ की उस तस्वीर पर पड़ी जो उसने घर से आते वक़्त दुपट्टे में छुपा लिया था।उसने उसे जैसे हाथों में लिया माँ के शब्द याद आये जब वो कहा करती थी जीवन में कोई भी परेशानी हो मेरे सामने आ जाना मैं ना सिर्फ तेरी तकलीफों को समझूंगी बल्कि अपनी तरफ से उस स्थिति से तुझे निकालने की पुरी कोशिश करुँगी… और फिर वो अचानक फफ़क़ पड़ी उसकी आँसुओ की कुछ बुँदे माँ के आँखों को चूमकर गालों पे लुढ़क गई जैसे बेटी को तकलीफ में देख कर माँ की ममता रो पड़ी हो।
तभी ज्योति के कानो में समीर की चीखती हूई आवाज़ गूँजी… बहुत दुखी हैँ मुझसे…माँ से मेरी मौत मांग रही है या अपना जीवन… अब ये तस्वीर चुपचाप से मुझे दे दे नहीं तो तुझे भी इसके पास पहुंचा दूंगा…और इतना कहते हुए तस्वीर उससे छीन कर फेंकने की कोशिश करने लगा और इसी छीना झपटी में तस्वीर फर्श से टकराकर टूट गई…और फिर टूट गया ज्योति के सब्र का बांध… वो अनायास ही फुट पड़ी… उसके आंसू अंगार में बदल गये… समीर की हिम्मत नहीं हूई कि उसका विरोध करे… दिल की सारी भड़ास निकल जाने के बाद उसने अपने लिये वो निर्णय लिया जो वो जाने कब से लेना चाहती थी… एक पल में अपना खोया आत्मविश्वास खुद में महसूस करने लगी… जैसे माँ ने एक बार फिर खुद टूटकर सही अपनी बच्ची को बिखरने से बचा लिया था… उसने अपने कपड़ों के बैग के साथ माँ की तस्वीर को लेकर वर्षों से बँधी बेड़ी तोड़ दिया… तस्वीर को अच्छे से फ्रेम करवाकर सीने से लगा कर एक सुकून के साथ उस राह पर चल पड़ी जहाँ खुशियाँ और कामयाबी उसका इन्तजार कर रही थी।

***

लघुकथा -3
माँ का दर्द

रमेश जैसे ही घर से निकलने लगा उसकी बीवी ने टोका प्लीज आज पीकर मत आना आज मुन्ने का पांचवा जन्मदिन है.. उसके दोस्त सब आएंगे तो अच्छा नहीं लगेगा। रमेश ने लगभग चिल्लाते हुए कहा तुझे टोककर मेरा दिन ख़राब करनेके अलावा कोई और काम नहीं है क्या…? रोज रोज के चिक चिक ताने से मैं तंगआ चुका हूँ। इससे पहले कि मैं तुझे मायके छोड़आउ मुझे टोकना छोड़ दे और अपने काम से मतलब रखा कर… इससे पहले कि उसकी पत्नी रेवती फिर कुछ बोलती बाहर से सहमा हुआ मुन्ना घर के अंदर आ कर कोने में खड़ा हो गया। रमेश ने उसे कहा… तु क्यों डर गयामैं तेरा बाप हूँ कोई शेर नहीं जो ख जाऊंगा बस अपनी माँ को समझा ले… नहीं तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा… फिर पैर पटकते हुए चला गया। उसके जाते ही मुन्ना दौड़ कर माँ के गले लग गया। रेवती ने उसे प्यार से पूछा कहाँ गए थे… मुन्ना ने कहा माँ मैं अपने दोस्तों को बताने गया था कि अभी हमारे गाँव में किसी की डेथ हो गई है इसलिए जन्मदिन नही मनाएंगे… पिछली बार पापा ने सबके सामने तेरी बेज्जती कर दी तो तु बहुत रोइ थी न… रेवती के आँखों से आंसू बहने लगे उसने मुन्ना को गले से लग लिया और सोचन लगी किसी ने सच कहा है माँ का दर्द समझने के लिए 5वर्ष की औलाद काफी होती है…

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लघुकथा-४
पारिवारिक अदालत

एक सुन्दर सी कदकाठी की लड़की सुनसान सड़क पर चली जा रही थी…. और उसके पीछे चार पांच लड़कों का झुण्ड बढ़ा आ रहा था…. लड़की ने अपने काले रंग के दुपट्टे से सर को इस तरह से ढक रखा था कि उसका चेहरा बिलकुल नहीं दिख रहा था… वो तेज तेज क़दमों से घर पहुँचने की कोशिश में तल्लिन थी… और अब वो झुण्ड इतना पास आ चुका था कि उनके बीच चल रही बात चीत उसे साफ साफ सुनाई दे रही थी…किसी ने कहा अब किस बात का इंतज़ार है… अकेली क्या कर लेगी? इधर कोई नहीं आता है जल्दी…तभी दूसरे लड़के ने कहा नहीं ये गलत है…. आज न कल लोगों को पता चल ही जाता है…. तीसरे ने कहा अरे पता चल जाता है तो क्या होता है? साबित होते होते हम आधी जिंदगी जी चुके होते हैँ… वैसे भी मेरे पिता की पहुँच ऊपर तक है… कानून मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा… दूसरे लड़के ने फिर कहा नहीं भाई कानून तो बाद में मुझे तो मेरा परिवार ही ऐसा सजा देगा कि मैं जीते जी मर जाउंगा… मेरे परिवार से तो मुझे कोई मिलने भी नहीं आएगा… उल्टा मुझे फांसी दिलवाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा…. एक पल के लिए मैं समाज और कानून की नफ़रतझेल लूंगा पर माँ बाप और बहन की नफरत सहकर मैं नहीं जी सकता… उस लड़की का मन किया कि ऐसे परिवार के चरणों में सर झुकाये… तभी एक और लड़के की आवाज गूँजी… मेरा परिवार तो सब जानकर भी मुझे बचाने के लिए अपना सब बेच देंगे.. और मेरी बहन तो ऐसी कूल है कि राखी लेकर जेल पहुँच जायेगी… रो रो कर माँ ईश्वर से मेरी जमानत मांग लेंगी… आगे के शब्द जैस लड़की को सुनाई ही नहीं दे रहे थे… बस आंसू बहे जा रहे थे… उसने वो आवाज पहचान ली थी… वो कोई और नहीं उसका भाइ था… अपनी पारिवारिक अदालत के लिए उसके मन में इतनी ग्लानि हो रही थी कि उसके क़दमों ने चलने से मना कर दिया…और वो वहीँ निढाल होकर गिर गई… अचानक लड़की के गिरने से लड़कों का झुण्ड गायब हो गया… और लड़की थोड़ी देर बाद थके थके क़दमों से घर की ओर चल पड़ी…उस परिवार के कानून व्यवस्था को ठीक करने के निश्चय के साथ… ताकि कोई भी सदस्य अपराध करने से पहले कानून से नहीं परिवार से डरे जिसकी न्याय प्रक्रिया लम्बी नहीं होती…

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लघुकथा-५
रखवाली

आज शारदा बेन का जन्मदिन है… वृद्धाश्रम की सारी महिलाओं ने उनके लिए एक सरप्राइज प्लान किया था और सुबह से सब उसकी तैयारियों में व्यस्त थे….. किसी ने उनकी पसंद के फूलों से हॉल सजा दिया तो कोई उनकी मनपसंद कलर की साड़ी ले आयी…. किसी ने वो जब से आश्रम में आई थी तब से लेकर आज तक की सारी तस्वीरों को एकत्र करके सुन्दर सा फ्रेम बनवा लिया था….. तो कोई उनकी मनपसंद डिस बनाने में व्यस्त था….. हो भी क्यों नही सबकी चहेती थी शारदा जी….. सभी उन्हें अपनी माँ मानती थीं….. पर वो जिसने उनकी कोख से जन्म लिया था….. कभी मिलने भी नहीं आता था….. शारदा जी अक्सर अकेले में दुखी हुआ करती थीं….. सब ये जानते थे पर कोई उनका दिल नहीं दुखाना चाहता था इसलिए सामने से कभी उस प्रसंग पर कुछ चर्चा नहीं होती थीं।आज भी शारदा जी अपने कमरे में छुपकर अपने परिवार की पुरानी तस्वीर निकाल कर देखते हुए आंसू बहा रही थीं….. तभी उसी आश्रम की एक संगिनी ने उनके कंधे पर हाथ रखा तो वह अपने आंसू पोछ कर पलटते हुए बोली आइये बैठिये…. संगिनी ने कहा इन आँसुओ को मत छुपाइये… बह जाने दीजिये… मन का बोझ हल्का हो जायेगा….आजकल लोग आम बोकर भी ना जाने बबुल क्यों पाते हैँ….? शारदा जी ने लम्बी सांस लेते हुए कहा….. गलती कहीं न कहीं हमी से होती है बहन हम आम बोकर निश्चिंत हो जाते हैँ…. और सही से रखवाली नहीं करते….. और इस बीच क्या पता कब कोई हमारे बीच के आस पास इतने बबुल के बीज लगा देता है कि हमारा आम दबा ही रह जाता है और बबुल हमारे आंगन में लहलहाने लगता है….फल सिर्फ बोने से नहीं पौधे के परिपक्व होने तक रखवाली महत्पूर्ण है….. जो हमसे चूक रहा है… जिसका परिणाम बबूलों की बढ़ती संख्या है… कहते हुए शारदा जी ने जैसे ही तस्वीर सुटकेश में रखा… पूरा कमरा हैपीबर्थडे टू यु माँ से कमरा गूंज उठा… और शारदा जी भाव बिभोर हो गई… और सोचा इस परिवार के हर सदस्य की रखवाली अंतिम सांस तक करेंगी।

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