हिन्दी को बचाने के लिए सक्रिय प्रतिरोध जरूरी

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आज हिंदी के भविष्य और अखंडता के समक्ष इतिहास का सबसे बड़ा संकट उपस्थित है । यह समय प्रतीक्षा करो और देखो का नहीं है ।अब सक्रिय प्रतिरोध और स्वर बुलंद करने का है । अंग्रेजों ने दो सौ वर्षों के शासन के दौरान जो सफलता नहीं पाई उसे हमारे ही देश के कतिपय स्वार्थी तत्त्व साकार करने में लगे हैं ।कुछ लोग हिंदी की उन बोलियों को जो हजारों साल से हिंदी की प्राणधारा रही हैं उन्हें संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करवाकर हिंदी की प्रतिस्पर्धा में लाना चाहते हैं । ऐसी बोलियों की संख्या एक दो नहीं कुल 38 है जिन्होंने अपनी बोली को भाषा का दर्जा देने का अनुरोध किया है ।यदि ऐसा होता है तो सैकड़ों और भी बोलियां तैयार बैठी हैं । ऐसी स्धिति में देश की भाषिक व्यवस्था और सांस्कृतिक एकता छिन्न -भिन्न हो जाएगी ।यह प्रकारांतर से देश के समग्र विकास और भावनात्मक एकता को तहस-नहस कर देगा । यह सरकार के समक्ष आरक्षण से भी भयावह चुनौती होगी जिससे पार पाना लगभग असंभव होगा ।इससे 2050 तक इस देश में हिंदी बोलने वालों की संख्या अंग्रेजी बोलने वालों से कम हो जाएगी और वह सदा -सर्वदा के लिए प्रतिष्ठित हो जाएगी ।कहने का आशय यह है कि हिंदी की बोलियों को उससे अलग करने वाले प्रकारांतर से देश के शुभचिंतक नहीं है ।ऐसी शक्तियों से लड़ने के लिए 15 जनवरी को जंतर मंतर पर आयोजित धरने में 11:30 पर आइए, अपनी बात रखिए और गृहमंत्री से मिलकर उन्हें हिंदी जगत की चिंता से अवगत कराइये।इतिहास आपको तटस्थ रहने का अवसर नहीं देगा । हिंदी के महान प्रतिभाशाली महाकवि जयशंकर प्रसाद, मुंशी प्रेमचंद, हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे साहित्यकारों ने भोजपुरी भाषी होते हुए भी सदैव हिंदी को शक्तिशाली बनाने का उपक्रम किया ।वे भलीभाँति जानते थे कि हिंदी की मजबूती ही देश की मजबूती है ।हिंदी को तोड़ने का उपक्रम देश को तोड़ने जैसा है । इसलिए देशवासियों तैयार हो जाओ हिंदी और देश के माथे की बिंदी की रक्षा करने के लिए अन्यथा भावी पीढ़ियों को जवाब देना असंभव होगा ।
– प्रो करुणा शंकर उपाध्याय

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