होली चंद यादेंः शैल अग्रवाल, रचना श्रीवास्तव

 होलीः चन्द यादें

 

 

  उड़ते अबीर और गुलाल और पिचकारियों की तीखी और रंग-बिरंगी छेड़छाड़—काँजी, बड़े, मीठी गुँजिया और सेव— होली का त्योहार ही ऐसा है कि याद आते ही मन खुद ही ऊदा-ऊदा और रंगीन हो उठता है, बिल्कुल फागुन के मौसम की तरह ही। पर कहाँ से शुरु करूँ  होली की ये रंगभरी बातें, जब कि इतनी सारी यादें नटखट शिशु सी पालथी मारे सामने आ बैठी हैं और जिद पर जिद किए जा रही हैं —हमारे बारे में बताओ ना—-हमारे बारे में लिखो, तुम्हारे पाठकों को अच्छा लगेगा? चलिए, शायद वहाँ से, जब पहली बार कई बरस पहले, दूर कहीं बचपन में उस बारात के साथ उँटों पर चढ़कर राजस्थान के दूर दराज के गांव में गए थे और जहाँ तक पहुँचने का शायद वही एकमात्र जरिया भी था, या फिर मथुरा वासियों के लिए कुछ नया हो जाए, यह सोचकर ऐसा  आयोजन किया गया था, पर ऊंटों की बारात तो उतनी नही, हाँ, लड़की वालों ने फूलों की माला और रोली के टीकों के बाद , बरात की जो जोरदार होली खेलकर आबोभगत की थी वह आज भी भुलाए नहीं भूलती। आजभी मन उन महकती टेसू और गुलाब की पत्तियों की बाल्टियों से नहाया हुआ है और वह गीला टूटते-बिखरते बूँदी के लड्डुओं का स्वाद, उन रसीली गालियों के साथ ज्यों का त्यों बरकरार है। या फिर बनारस की गुलालों वाली नाच-गानों के रंग से सजी बजड़ों पर बीती होलियाँ और गंगा किनारे के वे मुखरित मूर्खाधिवेशन —या फिर शुरू करूँ वहाँ से, जब हमारी पहली-पहली होली थी अपनी नई नवेली भाभी के साथ और हम बच्चों की बानर सेना ने कई कई योजनाएँ बना डाली थीं पर जाने कैसे दादा जी को हर बात की खबर पहले से ही लगजाती थी और वह योजना को नामंजूर कर देते थे—और तब हारकर बागडोर हमने खुद अपने हाथों में ली और पूरा ही मिशन एक बेहद खुपिया तरीके से संचालित किया गया। जब भाइयों की सभी योजनाएँ ज्यादा हुड़दंगी सिद्ध हो चुकीं –कुछ और नया और भाभी को कम परेशान करने वाला सोचने पर बात आई , तो फिर होली के दिन सुबह सुबह अपने नए पोस्टर कलर और ब्रश लेकर हम सोती भाभी के सिराहने जा पहुँचे और बेहद सिद्धहस्त कलाकर की तरह सारी लीपा पोती करके चुटकियों मैं कमरे से बाहर भी निकल आए और हमारी शरारतों से बेखबर भाभी सोती ही रह गईं।   हाँ सुबह-सुबह जब सर ढके, छमछम करती भाभी ने आकर बड़ों के पैर छुए तो एक-से-एक गंभीर स्वभाव वाले बड़ों का भी हंसते हंसते बुरा हाल था। यह बदमाशी किसने की है—दादाजी की कड़कती आवाज यकायक गूंजी और घर भर की आंखें हम पर आ अटकीं। परेशान, घबराई- शरमाई भाभी जबाव सुने बगैर ही, तुरंत ही वापस अपने कमरे को दौड़ीं। अपना वह होलीवाला चेहरा देखकर उनका क्या हाल हुआ होगा, इसका अन्दाज आसानी से लगाया जा सकता है। फिर जब रामलीला के रावण जैसा अपना दाढ़ी मूँछ वाला वह मेकअप पोंछकर भाभी वापस लौटीं तो पूरी तरह से होली के अस्त्र शस्त्रों से लैस थीं और फिर तो दो तीन घंटे तक वह होली का हुड़दंग मचा कि मुझ जैसे डरपोक और बन्द कमरे के अन्दर से ही सारा खिलवाड़ देखने वालों को भी महीनों लग गए चेहरे, गर्दन और हाथ पैरों से रंग रगड़ते, पोंछते -छुड़ाते;— इसबार रंगों के साथ अल्म्यूनियम पेंट और शू पौलिश सभी कुछ मिला हुआ था हमारे चेहरे और बदन पर।
या फिर शायद वह होली जो यहाँ इंगलैंड में खेली गई थी और जिसमें चुटकी भर गुलाल के अलावा और कोई रंग ही नही था। यूँ तो यहाँ इंगलैंड में सब त्योहार करीब करीब एक से ही महसूस होते हैं क्योंकि सभी का प्रमुख आकर्षण वही खाना और नाच गाना ही रह जाता है, परन्तु वह होली फ़र्क और यादगार थी।- डाँ कूपर नए नए हमारी बिÏल्डग में आए थे और शायद कुछ दिन भारत में रहे भी थे क्योंकि अक्सर ही वह भारत और भारतीय तौर तरीके और तीज त्योहारों के बारे में भी बात करते रहते थे और कई बार उन्होंने बताया था कि  कैसे भारत की  रंग-बिरंगी तीज त्योहारों वाली संस्कृति और उत्साह उन्हे आज भी याद आता है और हजारों तीज त्योहारों की यादों ने, तरह तरह के पकवानों ने उनकी फिरसे एक भारतीय परिवार से जुड़ने की चाह को कैसे और भी प्रगाढ़ कर दिया है। वैसे भी आम आदमियों से थोड़ा हटकर ही थे वे, बिल्कुल ही मनमौजी किस्म के। पाँच साल इंजिनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद मन हुआ कि नहीं डॉक्टर ही बनना है, तो अगले पाँच साल तक मेडिसिन पढी और डॉक्टर बनकर ही दम लिया। हाँ तो हम बात कररहे थे होली की—सुबह सुबह ही उस दिन कूपर साहब पधार चुके थे और पूछ रहे थे कि आज तो होली है— खेलोगी नही? लाचार मैं उठकर गई और तश्तरी में गुलाल और मिठाई ले आई। हम तीनों ने आपस में गुलाल लगाया। मिठाई खाई और बनारस के स्वयंभू वाले मिश्रा जी की बोतल से बनाकर ठँडाई भी पी ली। पर कूपर साबह का मन भरा ही नही था। जाते ही पाँच मिनट बाद फिर दरवाजे पर घंटी थी और दरवाजा खोलते ही बुरा न मानो होली है कहकर उन्होंने बाल्टी भर पानी से  नहला दिया , गनीमत थी कि पानी अच्छी तरह से गरम था और सीढ़ियों और जीने पर कालीन नही था। पति भी तबतक दौड़े दौड़े वहां आ चुके थे और बाल्टी लेकर मेरे पीछे खड़े थे। फिर क्या था बात आग की तरह पूरी ही बिÏल्डग में फैल गई। फिर तो सभी जुड़गए होली के उस नहाने और नहलाने के हुड़दंग में जो कि दोपहर देर तक चलता रहा। यही नही बाद में हम सबने मिलजुलकर चाय भी एकसाथ ही पीयी, वहीं बाहर लौन में बैठकर। साथ में जी भरकर होली की परंपरा को कायम रखते हुए गाना बजाना भी हुआ —हास परिहास हुआ। जिनके पास यादें थीं उन्होंने यादें बाँटीं और जिनके पास चुटकुले थे उन्होंने चुटकुले। कितनी होलियाँ आईं और चली गईं पर आजभी उस होली की, अच्छी खासी ठंड के बाद भी, उसके उत्साह और जोश की—वह भी इंगलैंड के इस ठंडे मौसम  में… याद आते ही होठोंपर आई मुस्कान रुक नही पाती।—-

शैल अग्रवाल    

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बाथ टब की होली

 

अपने देश से यहाँ आ के बहुत कुछ पाया पर इस बहुत कुछ पाने मे जो खोया वो बहुत कुछ से बहुत ज्यादा था .अपने देश जैसी बात तो यहाँ  है नही  विशेष कर जब बात हो  त्यौहारों  की .सब कुछ जैसे  छोटा हो जाता है एक जगह मे सिमट जाता है। .आप सोच रहे होंगे की मै अचानक ये क्या रोना लेके बैठ गई .जानते है अभी होली आई थी आई थी न .अरे भाई आई थी  मै इस बात को  बारबार क्यों कह रही हूँ आप के लिये नही ख़ुद को यकीन दिला रही हूँ की हाँ यहाँ भी आई थी होली .मै आप को बताना चाहती   हूँ कि मै एक संवेदनशील  लड़की हूँ और हर  चीज  मै संवेदनाओं  के साथ हास्य  भी ढूंढ लेती हूँ अब आप सोचेंगे  की मै क्या कहना  चाहती  हूँ आप पढ़ते  रहिये  मै बताती  जारही हूँ । अरे रुक गए  नही  नही रुकिए नही,  पढ़ते रहिये, .हाँ तो होली आई यहाँ पे यानि डैलस मे होली सिकुड़ के मन्दिर के प्रांगण मे सिमट जाती है वहाँ मेला सा लगता है, पर अपने देश वाली बात कहाँ… .वहां तो  रंग भी खेला जाता है  पर एक दूसरे को पूछ पूछ के रंग लगाया जाता है क्यों भाई रंग लगा दूँ .यदि हाँ तो लगा दिया यदि आप अपने ग्रुप  के साथ है तब ठीक वर्ना अनुमति लेते रहिये,  यदि नही पूछा और रंग लगा दिया और खुदा न खस्ता उसको रंग से अलार्जी हुई तो बस आप की हो-ली। होली  .के रंग में भंग हो सकता है। यहाँ  .आनद बाजार भी लगता है ये मुझको बहुत पसंद है खूब खाओ ……..अलग अलग पकवान …         पर जानते है मै जहाँ  रहती हूँ डेनटन  मै वहां से मन्दिर ५० मिनट की ड्राइव है  अब इतनी लम्बी दूरी तय  कर के बच्चों  को  ले के जाओ फ़िर रंग लगाओ (पूछ पूछ के ) है न कितनी मेहनत का काम… ऐसा नही है  के मै गई नही हूँ, मै गई हूँ तभी तो आप को ये सब बता रही हूँ  तब मेरे साथ मेरी बेटी ही थी .अब इन छोटू महाराज के आने के बाद तो थोड़ा और मुश्किल हो गई .तो मेने सोचा की क्यों न घर मे ही होली मनाई जाये .अब सोच  तो लिया पर कहाँ किस जगह खेलूं ये बहुत बड़ी समस्या आ गई .आप हँस रहे है न कह रहें होंगे की भाई घर है वंही खेलो सड़क है वहां खेलो इतना सोचने  की क्या बात है  हुम……………. यहाँ आपने देश जैसी बात है कहाँ, दोस्तों घर के बाहर खेला तो शिकायत होगी और जो  लीजिंग  ऑफिस के लोग  है न वो जुर्माना कर देंगे होली के दिन फटका (चूना ) लग जायेगा  .और घर के अंदर खेला तो कार्पेट गंदा होगा  और उस की सफाई   ख़ुद से तो होगी नही किसी को बुलाना होगा और उसके लिए  देने होंगे  आपनी गाढी  कमाई के कीमती डॉलर…. तो क्या किया जाए..। फ़िर नजर गई रेस्टरूम पे यानि की बाथरूम पे बस फ़िर क्या था हम घुस गए बाथटब   मे खूब रंग लगाया एक दूसरे को बच्चों को भी मजा आया क्यों कि आज के दिन तो अपने घर पर माँ खुद घऱ को गंदा करने को कहती थी।  खूब रंग उछाला गया थोड़ा डर तब भी था दीवारों  का .उसके बाद बाथ टब   मे पानी  भरा गया उसमें रंग डाला गया .और उसमें डुबकी लगाई। मेरी बेटी तो बहुत खुश थी कहती है की आइ लाइक कलर बाथ .तो कलर बाथ के बाद साफ पानी से नहाकर सभी बाहर आ गये….और ऐसे हुई हमारी बाथ टब की होली…।  पर एक बात बताऊँ जब अपने देश भारत में रंग खेलते थे तो बाद मे बहुत नींद आती थी उसी तरह से बाथ टब होली के बाद  भी खूब नीद आई  .दोस्तों यदि आप के पास आपना घर है तो आप बैक यार्ड मे होली खेल सकते है पर नहाना भी वहीं  पड़ेगा क्योंकि रंग मे भीगे हुए आप घर के अंदर नही जा सकते वरना कार्पेट ख़राब होगा तो अच्छा है की मेरी तरह बाथ टब की होली खेल कर ही होली का भरपूर मजा लिया जाए…
जानते है मैं चाहती थी कि  होली की मस्ती को बस यहीं पर खत्म करके आराम करुं मगर इसके आगे तो और भी बहुत कुछ था….   शाम को घर पर एक छोटी सी पार्टी रखी थी खाना तो पहले   से ही बना लिया था बाकि थी पूड़ी कचौड़ी तलनी .भइया यहाँ का घर है तलने से पहले बहुत इंतजाम करने पड़ते है खिड़की खोलो  महक सोखने वाली मोमबत्ती जलाओ  तब जा के तलो,  वरना आने वालों  को  परेशानी होगी .और आपके घर मे खाने की खुशबू भर जायेगी .
सब हो गया लोग आगये .बातें की हँसी ठहाकों के साथ गपशप करते करते थोडी रात हुई तो हमको अपनी आवाज धीमी करना पड़ी क्योंकि पडोसियों तक हमारी आवाज नहीं पहुँचनी चाहिए…. क्या अपने देश में हम कभी ऐसा सोचते हैं कि पड़ोस में रहने वाले को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए… हम तो अपने घर के मालिक होते हैं जितनी मर्जी होगी उतना शोर मचाएंगे .
खाना खाने के बाद मैने  घर आए सभी मेहमानों का मजाकिया टाईटल देकर उनका खूब मजाक उड़ाया और जाते-जाते सबको एक टीका लगाकर कहा बुरा न मानो होली है…..तो ऐसी रही भारत से हजारों किलोमीटर दूर अमरीका के डैलास शहर की होली…..कभी आपका  होली खेलने का मूड हो तो आजाईये …अगली होली पर..।

रचना श्रीवास्तव