मंजुला एम, अखिलेश शर्मा, उषा किरण


पाँच लघुकथा

मंजुला म (हैदराबाद)

लघुकथा-१
गंध

खचाखच भरी बस में जैसे – तैसे उसने अपने लिए जगह बना ही ली। पसीने और परफ्यूम की मिश्रित गंध उसे भीतर तक तृप्त कर रही थी।निःसंदेह यह गंध उसकी पसंदीदा गंधोँ मे से थी अब यह गंध किसी अधेड़ महिला से आ रही हो या किसी षोडसी से इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था और हिचकोले खाती बस में यदि गलती से उनका कोई अंग उससे छू जाये तो बस सोने पे सुहागा। ” मैंनें जान बूझ कर कहाँ कुछ किया,अब गलती से कोई छू जाये तो इसमें मेरा क्या दोष? ” यही सोच हर बार वो खुद को शरीफों की श्रेणी में ले आता था।
वो अपने इसी आलौकिक सुख को लेने में मग्न था की तभी फोन की घंटी बजी “हेलो! गुड्डू हम बहुरिया को अस्पताल ले जा रहें हैं, लगता है समय से पहले ही बच्चा हो जायेगा, तुम सीधे अस्पताल पहुँचो।”
” जी अम्मा ” कहते हुए उसने फ़ोन काटा। उसका स्टॉप आने ही वाला था। उसने एक बार फिर उस गंध को अपने नाथूनों में भरा और बस से उतर गया। “सब कहते हैं लल्ला ही होगा, अम्मा कहती है तीन पीढ़ियों से खानदान में कोई लड़की नहीं हुई। ” उसके कदम तेजी से अस्पताल की ओर बढ़ गए।
” अरे लल्ला तेरे तो भाग खुल गए, दुर्गा अष्टमी के दिन बेटी आई है घर में” अम्मा उसे देखते ही चहकी ” ले तू भी देख ले “अम्मा ने कहा तभी उसके कानों में अस्पताल में चल रहें टी. वी की आवाज़ कानो में पड़ी ” घर, बस, ट्रेन, अस्पताल, बेटियाँ कहीं भी सुरक्षित नहीं ” और उसके बढ़े हाथ रुक गए। पहली बार अपने नथुनों मे भरी गंध से उसे घिन्न आई और अपनी नवजात बिटिया को देख मन के भीतर कुछ भीगा सा महसूस हुआ, जाने क्यों टुकुर- टुकुर देखती उन मासूम आँखों से वो नजरे नहीं मिला पा रहा था।

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लघुकथा-२
डिअर डायरी

20/3/2006
आज मेरी शादी हो रही हैं। पापा आँगन की चिड़िया कहते हैं मुझे, कहते हैं मेरे बिना इस घर का कोई अस्तित्व ही नहीं। जाने कैसे रहेंगे वो मेरे बिना और जाने कैसा होगा वो घर जहाँ बाकी का जीवन बिताना है। उफ्फ पेट में तितलियाँ उड़ना क्या इसी को कहते हैं?
18/9/2008
उन्होंने आज फिर मुझे अपंग कहा, कहा की उनके बिना मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं, इक कदम नहीं चल सकती मैं उनके बिना। कभी-कभी अपने अस्तित्व पर शक हो जाता है। कहीं वो सच तो नहीं कह रहे। क्यूँ मन के घाव शरीर की चोट से अधिक दर्द देते हैं?
15/ 7 /2016
आज यूँ लगा जैसे सचमुच ही मेरे हाथ पाँव ही नहीं हैं। गुड्डू नें भी कितनी आसानी से कह दिया ” माँ! तुम्हे कुछ नहीं आता, बस घर में पड़ी रहती हो। ” केवल इसलिए कि मैं घर से बाहर जाकर नहीं कमाती मेरी कोई पहचान नहीं। अरे दिन रात बस इन्ही के लिए खटती हूँ, घर तो छोड़ो घर के बाहर लगी तख्ती में भी मेरा नाम नहीं। कभी वर्मा जी कि बेटी कभी मिसेज शर्मा तो कभी गुड्डू कि मम्मी… सच ही कहते हैं ये लोग,मैं हूँ ही अपंग इसके सहारे के बिना कुछ नहीं। क्या सच में मैं कुछ नहीं?
16/7/2023
आज का दिन बहुत खास हैं। ऐसा लग रहा हैं फिर से चिड़िया बन गई हूँ। एक बार फिर पेट में तितलियाँ उड़ रही हैं। अपनी पहचान बनाने का ये सफर आसान नहीं था। ऐसा लगा मानो बरसों व्हील चेयर पर रहने के बाद फिर चलना सीखा हो । मगर आखिर मैं बिना सहारे के चलना सीख ही गई। आज जब मंच पर मुझे सम्मान देने के लिए बुलाया जायेगा तब मैं, मैं होऊंगी… मैं “अपराजिता”… केवल “अपराजिता “।
मौलिक एवं स्वरचित
मंजुला

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लघुकथा-३
चिट्ठी

“वो चिट्ठियों का जमाना था।मैं ठहरी अनपढ़… लेकिन बड़ी इच्छा थी कि तेरे दादाजी मुझे चिट्ठी लिखें, अक्सर उनसे कहती जब वो गाँव आते…फिर आखिर एक दिन उन्होंने चिट्ठी भेज ही दी” कहते हुए दादी कहीं खो सी गईंं।
“फिर…फिर क्या हुआ?दादी,आपने वो चिट्ठी पढ़ी कैसे?” पोती की उत्सुकता कम नहीं हो रही थी।
Reliance”अरे! तब घर से बाहर निकलने की इजाजत न थी हमें…और घर में सास, ससुर, देवर थे…. किसी से कहती तो बेशरम कहलाती। किससे पढ़वाती…बस रोज उलट पलट कर देखती और छुपा कर रख लेती…अब तक न पढ़वाई हमने वो चिट्ठी…बस ऐसे ही तेरे दादाजी से झूठ मूठ कह दिया कि पढ़वा लिया वरना उन्हें बुरा लगता ना”। दादी के स्वर में एक उदासी सी पसरी थी।
“क्या कह रही हो दादी…अब तक नहीं पढ़वाया…बताओ, बताओ कहाँ है वो चिट्ठी, मैं पढ़ देती हूँ” पोती ने आश्चर्य से कहा।
“तू …सचमुच पढ़ेगी” दादी की बूढी आँखों में चमक आ गई। “चल ठीक है…ज़रा सुनूँ तो क्या लिखा था तेरे दादाजी ने”। दादी ने संदूक से चिट्ठी निकालते हुए कहा “ले” ।
पोती ने दो घड़ी चिट्ठी को निहारने के बाद पढ़ना शुरू किया –
“प्यारी कमला,
ढेर सारा प्यार, मैं यहाँ कुशल से हूँ। मेरे वहाँ न होने पर भी तुमने इतने अच्छे से घर को सम्हाला है, तभी तो मैं यहाँ बेफिक्र होकर काम कर पा रहा हूँ। तुम मेरी ताकत हो। सबके साथ अपना भी खयाल रखना।
तुम्हारा,
किशोर
दादी आँखे बंद किए चिट्ठी सुन रही थी। जाने कब आँसू आँखो के कोरों से बह निकले।पोती ने चुप चाप चिट्ठी दादी को पकड़ा दिया। उसमें कुछ नहीं लिखा था, सिवाय टेढ़ी मेढ़ी रेखाओं के।दादाजी भी तो अनपढ़ थे…ये बात शायद दादी कभी न जान पाईं।

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लघुकथा-४
” डिसकनेक्ट ”
“ओह! नहीं” दोनों ने एक साथ कहा। तकनीकी खराबी के कारण दोनों के डिवाइसेज ने काम करना बंद कर दिया था। गुस्से से भरे दोनों ने काफी समय बाद सर उठाया और आस-पास का जायजा लिया। सहसा एक दूसरे से नज़र टकराई –
” ओह! ये तुम हो, काफी बदल गई हो। पहचान में ही नहीं आ रही”
” तुम भी , काफी बदल गए हो”
“हम्म..जहाँ तक मुझे याद आ रहा है , मेरे माँ- बाप भी यहीं रहते थे ।”
” हाँ..शायद।” उसनें बेरुखी से कहा।
“और हमारे बच्चे ? ”
” उनके हाथ मे जब से ये डिवाइस लगा है , उनका कुछ पता नहीं ” उसने बताया
” लगता है काफी समय बीत गया है..सबकुछ कितना बदल गया है…है ना?”
” हाँ…” उसने बेचैनी से अपने डिवाइस का जायजा लेते हुए कहा।
“और…” उसने कुछ कहने के लिए मुंह खोला ही था ,कि तभी उनके डिवाइसेज मे एक साथ ” बीप” की आवाज़ आई। दोनों के चेहरे पर आई चमक ने बता दिया कि उनके डिवाइस.पुनः काम ourकरने लगे है और बिना एक क्षण गंवाए दोनों फिर एक बार अपनी – अपनी आभासी दुनिया में खो चुके थे।

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लघुकथा-५
इसकी टोपी उसके सर

” चलो-चलो रैली का समय हो रहा है । अरे ! ये क्या ये टोपी….?” जब उसने कहा तो साथ बैठकर खाना खा रहे दोनो ने एक दूसरे को देखा ,फिर ठठाकर हंस पड़े-
” वो क्या है साहब, खाना खाते बखत नीचे रखा था , और पता नहीं कब एक दूसरे की टोपी पहन ली ” पहले व्यक्ति ने कहा
” वैसे भी क्या फरक पड़ता है साहब , लाठी और पथ्थर ही तो बरसाना है फिर चाहे इस टोपी को पहन कर फेंको या उस टोपी को ” दूसरे व्यक्ति ने दांत निपोरते हुए कहा
” हम्म् ज़बान कुछ ज्यादा नहीं चलने लगी तेरी..चल-चल समय हो रहा है ” उन्हें लेने आए व्यक्ति ने गुस्से से कहा
” चल फिर शाम को टपरी पर मिलते हैं…..अगर जिंदा रहे तो…” कहते हुए पहले व्यक्ति ने दूसरे का हाथ थाम लिया और फिर दोनों अपनी जैसी टोपी वाले गुटों में शामिल हो गए।

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पांच लघुकथा


अखिलेश शर्मा
R – 1 A – 904, Tower – 11
गुलमोहर गार्डन, राजनगर एक्सटेंशन
ग़ाज़ियाबाद उत्तर प्रदेश, 201017
चलभाष : 9868646053, 9013887282

लघुकथा – 1
जूते

रामाधीन ने आनन-फानन अपने हाथ रिक्शा में ताला लगाया और अपने एक कमरे के घर में को दौड़ा।
“देख मुझे क्या मिला।” रामाधीन घर में घुसते ही चिल्लाया। इससे पहले कि उसकी पत्नी सुनीता आंगन में लगे नल पे कपड़े धोने का काम अधूरा छोड़ कर अंदर तक आती, रामाधीन ख़ुद ही उसके पास पहुंच गया।
“जूते ! नये हैं ?” सुनीता अपना काम करते-करते बोली।
“मूरख, नये कौन देता है ? लेकिन ये नये से ही हैं !”
“क्या पता पड़ती है, मर गया होगा किसी सेठ का बाप कह कर कि मेरे मरे पे जूते बांटना या किसी पंडितजी ने किसी सेठ को कोई उपाय बता दिया हो जूते बांटने का…!”
“पुराने हैं। लेकिन देख एकदम नये हैं। बाज़ार में सवारी उतार कर इधर आ रहा था, एक आदमी ने आवाज़ दी। दो थे वो। आदमी-औरत। मुझे रोका और ये थैला पकड़ा दिया। बोले –‘जूते हैं। किसी मरे-सरे के उतरे-उतराये नहीं हैं तो भाई संकोच ना करना पहनने में। मैंने अपने लिये ख़रीदे थे, दो बार पहन लिये लेकिन फिट नहीं हो रहे, वापिस अब होंगे नहीं। तुम पहन लेना।”
“तो फिर नये से कहाँ से हुये, पुराने ही तो हुये।”
“हाँ ठीक है, पुराने ही हैं। दो बार पहनने से पुराने होते हों तो यही ठीक। हालत देख, एकदम कोरे लग लग रहे हैं।”
“तुम्हारे पैर से तो बड़े हैं।”
रामाधीन ने जूते पैरों में डाले। एकदम ढीले, दो नंबर बड़े।
दोनों ज़मीन पर रखे जूतों को एकटक देखे जा रहे थे।
“एड़ी में कपड़ा बांध कर फिट हो जाएंगे।” रामाधीन बोला।
“सर्दियां आने वाली हैं। तुम्हारे पैर ठंड से सूज जाते हैं। भगवान भला करे देने वाले का।” सुनीता ने जूतों को हाथ में ले लिया और उन्हें ऐसे देखने लगी जैसे कोई माँ, गोद में सो रहे अपने बच्चे को निहारती है।
“मुन्नी के लिये भी तो खरीदने हैं जूते। उसकी मैडम दस दफे कह चुकी हैं कि चप्पलों में स्कूल ना आया करो।” सुनीता जैसे जागी।
“दास के पास ले जाऊं…अगर अच्छे पैसे दे दे तो उसे बेच ही ना दूँ!” रामाधीन भी जूतों को घूर रहा था।
“एक नंबर का बदमाश हैं दास। अब तो नखरे ही अलग हो रखे हैं उसके। अपने खोखे पे बोर्ड लगवाया है उसने, दास कोबलर, अंग्रेज़ी में। चप्पलों पे दो टांके लगाने के बीस रूपये के लेता है। इन जूतों के तुम्हें ज़्यादा से ज़्यादा पचास रूपये पकड़ा देगा और खुद बेचेगा तीन सौ में।”
“छह-आठ सौ से कम ना होंगे इनके दाम !”
“लेकिन पहनोगे कैसे ?”
“सोचता हूँ कुछ।” कहकर रामाधीन ने फिलहाल के लिये वार्तालाप को विराम दिया। रोटी खा कर आधे घंटे बाद वो फिर रिक्शा लेकर निकल पड़ा। साथ अपने जूतों का थैला भी ले लिया। रात में नौ बजे लौटा।
“जूते कहाँ गये?” सुनीता ने पूछा।
“बेच दिये। दो सौ में। कल मंगल बाज़ार लगेगा, मुन्नी के लिये जूते खरीदने चलना मेरे साथ…बस चुप, कुछ नहीं कहना है। बात ख़त्म।”
सुनीता खाना लगाने के लिये खड़ी हो गयी। उसने भी चैन की सांस भरी – छाती पर से बोझ हटा !

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लघुकथा – 2
वीआईपी

“तीस रुपए लगेंगे।” रिक्शावाले ने लापरवाही से कहा। बोलते समय रिक्शावाला हांफ रहा था। उसकी कमीज़ पसीने से तर और मैल से चीकट थी।
“भई इतना दूर तो है नहीं।” ग़रीब ने रिक्शावाले के मुंह से उठती शराब की दुर्गंध महसूस कर ली थी।
“इतना ही लगेगा। दोपहर से बीस सवारी छोड़ चुका हूँ वहाँ तक। बड़े ही मोटे-मोटे लोग आए हैं भाई !” रिक्शावाले ने मुंह दूसरी तरफ कर लिया। असल में जाने का उसका मन बिल्कुल था ही नहीं।
ग़रीब ने अपना झोला संभाला और पैदल ही चल पड़ा। वो समझ गया था कि इतना ‘कमा’ लिया है रिक्शावाले ने कि जो ख़ून पसीना बहा है उसकी पूर्ति शराब ख़रीद कर और उसे पेट में उडेल कर कर दे।
ग़रीब लंगड़ाता हुआ चले जा रहा है। जिस लोकल बस में चढ़ कर वो आया है, उसमें बेतहाशा भीड़ थी जिसमें उसका पैर कुचल गया है और अब उसमें दर्द हो रहा है। पैर दर्द के चलते ही उसने रिक्शा करने की सोची थी, वर्ना वो और रिक्शा !
जिस जगह उसे पहुंचना है वह एक बड़ा बैंक्वेट हॉल है, जहाँ आज उसका अभिनंदन होना है। शहर के एक नामी कवि ‘तन्हा’ की सातवीं पुस्तक का लोकार्पण है और तन्हा ने यह पुस्तक गरीब को समर्पित की है।
बैंक्वेट के बाहर कारों की कतारें हैं। दसियों सुरक्षा गार्ड यातायात व्यवस्था सुचारू करने में मग्न हैं। ग़रीब लंगड़ाता हुआ बैंक्वेट के भीतर जाने लगा। सुरक्षा गार्डों ने उसे थाम लिया और बाहर भगा दिया। ग़रीब खूब चिल्लाता रहा कि जिस तन्हा की पुस्तक का लोकार्पण हो रहा है, वह उसी के बारे में है, उसी को समर्पित है, उसे अमीर ने ख़ुद बताया था कि ‘उससे ही कवि को प्रेरणा, शब्द, भाव, दर्द, भाषा इत्यादि मिले हैं, वह वीआईपी है आज के आयोजन का’ लेकिन किसी ने उसकी ना सुनी।

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लघुकथा – 3
जीवन
एक सुबह उसे ईश्वर मिला। उसने ईश्वर से कहा –‘मैं ख़ूब सारा जीना चाहता हूँ।’
ईश्वर हंसा और बोला –‘सबको जीना चाहिए। बस जान लो कि ख़ूब सारा कितना सारा होता है।’
एक दोपहर उसे ईश्वर मिला। उसने ईश्वर से कहा –‘मैं कैसे अपने जीवन को अर्थवान बनाऊँ?’
ईश्वर हंसा और बोला –‘बहुत आसान है। उन्हें अर्थ दो जिन्हें सब निरर्थक समझते हैं।’
एक शाम उसे ईश्वर मिला। उसने ईश्वर से कहा –‘कोई भी तो अर्थवान जीवन नहीं जीना चाहता।’
ईश्वर हंसा और बोला –‘यही एकमात्र सत्य है। इसी सत्य के साथ जीना सीखो।’
एक रात उसे ईश्वर मिला। उसने ईश्वर से कहा –‘क्या जिया, जीवन निरर्थक रहा।’
ईश्वर हंसा और बोला – ‘अरे नहीं। तुम ही तो जी पाए क्यूँकि तुम जान पाए कि जीवन निरर्थक है।’

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लघुकथा – 4
कच्चा प्रेमी, पक्का प्रेमी

दोनों ही जानते थे कि शायद यह आख़िरी मुलाक़ात होगी उन दोनों के बीच। शायद इसलिए कि प्रकृति ने ही कभी कहीं मिलवा दिया अचानक से तो बात जुदा होगी, वरना ख़ुद से तो वे प्रयत्न करने से रहे। दोनों में से किसी के भी प्रयत्न करने का अर्थ होगा वो क़ौल तोड़ना जो उन दोनों ने दो दिन पहले कॉलेज की कैंटीन में बैठ कर एक दूसरे से किया था– ‘यह रिश्ता ख़त्म…हम एक दूसरे से कभी टकराए तो ऐसे मिलेंगे जैसे कभी एक क्लास में साथ पढ़ने वाले दो लोग मिलते हैं जिनकी स्मृति में बस एक दूसरे का धुंधला-धुंधला चेहरा भर होता है, उससे ज़्यादा कुछ नहीं।’

दो दिन बाद दोस्तों ने एक पार्टी का आयोजन कर लिया लड़की की शादी के उपलक्ष्य में। लड़की की शादी इस शहर से सात सौ किलोमीटर दूर, उसके भावी पति, जो कि एक अमीर सरकारी अधिकारी है, के शहर में जाकर संपन्न की जानी है, जिसमें शायद कोई मित्र जा पाए, इसलिए दोस्तों ने यहाँ इस पार्टी का आयोजन कर लिया है। सब हंस रहे हैं। सब आनंद ले रहे हैं। सब दोस्त पैसे इकठ्ठे करके एक तोहफ़ा लाए हैं। लड़के को कहा गया कि सबकी तरफ़ से लड़की को वो तोहफ़ा दे। लड़का उठा, तोहफ़ा हाथ में उठाया और लड़की की तरफ़ बढ़ा। लड़के के हाथ कांप रहे थे। इससे पहले कि तोहफ़ा उसके हाथों से लडकी के हाथों तक पहुंच पाता, लड़का ख़ुद को संभाल नहीं पाया और उसकी रुलाई छूट गई। कोई नहीं समझ पाया कि लड़के को अचानक से क्या हो गया। अभी तक कोई नहीं जानता था कि लड़का और लड़की के बीच में कुछ चल रहा था, लेकिन अब सबको अंदाज़ा हो गया था। दोस्तों के बीच घोर आश्चर्य था कि कैसे किसी को भी इस रिश्ते की भनक तक नहीं लगी। लड़का रोया तो लड़की भी ख़ुद को संयमित ना रख सकी और ज़ार-ज़ार रोने लगी। पार्टी की ख़ुशी, एकदम से काफ़ूर हो गई। लड़की और लड़का बहुत देर तक रोने के बाद चुप हुए।

सब लोग यही पूछ रहे थे कि यदि उनमें कुछ था तो आगे क्यूँ नहीं बढ़े, यह जुदा हो जाने का निर्णय क्यूँ ? दोस्तों ने यह भी कहा कि अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है यदि वे फ़ैसला करें तो सब उनकी मदद करेंगे।

लड़की ने जवाब में कहा – ‘नहीं। कोई फ़र्क नहीं पड़ता अब साथ रहने या नहीं रहने से। हम प्रेम में हमेशा साथ रहेंगे। सच पूछो तो यहीं रुक जाना बेहतर रहेगा वरना हम उकता जाएंगे प्रेम से। बहुत सोच समझ कर शादी करने का निर्णय लिया है मैंने।’

लड़का मूर्खों की नाईं, लड़की का मुंह देखे जा रहा था।

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लघुकथा – 5
विधान

छोटा-मोटा बिल्डर बन गया हैं वो। हज़ार से पांच हज़ार गज नाप के प्लॉट ख़रीद लेता है वो फिर उन पर मकान, फ्लोर बना कर बेच देता है। यह सब कुछ उसने पिछले दस वर्षों में सीखा और आजमाया है। ज़मीनों के इस काम में उतरने से पहले उसकी एक बहुत अच्छे से चलती हुई जूतों की पुश्तैनी दुकान थी। छोटी सी दुकान और पुराने शहर में छोटा सा घर। बाज़ार के कुछ व्यापारियों ने मिलकर कमेटी डालना शुरू किया। उसने और उसके दो चार दुकानदार साथियों ने अन्य के साथ कुछ घपला कर मारा और इस तरह से मोटा पैसा हाथ लगा। धीरे-धीरे वो आगे ही आगे बढ़ता चला गया। वो उस बाप का बेटा था जिस बाप ने चार रुपए बचाने के लिए आठ किलोमीटर पैदल चलना ज़्यादा बेहतर समझा था और इसका बेटा वो है जिसे कार के बिना किसी दोस्त-रिश्तेदारी में जाने में शर्म आती है। पैसा जब आने लगा तो स्वाभाविक रूप से डर और चिंता भी बढ़ने लगे। डर इस बात का कि उसने जिन लोगों के साथ चालबाज़ियाँ करीं हैं उनकी बददुआ ना लगे और चिंता इस बात की कि कैसे इस बेशुमार पैसे को लुटने या अपव्यय से बचाया जाए। नाना प्रकार के भय के चलते वो धर्म की शरण में चला गया। एक निर्धन और सात्विक व्यक्ति जब धर्म की शरण में जाता है तो उसका आत्मिक, मानसिक, आध्यात्मिक उद्धार होता है लेकिन एक भ्रष्ट व्यक्ति को वहाँ सिवाय स्वयं को धोखे में रखने की धूर्त समझ के अलावा कुछ नहीं मिलता। निर्धन और सच्चे व्यक्ति को धर्म में संतोष और शांति मिल सकती है लेकिन पाखंडी और स्वार्थी को कुछ नहीं मिलता।

ये हुआ उसके साथ कि वो बहुत ही निम्न और ओछे स्तर का कृपण और काइयाँ होता चला गया। इधर बेटे के जीवन में ना पिता के लिए सम्मान था ना ही पैसों के लिए जिम्मेवारी। उसका काम था, दिनरात आवारागर्दी और पैसे फूंकना।

अब चार पंक्तियों में कथा ख़त्म करता हूँ। पिता ने एक दिन बेटे को उसकी फिजूलखर्ची के लिए पैसे देने से मना कर दिया। बेटे ने पिता को ख़ूब गालियाँ सुनाईं और हाथ भी उठा दिया। बेटे ने पिता को इतना मारा कि पिता के प्राण निकल गए। बेटे ने पिता के पैसों का इस्तेमाल किया और कालांतर में सारी कानूनी कार्यवाहियों से बच निकला।


पाँच लघुकथा।
उषा किरण, पटना, बिहार

लघुकथा १
स्पर्श

अतीत की यादों में लिपटी वह भयभीत हिरणी की तरह चौकन्नी होकर अपने बेटे के जागने के इंतजार में अपने ही बुने ताने बाने में लिपटी थी।कितनी कठिनाई से उसने एकलौते बेटे को शादी के लिए राजी किया था।पिता के नहीं रहने पर बहुत अक्खड़ हो गया था। बेटा आर्मी आफिसर था। जब भी शादी की बात चलती तो किसी न किसी बहाने टाल जाता।उम्र निकलती जा रही थी।खैर, माँ की जिद के आगे उसने हामी भर दी और माँ ने आनन फानन में शादी ठीक कर दी ।लड़की बेटे से दस बारह साल छोटी अल्हड़ किशोरी । माँ ने सोचा शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा। बेटे ने भी माँ की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए शादी कर ली ।
लेकिन परिस्थितिवश शादी की रात ही नई दुल्हन को देखे बिना उसे उसी रात अपने नौकरी पर लौट जाना पड़ा। इधर नई नवेली बहू बिल्कुल नासमझ।ससुराल के तौर तरीके सीखने के बजाय बिल्कुल गाँव की अल्हड़ किशोरी की तरह कभी अमरुद के पेड़ तो कभी गाँव के कुएँ पर अपनी हमउम्र किशोरियों के साथ अठखेलियों में मस्त।सासु माँ प्यार से सिखाती कि ” देख बहू, तुम्हारा पति थोड़ा अक्खड़ किस्म का है।थोड़ा तो कुछ पकाना सीख ले ।” लेकिन वो तो खुद में मस्त।दुनियादारी से कोसों दूर।माँ बेचारी दिन रात चिंता में डूबी रहती कि जब बेटा छुट्टी में घर आएगा तो पता नहीं क्या करेगा? दो महीने बीतने को थे, लेकिन लाख समझाने पर भी वही ढाक के तीन पात। तभी एक शाम बेटा अचानक आ पहुँचा।
रात बीतने को थी, लेकिन माँ की पलकें सुबह की कल्पना से एक मिनट के लिए भी न झपकीं ।पता नहीं बहू का अल्हड़पन क्या रंग लाएगी?माँ चार बजे सुबह ही उठकर रसोई में जाकर बैठ गयी और बेटे के जगने का इंतजार करने लगी।अचानक एकदम करीब से बेटे की पदचाप से उसकी तन्द्रा टूटी।नजरें उठाई तो देखा कि बेटा सामने खड़ा है और पीछे पीछे गम्भीर सधी हुई धीमी चाल से बहू भी सीढ़ियों से मंद मंद मुस्कराती हुई उतर रही है। बेटा हंसते हुए कह रहा है कि ” माँ! तुमने बहुत अच्छी बहू मेरे लिए चुनी । ”
इधर माँ आश्चर्यमिश्रित मुस्कान के साथ सोच रही थी कि क्या
” स्पर्श ” में इतनी जादुई शक्ति है कि एक रात में इतनी चुलबुली नवयौवना को धीर गंभीर युवती बना दे?

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लघुकथा २

शगुन का टीका

चारों तरफ अफरा- तफरी मची हुई थी। दरवाजे पर बैंड- बाजे की आवाज से एक दूसरे की बात सुनने में कठिनाई हो रही थी। बारात थोड़ी देर में निकलने वाली थी।
घोड़ी पर चढ़ने को तैयार अमित ने चारों ओर नजर दौड़ाई लेकिन माँ कहीं नजर नहीं आई। उसके चारों तरफ चाची ,फुआ, रिश्ते की बड़ी बहन सब उसे घेरे खड़े थे और जल्दी से घोड़ी पर चढ़ने को मनुहार कर रहे थे क्योंकि बारात जाने में देर हो रही थी। लेकिन अमित की आँखें माँ को खोज रही थी।
माँ बेचारी अपने कमरे में बैठ रो रही थी और सोच रही थी कि पति के गुजर जाने के बाद बेटा को इतनी कठिनाई से पाल- पोस कर इस योग्य बनाया कि आज वह एक उँचे ओहदे पर है लेकिन इतनी खुशी के मौके पर वह अपने बेटे को एक शगुन का टीका भी नहीं लगा सकती।खैर, कोई बात नहीं।बच्चा सही सलामत रहे,इससे बढ़ कर एक माँ के लिए क्या खुशी हो सकती है? अचानक उसकी तंद्रा टूटी तो देखती है कि अमित उसका हाथ पकड़ कह रहा है कि बाहर चल कर मुझे शगुन का टीका लगाओ। तभी महिलाओं की झुंड में से आवाज आयी कि माँ शगुन का टीका नहीं लगा सकती क्यों कि वो विधवा है।उसके टीका लगाने से अमंगल हो जाएगा। सभी एक दूसरे को देखने लगीं और बार – बार अमित को अपशगुन की बात समझाने लगी। लेकिन अमित को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ा।
अमित माँ का हाथ खींचते हुए बाहर ले आया और बोला कि जिस माँ ने कदम- कदम पर मेरे भविष्य के लिए ईश्वर के सामने मेरे लिए मंगलकामना की, आज उस माँ के हाथ शगुन का टीका लगाने से अमंगल कैसे हो सकता है? और सभी के विरोध करने पर भी माँ के हाथों टीका लगवा कर ही घोड़ी पर चढ़ा।

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लघुकथा ३

बैसाखी का सहारा

उस दिन सुबह से झड़ी लगी थी। सुरभि बालकनी में खड़ी बारिशों की बौछार में नहाए दार्जिलिंग की वादियों को निहारते हुए अतीत के आँगन में विचरण कर रही थी कि किस तरह शादी के शुरुआती दिन मजे में बीत रहे थे। रोज शाम में घूमना- फिरना और रात का खाना प्रायः बाहर ही होता। लेकिन ये सिलसिला ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाया। एक तो अमन को हॉस्पिटल से छुट्टी नहीं मिलती और दूसरी अभी तनख्वाह भी ज्यादा न थी। फिर चार साल होते – होते दो बच्चे भी हो गए। नतीजा काम भी बढ़ गया और मन मुताबिक खर्च करने के लिए पैसे भी नहीं। सुरभि कोई काम खुद से नहीं करना चाहती थी। हर काम के लिए सहायक चाहिए।अमन समझाता कि अभी मैं छोटा डॉक्टर हूँ ,काम का बोझ ज्यादा है। फिर जितना सीखूँगा,भविष्य में मेरे लिए उतना ही अच्छा होगा।लेकिन कोई फायदा नहीं।उल्टा सोचती कि क्यों डाक्टर से शादी की, जिसके पास प्यार के दो बोल नहीं। उसके पास तो हमेशा मरीजों की चीख- पुकार मची रहती, वह प्यार की परिभाषा क्या जाने?सुरभि के रुखे व्यवहार से अमन भी घर में बुझा- बुझा रहता। अभी वह अपने ख्यालों में गुम ही थी कि उसकी नजर दूर चढ़ाई पर चढ़ती एक नवयुवती पर पड़ी, जो अपने काँधे पर सूटकेस और बैग रखे पास आ रही थी। नजदीक आने पर उसने सवालिया नजरों से केयरटेकर रामसिंह को देखा। फिर पूछा–
‘यह लड़की कौन है? ‘
‘आपने पहचाना नहीं, मेमसाहेब! यह तो अपनी प्रेमा है। बहुत पहले जब आप आयी थीं तो छोटी थी। आप उसे चॉकलेट खिलाया करती थीं। अब बड़ी हो गई है।इसकी शादी कर दी। बड़ा अच्छा लड़का है। चाय बागान में काम करता है। ‘ उसने देखा कि प्रेमा बहुत नाजुक – सी और खूबसूरत है।
उसने उसे अपने पास बुलाकर कहा कि जब तुम्हारा आदमी चाय बागान में अच्छा- खासा कमाता है तो फिर तुम्हें इतना परेशान होने की क्या आवश्यकता है?प्रेमा आश्चर्य से देखते हुए बोली, ‘नहीं मेम साहब, मेरा आदमी दिन भर बाहर खटता है तो क्या मैं इतना सा भी नहीं कर सकती? चार पैसा कमाऊँगी तो घर अच्छा से चलेगा।फिर मैं बीबी क्या हुई?दोनों को साथ- साथ काम करना चाहिए न मेम साब । आगे का भी तो देखना है।’ कहते हुए वह थोड़ा शरमा गयी। सामान ढोने से सर्दी में भी उसके माथे पर पसीने की बूंदें झलक रही थीं । लेकिन वह कितनी खुश , कितनी संतुष्ट नजर आ रही थी।
एक अनपढ़ गंवार पहाड़ी लड़की ने कितनी बड़ी बात कह दी थी, जिसे समझने में दर्शनशास्त्र में एम ए पास सुरभि ने अपने जीवन के दस अनमोल वर्ष गँवा दिए थे। आज इन पहाड़ी वादियों में जैसे उसके लड़खड़ाते कदमों को बैसाखी का सहारा मिल गया।

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लघुकथा ४

अंतर रिश्तों का

पूरा घर – बाहर आम्र- पल्लव के बंदनवार सजे थे। एक
ओर दरवाजे पर शहनाई की मीठी – मीठी धुन सुनाई दे रही थी तो दूसरी ओर आँगन से मंगल – गीत की ध्वनि कानों में मिश्री घोल रही थी।पूरा घर अफरा तफरी मची हुई थी.क्यों न हो, आखिर गाँव के सबसे धनाढ्य वकील गोपाल बाबू की इकलौती बिटिया गुड़िया की शादी जो
थी ।
इतने में ही शोर मचा कि शोभा दीदी आ गयी। सभी अपने अपने काम छोड़ दौड़ पड़े उनकी अगुवानी में। घर की मालकिन भी खुद भागते कदमों से ननद की अगुवाई के लिए जा पहुँची। घर की महराजिन अपनी नई नवेली बहू को बताने लगी कि मालिक की इकलौती बहन हैं । बहुत बड़े घर में ब्याही गई हैं, बर्षों बाद मायके आयी हैं।
कमरे में जाते ही शोभा निढाल सी जाकर एक बिस्तर पर भाभी के साथ बैठ गयी और हल्दी लगी भतीजी को निहारने लगी । मन में एक हुक – सी उठी। उसके मानस पटल पर बर्षों पुरानी यादें चलचित्र के समान एक एक कर आने लगीं। भैया का दोस्त अमित का घर में आना- जाना था। अमित किसी सरकारी उच्च पद पर आसीन था और बहुत ही शालीन स्वाभाव का जिंदादिल इंसान था।भाभी से भी खूब हंसी मजाक चलता।पता नहीं कब और कैसे अमित और शोभा एक दूसरे को पसंद करने लगे। लेकिन एक दिन भैया काफी गुस्से में अंदर आए और बोले कि आज से अमित इस घर में नहीं आएगा। बहुत पूछने पर भाभी से पता चला कि वह शोभा का हाथ माँग रहा था, जिसे भैया ने यह कहकर इन्कार कर दिया कि विजातीय में दोस्ती तो हो सकती है लेकिन रिश्ता नहीं।एक वर्ष बाद भैया ने काफी जांच-परख बाद एक भले परिवार का लड़का जो पेशे से वकील था,शोभा की शादी कर दी। शादी के बाद शोभा
मुश्किल से दो बार ही भैया से मिलने आ पायी । लेकिन आज जिस भतीजी की छठी की पूरियाँ खायी थी , उसकी शादी में आने से अपने आप को रोक न सकी ।
शादी की गहमागहमी खत्म हो चुकी थी। भैया – भाभी शोभा को कुछ दिन और रोकने की बहुत जिद की, लेकिन शोभा नहीं मानी । चलते समय भैया – भाभी समझा रहे थे कि अपना ध्यान रखा करो वकील साहब बता रहे थे कि तुम अपना ध्यान नहीं रखती हो।अचानक शोभा ने भैया की ओर देखते हुए भाभी से पूछा — भाभी! गुड़िया की शादी विजातीय से करने के लिए भैया कैसे तैयार हो गए? भाभी अपने आप में मगन हंसते हुए कहा — अरी बन्नो, ऐसे थोड़े ही माने, वो तो गुड़िया खाना पीना छोड़ बिस्तर पर पड़ गयी । शोभा ने गहरी सांसे लेते हुए कहा —- हाँ भाभी, बहन और बेटी के दर्द में अंतर भी तो होता है।इतना कह अश्रुपूरित आँखों से दोनों के झुके तथा भावविह्वल चेहरे की ओर देखते हुए गाड़ी में बैठ गयी।

लघुकथा ५
संपूर्ण प्यार

अभी दस दिन हुए लतिका के एम ए पास होने का रिजल्ट आया ही था कि उसके पिता अचानक हार्टअटैक से चल बसे। भाई अभी हाई स्कूल में ही था। माँ रेखा हर हमेशा सोच में पड़ी रहती कि अब इसकी शादी कैसे होगी? घर की आर्थिक स्थिति भी डँवाडोल थी। ले- देकर रेखा का भाई ही एक सहारा था। रेखा ने अपने भाई से आग्रह किया कि लतिका के लिए कोई नौकरी पेशा लड़़का ढूंढे।जहाँ भी लड़का देखा जाता,दहेज के कारण बात नहीं बनती। खैर किसी तरह लड़का तो नौकरी पेशा मिल गया लेकिन शिक्षा सिर्फ हाई स्कूल तक ही थी। दरअसल आनंद को पढ़ाई में मन नहीं लगता था, इसीलिए आगे न पढ़कर प्रेस में नौकरी कर ली। घर में भी माँ और छोटी बहन वंदना की जिम्मेवारी थी।
रेखा ने ये सोच कर कि लड़का नौकरी करता है , शादी के लिए हामी भर दी।लतिका पहले तो थोड़ा हिचकिचायी लेकिन घर की आर्थिक स्थिति देखते हुए इस शादी के लिए राजी हो गई।
करीब दो महीने बाद दोनों की शादी हो गयी।
ससुराल में सभी लतिका की प्रशंसा करते थकते नहीं थे। अभी तक वह अपनी इतनी प्रशंसा नहीं सुनी थी लेकिन एक बात उसे झकझोर रही थी कि आनंद उसके सामने हमेशा निरीह बना रहता है।पत्नी से कम पढ़ा होने के कारण इन दिनों आनंद में एक हीन भावना घर कर गयी थी। बहुत कम बोलता और हमेशा खोया – खोया रहता। इधर अड़ोस- पड़ोस के लोग अलग – अलग तरीके से बातें बनाकर आनंद की माँ सुभाषिनी को भड़काते ।आनंद के दोस्त भी उसके कान भरने से बाज नहीं आते। लेकिन चंद दिनों में ही लतिका सास और ननद का दिल जीत चुकी थी। वह ननद वंदना की पढ़ाई में भी मदद करती, जिसके कारण वंदना काफी अच्छे अंकों से हाई स्कूल पास की। जब कॉलेज में उसका नामांकन हुआ तो उसने साहस कर आनंद को भी प्राइवेट से इंटर का फार्म भरने के लिए कहा। पहले तो आनंद काफी सकुचाया लेकिन लतिका ने बहुत समझाया कि वंदना की किताबें हैं ही और मैं भी आपको मदद करुँगी,तो मान गया। अब वह दिन में नौकरी करता और रात में करीब तीन- चार घंटे पढ़ाई। इधर लतिका ने भी प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया। नतीजा घर की माली हालत भी धीरे- धीरे सुधरने लगी। आनंद के दोस्त उसे हमेशा चिढ़ाते लेकिन वह उनकी बातों को अनसुनी कर देता।
इंटर का रिजल्ट आया। वह द्वितीय श्रेणी से पास हुआ। उसका खोया आत्मविश्वास लौटने लगा। इस बार उसने खुद ही बी ए में कॉलेज के संध्या क्लास में एडमिशन ले लिया। बी ए में भी वह द्वितीय श्रेणी से पास हुआ। अब उसने हिंदी में एम ए करने की अपनी इच्छा लतिका को बतायी। उसका आत्मविश्वास देखकर लतिका मन ही मन काफी खुश हुई।चूंकि लतिका मनोविज्ञान से एम ए थी इसलिए इस बार वह कोई मदद नहीं कर सकती थी। इतने दिनों में वह पढ़ाई की तकनीक जान चुका था। लतिका चाहती थी कि इस बार वह बिना उसकी मदद के एम ए की पढ़ाई करे।इससे उसकी हीनता की भावना दूर होगी और वह खुद को उसके सामने बौना नहीं महसूस करेगा।

हुआ भी वही। यूनिवर्सिटी में अपना रिजल्ट देखकर आनंद भागा – भागा घर आया। लतिका उस समय अपने कमरे में कुछ कर रही थी। इससे पहले कि लतिका कुछ समझती, उसने उसे दोनों हाथों से उठा कर चूम लिया और बोला, ‘ प्रथम श्रेणी,द्वितीय स्थान।’
उसकी हीनता की ग्रंथि चरमरा कर टूट गयी थी। आज वह स्वयं को बौना महसूस नहीं कर रहा था।लतिका के चेहरे पर खुशी और शर्म की लाली फैल गई। आज पहली बार उसे बिना मांगे पति का संपूर्ण प्यार मिला।

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