
पाँच लघुकथा

इंदु झुनझुनवाला
बैंगलुरु
लघुकथा-1
अनदेखा तार
अकेले दिवार को घूरती ना जाने क्या तलाश रही थी अनु की नज़रें…
शायद भीतर के तूफान से बचने के लिए कोई और।
तभी देखा पसरी हुई छत के कोने में जाला बुनती एक मकड़ी को। स्वयं ही बुनती जालों को अपने ही अंश से निकलते रस से।
और फँसती जाती उनके बीच।
थोड़ी देर में बुनावट पूरी हुई और वो बीच में फँस गई। निकलने की कोशिश भी नहीं,,,,।
अचानक मुझे लगा मेरा दम घुट जाएगा।
मैंने एक झाड़ा उठाया और उसे उस जाल से निकालने की कोशिश की।
पर ये क्या ,,,,?
वो जाल से नीचे तो गिरी, पर जाले के धागे का एक सिरा अभी भी जुड़ा था उससे,
चाहकर भी मैं उससे अलग नहीं कर पाई उसे।
क्या वो नहीं चाहती अलग होना उस जाले से?
फँसकर रह गई है उसकी जिन्दगी,
क्या यही सच है इस संसार का, मेरा, तुम्हारा, हम सबका?
यही दंश सालता है हमें जीवन पर्यन्त, भावनाओं के जुड़ाव का अनदेखा तार, जिसमें झटपटाते बंधे रह जाते है ह म तुम।
स्वयं को देखा तो लगा उस मकड़ी और मुझमें क्या अन्तर है!
मैं भी तो परिवार रूपी जाले में कैद झूठे मोह में बँधी कहाँ अलग होना चाहती हूँ। बात चाहत की भी नहीं। बातों संस्कारों के उस पलते तारों की है , जिनमें बचपन से ही उलझाया दिया जाता है हमें।
और दिल इ कदर जुड़ जाता है कि हम वास्तव में चाहत क्या हैं ये भी नहीं समझ आता। आज मन की यही स्थिति तो है तभी तो उस मकड़ी की भाँति अटकी हूँ मैं इस अनदेखे तार से।
आजाद होने को छटपटाता मन… शायद चाहती होगी मकड़ी भी ऐसा ही तो, पता नहीं।
पर फिर-फिर वो भी तो मेरी तरह ही बुन लेती है एक नया जाल…
***
लघुकथा-2
छोड़ी गई स्त्री
किशोरावस्था में सुना था, पति जिसे छोड़ दे, वो परित्यक्ता कहलाती है।
हमारे घर के सामने के घर में एक पतली-दुबली बूढ़ी, पर बेहद खूबसूरत, सफेद बालों वाली एक औरत रहती थी अपने दो बच्चों के साथ। उनके बच्चों के देखा-देखी हम सभी गली के बच्चे उन्हें अम्मा जी कहने लगे थे।
जैसे-जैसे बड़ी हुई, जाना कि वो छोडी हुई स्त्री है भोगकर छोड़ी गई।
पर अपने सत पर अडिग, कभी किसी और के लिए नही सोचा।
कभी बहुत सोचा भी नहीं था मैंने उनके बारे।
पर आज अचानक वो याद आ गई ना जाने कैसे?
केशव ने मुझे सामाजिक स्तर पर छोड़ा तो नहीं था, पर मन के स्तर पर?
मन से शायद उसने कभी मुझे नहीं जोड़ा, जरूरत थी जबतक साथ रखा, आज अब जरूरत नही शायद।
इसलिए आज वो मुझसे बोलना भी जरूरी नहीं समझता।
क्या विवाह का अर्थ और सम्बन्ध इतना कच्चा,,,, व्यवसाय की तरह ?
माँ ने तो कहा था जन्मों का रिश्ता होता है तभी तो मैं, उन संस्कारों में बँधी, उसे अपना तन-मन-धन सब कुछ वर्षो से सौंपती आई थी, उसकी उपेक्षा को झेलती रही हूँ पर अब खल रही है।
एक छत के नीचे रहते हुए भी परित्यक्ता होने के अहसास से चू रही है।
तब सवाल उठा मन में कि क्या वो अम्मा जी की तरह परित्यक्ता है, क्या अम्मा जी उसकी तरह परित्यक्ता हैं, जबकि सुना है अभी भी कभी -कभी उनके पति उनके पास आते थे,बच्चों के साथ भी समय बिताते हैं, दो बेटे भी हैं उनके। यानि उनके मन में तब भी अम्मा जी के लिए स्थान था?
पर केशव ? केशव का भी तो एक बेटा है, पर उसे उसकी भी फिक्र कहाँ है, वो तो अब नज़र उठाकर भी नहीं देखता मै जी रही हूँ मर गई,,,, फिर परित्यक्ता कौन?
***
लघुकथा-३
खिलौना मात्र
क्रिकेट देखते हुए मैदान के एक कोने पर बैठी सविता को लगा, क्या मेरी क़िस्मत इस बॉल-सी नहीं, जिसके हाथ में बैट है, उछाल देता है मुझे, इधर से उधर?
कभी छक्का और चौका…
दूर तक उछलकर जाती थी मैं, पर तालियाँ बजती थी बैंटिग करने वाले के लिए।
बैट से मार-मार कर मेरी हालत ख़स्ता कर मुझे डाल देते हैं डस्टबिन में ।
और मेरी तरह ही एक नया चमकदार बॉल…मेरी ही तरह किस्मत लेकर फिर से मैदान में।
क्या ये स्त्री जन्म की विडम्बना है…जिस पुरूष को पैदा कर रचनाकार का श्रेय हासिल है उसे, उसके लिए ही वो एक खिलौना मात्र ?
***
लघुकथा-४
क्या दोष था मेरा?
कल मेला देखने गई मैं अपनी सखी रेवती के साथ तो वहाँ एक कुम्हार चाक पर मिट्टी के बर्तन को आकार दे रहा था, पता नहीं कैसे देखते-देखते जैसे मैं उस मिट्टी में समा-सी गई,,,,
चाक पर घुमती मैं, खुश हो रही थी अपने नए आकार की कल्पना से,,,
कुम्हार ने दिया था सुन्दर मटकी का रूप मुझे, जो प्यास बुझाएगा सबकी।
इस अहसास से ही खुशी-खुशी आग की तपिश सह गई मैं, और बन गई मज़बूत पक्की मटकी, ढंडे पानी से लबालब, इतराती ख़ुद पर।
पर ये क्या,,,,?
पानी पीकर उसने एक हाथ मारा मेरे ही पीठ पर और एक दरार मुझमें।
उसे तो पता भी न चला, पर धीरे-धीरे रिसता पानी,,,
जितनी बार पीता वो मुझे, उतनी बार एक हाथ या कभी बिना सोचे बिना मेरा ख्याल किए जोर से नीचे रख देता !
और दरार बड़ी होती गई। अन्ततः एक दिन टूटकर दो टुकड़े हो गए मेरे।
तब भी इतना दुःख नहीं हुआ था मुझे।
पर जब मुझे वापस मिट्टी में रौंदते हुए कहा उसने कि बड़ी कमजोर थी ये मटकी, शुरू से ही दरार थी इसमें, बस मैं था जो चला रहा था इसे।
तब बहुत दुःख हुआ मुझे, बहुत रोई,,,,
पूछा कुम्हार से एक ही सवाल- क्या दोष था मेरा, मिट्टी की मटकी होना ही दोष है क्या?
अचानक रेवती ने झकझोरा मुझे,, “क्या हो गया, कहाँ खो गई?”
चौंक उठी, तब लगा कितनी समानता है ना मुझमें और इस मटकी के जीवन में!
***
लघुकथा-५
हरी -हरी चुडियाँ
आज भी याद है वो दिन, जब शादी के बाद विदा होकर पहुँची, ससुराल की दहली पर रखा पहला कदम।
सभी ने बड़े ही प्यार से स्वागत किया। बुआ सास ने बैठाया सुन्दर-सी चौकी पर, और सिरगुंथी की रस्म अदा की ।
फिर मनहारिन ने पहनाई हरी-हरी काँच की चूडियाँ, जिनके मध्य कुछ लाल रंग की चूडियाँ भी थी ।
अपनी कलाई पर सजी इन सुन्दर-सी लाल-हरी चूडियों पर मन इतरा रहा था। साजन से मिलने की चाहत कहीं हिलोरे ले रही थी, अचानक एक तेज आवाज़ ने झकझोर कर रख दिया।
बहू को वापस जाना होगा, उसका भाई आ रहा है लेने।
मै सहम-सी गई, आखिर ऐसी क्या बात हो गई, अभी तो इस अपने नए घर को देख भी नही पाई ठीक से, किसी से पहचान भी कर पाई।
आदेश तो आदेश था, मेरा भाई आया और चुपचाप मैं वापस भेज दी गई।
किसीसे कुछ पूछने की हिम्मत कहाँ थी मुझमें।
पिता के घर आकर देखा, सभी की आँखे अभी भी भरी हुई थी।
उनमें विदाई का ग़म था या मेरे इसतरह वापस आ जाने का दर्द,,नहीं कह सकती।
पर उन सभी आँखों मे एक बेबसी थी ,,,जिसने मेरे मुँह पर भी ताला जड़ दिया।
मेरे सपनों का महल बनने से पहले ही चूर-चूर कर दिया था दहेज नामक दानव ने।
धीरे-धीरे स्थितियाँ स्पष्ट होने लगी।
तभी एक संकल्प ले लिया था, आज के बाद कोई बेटी इस तरह बेघर नहीं होनी चाहिए, दहेज के दानव के पंजों मे फँसकर।
सबसे पहले बेटियों की शिक्षा और उससे भी पहले बेटों को संस्कारों की शिक्षा की अहमियत समझ में आई।
एक लक्ष्य जीवन का मिल गया, हर स्कूल और कॉलेज में जाकर इस बात को रखना, आज नैतिक शिक्षा खोती जा रही है पुस्तकों से,,,!
इसके साथ ही उन सभी के लिए एक आशियाना भी बनाया मैंने, जो इसतरह बेघर की गई हो।
पर फ़र्क था अब। इन सब बेटियों को इन्तज़ार नहीं था अपने उद्धार के लिए, बनाया था मैंने इन्हें सशक्त।
बर्षों बाद मुँहबोली बेटियों से सजे अपने आशियाने के तले हरी-लाल चूडियों से सजी कलाईयाँ देख आज भी आँखों में आँसू तो है पर खुशी के।
पाँच लघुकथा

चंदा प्रहलादिका
कोलकत्ता
लघुकथा-1
हक़दार
इतने वर्षो बाद अपने पति नरेन को सामने देख हतप्रभ हो गयी थी अनीता। जिसने दूसरी औरत के प्यार के चक्कर में उसे और उसके गोदी के बच्चे को छोड़कर दूसरा घर बसा लिया था।
पर आज अचानक न जाने कैसे, न जाने क्यों सामने आ खड़ा हुआ था।पति को इतने सालों बाद देख चौंक उठी थी वह। डर भी गयी, कहीं मेरे बेटे को छीनने तो नहीं आया है।
कितनी मुश्किलों से लोगों के घर काम करके बड़ा किया था उसे। एक ही सपना था कि बड़ा हो कर वह सारे दुःख दूर कर देगा।बेटे ने निराश भी नहीं किया था।जब अपनी पहली कमायी उसने मेरी हथेली पर रखी तो जैसे उम्र भर की थकन उतर गयी थी। पर फिर आज यमदूत की तरह पति सामने था।
पूछ ही लिया उसने, ”अब किसलिये आए हो?”
और वो बेशर्म बोल उठा,”मेरा बेटा कमाता है। उसकी कमाई पर मेरा भी हक़ है।”
सुन्न पड़ गयी थी वह। तभी फिर बेटे ने जीवनदान दिया,
”कौन बेटा,किसका बेटा? मैने नहीं देखा तुमको कभी। मैं सिर्फ मेरी माँ का बेटा हूँ। स्कूल में जब पूछा गया पिता के बारे में तो मैने कह दिया था कि मेरे पिता स्वर्गवासी हो गये।अब फिर कभी हमें चेहरा मत दिखाना। हक़ की बात करते हैं। हुँह…फ़र्ज़ भी कभी याद कर लेते!”
***
लघुकथा-2
उपहार
आज फिर चप्पल टूट गयी थी ।पाँच बार पहले भी ठीक करा चुकी थी वह।
क्या करती , तनख्वाह से घर का खर्च ही बहुत मुश्किलों से चल पाता था।बच्चों की पढ़ाई, बीमार पति की दवा में सब खर्च हो जाता।आज आफिस में फिर देर हो गयी थी।अभी घर जाकर खाना बनाना होगा, सभी भूखें होंगे।
चप्पल हाथ में उठा नंगे पैर ही घर को चल दी।घर के द्वार पर मोनू , सात साल का बेटा बोला, “माँ आज खुशखबरी सुनाऊँ ? ”
उसकी बात अनसुनी कर दी । हाथ पैर धोया और रसोई घर की ओर चल दी। आश्चर्य और खुशी की मिली- जुली भावना ने आँखे भिगो दीं। पति और ग्यारह साल की बेटी दोनों मिलकर खाना बना रहे थे।
व्हील चेयर पर बैठे पति, बेटी प्रिया को बताकर खाना बनवा रहे थे। तभी बेटी का स्पष्टीकरण देना और भी भावुक कर गया,
“ माँ प्रतिदिन आप बनाती-खिलाती हैं खाना । आज मैं खिलाऊंगी,आप बैठें ।”
खाने के पश्चात उसने मुझे हाथ में एक पैकेट दिया। मैंने देखा, चप्पल थी एक जोड़ी। आश्चर्यजनक, उसके पास पैसे?
शायद मेरा सवाल उसने समझ लिया और कहा ,“ मैंने कोई ग़लत कार्य नहीं किया। कुछ बच्चों को पापा और मैने पढ़ाना शुरू किया है जिससे आपको कुछ आराम मिले।मैं आपका हाथ बंटाना चाहती हूँ।
जीवन का सर्वोत्तम उपहार था यह एक माँ के लिये।
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लघुकथा-3
व्यापार
सर पकड़ कर बैठी थी मालती ।
जान बच गयी।
कुछ रोज पहले उसको बहुत बैचैनी के साथ श्वास लेने में कठिनाई भी हो रही थी।
कई सालों से फेफड़े की बीमारी के कारण श्वास की तकलीफ़ होती थी। पर ठीक भी हो जाती थी।इस बार परेशानी बढ़ती गयी थी। अस्पताल में भर्ती कराया गया।
आक्सीजन लगाते ही श्वास की प्रक्रिया सामान्य हो गयी थी।पर अस्पताल में एक बार भर्ती क्या हुई कि मना करने के बाद भी पाँच घंटे ढेर सारी जाँच हुई जिसकी कोई आवश्यकता नहीं थी । दर्द से रोना आ रहा था।तदुपरान्त भारी मात्रा में दवाईयां देनी शुरू
हुई थी। बहुत रोयी पर कोई सुनने वाला नहीं था ।दूसरे दिन कड़ी दवाइयों के विरुद्ध मालती ने आवाज उठायी थी।
क्योंकि आक्सीजन के अलावा और इलाज की आवश्यकता ही नहीं थी।
शाम को डॉ आये तो बोल पड़ी , “इतनी दवायें क्यों? मुझे नहीं चाहिए।”
डॉ नाराज होकर बोले, “आपका फेफड़ा खराब हो गया है। निमोनिया हो गया है।जिंदगी चाहिए तो जो हो रहा है होने दीजिए।”
मालती,” मुझे छोड़ दें।अपना भला बुरा मैं सोच लूंगी।”
डॉ नाराज हो गए पर दूसरे दिन छोड़ दिया था।
आज मालती ने निश्चय किया किसी दूसरे डॉ को दिखायेगी।
दूसरे डॉ को दिखाया, उसने कहा,“ आपको निमोनिया या और कोई बीमारी नहीं। श्वास की तकलीफ़ थी ।केवल आक्सीजन की आवश्यकता थी। अस्पतालों में व्यापार चलता है।आप बचकर आ गयी।आपने समझदारी की वरना इतनी कड़ी दवाओं के पश्चात आप बचती ही नहीं। क्योंकि आपका फेफड़ा कमजोर है।लंबे समय से फेफड़े की दवा की वजह से
शरीर के सभी अंग कमजोर हो गये हैं।”
***
लघुकथा-४
कड़वा सच
“कहाँ जा रहे हो ?”
माँ, मैं अभी आ रहा हूँ…रवि ने कहा—-
“अभी तो आया और फिर चल दिया “माँ ने फिर कहा।
“एक ज़रूरी काम याद आ गया ।”
“तेरा समय ,असमय इस तरह आना -जाना मुझे डरा देता है बेटा।”
“क्यों माँ -इतना डरती क्यों हो?”
माँ की आखों में आँसू भर आए…
“तेरे पिता भी ऐसा कहकर गये और वापस लौट कर नहीं आए। “
“माँ तुम हमेशा ये बात क्यों करती हो ?”
बुदबुदाया ..खुद भी दुखी होती है और मुझे भी करती है ।
कैसे बताता… माँ को,
पिता के साथ कोई दुर्घटना नहीं हुई थी ।
वो तो पैसों की तंगी से घबराकर घर से पलायन कर गये थे ।
जिनसे क़र्ज़ ले रखा था उनसे डर कर भाग लिए।बीबी बच्चे के लिए भी नहीं सोचा ,सब जानते हैं पर माँ नहीं समझती है।माँ दुखी न हो सोचकर बोलता नहीं ।
बहुत संघर्ष किया जिंदगी में इस मुकाम तक पहुँचने के लिये।
आज किसी ने ख़बर दी पिता की, उन्हें देखने ही जा रहा था ।
सोचा आकर माँ को बतायेगा ।
पिता की दयनीय हालत देखकर आँखें भर आई ।
अंतिम श्वास ले रहे थे। उन्होंने बुलवाया था बेटे को।
करुण स्वर में कहा-” बेटे एक सच बताना था तुम्हें। मैं पैसों की तंगी से डरकर नहीं भागा था।
मैं बुज़दिल नहीं हूँ।
गलत लोगों के चंगुल में फँस गया था ।
उन्होंने धमकी दी थी, मैंने उनके हेर -फेर के धंधें में साथ नहीं दिया तो मेरे परिवार को ख़त्म कर देंगे।
तुम माँ बेटे की जिंदगी की सलामती के लिए मैं तुमलोगों से दूर हो गया था।
वे लोग कभी तुम्हारे बारे में जान नहीं पाए ।
मैंने उनका साथ भी नहीं दिया। देश के साथ ग़द्दारी नहीं कर सकता था। बस उनसे बचकर भागता रहा हूँ।
एक सच यह कि केंसर जैसी खतरनाक बीमारी का शिकार हो गया हूँ ।
अंतिम समय आ गया। तुमसे सच कहकर मन हल्का हो गया। अब चैन से मर पाऊँगा ।”
रवि स्तब्ध सा खड़ा रह गया।
***
लघुकता-५
देवी जागरण
शाम हो गयी थी।अंधेरा सा हर जगह छाने लगा था। रानी के कदम तेजी से गंगा की बढ़ चले थे।आज अपने प्राण त्याग देने का निश्चय कर लिया था।
प्रतिदिन की ये मार प्रताड़ना अब और नहीं सहन होती थी उससे।शराब के नशे में चूर रवि बर्बरता की सारी हदें पार कर जाता है। उसे इंसान से जानवर बनते देर न लगती।
आज हदे पार हो गयीं। अब और अपशब्द व मार नहीं ।गंगा में कूदने लगी तभी पीछे से किसी ने खींचा,
“कौन क्या है ?”
“बिटिया!”
वो गाँव के मंदिर के पुजारी काका थे जिनसे प्रतिदिन मंदिर दर्शन के बाद प्रसाद लेती थी रानी। भगवान के समक्ष बहुत रोती थी तो हमेशा पुजारी काका उसे समझाते रहे थे।
सांत्वना का हाथ सिर पर आते ही रानी फफक कर रो पड़ी। काका बोले , “बेटी!एक नारी कभी इतनी कमजोर नहीं हो सकती।उसमें सदैव माँ दुर्गा का वास होता है।अपनी शक्ति को पहचानो।पति का सम्मान तभी तक है जब तक वो इंसान है , जब हैवान बन जाता है तो उस पर शस्त्र उठाना न्यायसम्मत हो जाता है। तुम्हें लड़ना है मरना नहीं। जिंदगी बहुत कीमती है।जाओ और मुकाबला करो।”
अचानक उसे लगा उसके भीतर असीम ऊर्जा का संचार हुआ है। उसने अन्याय के विरुद्ध लड़ने का संकल्प किया।
देवी जागरण आरम्भ हो चुका था।
पाँच लघुकथा

भगवती सक्सेना
बैंगलुरु
लघुकथा-१
दहेज
दो महीने बाद अक्षरा की शादी, डॉ साहब के दोस्त के बेटे से तय हुई है।
तभी कुछ विचारों का रेला उसे दो वर्ष पीछे खींच ले गया। अक्षरा एम एससी के अंतिम वर्ष में थी। एक दिन उसके पापा डॉ अश्विनी जी ने कहा, “बेटा, तुम्हारी माँ तो तुम्हे मेरे जिम्मे छोड़कर ईश्वर के घर चली गयी, पर मुझे जिम्मेदारी पूरी करनी ही पड़ेगी। आज तुम्हे देखने एक वकील का परिवार आ रहा है, भारत मॅट्रिमोनी से मैंने ढूढा है।”
“ठीक है पापा।”
एक बार देखने और एक बार बाहर मिलने के बाद शादी पक्की हो गयी।
दो महीने बाद की डेट भी तय हो गयी।
ऑनलाइन, ऑफ लाइन ढेरों शॉपिंग पापा और बेटी ने मिलकर किया। शादी की तैयारी के लिए एक महीने पहले चाचा चाची आ गए।
वकील साहब ने कोई मांग नही रखी, उनका विचार था, डॉ साहब की इकलौती बेटी है, सब समान तो देंगे ही। बेटा विशाल ड्राई क्लीनिंग की बड़ी सी दुकान का मालिक था।
शादी का दिन भी आ गया, सारे मेहमान इकट्ठे हुए। हर रश्म अक्षरा की शादी की पूरी हुई। शाम को धूमधाम से बारात आयी। एक बड़े से ग्राउंड में गोलाई में सारे व्यंजनों के स्टाल सजे थे, दोनों ओर के रिश्तेदारों ने छक कर मजे लिये।
रात बारह बजे शहर वाले अपने घरों में चले गए। सिर्फ नजदीकी रिश्तेदार ही बच गए। फेरे शुरू ही होने वाले थे, कि विशाल ने पापा के कान में पूछा, “कौन सी गाड़ी दे रहे ये लोग।”
वकील साहब डॉ साहब को एक तरफ ले जाकर बोले, “एक बात बताइये, बेटे की इच्छा है, एक बड़ी कार आप दें, मेरे पास मारुति ही है।”
डॉ बोले, “आपने पहले तो कोई मांग नही रखी।”
“मुझे लगा इकलौती बेटी है, आप सबकुछ देंगे।”
“वकील साहब, मेरी बेटी इन सबके बहुत खिलाफ है, वह सुनेगी तो बिफर पड़ेगी।”
वकील साहब चिल्ला पड़े, “ये भी कोई बात है, सबलोग देते हैं, कुछ नया नहीं है।”
उनकी आवाज़ का साथ बेटा भी देने लगा।
अब अक्षरा से सहन नहीं हुआ, उसने भी अपनी आवाज़ ऊंची करी, “अगर इस तरह आपलोग फेरे के पहले गाड़ी की डिमांड कर सकते हैं, तो फेरे के बाद रोज कुछ न कुछ आपको चाहिए होगा। माफ करिये, इस विशाल जिसका दिल बहुत छोटा है, मैं शादी नहीं करूंगी।”
डॉ साहब ने आकर बेटी को समझाया, “बेटी, ऐसे न बोलो, सारी बिरादरी जमा है, कुछ करता हूँ।”
“नहीं, पापा, बिल्कुल नहीं।”
और लौट के बुद्धू घर को गए….बारात वापस हुई।
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लघुकथा-२
खामोशी
मम्मी का फ़ोन आया, ” हेलो, वो राम मंदिर के पास वाली ताईजी का स्वर्गवास हो गया।”
और रजनी ने बोला, “वो जो हमेशा खामोश रहती थी।”
” हां ”
“एक बात बताइये मम्मी, वो छोटी सी ताईजी हर रविवार अपने प्रोफेसर बेटे बहू के साथ आती थी, सब लोग लगातार बातें करते थे, और ताईजी एक शब्द भी नही बोलती थी, क्या कारण था?”
एक बार अकेले में उनसे पूछा था, बोली, “शादी होकर आयी तो अनपढ़ सास ने कहा, जबान मत चलाओ, बहू हो, घर चलाओ, बेटे बहू के शासन में, एक बार कुछ बोला, तो जोर से बोले, जब कुछ नही जानती तो चुप रहिए और मैंने घर की शांति के लिए खामोशी से जिंदगी बिताने का फैसला कर लिया।
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लघुकथा-३
सुकून
आकाश ने अवनि से कहा, “क्या मिलता है दिनभर कहानी कविताएं लिखती रहती हो।”
“तुम नहीं समझोगे, सुकून मिलता है।”
तभी ऑफिस से बॉस का फ़ोन आ गया, “आकाश, लाजवाब लेखन है अवनि जी का। मेरी तरफ से बधाई बोलना।”
“किसका फ़ोन था?”
“सुनो, लेखन हमेशा जारी रखना तुम। अच्छा लगा, आज बॉस ने फ़ोन किया।”
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लघुकथा-4
भूख
रात भर धुआंधार बारिश हो रही थी, झोपड़ी जलमग्न हो चुकी थी।
धीरे धीरे चल पड़े मंगलू और पत्नी, गुड्डी का हाथ पकड़कर। तभी सड़क में एक कार हॉर्न बजाती हुई रुक गयी। उसमे से राकेश बाबू बोले, अरे मंगलू तुमलोग कहाँ जा रहे हो, मौसम विभाग की भविष्यवाणी हुई है, चार दिन बहुत भीषण बारिश होने वाली है।
“अच्छा, हम तो नही जानते, बाबू।”
“हां, हमारे घर चलो, वैसे भी तुम्हारी भाभी मायके गयी है, गुड्डी की अम्मा खाना बना देगी।”
“हां, साहब, ये तो बहुत अच्छा होगा।”
पर गुड्डी की अम्मा ने जबरदस्ती मंगलू को एक कोने में बुलाया, और बोली, नहीं, इसके घर नही जाना, दो दिन को इसकी पत्नी ने मुझसे बर्तन धुलवाए थे, मैंने स्वयं ही इसकी नजरो को परखकर काम छोड़ दिया था।
ये हमारी भूख के बदले अपनी भूख मिटाने कहेगा, चलो यहां से….
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लघुकथा-५
बुढापा
“सुलोचना, क्या चली गयी, बेटी ने माँ का रूप धारण कर लिया।”
“पापा, दवाई खा लीजिये, और जल्दी से सो जाइये, मोबाइल रात को बिल्कुल नही खोलना है, वरना नींद नही आएगी।”
“एक बात और, कम्बल ठीक से ओढना पड़ेगा, रात को ठंड बढ़ जाती है, कई बार मैं आकर आपका कम्बल ठीक करती हूं, बिल्कुल छोटे बच्चे बन गए हैं।”
“हे भगवान, क्या ये वही आरती है, जिसके पैदा होने पर अम्मा बोलती थी, बेटा तो हुआ नही, बुढ़ापे में कौन देखभाल करेगा। हां, एक बात तो माननी पड़ेगी, बेटा एक ही परिवार को रोशन करता है, पर बेटियां दोनो परिवारों को जगमग करती हैं। कभी कभी मैं भी इससे चिढ़ जाता हूँ, कितने बंधनो में रखती है, फिर याद आता है, एक उम्र में मैं इसे रोकता था, आज ये मुझे राह दिखाती है।”
“पापा, अभी फ़ोन पर मेरी सहेली ने एक हेल्पर नारायण का नाम बताया है, कल आएगा, पूरी बात उससे करना है, वो दिनभर आपके साथ रहेगा, महीने में एक बार मैं दो दिन को आकर सब व्यवस्थित करके जाऊंगी।”
“सुनो, आरती, तुम अपना भी ध्यान रखना, सुलोचना मुझे अकेला छोड़कर चली गयी, अब सिर्फ दिमाग तुम्हारे ही बारे में सोचता है, राकेश स्वभाव में ठीक है न, तंग तो नही करता।”
“नहीं, पापा, मैंने आपको क्या बोला था, कोई टेंशन नही लेना, सब बढ़िया है, वो राज अंकल से और मेरे से हमेशा मोबाइल में सब बातें करना, ओके, माई डिअर पप्पा, अब गुड नाईट…”
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