1. बदलाव के मुहाने पर मिस्र 2. चहारदीवारी में कैद जिन्दगी-फिलीस्तीन-विनय प्रकाश तिर्की

किसी देश की यात्रा करनी हो तो सड़क मार्ग से अच्छा कुछ नहीं हो सकता। इससे वहाँ की भूमि की संरचना ,जलवायु, मानवीय बसाहटों आदि की नई-नई जानकारी मिलती है। खोजी प्रवृति के मानवीय मन को और क्या चाहिए।किसी भी बेहतर रचना को अंजाम देने के लिए, अनुसंधान की प्रवृति, रचना कौशल को और भी निखार देती है। लालसागर के किनारों से जाते हुए इजराएल से हम लोग मिस्त्र के ताबा बार्डर पहुँचे। वहां पर गाईड हमारे दल का इंतजार कर रहा था। मिस्त्र का लगभग चौरानवे प्रतिशत भू-भाग मरूस्थल है, और यहाँ की आजीविका का बहुत बड़ा स्त्रोत पर्यटन है, अतः मिस्त्री बड़ी सहृदयता व गर्मजोशी से पर्यटकों का स्वागत करते हैं। यह इलाका सिनाई प्रायद्वीप कहलाता है। साठ हज़ार वर्ग किलोमीटर का यह विशाल इलाका मिस्त्र का इकलौता क्षेत्र है, जो एशिया के महाद्वीप पर पड़ता है और शेष मिस्त्र , उत्तर अफ्रीकी महाद्वीप में। भौगोलिक दृष्टि से यह भू-भाग एशिया और अफ्रीका महाद्वीपों के बीच एक जमीनी पुल का काम करता है। सिनाई प्रायद्वीप और मिस्त्र की मुख्य भूमि के बीच स्वेज नहर पड़ती है । यहीं से अफ्रीका महाद्वीप प्रारम्भ हो जाता है। पूर्व में सिनाई की जमीनी सरहद, इजराएल से लगती है। इस क्षेत्र में यदा-कदा आतंकी घटनाएँ होती रहती हैं।
इस क्षेत्र में विडविन समुदाय के खानाबदोश लोग बसते हैं। यह भू-भाग पूरी तरह अनुपजाऊ व भयानक मरूस्थली होने के कारण यहाँ मानव आबादी न के बराबर है। सैकड़ों लाल पत्थरों के टीलों की श्रृंखलाओं के मध्य विडविन यहाँ-वहाँ बसे दिख जाते हैं। उनकी झोपड़ियाँ बांस, टीन की चादरों व तिनकों से बनी हुई होती हैं। यहाँ पाये जाने वाले विडविन अरब जनजाति के हैं, जिनका मुख्य पेशा पशुपालन है। वर्तमान में कुछ विडविन मानवीय सभ्यता की मुख्य धारा में आकर गाईड, टैक्सी चालक आदि बन गए हैं, पर ये लोग बेरोजगारी का दंश भी झेल रहे हैं, और इन्हीं कारणों से मिस्त्र की सीमाओं में ये अनैतिक गतिविधियों जैसे ड्रग तस्करी, अवैध रूप से हथियार की खरीद-फरोख्त आदि में लिप्त भी रहते हैं।
सिनाई पर्वत श्रृंखला के बीच एक छोटा कस्बा सेंट कैथरीन है। यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्म की मान्यता है कि यहीं के सिनाई पर्वत पर पैगम्बर मोजेस को ईश्वर से दस धर्मादेश मिले थे। वर्तमान में सिनाई एक पर्यटन स्थल है। पर्वत तलहटी में सेंट कैथरीन मठ दुनिया का सबसे प्राचीन ईसाई मठ है। इस मठ के भीतर काफी संख्या में आर्थोडॉक्स ईसाई मठवासी तपस्या में लीन मिलेंगे। ऊंची दीवारों से घिरे इस आर्थोडॉक्स मठ के अंदर मस्जिद भी है। शिया पंथ के फतिमिद खलीफा ने मठ के अंदर मौजूद एक छोटे चर्च को दसवीं सदी में मस्जिद में परिवर्तित कर दिया, पर इस मस्जिद में विशेष अवसरों पर ही प्रार्थना की जाती है। यह मठ दुनियाँ के सबसे महत्वपूर्ण ईसाई स्थलों में से एक है।आतंकी गतिविधियों के कारण मठ के प्रवेश द्वार के निकट एक सुरक्षा चैकी स्थापित की गई है, तथापि यहाँ इस्लामिक स्टेट के हमले हो चुके हैं। इस कस्बे की आबादी लगभग पांच हजार है, जिसमें बीस प्रतिशत ईसाई आबादी है। सेंट कैथरीन आधिकारिक तौर पर सन् 2002 में यूनेस्को का विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया।
सिनाई प्रायद्वीप क्षेत्रों में आतंकी गतिविधियों के कारण पर्यटकों की सुरक्षा के लिए यहाँ से एक मार्शल (सुरक्षाकर्मी) हमारे बस में सवार हुआ। पर्यटकों की सभी बसों में एक सुरक्षाधिकारी साथ चलते हैं। पर्यटन यहाँ का मुख्य उद्योग होने के कारण यह आवश्यक भी है। पूरे मिस्त्र में एक अजीब स्थिति से सामना करना पड़ता है। यहाँ किसी भी होटल या रेस्तराँ में पेयजल उपलब्ध नहीं कराया जाता है। रेगिस्तान में पानी की क्या कीमत होती है, वह यहीं आकर पता चलता है। दूर-दूर तक जल स्त्रोतों का अता-पता नहीं है। ऐसी विषम स्थितियों में जीवन तब भी चलता रहता है। यहाँ की जमीन रेतीली नहीं है, पर पथरीली और जली हुई है, जबकि खाड़ी देशों का अधिकांश भू-भाग पूरी तरह रेतीला है। सामान्य आदमी ऐसे भू-भागों में जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता। प्रकृति की मार से त्रासदीपूर्व जीवन जीना यहाँ की विवशता ही है।
मिस्त्र के पिरामिड को लेकर मुझे कोई रूचि नहीं थी, चूंकि क्योंकि इससे मैं पहले से वाकिफ हो चुका था । आठ लोगों को छोड़कर दल के सभी यात्री अपने वतन के लिए वापिस उड़ चुके थे। इस देश के अनछुए पहलुओं को जानने की इच्छा से मैंने गाईड को काहिरा शहर के मटारिया और जाबालिन चलने का आग्रह किया। मुस्लिमों और ईसाईयों के आपसी संबंधों को लेकर मेरी रूचि थी। मिस्त्र की आबादी में करीब दस प्रतिशत कॉप्टिक ईसाई हैं। हालांकि कुछ इसे पंद्रह से बीस प्रतिशत का आकलन करते हैं। मिस्र में धार्मिक आधार पर जनगणना नहीं होती है। यहाँ यह प्रासंगिक है कि मिस्र के कॉप्टिक ईसाई धार्मिक तौर पर रोमन कैथोलिकवाद और पूर्वी आर्थोडॉक्सी की तरह होते हैं। मृत्यु पश्चात् मोक्ष को लेकर इनकी कुछ अलग-अलग मान्यताएँ होती हैं, और इसके लिए वे मरणोपरांत अनुष्ठानों में यकीन करते हैं। कॉप्टिक का अर्थ है ’’मिस्त्र’’। यहाँ के ईसाई मिस्त्र के मूल निवासी हैं और अपने को कॉप्टिक कहते हैं और अरबी मूल के नहीं मानते।
बाईबिल के चार गोस्पेल लेखकों में से एक लेखक सेंट मार्क, ईसा की मृत्यु के पश्चात् एलेक्जेन्ड्रिंया आये थे, जो कॉप्टिक चर्च के संस्थापक और पहले बिशप थे। इस्लामी चरमपंथियों द्वारा मिस्त्र के चर्चों और ईसाईयों पर छिटपुट लेकिन घातक हमले होते रहे हैं अतः मुस्लिम ब्रदरहुड समर्थित शासन के सत्ता के बाहर होने के बाद यहाँ हर छोटे- बड़े चर्चों में आग उगलती हथियारों से लैस सुरक्षाकर्मी तैनात होते हैं, जबकि पहले यहाँ ऐसा नजारा नहीं था। यहाँ पर बिना किसी स्थानीय गाईड के किसी भी चर्च में प्रवेश कर पाना नामुमकिन है।
काहिरा शहर के उपनगरीय क्षेत्र ’’जाबालीन विलेज अपनी एक विशिष्टता लिए हुए है जो पर्यटकों को आकर्षित करती है। पर बहुत सारे पर्यटक यहाँ कभी आना पसंद नहीं करेंगे। जाबालीन विलेज का शाब्दिक अर्थ होता है- ’’कचरा बीनने वालों की बस्ती’’। सन 1970 में काहिरा नगर निगम ने इन्हें गीजा क्षेत्र से हटाकर मोकाटम पहाड़ियों के बीच में विस्थापित किया था। इस इलाके में केवल कचरा बीनने वाले ही रहते हैं। पूरे शहर का कचरा बीनने वाले, और कबाड़ी का धंधा करने वाले यहीं पर बसते हैं। यहाँ पर भारत के किसी महानगर के स्लम एरिया सा माहौल नजर आया, पर यहाँ के बहुमंजिले मकान आश्चर्य का विषय थे। यहाँ आना मतलब, गंदगी से भरे, कचरों के ढ़ेर, बदबूदार सड़कों से रूबरू होना है। मिस्त्र, मुस्लिम बाहुल्य देश है, पर जाबालीन बस्ती की साठ हज़ार लोगों की आबादी में नब्बे प्रतिशत लोग काप्टिक ईसाई हैं। शेष आबादी वाहिया मुस्लिमों की है। मोकाटम पर्वत में संत सेंट सिमोन मोनेस्ट्री भी है। यहाँ पर अजंता-एलोरा की तर्ज पर पर्वतों को काटकर ईसाई धर्म से संबंधित मूर्तियाँ उकेरी गई हैं। पर्वतों के मध्य गुफाओं में दो बड़े-बड़े चर्च हैं। पूरे मध्य पूर्व में यह चर्च सबसे बड़ा है, जिसकी क्षमता बीस हज़ार लोगों की है। यहाँ के काप्टिक ईसाई अन्य क्षेत्रों में जाना नहीं चाहते हैं। दरअसल वे यहाँ पर अपने को धार्मिक रूप से ज्यादा सुरक्षित पाते हैं। उन्हें महसूस होता है कि वे अपनी आस्थानुरूप अपने धर्म का अनुशीलन कर सकते हैं। यहाँ मोकाटम की पहाड़ियों की चट्टानें खिसकने से हमेशा ही काफी जनहानि होने का भय बना रहता है। कई बार चट्टानों के स्खलन से यहाँ पर मौतें भी हुई हैं।
काहिरा शहर के ’’मटारिया’’ किसी आकर्षण से कम नहीं हैं। उपनगरीय सीमा में बसा ’’मटारिया’’ एकदम भीड़-भाड़ वाला इलाका है। यहाँ पर धूल-धूसरित सड़कें, बेतरतीब खड़े वाहनों, और घनी बसाहट के कारण बड़े वाहन गुजर नहीं सकते। यहीं ईसाईयों का धार्मिक स्थल, ’’मेरी वर्जिन ट्री’’ स्थित है, पर यहाँ पहुँच सुगम न होने के कारण अधिकांश पर्यटक इस ओर का रूख नहीं करते हैं। कॉप्टिक विवरण के अनुसार मिस्त्र प्रवास के दौरान बालक ईसा का परिवार, यानी होली फैमिली ने काहिरा के विभिन्न अट्ठाईस स्थानों में तीन वर्ष और ग्यारह माह तक निवास किया। कॉप्टिक परम्परा के अनुसार बालक ईसा यहीं सिकामोर पेड़ की डालियों से खेलते थे। वर्तमान में यह पेड़ टूटकर गिरा पड़ा है। यूनेस्को की देखरेख में इसे संरक्षित करते हुए पेड़ की डालियों और तने को पारदर्शी प्लास्टिक से लपेट दिया गया है। इसी से लगता हुआ एक पुराना कुँआ है, जहाँ के पानी का इस परिवार ने उपयोग किया। वहीं कुछ दूरी पर निर्मित चैपल में बालक ईसा के ’’क्रेडेल’’ यानी पालना (झूला) लोहे के दो हुक के सहारे दीवार पर रखे गये हैं। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि मुझे इसकी जानकारी यहीं आकर मिली। बाईबिल में इन सब घटनाओं का विवरण नहीं मिलता, न ही इसका उल्लेख है। पर यह सब मिस्त्र के कॉप्टिक चर्च के विश्वास और परम्परा पर ही आधारित है।
मिस्त्र की प्राचीन सभ्यता नील नदी के किनारे विकसित हुई, जो विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में से एक थी। आधुनिक मिस्त्र संक्रमण काल से गुजर रहा है। पर्यटन मुख्य उद्योग होने के कारण यहाँ विभिन्न सभ्यताओं के सम्पर्क से काफी बदलाव देखने को मिलते हैं। यहाँ की प्राचीन संस्कृति को यूरोप, मध्य एशिया तथा अफ्रीका की परवर्ती संस्कृतियों ने प्रभावित किया है । यहाँ नील नदी में क्रूज पर सवार होना भी एक अदभुत अनुभव है, मिस्त्र, की प्राचीन सभ्यता के छिपे रहस्यों के बीच लोक वाद्य और आधुनिक पश्चिमी संगीत के समिश्रण, बैले नृत्य, बालीवुड के गानों पर ठुमके यहीं सम्भव है। कोई भी चीज हमेशा स्थाई नहीं रह सकती। अन्य सभ्यताओं को प्रभावित करने वाली सभ्यता अब खुद एक बदलाव के मुहाने पर खड़ी है।
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चहारदीवारी में कैद जिन्दगी-फिलीस्तीन

संसार के जितने भी देश हैं, उनमें से इजराएल सबसे रहस्यमयी देश प्रतीत होता है, न जाने यह देश सदियों से आज तक कितने भीषण युद्धों, लड़ाईयों और विषमताओं का बड़ा गवाह बना हुआ है कि कहना मुश्किल है। यही एक बड़ा कारण है कि इस देश की ओर बरबस आकर्षित होना और उस ओर खींचा चला आना एक नियति से कम नहीं। इस देश की संस्कृति, उनके सामाजिक सोच, राजनीतिक स्थितियों, उनकी परम्पराओं और अंत में उनके पीछे की वजह को जानने की प्रबल इच्छा के आगे मैं लगभग विवश ही हूँ। जिज्ञासा, मानव मन का एक स्थायी भाव है, जो अक्सर मनुष्य को एक नई जानकारी प्राप्त करने की दिशा में प्रेरित करता रहता है। मेरा मन भी इस जिज्ञासा के भाव से अछूता नहीं है। इस देश की सांस्कृतिक संरचना और इतिहास जानने की जिज्ञासा से मैं वहाँ तीसरी बार बरबस खींचा चला गया था।
जार्डन से होकर एलन वाय ब्रिज पार कर जैसे ही हमारी बस ने इजराएली सीमा में प्रवेश किया, दो-तीन इस्राएलियों ने हमारे दल का सामान उतारकर ट्रे में रख दिया और टिप्स स्वरूप डॉलर देने को कहा। प्रत्येक यात्री से वे पैसे की मांग कर रहे थे, मैं दंग रह गया। पिछली यात्राओं में ऐसा दृश्य न था। पूरे संसार में अपने अनुशासन, चपलता, ईमानदारी, देशभक्ति से ओतप्रोत कहे जाने वाले देश में यह देखकर मैं व्यथित हो उठा।
वीजा की औपचारिकता पूर्ण कर हम बस से वेस्ट बैंक यानी फिलीस्तीन सीमा में स्थित ईसा के जन्म स्थान बेथलेहेम नगर रवाना हुए। बस चालक से बीच-बीच में मैं विभिन्न विषयों पर जानकारी लेता रहता था। फिलीस्तीनी सीमा के चेक पाईंट के पास बड़े-बड़े साईन बोर्ड में लाल अक्षरों में लिखा था- ’’यह क्षेत्र इजराएलियों के लिए अत्यंत खतरनाक है।’’ ठीक वैसे, जैसे नक्सली लिखते हैं । मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। चेक पाईंट में इजराएली पुलिस जबकि वेस्ट बैंक में फिलीस्तीनी। पीले नम्बर प्लेट की गाड़ियाँ फिलीस्तीनी तथा इजराएली क्षेत्रों में बेरोकटोक आवाजाही कर सकती हैं। ये इंगित करती हैं कि ये गाड़ियाँ इस्राएलियों की हैं जबकि फिलिस्तीनियों की पहचान के लिए उनके वाहनों में सफेद रंग की नंबर प्लेटें लगी हुई होती हैं। ये गाड़ियाँ इजराएली सीमा में प्रवेश नहीं कर सकतीं।
फिलिस्तीन की पूरी सीमाओं को ऊँची-ऊँची सीमेंट की दीवारों से घेर दिया गया है। दीवारें इतनी ऊँची हैं कि विभिन्न देशों की जेलों की दीवारें भी शरमा जाए। इन दीवारों और विभिन्न चेक पाईंट की वीडियोग्राफी और छायांकन अपराध है। कोई फिलीस्तानी एक विशेष अनुज्ञा से ही इजराएली क्षेत्रों में प्रवेश कर सकता है, परन्तु वह वहां रातें नहीं गुजार सकता। उसे हर हाल में फिलीस्तीन वापिस होना ही पड़ता है। यहाँ फिलीस्तीन में ईसाई आबादी मात्र चार प्रतिशत ही रह गई है। जबकि चार से पांच वर्षों पूर्व यह आबादी लगभग आठ प्रतिशत थी। भेदभाव व अन्य कारणों से यहाँ के ईसाई विभिन्न देशों की ओर कूच कर गए हैं और यह क्रम अभी भी जारी है। फिलीस्तीनी ईसाइयों द्वारा इस क्षेत्र को छोड़ने का मुख्य कारण आर्थिक और शैक्षणिक अवसरों की कमी भी है। फिलीस्तीनी मुस्लिमों को कोई अन्य देश आसानी से स्वीकार नहीं करता, अतः वे यहीं के होकर रह गए हैं ।
फिलिस्तीनियों के लिए इजराएल पासपोर्ट जारी नहीं करता है। विदेश भ्रमण के लिए इच्छुक फिलीस्तीनियों के लिए जार्डन पासपोर्ट जारी करता है, पर यह उन्हें जार्डन की नागरिकता का अधिकार नहीं देता। फिलीस्तीन ऑथोरिटी भी पासपोर्ट जारी करती है, जिसकी अवधि पांच वर्ष की होती है, पर बहुत सारे देश फिलीस्तीन को अधिकारिक तौर पर स्वतंत्र राष्ट्र की मान्यता नहीं देते, अतः वीजा प्राप्ति के उपरांत ही इन देशों की यात्राएँ की जा सकती हैं। पाकिस्तानियों को इजराएल अपने देश तथा फिलीस्तीन प्रवेश की अनुमति नहीं देता, अतः काफी पाकिस्तानी ईसाई अन्य देशों की नागरिकता प्राप्त कर ईसा से जुड़े स्थानों को देखने के लिए इजराएल और फिलीस्तीन की यात्राएँ करते हैं। इसी तरह बांग्लादेश, पूर्व में पाकिस्तान का हिस्सा होने के कारण इस देश के नागरिकों के लिए भी इजराएल प्रवेश करना, नाकों चने चबाना जैसा ही है।
क्रिसमस के दौरान फिलीस्तीन के बेथलेहेम नगर में पर्यटन अपने शिखर पर होता है। क्रिसमस के एक दिवस पूर्व हजारों फिलीस्तीनी स्काउट बच्चे नीले वस्त्र पहने, सुनहरी टोपी लगाये और तरह- तरह के झण्डे हाथों में लिए ड्रम के साथ परेड निकालते हैं।विश्व भर के लोगों के साथ इसे देखना एक रोमांचकारी अनुभव होता है। यह परेड शहर के मध्य से शुरू होकर मैंगर स्क्वायर पर समाप्त होती है। परेड में बैग पाइप बैंड होते हैं, बैग पाइप बजाना एक परम्परा है, जब ब्रिटिश सेना ने इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस की चाक-चौबंद व्यवस्था के साथ आधी सड़कें बंद कर दी जाती हैं। क्रिसमस परेड में शामिल स्काउट के बच्चों के बारे में जानकारी लेना अवश्यम्भावी हो गया था कि इसमें मुस्लिम शामिल होते हैं या नहीं?
इजराएल और फिलीस्तीन में मुस्लिम और ईसाई अरब माने जाते हैं। जहाँ-जहाँ यहूदी बस्तियां हैं वहाँ इनकी बसावट नहीं होती। मुस्लिम और ईसाई साथ-साथ ही रहते हैं। विभिन्न धर्मावलम्बियों की बस्ती को यहाँ क्वार्टर कहा जाता है, मसलन ज्यूस क्वार्टर, मुस्लिम क्वार्टर, क्रिश्चयन क्वार्टर। अरबों से यानी मुस्लिमों और ईसाईयों से यहूदी दूरी बनाये रखते हैं। इस कौम से वे सशंकित रहते हैं। इनके दिलों में इतनी दूरियाँ हैं कि नजदीकियाँ कभी बन ही नहीं सकती। इसके पीछे यहाँ की राजनैतिक व सामाजिक जटिलताएँ हैं, जो उन्हें एक दूसरे से जुदा करती हैं। पुराने जेरूशलम शहर में अधिकतर मुस्लिम तथा ईसाई आबादी है। यहूदियों की वेलिंग वाल भी यहीं है। इन क्षेत्रों में इक्का-दुक्का यहूदी परिवार भी है, जो अपनी पृथक पहचान या यूँ कहें, श्रेष्ठता के लिए घर के मुख्य द्वार पर एक विशेष चिन्ह अंकित किए हुए हैं। वे दीप भी जलाते रहते हैं। यहूदी क्वार्टर में जाना हो तो पूरे सुरक्षा चक्र से गुजरना पड़ता है, पर मुस्लिम और ईसाईयों की बस्तियों के लिए ऐसा नहीं है।
धार्मिक रूप से इजराएल एक विभाजित समाज है। राजनैतिक मूल्यों और सार्वजनिक जीवन में धर्म की भूमिका को लेकर यहूदियों और अरबों के बीच एक गहरी खाई है। यहूदियों के बीच भी धार्मिक उप-समूह है और वे चार श्रेणियों में बँटे हुए हैं। आर्थोडॉक्स यहूदी खुद को पहले यहूदी फिर इजराएली के रूप में देखते हैं। अधिकांश यहूदियों के लिए यहूदी पहचान राष्ट्रीय गौरव के साथ जुड़ी हुई है। इजराएल के अधिकांश गैर यहूदी निवासी जातीय रूप से अरब हैं और धार्मिक रूप से मुस्लिम, ईसाई या ड्रूज के रूप में पहचान करते हैं। विभिन्न धार्मिक पृष्ठभूमि के यहूदी व अरबों को केवल उनकी धार्मिक और राजनीतिक विचारों से अलग किया जा सकता है। ये सभी धार्मिक समूह एक दूसरे से अलग-थलग ही हैं। अरबों के धार्मिक समूह आपसी विवाह को लेकर सहज नहीं हैं, पर वे चूंकि जातीय रूप से अरब हैं सो ईसा की जन्मभूमि बेथलेहेम नगर की क्रिसमस रैली व परेड में मुस्लिम और ईसाई दोनों ही शामिल होते हैं, परन्तु बहुत सारे फिलीस्तीनी व इजराएली ईसाई अपने को अरबी नहीं मानते हैं। वे अपने को महान वायजांयन्टीन सभ्यता के वंशज ही मानते हैं। वे यह भी मानते हैं कि इन क्षेत्रों में इस्लाम के आगमन के पूर्व ही उनकी जड़ें विद्यमान थीं। जेरूशलम के सेपलचर चर्च यानी ईसा की कब्र पर बने चर्च की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसकी चाबी एक अरबी मुस्लिम परिवार के पास रहती है।
फिलीस्तीनी पुलिस को अत्याधुनिक हथियार रखना मना है, जबकि इजराएल में अट्टारह वर्ष की आयु पूर्ण होने पर प्रत्येक महिला व पुरूष को सेना में सेवा देना अनिवार्य होता है । यह समस्त यहूदियों और ड्रूज के लिए अनिवार्य शर्त है, जबकि मुस्लिमों तथा ईसाईयों के लिए ऐच्छिक। पुरूष को तीन वर्ष तथा महिलाओं हेतु दो वर्ष की सेवा अवधि अनिवार्य है। जगह-जगह इजराएली कमसिन युवक-युवतियों के हाथों अत्याधुनिक हथियार देखकर शरीर में सिहरन सी दौड़ जाती है। ये सब चीजें इशारा करती हैं कि इस देश में परिस्थितियाँ सामान्य नहीं है।
गलीली क्षेत्र को छोड़ दिया जाये तो फिलीस्तीनी व इजराएल के अधिकांश भू-भाग शुष्क और अनुपजाऊ है, परन्तु इजराएलियों ने नई-नई उन्नत तकनीकों का प्रयोग कर अपने कब्जे वाली इन अनुपजाऊ भूमि को भी उर्वरक बना दिया है। वहीं दूसरी ओर फिलीस्तीनी भू- भाग में भूमि बिना खेती के ज्यों के त्यों पड़ी हुई है। दरअसल मरूस्थली भू-भागों में उन्नत तकनीकों का प्रयोग करना अत्यंत महँगा सौदा होता है और यह आर्थिक रूप से गरीब देश के बूते के बाहर की चीज है। इजराएल में कृषि हेतु ’’केबूत’’ प्रथा प्रचलित है। केबूत कुछ लोगों का समूह होता है जो यहूदियों की भूमि पर निःशुल्क कृषि कार्य करते हैं। सरकार उन्हें कृषि कार्य हेतु समस्त प्रकार की सुविधाएँ प्रदान करती है। खेती से प्राप्त ऊपज पर इनका कोई अधिकार नहीं होता। इसके बदले सरकार उन्हें हर तरह की मुफ्त सुविधा जैसे आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि प्रदान करती है। एक कृषि गाँव में आठ से दस केबूत परिवार से अधिक नहीं होते हैं। गैर यहूदियों को ’’केबूत’’ रखने की मनाही है। यह एक तरह की सामूहिक खेती है। इजराएल की स्थापना के बाद यूरोप, अरब और दुनिया के अन्य देशों से यहूदी शरणार्थियों की बाढ़ ने केबूतों के लिए नई चुनौतियों के साथ अवसरों को भी प्रस्तुत किया है । आप्रवासी समस्या ने नए सदस्यों और सस्ते श्रम के माध्यम से केबूत प्रथा को विस्तार करने का मौका दिया। केबूतों को उनके मूल्यों और राष्ट्रीय उद्देश्यों के लिए एक सृजक के रूप में माना गया और इजराएली समाज में उन्हें बहुत सराहना मिली।
जार्डन से सड़क मार्ग से इजराएल प्रवेश के लिए एलन वाय ब्रिज अथवा किंग हुसैन ब्रिज ही एकमात्र जरिया है, यह क्षेत्र वेस्ट बैंक यानी फिलीस्तीनी है, किन्तु नियंत्रण इजराएल के हाथों में है। कुल मिलाकर यहाँ इतनी ज्यादा राजनैतिक जटिलताएँ और मतभेद हैं कि लम्बे समय तक इसका निपटारा होना संभव नहीं लगता। फिलीस्तीनी अपने चारों तरफ अस्त्र-शस्त्रों के बीच पिंजरे में कैद पंछी की तरह चहारदीवारी के भीतर जीवन जीने को मजबूर हैं।

विनय प्रकाश तिर्की
आफिसर्स कालोनी, सेक्टर 17, नवा रायपुर, छत्तीसगढ़ भारत
मोबाईल- +919425513159

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